उत्सर्ग किये जानेवाले वृषके लक्षण, वृषोत्सर्गका विधान और उसका महत्त्व

मनुरुवाच

भगवन् श्रोतुमिच्छामि वृषभस्य च लक्षणम्।

वृषोत्सर्गविधिं चैव तथा पुण्यफलं महत्॥१

मत्स्य उवाच

धेनुमादौ परीक्षेत सुशीलां च गुणान्विताम्।

अव्यङ्गामपरिक्लिष्टां जीववत्सामरोगिणीम्॥२

स्निग्धवर्णां स्निग्धखुरां स्निग्धशृङ्गी तथैव च।

मनोहराकृतिं सौम्यां सुप्रमाणामनुद्धताम्॥३

आवतैर्दक्षिणावर्तेर्युक्तां दक्षिणतस्तथा।

वामावर्तेर्वामतश्च विस्तीर्णजघनां तथा॥४

मृदुसंहतताम्रोष्ठी रक्तग्रीवासुशोभिताम्।

अश्यामदीर्घा स्फुटिता रक्तजिह्वा तथा च या॥५

विस्त्रावामलनेत्रा शफैरविरलैर्दूलैः।

वैदूर्यमधुवर्णैश्च जलबुबुदसंनिभैः॥६

रक्तस्निग्धैश्च नयनैस्तथा रक्तकनीनिकैः ।

सप्तचतुर्दशदन्ता तथा वा श्यामतालुका॥७

षडुन्नता सुपाझेरुः पृथुपञ्चसमायता।

अष्टायतशिरोग्रीवा या राजन् सा सुलक्षणा॥८

मनुरुवाच

षडुन्नताः के भगवन् के च पञ्च समायताः।

आयताश्च तथैवाष्टौ धेनूनां के शुभावहाः॥९

मनुजीने कहा-भगवन् ! अब मैं उत्सर्ग किये जानेवाले वृषभके लक्षणों, वृषोत्सर्गकी विधि और वृषोत्सर्गसे प्राप्त होनेवाले महान् पुण्यफलको सुनना चाहता हूँ॥१॥

मत्स्यभगवान् बोले-राजन्! सर्वप्रथम धेनुकी परीक्षा करनी चाहिये। जो सुशीला, गुणवती, अविकृत अङ्गोवाली, मोटी-ताजी, जिसके बछड़े जीते हों, रोगरहित, मनोहर रंगवाली, चिकने खुरवाली, चिकने सींगोंवाली, सुदृश्य, सीधी-सादी, न अधिक ऊँची, न अधिक नाटी अर्थात् मध्यम कदवाली, अचञ्चल, भँवरीवाली, विशेषतः दाहिनी ओरकी भँवरियाँ दाहिनी ओर और बायीं ओरकी बायीं ओर हों, विस्तृत जाँघोंवाली, मुलायम एवं सटे हुए लाल होठोंवाली, लाल गलेसे सुशोभित, काली एवं लम्बी न हो ऐसी स्फुटित लाल जिह्वावाली, अश्रुरहित निर्मल नेत्रोंवाली, सुदृढ़ एवं सटे हुए खुरोंवाली, वैदूर्य, मधु अथवा जलके बुबुदके समान रंगोंवाली, लाल चिकने नेत्र और लाल कनीनिकासे युक्त, इक्कीस दाँत और श्यामवर्णके तालुसे सम्पन्न हो, जिसके छः स्थान उच्च, पाँच स्थान समान, सिर, ग्रीवा और आठ स्थान विस्तृत तथा बगल और ऊरु देश सुन्दर हों, वह गौ शुभ लक्षणोंसे युक्त मानी गयी है॥२-८॥

मनुने पूछा-भगवन्! आपने जो यह बतलाया कि गौओंके छ: स्थान उन्नत, पाँच स्थान सम तथा आठ स्थान आयत होने चाहिये, वे शुभदायक स्थान कौन- कौन हैं?॥९॥

