त्रिपुर-निर्माणका वर्णन

ऋषय ऊचुः

कथं जगाम भगवान् पुरारित्वं महेश्वरः।

ददाह च कथं देवस्तन्नो विस्तरतो वद॥१

पृच्छामस्त्वां वयं सर्वे बहुमानात् पुनः पुनः ।

त्रिपुरं तद् यथा दुर्गं मयमायाविनिर्मितम्।

देवेनैकेषुणा दग्धं तथा नो वद मानद॥२

ऋषियोंने पूछा-सबको मान देनेवाले सूतजी! भगवान् महेश्वर पुरारि (त्रिपुरके शत्रु) किस कारण हो गये तथा उन देवाधिदेवने उसे कैसे दग्ध किया? यह आप हमलोगोंको विस्तारपूर्वक बतलाइये। हम सब लोग परम सम्मानपूर्वक आपसे बारंबार पूछ रहे हैं कि मयदानवकी मायाद्वारा विनिर्मित उस त्रिपुर दुर्गको भगवान् शंकरने एक ही बाणसे जिस प्रकार जला दिया था, हमलोगोंसे उस प्रसङ्गका विस्तारसे वर्णन कीजिये॥ १-२॥

सूत उवाच

शृणुध्वं त्रिपुरं* देवो यथा दारितवान् भवः ।

मयो नाम महामायो मायानां जनकोऽसुरः॥ ३

निर्जितः स तु संग्रामे तताप परमं तपः।

तपस्यन्तं तु तं विप्रा दैत्यावन्यावनुग्रहात्॥ ४

तस्यैव कृत्यमुद्दिश्य तेपतुः परमं तपः।

विद्युन्माली च बलवांस्तारकाख्यश्च वीर्यवान्॥ ५

मयतेजःसमाक्रान्तौ तेपतुर्मयपार्श्वगौ।

लोका इव यथा मूर्तास्त्रयस्त्रय इवानयः॥ ६

लोकत्रयं तापयन्तस्ते तेपुर्दानवास्तपः ।

हेमन्ते जलशय्यासु ग्रीष्मे पञ्चतपे तथा॥ ७

वर्षासु च तथाऽऽकाशे क्षपयन्तस्तनूः प्रियाः।

सेवानाः फलमूलानि पुष्पाणि च जलानि च॥ ८

अन्यथाचरिताहाराः पङ्केनाचितवल्कलाः।

मनाः शैवालपङ्केषु विमलाविमलेषु च॥ ९

निर्मांसाश्च ततो जाताः कृशा धमनिसंतताः।

तेषां तपःप्रभावेण प्रभावविधुतं यथा॥१०

निष्प्रभं तु जगत् सर्वं मन्दमेवाभिभाषितम्।

दह्यमानेषु लोकेषु तैस्त्रिभिर्दानवाग्निभिः॥११

तेषामने जगद्वन्धुः प्रादुर्भूतः पितामहः।

ततः साहसकर्तारः प्राहुस्ते सहसागतम्॥१२

स्वकं पितामहं दैत्यास्तं वै तुष्टुवुरेव च।

अथ तान् दानवान् ब्रह्मा तपसा तपनप्रभान्॥१३

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! भगवान् शंकरने जिस प्रकार त्रिपुरको विदीर्ण किया था (उसका वर्णन कर रहा हूँ), सुनिये। मय नामक एक महान् मायावी असुर था। वह विभिन्न प्रकारकी मायाओंका उत्पादक था। वह संग्राममें देवताओंद्वारा पराजित हो गया था, इसलिये घोर तपस्यामें संलग्न हो गया। द्विजवरो! उसे तपस्या करते देख दो अन्य दैत्य भी अनुग्रहवश उसीके कार्यके उद्देश्यसे उग्र तपस्यामें जुट गये। उनमें एक महाबली विद्युन्माली और दूसरा महापराक्रमी तारक था। ये दोनों मयके तेजसे आकृष्ट होकर उसीके पार्श्वभागमें बैठकर तपस्या कर रहे थे। उस समय तपस्यासे उद्भासित होते हुए वे तीनों ऐसा प्रतीत हो रहे थे, मानो लौकिक रूपमें मूर्तिमान् तीनों अग्नियाँ हों। वे तीनों दानव त्रिलोकीको संतप्त करते हुए तपस्यामें संलग्न थे। वे हेमन्त-ऋतुमें जलमें शयन करते, ग्रीष्म ऋतुमें पञ्चाग्नि तापते और वर्षा-ऋतुमें आकाशके नीचे खुले मैदानमें खड़े रहते थे। इस प्रकार वे सबको परम प्रिय लगनेवाले अपने शरीरको सुखा रहे थे और मात्र फल, मूल, फूल और जलके आहारपर जीवन व्यतीत कर रहे थे अथवा वे कभी-कभी निराहार भी रह जाते थे। उनके वल्कलोंपर कीचड़ जम गया था और वे स्वयं विमल देहधारी होकर भी गंदे सेवारके कीचड़ोंमें निमग्न रहते थे। इस कारण उनके शरीरका मांस गल गया था। वे इतने दुर्बल हो गये थे कि उनके शरीरकी नसें बाहर उभड़ आयी थीं। उनकी तपस्याके प्रभावसे सारा जगत् निष्प्रभ हो गया-काँप उठा। सर्वत्र उदासी छा गयी। सभीके स्वर मन्द पड़ गये। इस प्रकार उन तीनों दानवरूपी अग्नियोंसे त्रिलोकीको जलते देखकर जगद्वन्धु पितामह ब्रह्मा उनके समक्ष प्रकट हुए॥३-११३॥

