मत्स्य महा पुराण
आश्रमस्थ विवरमें पुरूरवा* का प्रवेश, आश्रमकी शोभाका वर्णन तथा पुरुरवाकी तपस्या
सूत उवाच
तत्र यौ तौ महाशृङ्गौ महावौँ महाहिमौ।
तृतीयं तु तयोर्मध्ये शृङ्गमत्यन्तमुच्छ्रितम्॥१
नित्यातप्तशिलाजालं सदाभ्रपरिवर्जितम्।
तस्याधस्ताद् वृक्षगणो दिशां भागे च पश्चिमे॥२
जातीलतापरिक्षिप्त विवरं चारुदर्शनम्।
दृष्ट्वैव कौतुकाविष्टस्तं विवेश महीपतिः॥३
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! वहाँ सदा हिमाच्छादित तथा रंग-बिरंगे जो दो महान् शिखर थे, उनके बीचमें एक तीसरा शिखर था, जो अत्यन्त ऊँचा था। वह बादलोंसे सदा शून्य रहता था, जिससे उसकी शिलाएँ नित्य सन्तप्त बनी रहती थीं। उस शिखरके नीचे पश्चिम दिशामें वृक्षोंके समूह शोभा पा रहे थे। उन्हींके बीचमें एक अत्यन्त सुन्दर विवर (छिद्र) था, जो मालतीकी लताओंसे आच्छादित था। उसे देखते ही राजा पुरूरवा आश्चर्यचकित हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने उस विवरमें
*इस पुराणमें-यजुर्वेद ५। २, ऋग्वेद १० । १५, शतपथब्रा० ११। ५ आदिमें संकथित पुरूरवाके कथानकका सर्वाधिक विस्तारसे उपवृंहण हुआ है और कई बार उसकी पुनरुक्ति भी हुई है। इससे विक्रमोर्वशीयमें कालिदास एवं पार्जीटर आदि आधुनिक पाश्चात्त्य विद्वान् लेखक बहुत प्रभावित हुए हैं। निघण्टु ५।४ तथा यास्कीय निरुक्त १० । ४६ एवं ऋग्वेद १०।९५।२ के अनुसार ये सूर्य या मूल प्राणतत्त्व हैं। पाणि०६।३ । १३७ के अनुसार यहाँ 'पुरू' में दीर्घ हुआ है।
तमसा चातिनिबिडं नल्वमानं सुसंकटम्।
नल्वमात्रमतिक्रम्य स्वप्रभाभरणोज्वलम्॥ ४
तमुच्छ्रितमथात्यन्तं गम्भीरं परिवर्तुलम्।
न तत्र सूर्यस्तपति न विराजति चन्द्रमाः॥ ५
तथापि दिवसाकारं प्रकाशं तदहर्निशम्।
क्रोशाधिकपरीमाणं सरसा च विराजितम्॥ ६
समंतात् सरसस्तस्य शैललग्ना तु वेदिका।
सौवर्णै राजतैर्वृक्षैर्विद्रुमैरुपशोभितम्।। ७
नानामाणिक्यकुसुमैः सुप्रभाभरणोज्वलैः ।
तस्मिन् सरसि पद्मानि पद्मरागच्छदानि तु॥ ८
वज्रकेशरजालानि सुगन्धीनि तथा युतम्।
पत्रैर्मरकतैर्नीलैवैदूर्यस्य महीपते॥ ९
कर्णिकाश्च तथा तेषां जातरूपस्य पार्थिव।
तस्मिन् सरसि या भूमिः सा तु वज्रसमाकुला॥१०
नानारत्नैरुपचिता जलजानां समाश्रया।
कपर्दिकानां शुक्तीनां शङ्खानां च महीपते॥११
मकराणां च मत्स्यानां चण्डानां कच्छपैः सह।
तत्र मरकतखण्डानि वज्राणां च सहस्त्रशः॥१२
पद्मरागेन्द्रनीलानि महानीलानि पार्थिव ।
पुष्परागाणि सर्वाणि तथा कर्केतनानि च ॥१३
तुत्थकस्य तु खण्डानि तथा शेषस्य भागशः।
रा(ला)जावर्तस्य मुख्यस्य रुधिराक्षस्य चाप्यथ॥१४
सूर्येन्दुकान्तयश्चैव नीलो वर्णान्तिमश्च यः।
ज्योतीरसस्य रम्यस्य स्यमन्तस्य च भागशः॥१५
