मत्स्य महा पुराण
पर्वतदानके दस भेद, धान्यशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
नारद उवाच
भगवश्रोतुमिच्छामि दानमाहात्म्यमुत्तमम्।
यदक्षयं परे लोके देवर्षिगणपूजितम्॥१
उमापतिरुवाच
मेरोः प्रदानं वक्ष्यामि दशधा मुनिपुङ्गव।
यत्प्रदानान्नरो लोकानाप्नोति सुरपूजितान्॥२
पुराणेषु च वेदेषु यज्ञेष्वायतनेषु च।
न तत्फलमधीतेषु कृतेष्विह यदश्नुते॥३
दानकी विधि और उसका माहात्म्य नारदजीने पूछा-भगवन् ! अब मैं विविध दानोंके उत्तम माहात्म्यको श्रवण करना चाहता हूँ, जो देवगणों एवं ऋषिसमूहोंद्वारा पूजित और परलोकमें अक्षय फल देनेवाला है॥१॥
उमापतिने कहा-मुनिपुङ्गव! मैं मेरु-(पर्वत) दानके दस भेदोंको बतला रहा हूँ। जिनका दान करनेसे मनुष्य देवपूजित लोकोंको प्राप्त करता है। उसे इस लोकमें जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह वेदों और पुराणोंके अध्ययनसे, यज्ञानुष्ठानसे और देव-मन्दिर आदिके
तस्माद् विधानं वक्ष्यामि पर्वतानामनुक्रमात् ।
प्रथमो धान्यशैलः स्याद् द्वितीयो लवणाचलः॥ ४
गुडाचलस्तृतीयस्तु चतुर्थो हेमपर्वतः।
पञ्चमस्तिलशैलः स्यात् षष्ठः कार्पासपर्वतः॥ ५
सप्तमो घृतशैलश्च रत्नशैलस्तथाष्टमः।
राजतो नवमस्तद्वद् दशमः शर्कराचलः॥ ६
वक्ष्ये विधानमेतेषां यथावदनुपूर्वशः।
अयने विषुवे पुण्ये व्यतीपाते दिनक्षये॥ ७
शुक्लपक्षे तृतीयायामुपरागे शशिक्षये।
विवाहोत्सवयज्ञेषु द्वादश्यामथ वा पुनः॥ ८
शुक्लायां पञ्चदश्यां वा पुण्यः वा विधानतः।
धान्यशैलादयो देया यथाशास्त्रं विजानता॥ ९
तीर्थेष्वायतने वापि गोष्ठे वा भवनाङ्गणे।
मण्डपं कारयेद् भक्त्या चतुरस्त्रमुदङ्मुखम्।
प्रागुदक्प्रवणं तद्वत् प्राङ्मुखं च विधानतः॥१०
गोमयेनानुलिप्तायां भूमावास्तीर्य वै कुशान्।
तन्मध्ये पर्वतं कुर्याद् विष्कम्भपर्वतान्वितम्॥११
धान्यद्रोणसहस्रेण भवेद् गिरिरिहोत्तमः।
मध्यमः पञ्चशतिकः कनिष्ठः स्यात् त्रिभिः शतैः॥१२
मेरुर्महाव्रीहिमयस्तु मध्ये
सुवर्णवृक्षत्रयसंयुतः स्यात्।
पूर्वेण मुक्ताफलवज्रयुक्तो
याम्येन गोमेदकपुष्परागैः॥१३
पश्चाच्च गारुत्मतनीलरत्नैः
सौम्येन वैदूर्यसरोजरागैः।
श्रीखण्डखण्डैरभितः प्रवालै-
लतान्वितः शुक्तिशिलातलः स्यात्।।१४
ब्रह्माथ विष्णुर्भगवान् पुरारि-
दिवाकरोऽप्यत्र हिरण्मयः स्यात्।
मूर्धन्यवस्थानममत्सरेण
कार्यं त्वनेकैश्च पुनर्द्विजौघैः ।। १५
