मत्स्य महा पुराण
पीठिकाओंके भेद, लक्षण और फल
सूत उवाच
पीठिकालक्षणं वक्ष्ये यथावदनुपूर्वशः ।
पीठोच्छ्रायं यथावच्च भागान् षोडश कारयेत्॥ १
भूमावेकः प्रविष्टः स्याच्चतुर्भिर्जगती मता।
वृत्तो भागस्तथैकः स्याद् वृतः पटलमागतः॥ २
सूतजी कहते हैं-ऋषियो! अब मैं आपलोगोंको पीठिकाओंके लक्षणोंको आनुपूर्वी यथार्थरूपसे बतला रहा हूँ। पीठिकाकी ऊँचाईको सोलह भागोंमें विभक्त करे। उनमें बीचका एक भाग पृथ्वीमें प्रविष्ट रहेगा। ऊपरके शेष चार भाग 'जगती' माने जाते हैं। उनसे ऊपरका एक भाग पटल भागसे घिरा हुआ 'वृत्त' कहलाता है।
भागैस्त्रिभिस्तथा कण्ठः कण्ठपट्टस्तु भागतः।
भागाभ्यामूर्ध्वपट्टश्च शेषभागेन पट्टिका॥ ३
प्रविष्टं भागमेकैकं जगतीं यावदेव तु ।
निर्गमस्तु पुनस्तस्य यावद् वै शेषपट्टिका॥ ४
वारिनिर्गमनार्थं तु तत्र कार्यः प्रणालकः।
पीठिकानां तु सर्वासामेतत्सामान्यलक्षणम्॥ ५
विशेषान् देवताभेदाशृणुध्वं द्विजसत्तमाः।
स्थण्डिला वाथ वापी वा यक्षी वेदी च मण्डला ॥ ६
पूर्णचन्द्रा च वज्रा च पद्मा वार्धशशी तथा।
त्रिकोणा दशमी तासां संस्थानं वा निबोधत॥ ७
स्थण्डिला चतुरस्रा तु वर्जिता मेखलादिभिः ।
वापी द्विमेखला ज्ञेया यक्षी चैव त्रिमेखला॥ ८
चतुरस्रायता वेदी न तां लिङ्गेषु योजयेत्।
मण्डला वर्तुला या तु मेखलाभिर्गणप्रिया॥ ९
रक्ता द्विमेखला मध्ये पूर्णचन्द्रा तु सा भवेत्।
मेखलात्रयसंयुक्ता षडस्रा वज्रिका भवेत्॥१०
षोडशास्त्रा भवेत् पद्मा किंचिद्मस्वा तु मूलतः।
तथैव धनुषाकारा सार्धचन्द्रा प्रशस्यते॥११
त्रिशूलसदृशी तद्वत् त्रिकोणा अ॒र्ध्वतो मता।
प्रागुदप्रवणा तद्वत् प्रशस्ता लक्षणान्विता॥१२
परिवेषं त्रिभागेन निर्गमं तत्र कारयेत्।
विस्तारं तत्प्रमाणं च मूले चाग्रे तथोर्ध्वतः॥१३
जलमार्गश्च कर्तव्यस्त्रिभागेन सुशोभनः ।
लिङ्गस्याईविभागेन स्थौल्येन समधिष्ठिता॥१४
मेखला तत्रिभागेन खातं चैव प्रमाणतः।
अथवा पादहीनं तु शोभनं कारयेत् सदा॥१५
उत्तरस्थं प्रणालं च प्रमाणादधिकं भवेत्।
स्थण्डिलायामथारोग्यं धनं धान्यं च पुष्कलम्॥१६
गोप्रदा च भवेद् यक्षी वेदी सम्पत्प्रदा भवेत्।
मण्डलायां भवेत् कीर्तिवरदा पूर्णचन्द्रिका॥१७
उसके ऊपर तीन भागोंसे कण्ठ, एक भागसे कण्ठपट्ट, दो भागोंसे ऊर्ध्वपट्ट तथा शेष भागोंसे पट्टिका बनायी जाती है। एक-एक भाग जगतीपर्यन्त एक-दूसरेमें प्रविष्ट रहते हैं। फिर शेषपट्टिका-पर्यन्त सबका निर्गम होता है। पट्टिकामें जल निकलनेके लिये (सोमसूत्रसे मिली) नाली बनानी चाहिये। यह सभी पीठिकाओंका सामान्य लक्षण है। ऋषिगण! अब देवताओंके भेदसे पीठिकाओंके विशेष लक्षण सुनिये। स्थण्डिला, वापी, यक्षी, वेदी, मण्डला, पूर्णचन्द्रा, वज्रा, पद्मा, अर्धशशी तथा दसवीं त्रिकोणा-ये पीठिकाओंके भेद हैं। अब इनकी स्थिति सुनिये। स्थण्डिला-पीठिका चौकोर होती है, इसमें मेखला आदि कुछ नहीं होती। वापीको दो मेखलाओंसे तथा यक्षीको तीन मेखलाओंसे युक्त जानना चाहिये। चार पहलवाली आयताकार पीठिका वेदी कही जाती है, उसे लिङ्गकी स्थापनामें प्रयुक्त नहीं करना चाहिये। मण्डला मेखलाओंसे युक्त गोलाकार होती है, वह प्रमथगणोंको प्रिय होती है। जो पीठिका लाल वर्णवाली तथा मध्यमें दो मेखलाओंसे युक्त होती है, उसे पूर्णचन्द्रा कहते हैं। तीन मेखलाओंसे युक्त छ: कोनेवाली पीठिकाको वज्रा कहते हैं ॥१-१०॥