सुरोरगवलक्षाणां स्फटिकस्य तथैव च।
गोमेदपित्तकानां च धूलीमरकतस्य च ॥ १६
वैदूर्यसौगन्धिकयोस्तथा राजमणेर्नृप।
वज्रस्यैव च मुख्यस्य तथा ब्रह्ममणेरपि॥१७
मुक्ताफलानि मुक्तानां ताराविग्रहधारिणीम्॥१८
प्रवेश किया। वह मार्ग चार सौ हाथ (एक फल्ग)-तक घने अन्धकारसे समावृत होनेके कारण अत्यन्त संकटमय था। उस चार सौ हाथकी दूरी पार कर लेनेपर राजा ऐसे स्थानपर पहुँचे, जो अपनी कान्तिसे ही उद्भासित हो रहा था। वह स्थान ऊँचा, अत्यन्त गम्भीर और गोलाकार था तथा एक कोसके विस्तारवाला था। यद्यपि वहाँ न सूर्य तपते थे न चन्द्रमा ही विराजमान थे, तथापि वह दिनकी भाँति रात-दिन प्रकाशयुक्त बना रहता था। वहाँ एक सरोवर भी था। जो सुवर्ण, चाँदी और मूंगेके समान रंग- बिरंगे वृक्षोंसे सुशोभित था। उन वृक्षोंमें नाना प्रकारके मणियोंके सदृश परमोत्कृष्ट कान्तिसे युक्त फूल खिले हुए थे। उस सरोवरके चारों ओर शिलाओंकी वेदी बनी हुई थी, भूपाल ! उस सरोवरमें विभिन्न प्रकारके कमल खिले हुए थे, जिनके पुष्पदल पद्मरागमणि-सरीखे, केसर-समूह हीरेके-से और पत्ते नीले वैदूर्य मणिके समान चमक रहे थे और वे सुगन्धसे भरे हुए थे। उनकी कर्णिका (छत्ता) सुवर्णके समान चमकीली थी॥ १-९३ ॥
उस सरोवरमें जो भूमि थी, वह हीरेसे आच्छादित थी, साथ ही वह नाना प्रकारके दूसरे रत्नोंसे भी मण्डित थी। महीपाल! वहाँ जलमें उत्पन्न होनेवाली कौड़ी, सीपी और शङ्ख भी वर्तमान थे। वह कछुओंके साथ-साथ भयानक घड़ियालों और मछलियोंका वासस्थान था। राजन्! उसमें कहीं मरकतमणि तथा हीरेके हजारों टुकड़े पड़े थे। कहीं पद्मराग (माणिक्य या लाल), इन्द्रनील (नीलम), महानील, पुष्पराग (पुखराज), कर्केतन, तुत्थक तथा शेष मणियोंके खण्ड चमक रहे थे। कहीं लाजावर्त, मुख्य, रुधिराक्ष, सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त, नीलवर्णान्तिक, ज्योतीरस, रम्य एवं स्यमन्तक मणियोंके टुकड़े यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे। कहीं सुरमणि, सर्पमणि, वलक्षमणि और स्फटिकमणिकी चट्टानें चमक रही थीं, तो कहीं गोमेद, पित्तक, धूलीमणि, मरकत, वैदूर्य, सौगन्धिक, राजमणि, हीरा, मुख्य तथा ब्रह्ममणिके खण्ड दृष्टिगोचर हो रहे थे। कहीं-कहीं बिखरे हुए मोती* अपनी प्रभा फैला रहे थे, जो ताराओंके समान लग रहे थे।
* यहाँ श्लोक ८ से लेकर १९ तकके-बारह श्लोकोंमें--३२ मुख्य मणियोंके उल्लेखपूर्वक सम्पूर्ण रत्नशास्त्रका संक्षेपमें निरूपण हुआ है। गरुडपुराण ६८-७८, विष्णुधर्मो० २। १५, युक्तिकल्पतरु, बृहत्संहिता, रत्नसारमें इनका विस्तृत परिचय है।
सुखोष्णं चैव तत् तोयं स्नानाच्छीतविनाशनम्।
वैदूर्यस्य शिला मध्ये सरसस्तस्य शोभना॥१९