निर्माणसे भी नहीं प्राप्त होता। इसलिये अब मैं पर्वतोंके क्रमसे उनके विधानका वर्णन कर रहा हूँ। (उनके नाम हैं-) पहला धान्यशैल, दूसरा लवणाचल, तीसरा गुडाचल, चौथा हेमपर्वत, पाँचवाँ तिलशैल, छठा कार्पासपर्वत, सातवाँ घृतशैल, आठवाँ रत्नशैल, नवाँ रजतशैल और दसवाँ शर्कराचल। इनका विधान यथार्थरूपसे क्रमश: बतला रहा हूँ। सूर्यके उत्तरायण और दक्षिणायनके समय, पुण्यमय विषुवयोगमें, व्यतीपातयोगमें, ग्रहणके समय सूर्य अथवा चन्द्रमाके अदृश्य हो जानेपर, शुक्लपक्षकी तृतीया, द्वादशी अथवा पूर्णिमा तिथिके दिन, विवाह, उत्सव और यज्ञके अवसरोंपर तथा पुण्यप्रद शुभ नक्षत्रके योगमें विद्वान् दाताको शास्त्रादेशानुसार विधिपूर्वक धान्यशैल आदि पर्वतदानोंको करना चाहिये। इसके लिये तीर्थों में, देवमन्दिरमें, गोशालामें अथवा अपने घरके आँगनमें ही भक्तिपूर्वक विधि-विधानके साथ एक चौकोर मण्डपका निर्माण करावे; उसमें उत्तर और पूर्व दिशामें दो दरवाजे हों और उसकी भूमि पूर्वोत्तर दिशामें ढालू हो। उस मण्डपकी गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर कुश बिछाकर उसके बीचमें विष्कम्भपर्वतसहित देय पदार्थकी पर्वताकार राशि लगा दे। इस विषयमें एक हजार द्रोण अन्नका पर्वत उत्तम, पाँच सौ द्रोणका मध्यम और तीन सौ द्रोणका कनिष्ठ माना जाता है॥ २-१२॥
महान् धान्यराशिसे बने हुए मेरु पर्वतको मध्यमें तीन स्वर्णमय वृक्षोंसे युक्त कर, पूर्व दिशामें मोती और हीरेसे, दक्षिण दिशा में गोमेद और पुष्पराग (पुखराज)- से, पश्चिम दिशामें गारुत्मत (पन्ना) और नीलम मणिसे, उत्तर दिशामें वैदूर्य और पद्मराग मणिसे तथा चारों ओर चन्दनके टुकड़ों और मूंगेसे सुशोभित कर दे। उसे लताओंसे परिवेष्टित तथा सीपीके शिलाखण्डोंसे सुसज्जित कर दिया जाय। पुनः यजमान गर्वरहित होकर अनेकों द्विजसमूहोंके साथ उस पर्वतके मूर्धा-स्थानपर ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शङ्कर और सूर्यकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित करे।
१. सुमेरुगिरिके चारों ओर स्थित मन्दर, गन्धमादन, विपुल और सुपार्श्व नामक पर्वतोंको 'विष्कम्भपर्वत' कहा जाता है।
२. बत्तीस सेरका एक प्राचीन मान।
चत्वारि शृङ्गाणि च राजतानि
नितम्बभागेष्वपि राजतः स्यात्।
तथेक्षुवंशावृतकन्दरस्तु
घृतोदकप्रस्रवणैश्च दिक्षु॥१६
शुक्लाम्बराण्यम्बुधरावली स्यात्
पूर्वेण पीतानि च दक्षिणेन।
वासांसि पश्चादथ कर्बुराणि
रक्तानि चैवोत्तरतो घनाली॥१७
रौप्यान् महेन्द्रप्रमुखांस्तथाष्टौ
संस्थाप्य लोकाधिपतीन् क्रमेण।
नानाफलाली च समन्ततः स्या-
न्मनोरमं माल्यविलेपनं च॥१८
वितानकं चोपरि पञ्चवर्ण-
मम्लानपुष्पाभरणं सितं च।
इत्थं निवेश्यामरशैलमग्र्यं
मेरोस्तु विष्कम्भगिरीन् क्रमेण ॥१९
तुरीयभागेन चतुर्दिशं च
संस्थापयेत् पुष्पविलेपनाढ्यान्।
पूर्वेण मन्दरमनेकफलावलीभि-
र्युक्तं यवैः कनकभद्रकदम्बचिह्नः ॥२०
कामेन काञ्चनमयेन विराजमान-
माकारयेत् कुसुमवस्त्रविलेपनाढ्यम् ।