मत्स्य उवाच

उरः पृष्ठं शिरः कुक्षी श्रोणी च वसुधाधिप।

षडुन्नतानि धेनूनां पूजयन्ति विचक्षणाः ॥१०

कर्णी नेत्रे ललाटं च पञ्च भास्करनन्दन।

समायतानि शस्यन्ते पुच्छं सास्ना च सक्थिनी॥११

चत्वारश्च स्तना राजन् ज्ञेया ह्यष्टौ मनीषिभिः।

शिरो ग्रीवायताश्चैते भूमिपाल दश स्मृताः॥१२

तस्याः सुतं परीक्षेत वृषभं लक्षणान्वितम्।

उन्नतस्कन्ध ककुद्मृजुलाङ्गेलकम्बलम्॥१३

महाकटितटस्कन्धं वैदूर्यमणिलोचनम्।

प्रवालगर्भशृङ्गाग्रं सुदीर्घपृथुवालधिम्॥१४

नवाष्टादशसंख्यैर्वा तीक्ष्णाग्रैर्दशनैः शुभैः।

मल्लिकाक्षश्च मोक्तव्यो गृहेऽपि धनधान्यदः॥१५

वर्णतस्ताम्रकपिलो ब्राह्मणस्य प्रशस्यते।

श्वेतो रक्तश्च कृष्णश्च गौर: पाटल एव च॥१६

मद्रिकस्ताम्रपृष्ठश्च शबलः पञ्चवालकैः।

पृथुकर्णो महास्कन्धः श्लक्ष्णरोमा च यो भवेत्।

रक्ताक्षः कपिलो यश्च रक्तशृङ्गतलो भवेत्॥१७

श्वेतोदरः कृष्णपार्थो ब्राह्मणस्य तु शस्यते।

स्निग्धो रक्तेन वर्णेन क्षत्रियस्य प्रशस्यते॥१८

काञ्चनाभेन वैश्यस्य कृष्णेनाप्यन्त्यजन्मनः ।

यस्य प्रागायते शृङ्गे भ्रूमुखाभिमुखे सदा॥१९

सर्वेषामेव वर्णानां सर्वः सर्वार्थसाधकः।

मार्जारपादः कपिलो धन्यः कपिलपिङ्गलः॥२०

श्वेतो मार्जारपादस्तु धन्यो मणिनिभेक्षणः ।

करटः पिङ्गलश्चैव श्वेतपादस्तथैव च॥२१

सर्वपादसितो यश्च द्विपादश्वेत एव च।

कपिञ्जलनिभो धन्यस्तथा तित्तिरिसंनिभः ॥ २२

आकर्णमूलं श्वेतं तु मुखं यस्य प्रकाशते।

नन्दीमुखः स विज्ञेयो रक्तवर्णो विशेषतः॥२३

मत्स्यभगवान्ने कहा-पृथ्वीपते! छाती, पीठ, सिर, दोनों कोख तथा कमर- इन छ: उन्नत स्थानोंवाली धेनुओंको विज्ञलोग श्रेष्ठ मानते हैं। सूर्यपुत्र! दोनों कान, दोनों नेत्र तथा ललाट-इन पाँच स्थानोंका सम-आयत होना प्रशंसित है। पूँछ, गलकम्बल, दोनों सक्थियाँ (घुटनोंसे नीचेके भाग) और चारों स्तन-ये आठ तथा सिर और गर्दन-ये दो मिलाकर दस स्थान आयत होनेपर श्रेष्ठ माने गये हैं। भूपते! ऐसी सर्वलक्षणसम्पन्न धेनुके शुभ लक्षणोंसे युक्त बछड़ेकी भी परीक्षा करनी चाहिये। जिसका कंधा और ककुद् ऊँचा हो, पूंछ और गलेका कम्बल (चमड़ा) कोमल हो, कटितट और स्कन्ध विशाल हो, वैदूर्य मणिके समान नेत्र हों, सींगोंका अग्रभाग प्रबाल (मूंगे)-के सदृश हो, पूँछ लम्बी तथा मोटी हो, तीखे अग्रभागवाले नौ या अठारह सुन्दर दाँत हों तथा मल्लिका-पुष्पोंकी तरह श्वेत आँखें हों, ऐसे वृषका उत्सर्ग करना चाहिये, उसके गृहमें रहनेसे भी धन-धान्यकी वृद्धि होती है॥१०-१५॥