प्रमाणेन तथा सा च द्वे च राजन् धनुःशते।
चतुरस्रा तथा रम्या तपसा निर्मितात्रिणा॥२०
बिलद्वारसमो देशो यत्र यत्र हिरण्मयः ।
प्रदेश: स तु राजेन्द्र द्वीपे तस्मिन् मनोहरे॥२१
तथा पुष्करिणी रम्या तस्मिन् राजशिलातले।
सुशीतामलपानीया जलजैश्च विराजिता ।। २२
आकाशप्रतिमा राजंश्चतुरस्रा मनोहरा।
तस्यास्तदुदकं स्वादु लघु शीतं सुगन्धिकम्॥२३
न क्षिणोति यथा कण्ठं कुक्षिं नापूरयत्यपि।
तृप्तिं विधत्ते परमां शरीरे च महत् सुखम्॥ २४
मध्ये तु तस्याः प्रासादं निर्मितं तपसात्रिणा।
रुक्मसेतुप्रवेशान्तं सर्वरत्नमयं शुभम्॥२५
शशाङ्करश्मे: संकाशं प्रासादं राजतं हितम्।
रम्यवैदूर्यसोपानं विद्रुमामलसारकम्॥२६
इन्द्रनीलमहास्तम्भं मरकतासक्तवेदिकम्।
वज्रांशुजालैः स्फुरितं रम्यं दृष्टिमनोरमम्॥२७
प्रासादे तत्र भगवान् देवदेवो जनार्दनः ।
भोगिभोगावलीसुप्तः सर्वालङ्कारभूषितः ॥२८
जान्वाच्य कुञ्चितस्त्वेको देवदेवस्य चक्रिणः ।
फणीन्द्रसंनिविष्टोऽध्रिद्धितीयश्च तथानघ । २९
लक्ष्युत्सङ्गतोऽध्रिस्तु शेषभोगप्रशायिनः ।
फणीन्द्रभोगसंन्यस्तबाहुः केयूरभूषणः॥३०
अङ्गुलीपृष्ठविन्यस्तदेवशीर्षधर भुजम्।
एकं वै देवदेवस्य द्वितीयं तु प्रसारितम्॥३१
उस सरोवरका जल कुछ गुनगुना गरम था, जो स्नान करनेसे ठण्डकको दूर कर देता था। उस सरोवरके मध्यमें वैदूर्यमणिकी एक सुन्दर शिला थी। राजन् ! उस रमणीय शिलाको महर्षि अत्रिने अपनी तपस्याके प्रभावसे निर्मित किया था। वह आठ सौ हाथ (दो फलांग) विस्तृत एवं चौकोर थी। राजेन्द्र ! उस मनोहर द्वीपमें सारा प्रदेश बिलद्वारके समान स्वर्णमय था ॥१०-२१॥
राजन्! उस शिलातलपर एक रमणीय पुष्करिणी (पोखरी) थी, जो चौकोर, मनोमोहिनी तथा आकाशके समान निर्मल थी। वह अत्यन्त शीतल एवं निर्मल जलसे परिपूर्ण तथा कमलोंसे सुशोभित थी। उसका वह जल सुस्वादु, पचनेमें हलका, शीतल और सुगन्धयुक्त था। वह जैसे गलेको कष्ट नहीं पहुँचाता था, उसी प्रकार कुक्षिको भी वायुसे परिपूर्ण नहीं करता था, अर्थात् वायुविकार नहीं उत्पन्न करता था, अपितु शरीरमें पहुँचकर परम तृप्ति उत्पन्न करता तथा महान् सुख पहुँचाता था। उस पुष्करिणी (बावली)-के मध्यभागमें महर्षि अत्रिने अपनी तपस्याके बलसे एक महलका निर्माण किया था। वह सुन्दर प्रासाद चाँदीका बना हुआ था, जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान चमक रहा था। उसमें सभी प्रकारके रत्न जड़े गये थे तथा भीतर प्रवेश करनेके लिये सोनेकी सीढ़ियाँ बनी थीं, जिनमें रमणीय वैदूर्य एवं निर्मल मूंगे लगे हुए थे। उसमें इन्द्रनील मणिके विशाल खम्भे लगे थे। उसकी वेदिका अर्थात् फर्शपर मरकतमणि जड़ी हुई थी। हीरेकी किरणोंसे चमचमाता हुआ वह रमणीय