क्षीरारुणोदसरसाथ वनेन चैवं
रौप्येण शक्तिघटितेन विराजमानम्॥२१
याम्येन गन्धमदनश्च विवेशनीयो
गोधूमसंचयमयः कलधौतयुक्तः।
हैमेन यज्ञपतिना घृतमानसेन
वस्त्रैश्च राजतवनेन च संयुतः स्यात्॥२२
पश्चात् तिलाचलमनेकसुगन्धिपुष्प-
सौवर्णपिप्पलहिरण्मयहंसयुक्तम् ।
आकारयेद् रजतपुष्पवनेन तद्वद्
वस्त्रान्वितं दधिसितोदसरस्तथाग्रे॥२३
संस्थाप्य तं विपुलशैलमथोत्तरेण
शैलं सुपार्श्वमपि माषमयं सुवस्त्रम्।
पुष्पैश्च हेमवटपादपशेखरं त-
माकारयेत् कनकधेनुविराजमानम्॥२४
उसमें चाँदीके चार शिखर बनाये जायें, जिनके नितम्बभाग भी चाँदीके ही बने हों। उसी प्रकार चारों दिशाओंमें गन्ना और बाँससे ढकी हुई कन्दराएँ तथा घी और जलके झरने भी बनाये जायें। पुनः पूर्व दिशामें श्वेत वस्त्रोंसे, दक्षिण दिशामें पीले वस्त्रोंसे, पश्चिम दिशामें चितकबरे वस्त्रोंसे और उत्तर दिशामें लाल वस्त्रोंसे बादलोंकी पङ्क्तियाँ बनायी जायँ। फिर चाँदीके बने हुए महेन्द्र आदि आठों लोकपालोंको क्रमश: स्थापित करे और उस पर्वतके चारों ओर अनेकों प्रकारके फल, मनोरम पुष्पमालाएँ और चन्दन भी रख दे। उसके ऊपर पँचरंगा चँदोवा लगा दे और उसे खिले हुए श्वेत पुष्पोंसे विभूषित कर दे। इस प्रकार श्रेष्ठ अमरशैल (सुमेरुगिरि)-की स्थापना कर उसके चतुर्थांशसे इसकी चारों दिशाओंमें क्रमश: विष्कम्भ (मर्यादा) पर्वतोंकी स्थापना करनी चाहिये। ये सभी पुष्प और चन्दनसे सुशोभित हों। पूर्व दिशामें यवसे मन्दराचलका आकार बनावे, उसके निकट अनेकों प्रकारके फलोंकी कतारें लगा दे, उसे कनकभद्र (देवदारु) और कदम्ब-वृक्षोंके चिह्नोंसे सुशोभित कर दे, उसपर कामदेवकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्थापित कर दे। फिर उसे अपनी शक्तिके अनुसार चाँदीके बने हुए वन और दूधनिर्मित अरुणोद नामक सरोवरसे सुशोभित कर दे। तत्पश्चात् वस्त्र, पुष्प और चन्दन आदिसे उसे भरपूर सुसज्जित कर देना चाहिये॥१३-२१॥
दक्षिण दिशामें गेहूँकी राशिसे गन्धमादनकी रचना करनी चाहिये। उसे स्वर्णपत्रसे सुशोभित कर दे। उसपर यज्ञपतिकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित कर दे और उसे वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर उसे घीके सरोवर और चाँदीके वनसे सुशोभित कर देना चाहिये। पश्चिम दिशामें अनेकों सुगन्धित पुष्पों, स्वर्णमय पीपल-वृक्ष और सुवर्णनिर्मित हंससे युक्त तिलाचलकी स्थापना करनी चाहिये। उसी प्रकार इसे भी वस्त्रसे परिवेष्टित तथा चाँदीके पुष्पवनसे सुशोभित कर दे। इसके अग्रभागमें दहीसे सितोद सरोवरकी भी रचना कर दे। इस प्रकार उस विपुल शैलकी स्थापना करके उत्तर दिशामें उड़दसे सुपार्श्व नामक पर्वतकी स्थापना करे। इसे भी सुन्दर वस्त्र और पुष्पोंसे सुसज्जित कर दे, इसके शिखरपर स्वर्णमय वटवृक्ष रख दे और सुवर्णनिर्मित गौसे सुशोभित कर दे।