ब्राह्मणके लिये ताम्रके समान लाल अथवा कपिल वर्णका वृषभ उत्तम है। जो सफेद, लाल, काला, भूरा, पाटल, पूरा ऊँचा लाल पीठवाला, पाँच प्रकारके रोएँसे चितकबरा, स्थूल कानोंवाला विशाल कंधेसे युक्त, चिकने रोमोंवाला, लाल आँखोंवाला, कपिल, सींगका निचला भाग लाल रंगवाला, सफेद पेट और कृष्ण पार्श्वभागवाला हो, ऐसा वृषभ ब्राह्मणके लिये श्रेष्ठ कहा गया है। लाल रंगके चिकने रोमवाला वृषभ क्षत्रिय जातिके लिये, सुवर्णके समान वर्णवाला वृषभ वैश्यके लिये और काले रंगका वृष शूद्रके लिये उत्तम माना गया है। जिस वृषभके सींग आगेकी ओर विस्तृत तथा भौहें मुखकी ओर झुकी हों, वह सभी वर्गों के लिये सर्वार्थ-सिद्ध करनेवाला होता है। बिलावके समान पैरोंवाला, कपिल या पीले रंगका मिश्रित वृषभ धन्य होता है। श्वेत रंगका, बिल्लीके समान पैरवाला और मणिके समान आँखोंवाला वृषभ धन्य है। कौवेके समान काले और पीले रंगवाला तथा श्वेत पैरोंवाला वृष धन्य है। जिसके सभी पैर अथवा दो पैर श्वेतवर्णके हों और जिसका रंग कपिञ्जल अथवा तीतरके समान हो, वह भी धन्य है ॥ १६-२२॥

जिस वृषभका मुख कानतक श्वेत दिखायी पड़ता हो तथा विशेषतया वह लाल वर्णका हो, उसे नन्दीमुख जानना चाहिये।