मूल भागमें कुछ छोटी (पद्मपत्र-सी) सोलह पहलोंवाली पीठिका पद्मा कही जाती है। उसी प्रकार धनुषके आकारवाली पीठिकाको अर्धचन्द्रा कहते हैं। ऊपरसे त्रिशूलके समान दिखायी पड़नेवाली, पूर्व तथा उत्तरकी ओर कुछ ढालू एवं श्रेष्ठ लक्षणोंसे युक्त पीठिकाको त्रिकोणा कहते हैं। पीठिकाके तीन भाग परिधिके बाहर रहें और मूल, अग्रभाग तथा ऊपर-इन तीनों भागोंके विस्तार अधिक हों। त्रिभागमें जल निकलनेकी सुन्दर नाली (सोमसूत्र) होनी चाहिये। पीठिका लिङ्गके आधे भागकी मोटाईके परिमाणसे बनानी चाहिये। लिङ्गके तीन भागके बराबर मेखलाका खात बनाना चाहिये। अथवा वह चौथाई भागसे कम रहे, किंतु सर्वदा सुन्दर बनाना चाहिये। उत्तरकी ओर स्थित नाली प्रमाणसे कुछ अधिक ही बनानी चाहिये। स्थण्डिला-पीठिकाके स्थापित करनेसे आरोग्य तथा विपुल धन- धान्यादिकी प्राप्ति होती है। यक्षी गौ देनेवाली तथा वेदी सम्पत्तिदायिनी कही गयी है। मण्डलामें कीर्ति प्राप्त होती है और पूर्णचन्द्रिका वरदान देनेवाली कही गयी है।
आयुष्प्रदा भवेद् वज्रा पद्मा सौभाग्यदा भवेत्।
पुत्रप्रदार्धचन्द्रा स्यात् त्रिकोणा शत्रुनाशिनी॥१८
देवस्य यजनार्थ तु पीठिका दश कीर्तिताः।
शैले शैलमयीं दद्यात् पार्थिवे पार्थिवीं तथा॥१९
दारुजे दारुजां कुर्यान्मिश्रे मिश्रां तथैव च।
नान्ययोनिस्तु कर्तव्या सदा शुभफलेप्सुभिः॥२०
अर्चायामासमं दैर्घ्य लिङ्गायामसमं तथा।
यस्य देवस्य या पत्नी तां पीठे परिकल्पयेत्।
एतत् सर्वं समाख्यातं समासात् पीठलक्षणम्॥ २१
वज्रा दीर्घायु प्रदान करनेवाली तथा पद्मा सौभाग्यदायिनी कही गयी है। अर्धचन्द्रा पुत्र प्रदान करनेवाली तथा त्रिकोणा शत्रुनाशिनी होती है। इस प्रकार देवताकी पूजाके लिये ये दस पीठिकाएँ कही गयी हैं। पत्थरकी प्रतिमामें पत्थरकी तथा मिट्टीकी मूर्तिमें मिट्टीकी पीठिका देनी चाहिये। इसी प्रकार काष्ठकी मूर्तिमें काष्ठकी तथा मिश्रित धातुओंकी प्रतिमामें धातुमिश्रितकी पीठिका रखनी चाहिये। शुभ फलकी कामना करनेवालोंको दूसरे प्रकारकी पीठिका कभी नहीं देनी चाहिये। पीठिकाकी लम्बाई मूर्तिमें तथा लिङ्गमें बराबर नहीं रखी जाती। जिस देवताकी जो पत्नी हो, उसे उसी पीठपर स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार यह मैंने आपलोगोंको संक्षेपमें पीठिकाका लक्षण बतलाया है।।११-२१॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे देवतार्चानुकीर्तने पीठिकानुकीर्तनं नाम द्विषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २६२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवता नुकीर्तन-प्रसङ्गमें पीठिका-वर्णन नामक दो सौ बासठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६२ ॥
Summary of chapter 264 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya expounds upon the classification, structural geometry, and exact mathematical proportions for fashioning sacred Śivalingas from stone, metal, crystal, or wood. Bhagavān Matsya divides the Śivalinga into three distinct vertical sections: the lowest four-sided base buried in the ground representing Bhagavān Brahmā, the middle eight-sided section within the pedestal representing Bhagavān Vishṇu, and the upper cylindrical rounded portion projecting above representing Mahādeva Śiva. The text outlines classifications based on height and diameter ratios, detailing self-manifested Svāyambhuva Liṅgas and man-made Mānusha Liṅgas.