माक्षीकभद्रसरसाथ वनेन तद्वद्
रौप्येण भास्वरवता च युतं निधाय।
होमश्चतुर्भिरथ वेदपुराणविद्भि-
दर्दान्तैरनिन्द्यचरिताकृतिभिर्द्विजेन्द्रैः ॥ २५
पूर्वेण हस्तमितमत्र विधाय कुण्डं
कार्यस्तिलैर्यवघृतेन समित्कुशैश्च।
रात्रौ जागरमनुद्धतगीततूर्यै-
रावाहनं च कथयामि शिलोच्चयानाम्॥ २६
त्वं सर्वदेवगणधामनिधे विरुद्ध-
मस्मद्गृहेष्वमरपर्वत नाशयाशु।
क्षेमं विधत्स्व कुरु शान्तिमनुत्तमां नः
सम्पूजितः परमभक्तिमता मया हि॥२७
त्वमेव भगवानीशो ब्रह्मा विष्णुर्दिवाकरः।
मूर्तामूर्तात् परं बीजमतः पाहि सनातन॥ २८
यस्मात् त्वं लोकपालानां विश्वमूर्तेश्च मन्दिरम्।
रुद्रादित्यवसूनां च तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥२९
यस्मादशून्यममरैर्नारीभिश्च शिवेन च।
तस्मान्मामुद्धराशेषदुःखसंसारसागरात् ॥३०
एवमभ्यर्च्य तं मेरुं मन्दरं चाभिपूजयेत्।
यस्माच्चैत्ररथेन त्वं भद्राश्वेन च वर्षतः ॥ ३१
शोभसे मन्दर क्षिप्रमतस्तुष्टिकरो भव।
यस्माच्चूडामणिजम्बूद्वीपे त्वं गन्धमादन॥ ३२
गन्धर्ववनशोभावानतः कीर्तिर्दृढास्तु मे।
यस्मात् त्वं केतुमालेन वैभ्राजेन वनेन च॥ ३३
हिरण्मयाश्वत्थशिरास्तस्मात् पुष्टि(वास्तु मे।
उत्तरैः कुरुभिर्यस्मात् सावित्रेण वनेन च ॥३४
सुपार्श्व राजसे नित्यमतः श्रीरक्षयास्तु मे।
एवमामन्त्र्य तान् सर्वान् प्रभाते विमले पुनः॥३५
स्नात्वाथ गुरवे दद्यान्मध्यमं पर्वतोत्तमम्।
विष्कम्भपर्वतान् दद्यादृत्विग्भ्यः क्रमशो मुने॥ ३६
उसी प्रकार मधुसे बने हुए भद्रसर नामक सरोवर और चमकीली चाँदीसे निर्मित वनसे संयुक्त कर देना चाहिये। तत्पश्चात् पूर्व दिशा में एक हाथ लम्बा, चौड़ा और गहरा कुण्ड बनाकर तिल, यव, घी, समिधा और कुशोद्वारा चार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे हवन करावे। वे सभी ब्राह्मण वेदों और पुराणोंके ज्ञाता, जितेन्द्रिय, अनिन्द्य चरित्रवान् और सुरूप हों। रातमें मधुर शब्दमें गायन और तुरही आदि वाद्योंका वादन कराते हुए जागरण करना चाहिये। अब मैं इन पर्वतोंके आवाहनका प्रकार बतला रहा हूँ। (उन्हें इस प्रकार आवाहित करे-) अमरपर्वत! तुम समस्त देवगणोंके निवासस्थान और रत्नोंकी निधि हो। मैंने परम भक्तिके साथ तुम्हारी पूजा की है, इसलिये तुम हमारे घरोंमें स्थित विरुद्धभाव अर्थात् वैरभावको शीघ्र ही नष्ट कर दो, हमारे कल्याणका विधान करो और हमें श्रेष्ठ शान्ति प्रदान करो। सनातन ! तुम्हीं ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शङ्कर और सूर्य हो तथा मूर्त (साकार) और अमूर्त (निराकार)-से परे संसारके बीज (कारणरूप) हो, अत: हमारी रक्षा करो। चूँकि तुम लोकपालों, विश्वमूर्ति भगवान् विष्णु, रुद्र, सूर्य और वसुओंके निवासस्थान हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। चूँकि तुम देवताओं, देवाङ्गनाओं और शिवजीसे अशून्य अर्थात् संयुक्त रहते हो, इसलिये इस निखिल दु:खोंसे भरे हुए संसार-सागरसे मेरा उद्धार करो॥ २२-३०॥
इस प्रकार उस मेरुगिरिकी अर्चना करनेके पश्चात् मन्दराचलकी पूजा करनी चाहिये-'मन्दराचल! चूंकि तुम चैत्ररथ नामक वन और भद्राश्व नामक वर्षसे सुशोभित हो रहे हो, इसलिये शीघ्र ही मेरे लिये तुष्टिकारक बनो।' 'गन्धमादन! चूँकि तुम जम्बूद्वीपमें शिरोमणिके समान सुशोभित और गन्धर्वोके वनोंकी शोभासे सम्पन्न हो, इसलिये मेरी कीर्तिको सुदृढ़ कर दो।' 'विपलु ! चूँकि तुम केतुमाल वर्ष और वैभ्राज नामक वनसे सुशोभित हो और तुम्हारे शिखरपर स्वर्णमय पीपलका वृक्ष विराजमान है, इसलिये (तुम्हारी कृपासे) मुझे निश्चला पुष्टि प्राप्त हो।' 'सुपार्श्व! चूँकि तुम उत्तर कुरुवर्ष और सावित्र नामक वनसे नित्य शोभित हो रहे हो, अत: मुझे अक्षय लक्ष्मी प्रदान करो।' इस प्रकार उन सभी पर्वतोंको आमन्त्रित करके पुनः निर्मल प्रभात होनेपर स्नान आदिसे निवृत्त हो बीचवाला श्रेष्ठ पर्वत गुरु (यज्ञ करानेवाले)-को दान कर दे। मुने! इसी प्रकार क्रमश: विष्कम्भपर्वतोंको ऋत्विजोंको दान कर
गाश्च दद्याच्चतुर्विंशत्यथवा दश नारद ।
नव सप्त तथाष्टौ वा पञ्च दद्यादशक्तिमान्॥ ३७
एकापि गुरवे देया कपिला च पयस्विनी।
पर्वतानामशेषाणामेष एव विधिः स्मृतः ।। ३८
त एव पूजने मन्त्रास्त एवोपस्करा मताः।
ग्रहाणां लोकपालानां ब्रह्मादीनां च सर्वदा ॥ ३९
स्वमन्त्रेणैव सर्वेषु होमः शैलेषु पठ्यते।
उपवासी भवेन्नित्यमशक्ते नक्तमिष्यते॥४०
विधानं सर्वशैलानां क्रमशः शृणु नारद।
दानकाले च ये मन्त्राः पर्वतेषु च यत्फलम्॥४१
अन्नं ब्रह्म यतः प्रोक्तमन्ने प्राणा: प्रतिष्ठिताः।
अन्नाद् भवन्ति भूतानि जगदन्नेन वर्तते॥४२
अन्नमेव ततो लक्ष्मीरन्नमेव जनार्दनः।
धान्यपर्वतरूपेण पाहि तस्मान्नगोत्तम॥४३
अनेन विधिना यस्तु दद्याद् धान्यमयं गिरिम्।
मन्वन्तरशतं साग्रं देवलोके महीयते॥४४
अप्सरोगणगन्धर्वैराकीर्णेन विराजता।
विमानेन दिवः पृष्ठमायाति स्म निषेवितः।
धर्मक्षये राजराज्यमाप्नोतीह न संशयः॥ ४५