श्वेतं तु जठरं यस्य भवेत् पृष्ठं च गोपतेः।

वृषभः स समुद्राक्षः सततं कुलवर्धनः ॥ २४

मल्लिकापुष्पचित्रश्च धन्यो भवति पुङ्गवः।

कमलैर्मण्डलैश्चापि चित्रो भवति भाग्यदः ॥२५

अतसीपुष्पवर्णश्च तथा धन्यतरः स्मृतः।

एते धन्यास्तथाधन्यान् कीर्तयिष्यामि ते नृप॥ २६

कृष्णतालवोष्ठवदना रूक्षशृङ्गशफाश्च ये।

अव्यक्तवर्णा ह्रस्वाश्च व्याघ्रसिंहनिभाश्च ये॥ २७

ध्वातगृध्रसवर्णाश्च तथा मूषकसंनिभाः।

कुण्ठाः काणास्तथा खञ्जाः केकराक्षास्तथैव च ॥ २८

विषमश्वेतपादाश्च उद्भ्रान्तनयनास्तथा।

नैते वृषाः प्रमोक्तव्या न च धार्यास्तथा गृहे ॥ २९

मोक्तव्यानां च धार्याणां भूयो वक्ष्यामि लक्षणम्।

स्वस्तिकाकारशृङ्गाश्च तथा मेघौघनिःस्वनाः॥३०

महाप्रमाणाश्च तथा मत्तमातङ्गगामिनः ।

महोरस्का महोच्छ्राया महाबलपराक्रमाः।

शिरः कर्णी ललाटं च वालधिश्चरणास्तथा।। ३१

नेत्रे पार्श्वे च कृष्णानि शस्यन्ते चन्द्रभासिनाम्।

श्वेतान्येतानि शस्यन्ते कृष्णस्य तु विशेषतः॥ ३२

भूमौ कर्षति लागूलं प्रलम्बस्थूलवालधिः।

पुरस्तादुद्यतो नीलो वृषभश्च प्रशस्यते॥३३

शक्तिध्वजपताकाढ्या येषां राजी विराजते।

अनड्वाहस्तु ते धन्याश्चित्रसिद्धिजयावहाः॥३४

प्रदक्षिणं निवर्तन्ते स्वयं ये विनिवर्तिताः।

समुन्नतशिरोग्रीवा धन्यास्ते यूथवर्धनाः॥ ३५

रक्तशृङ्गाग्रनयनः श्वेतवर्णो भवेद् यदि।

शफैः प्रवालसदृशैर्नास्ति धन्यतरस्ततः॥ ३६

एते धार्याः प्रयत्लेन मोक्तव्या यदि वा वृषाः ।

धारिताश्च तथा मुक्ता धनधान्यप्रवर्धनाः ॥३७

जिस वृषभका पेट तथा पीठ श्वेतवर्ण हो, वह समुद्राक्ष नामक वृषभ कहा जाता है। वह सर्वदा कुलकी वृद्धि करनेवाला होता है। जो वृष मल्लिकाके फूलके समान चितकबरे रंगवाला होता है, वह धन्य है। जो कमल-मण्डलके समान चितकबरा होता है, वह सौभाग्यवर्धक होता है तथा अलसीके फूलके समान नीले रंगवाला बैल धन्यतर कहा गया है। राजन् ! ये उत्तम लक्षणोंवाले वृष हैं। अब मैं आपसे अशुभ लक्षणसम्पन्न वृषभोंका वर्णन कर रहा हूँ। जो काले तालु, ओंठ और मुखवाले, रूखे सींगों एवं खुरोंवाले, अव्यक्त रंगवाले, नाटे, बाघ तथा सिंहके समान भयानक, कौवे और गृध्रके समान रंगवाले या मूषकके समान अल्पकाय, मन्द स्वभाववाले, काने, लँगड़े, नीची-ऊँची आँखोंवाले, विषम (तीन या एक) पैरोंमें श्वेत रंगवाले तथा चञ्चल नेत्रोंवाले हों, ऐसे वृषभोंका न तो उत्सर्ग करना चाहिये और न उन्हें अपने घरमें ही रखना ठीक है। मैं पुनः उत्सर्ग करने तथा पालने योग्य (श्रेष्ठ) वृषभोंका लक्षण बतला रहा हूँ। जिनके सींग स्वस्तिकके आकारके हों और स्वर बादलकी गर्जनाके सदृश हो, जो ऊँचे कदवाले, हाथीके समान चलनेवाले, विशाल छातीवाले, बहुत ऊँचे, महान् बल-पराक्रमसे युक्त हों तथा चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णके जिन वृषभोंके सिर, दोनों कान, ललाट, पूँछ, चारों पैर, दोनों नेत्र, दोनों बगलें काले रंगके हों एवं काले रंगवाले वृषभोंके ये स्थान श्वेत हों तो वे उत्तम माने गये हैं। जिसकी लम्बी और मोटी पूँछ पृथ्वीपर रगड़ खाती हो और जिसका अगला भाग उठा हुआ हो, वह नील वृषभ प्रशंसनीय माना गया है ॥२३-३३॥

जिनके शरीरमें शक्ति, ध्वज और पताकाओंकी रेखा बनी हो, वे वृषभ धन्य हैं और विचित्र सिद्धि एवं विजय प्रदान करनेवाले हैं। जो घुमाये जानेपर या स्वयं घूमनेपर दाहिनी ओर घूमते हों तथा जिनके सिर एवं कंधे समुन्नत हों, वे धन्य तथा अपने समूहके वृद्धिकारक हैं। जिसके सींगोंके अग्रभाग तथा नेत्र लाल हों और वह यदि श्वेतवर्णका हो तथा उसके खुर प्रवालके समान लाल हों तो उससे श्रेष्ठ कोई वृषभ नहीं होता। ऐसे वृषभोंका प्रयत्नपूर्वक पालन अथवा उत्सर्ग करना चाहिये; क्योंकि ये रखने अथवा उत्सर्ग करने-दोनों दशाओंमें धन-धान्यको बढ़ाते हैं।

चरणानि मुखं पुच्छं यस्य श्वेतानि गोपतेः।

लाक्षारससवर्णश्च तं नीलमिति निर्दिशेत्॥ ३८

वृष एवं स मोक्तव्यो न सन्धार्यो गृहे भवेत्।

तदर्थमेषा चरति लोके गाथा पुरातनी॥३९

एष्टव्या बहवः पुत्रा योकोऽपि गयां व्रजेत्।

गौरी चाप्युद्वहेत् कन्यां नीलं वा वृषमुत्सृजेत्॥ ४०

एवं वृष लक्षणसम्प्रयुक्तं

गृहोद्भवं क्रीतमथापि राजन्।

मुक्त्वा न शोचेन्मरणं महात्मा

मोक्षं गतश्चाहमतोऽभिधास्ये॥४१

जिस वृषभके चारों चरण, मुख और पूँछ श्वेत हों तथा शेष शरीरका रंग लाह-रसके समान हो, उसे नील वृषभ कहते हैं। ऐसा वृषभ उत्सर्ग कर देना चाहिये, उसे घरमें पालना ठीक नहीं हैं; क्योंकि ऐसे वृषभके लिये लोकमें एक ऐसी पुरानी गाथा प्रचलित है कि बहुतेरे पुत्रोंकी कामना करनी चाहिये; क्योंकि उनमेंसे कोई भी तो गयाकी यात्रा करेगा या गौरी कन्याका दान करेगा या नीले वृषभका उत्सर्ग करेगा। राजन्! ऐसे लक्षणयुक्त वृषभका चाहे वह घरमें उत्पन्न हुआ हो या खरीदा गया हो, उत्सर्ग कर महात्मा पुरुष कभी मृत्युके भयसे शोकग्रस्त नहीं होता; उसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। इसीलिये मैं आपसे कह रहा हूँ॥३४-४१॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वृषभलक्षणं नाम सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०७॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वृषभलक्षण नामक दो सौ सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ। २०७॥