तब वे दैत्य अपने पितामहको सहसा सम्मुख उपस्थित देखकर अत्यन्त साहस करके बोले और उनकी स्तुति करने लगे। उस समय ब्रह्माके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे थे। तब उन्होंने तपस्याके प्रभावसे सूर्यके समान प्रभावशाली उन दानवोंसे

'यह महत्त्वपूर्ण प्रसङ्ग बहुत कुछ स्कन्द ५।४३, शिव, सौरपु० २९-३० लिङ्गपु०७३-४, आदि पुराणोंसे मिलता है। वैसे यह अपेक्षाकृत सर्वाधिक विस्तृत है तथा आगेके नर्मदा-माहात्म्यमें इसी ग्रन्थमें पुनः आया है। इसका बीज तै० सं०६।३।२।१, शतप० ६।३।३।२५ आदिमें प्राप्त होता है और पुष्पदन्तने भी 'शिवमहिनःस्तव' १८-१९ आदिके 'रथः क्षोणी यन्ता''."त्रिपुरतृण', 'त्रिपुरहर' आदिमें इसकी खूब उत्प्रेक्षा की है।

उवाच हर्षपूर्णाक्षो हर्षपूर्णमुखस्तदा।

वरदोऽहं हि वो वत्सास्तपस्तोषित आगतः॥१४

वियतामीप्सितं यच्च साभिलाषं तदुच्यताम्।

इत्येवमुच्यमानं तु प्रतिपन्नं पितामहम्॥ १५

विश्वकर्मा मयः प्राह प्रहर्षोत्फुल्ललोचनः।

देव दैत्याः पुरा देवैः संग्रामे तारकामये॥१६

निर्जितास्ताडिताश्चैव हताश्चाप्यायुधैरपि।

देवैर्वैरानुबन्धाच्च धावन्तो भयवेपिताः॥१७

शरणं नैव जानीमः शर्म वा शरणार्थिनः।

सोऽहं तपःप्रभावेण तव भक्त्या तथैव च॥१८

इच्छामि कर्तुं तद् दुर्गं यद् देवैरपि दुस्तरम्।

तस्मिंश्च त्रिपुरे दुर्गे मत्कृते कृतिनां वर॥१९

भूम्यग्निजलदुर्गाणां शापानां मुनितेजसाम्।

देवप्रहरणानां च देवानां च प्रजापते॥२०

अलङ्घनीयं भवतु त्रिपुरं यदि ते प्रियम्।

विश्वकर्मा इतीवोक्तः स तदा विश्वकर्मणा॥ २१

उवाच प्रहसन् वाक्यं मयं दैत्यगणाधिपम्।

सर्वामरत्वं नैवास्ति असवृत्तस्य दानव॥ २२

तस्माद् दुर्गविधानं हि तृणादपि विधीयताम्।

पितामहवचः श्रुत्वा तदैव दानवो मयः॥२३

प्राञ्जलिः पुनरप्याह ब्रह्माणं पद्मसम्भवम्।

यस्तदेकेषुणा दुर्गं सकृन्मुक्तेन निर्दहेत्॥ २४

समं स संयुगे हन्यादवध्यं शेषतो भवेत्।

एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा मयं देवः पितामहः ॥ २५

स्वप्ने लब्धो यथार्थो वै तत्रैवादर्शनं ययौ।

गते पितामहे दैत्या गता मयरविप्रभाः॥२६

वरदानाद् विरेजुस्ते तपसा च महाबलाः।

स मयस्तु महाबुद्धिर्दानवो वृषसत्तमः॥ २७

कहा-'बच्चो! मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे संतुष्ट होकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुमलोगोंकी जो अभिलाषा हो, उसे कहो और अपना अभीष्ट वर माँग लो।' वर देनेके लिये उत्सुक पितामहको इस प्रकार कहते हुए देखकर असुरोंके शिल्पी मयके नेत्र अत्यन्त हर्षसे उत्फुल्ल हो उठे। तब उसने कहा-'देव! प्राचीनकालमें