देना चाहिये। नारद! इसके बाद चौबीस, दस, नौ, आठ, सात अथवा पाँच गौ दान करनेका विधान है। यदि यजमान निर्धन हो तो वह एक ही दुधारू कपिला गौ गुरुको दान कर दे। सभी पर्वतदानोंके लिये यही विधि कही गयी है। उनके पूजनमें ग्रहों, लोकपालों और ब्रह्मा आदि देवताओंके वे ही मन्त्र हैं और वे ही सामग्रियाँ भी मानी गयी हैं। सभी पर्वत-पूजनोंमें उन-उनके मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये। यजमानको सदा व्रतमें उपवास करना चाहिये। यदि असमर्थ हो तो रातमें एक बार भोजन किया जा सकता है। नारद! अब तुम सभी पर्वतदानोंकी विधि, दानकालमें प्रयुक्त होनेवाले मन्त्र और उन दानोंसे प्राप्त होनेवाला जो फल है, वह सब क्रमश: सुनो। (दान देते समय धान्यशैलसे यों प्रार्थना करनी चाहिये-)"पर्वतश्रेष्ठ! अन्नको ही ब्रह्म कहा जाता है; क्योंकि अन्नमें प्राणियोंके प्राण प्रतिष्ठित हैं। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्नसे जगत् वर्तमान है, इसलिये अन्न ही लक्ष्मी है, अन्न ही भगवान् जनार्दन है, इसलिये धान्यशैलके रूपसे तुम मेरी रक्षा करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे धान्यमय पर्वतका दान करता है, वह सौ मन्वन्तरसे भी अधिक कालतक देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अप्सराओं और गन्धर्वोद्वारा व्याप्त सुन्दर विमानसे वह स्वर्गलोकमें आता है और उनके द्वारा पूजित होता है। पुनः पुण्यक्षय होनेपर वह इस लोकमें निस्संदेह राजाधिराज होता है ॥ ३१-४५ ॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे दानमाहात्म्य नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः।। ८३।।
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें दानमाहात्म्य नामक तिरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥८३॥
Summary of chapter 83 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya delivers an extensive exposition on the supreme spiritual efficacy of Dāna, declaring that ritual charity performed with deep faith and pure mind is the primary spiritual discipline for humanity in the present cosmic age. The Lord explains that while intense penance characterized Kṛta Yuga, sacred knowledge Tretā Yuga, and Vedic sacrifices Dvāpara Yuga, selfless charity stands as the supreme savior in Kali Yuga. The text details the inner attitudes required for charity, emphasizing that gifts given without ostentation, pride, or expectation of return yield infinite spiritual merit. The Lord enumerates various categories of charity, including gifts of food, water, land, cows, gold, knowledge, and protection, asserting that charity given to worthy recipients purifies past karma and serves as an imperishable treasury in the afterlife.