महल देखते ही मनको लुभा लेता था। उस महलमें देवाधिदेव भगवान् जनार्दन (मूर्ति-रूपसे) सम्पूर्ण आभूषणोंसे विभूषित होकर शेषनागके फणोंपर शयन कर रहे थे। अनघ! देवाधिदेव चक्रधारी भगवान्का एक चरण घुटनेसे मुड़ा हुआ था और दूसरा चरण शेषनागके ऊपरसे होता हुआ लक्ष्मीकी गोदमें स्थित था। शेषनागके फणोंपर शयन करनेवाले भगवान्का बाजूबंदसे विभूषित एक हाथ शेषनागके फणोंपर स्थापित था ॥२२-३०॥
उस हाथकी अङ्गुलियोंका पृष्ठभाग शेषके सिरपर रखा हुआ था। उनका दूसरा हाथ फैला हुआ था।
समाकुञ्चितजानुस्थमणिबन्धेन शोभितम्।
किञ्चिदाकुञ्चितं चैव नाभिदेशकरस्थितम्॥३२
तृतीयं तु भुजं तस्य चतुर्थं तु तथा शृणु।
आत्तसंतानकुसुमं घ्राणदेशानुसर्पिणम्॥ ३३
लक्ष्म्या संवाह्यमानाघ्रिः पद्मपत्रनिभैः करैः।
संतानमालामुकुटं हारकेयूरभूषितम्॥३४
भूषितं च तथा देवमङ्गदैरङ्गुलीयकैः।
फणीन्द्रफणविन्यस्तचारुरत्नशिखोज्ज्वलम्॥ ३५
अज्ञातवस्तुचरितं प्रतिष्ठितमथात्रिणा।
सिद्धानुपूज्यं सततं संतानकुसुमार्चितम्॥३६
दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गं दिव्यधूपेन धूपितम्।
सुरसैः सुफलैर्हृद्यैः सिद्धरुपहृतैः सदा॥३७
शोभितोत्तमपार्श्व तं देवमुत्पलशीर्षकम्।
ततः सम्मुखमुद्वीक्ष्य ववन्दे स नराधिपः॥३८
जानुभ्यां शिरसा चैव गत्वा भूमिं यथाविधि।
नाम्नां सहस्त्रेण तथा तुष्टाव मधुसूदनम्॥३९
प्रदक्षिणमथो चक्रे स तूत्थाय पुनः पुनः।
रम्यमायतनं दृष्ट्वा तत्रोवासाश्रमे पुनः ।। ४०
बिलाद् बहिर्गुहां काञ्चिदाश्रित्य सुमनोहराम्।
तपश्चकार तत्रैव पूजयन् मधुसूदनम्॥४१
नानाविधैस्तथा पुष्पैः फलमूलैः सगोरसैः।
नित्यं त्रिषवणस्नायी वह्निपूजापरायणः॥ ४२
देववापीजलैः कुर्वन् सततं प्राणधारणम्।
सर्वाहारपरित्यागं कृत्वा तु मनुजेश्वरः॥४३
अनास्तृतगुहाशायी कालं नयति पार्थिवः।
त्यक्ताहारक्रियश्चैव केवलं तोयतो नृपः।
न तस्य ग्लानिमायाति शरीरं च तदद्भुतम्॥४४
तीसरे हाथका मणिबन्ध मुड़े हुए घुटनेपर सुशोभित था तथा कुछ मुड़कर नाभिदेशपर फैले हुए पहले हाथपर अवलम्बित था। अब उनके चौथे हाथकी दशा सुनो। चौथे हाथमें भगवान् कल्पवृक्षका पुष्प धारण किये हुए थे और उसे अपनी नासिकातक ले गये थे। उस समय लक्ष्मी अपने कमल-दलके समान कोमल हाथोंसे भगवान्का चरण दबा रही थीं। भगवान्के मस्तकपर कल्पवृक्षके पुष्पोंकी मालाओंका मुकुट शोभा दे रहा था। वे हार, केयूर, बाजूबंद और अंगूठीसे विभूषित तथा शेषनागके फणोंपर रखे हुए सुन्दर रत्नोंसे प्रकाशित हो रहे थे। एवं इनकी विशेषता यह थी कि महर्षि अत्रिने उनकी स्थापना की थी। उनका चरित्र वस्तुत: जाना नहीं जा सकता। सिद्धगण सदा उनकी पूजा करते थे। कल्पवृक्षके पुष्पोंद्वारा उनकी अर्चना होती थी। उनके अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप था तथा वे दिव्य धूपसे धूपित थे। सिद्धगण उन्हें सदा सरस एवं मनोहर फलोंका उपहार देते थे। वे उत्तम पार्श्वसे सुशोभित थे तथा उनके मस्तकपर कमल शोभा पा रहा था॥ ३१-३७३ ॥
ऐसे भगवान् (-की मूर्ति)-को अपने सम्मुख देखकर राजा पुरूरवाने विधिपूर्वक घुटने टेककर और मस्तकको भूमिपर रखकर भगवान्को प्रणाम किया तथा सहस्रनामोंद्वारा उन मधुसूदनका स्तवन किया और उठकर बारम्बार उनकी प्रदक्षिणा की। पुन: उस रमणीय देवमन्दिरको देखकर उसी आश्रममें निवास करनेका निश्चय किया। तत्पश्चात् उस बिलसे बाहर निकलकर वे किसी अतिशय मनोहारिणी गुफाका आश्रय लेकर नाना प्रकारके पुष्पों, फलों, मूलों तथा गोरसोंद्वारा भगवान् मधुसूदनकी पूजा करते हुए वहीं तपस्यामें संलग्न हो गये। वे नित्य त्रिकाल स्नान तथा अग्निहोत्र करते थे। वे नरेश सभी प्रकारके आहारका परित्याग कर सदा उस देववापी (पोखरी)- के जलसे ही प्राणोंकी रक्षा करते थे। राजा बिना बिछौनेके ही गुफामें शयन करते हुए समय बिता रहे थे। यद्यपि राजाने भोजन करना छोड़ दिया था और केवल जलपर ही निर्भर थे, तथापि उन्हें किसी प्रकारकी ग्लानि नहीं होती थी, प्रत्युत उनका शरीर अद्भुत तेजोमय हो गया
एवं स राजा तपसि प्रसक्तः
सम्पूजयन् देववरं सदैव।
तत्राश्रमे कालमुवास कञ्चित्
स्वर्गोपमे दुःखमविन्दमानः॥ ४५
था। इस प्रकार राजा पुरूरवाने तपस्यामें दत्तचित्त होकर सदा देवश्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी पूजा करते हुए दुःखकी कुछ भी परवा न कर उस स्वर्गतुल्य आश्रममें कुछ कालतक निवास किया॥३८-४५॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशे आयतनवर्णनं नामैकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ ११९।।
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णनमें आयतनवर्णन नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११९ ॥
Summary of chapter 119 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya presents a vivid description of Uttarakuru-varsha, the northernmost sub-continent of Jambūdvīpa, celebrated as a realm of natural perfection and divine pleasure. Bhagavān Matsya reveals that the trees in Uttarakuru yield fine garments, precious ornaments, delicious food, and comfortable couches upon request. The residents possess golden complexions, enjoy eternal youth, and live in complete harmony without anger, jealousy, or suffering, spending their time in joyful devotional songs dedicated to Parameshvara.