घटित हुए तारकामय संग्राममें देवताओंने दैत्योंको पराजित कर दिया था। उन्होंने अस्त्रोंके प्रहारसे कुछको तो मौतके घाट उतार दिया था और कुछको बुरी तरहसे घायल कर दिया था। उस समय देवताओं के साथ वैर बँध जानेके कारण हमलोग भयसे कम्पित होकर चारों दिशाओंमें भागते फिरे, परंतु हम शरणार्थियोंको यह ज्ञात न हुआ कि हमारे लिये शरणदाता कौन है तथा हमारा कल्याण कैसे होगा। इसलिये मैं अपनी तपस्याके प्रभावसे तथा आपकी भक्तिके बलपर एक ऐसे दुर्गका निर्माण करना चाहता हूँ, जिसका पार करना देवताओंके लिये भी कठिन हो। सुकृती पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! मेरे द्वारा निर्मित उस त्रिपुरमें पृथ्वी, जल एवं अग्निसे निर्मित तथा सुरक्षित दुर्गोंका और मुनियोंके प्रभावसे दिये गये शापों, देवताओंके अस्त्रों और देवोंका प्रवेश न हो सके। प्रजापते! यदि आपको अच्छा लगे तो वह त्रिपुर सभीके लिये अलङ्घनीय हो जाय ॥१२-२०३ ॥

तब असुरोंके विश्वकर्मा (महाशिल्पी) मयद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर विश्व-स्रष्टा ब्रह्मा दैत्यगणोंके अधीश्वर मयसे हँसते हुए बोले-'दानव! (तुझ-जैसे) असदाचारीके लिये सर्वामरत्वका विधान नहीं है, अत: तुम तृणसे ही अपने दुर्गका निर्माण करो।' उस समय पितामहकी ऐसी बात सुनकर मयदानवने हाथ जोड़कर पुन: पद्मयोनि ब्रह्मासे कहा-'जो एक ही बारके छोड़े गये एक ही बाणसे उस दुर्गको जला दे, वही युद्धस्थलमें हम सबको मार सके, शेष प्राणियोंसे हमलोग अवध्य हो जायँ।' तदनन्तर मयसे 'एवमस्तु-ऐसा ही हो' कहकर भगवान् ब्रह्मा स्वप्रमें प्राप्त हुए धनकी तरह वहीं अन्तर्हित हो गये। पितामहके चले जानेपर सूर्यके समान प्रभावशाली मय आदि दानव भी अपने स्थानको चले गये। वे महाबली दानव तपस्या तथा वरदानके प्रभावसे अत्यन्त शोभित हो रहे थे। कुछ समयके बाद दानवश्रेष्ठ महाबुद्धिमान् मय-

दुर्ग व्यवसितः कर्तुमिति चाचिन्तयत् तदा।

कथं नाम भवेद् दुर्गं तन्मया त्रिपुरं कृतम्॥ २८

वत्स्यते तत्पुरं दिव्यं मत्तो नान्यैर्न संशयः।

यथा चैकेषुणा तेन तत्पुरं न हि हन्यते॥२९

देवैस्तथा विधातव्यं मया मतिविचारणम्।

विस्तारो योजनशतमेकैकस्य पुरस्य तु॥३०

कार्यस्तेषां च विष्कम्भश्चैकैकशतयोजनम्।

पुष्ययोगेण निर्माणं पुराणां च भविष्यति॥३१

पुष्ययोगेण च दिवि समेष्यन्ति परस्परम्।

पुष्ययोगेण युक्तानि यस्तान्यासादयिष्यति॥३२

पुराण्येकप्रहारेण स तानि निहनिष्यति।

आयसं तु क्षितितले राजतं तु नभस्तले॥३३

राजतस्योपरिष्टात् तु सौवर्णं भविता पुरम्।

एवं त्रिभिः पुरैर्युक्तं त्रिपुरं तद् भविष्यति।

शतयोजनविष्कम्भैरन्तरैस्तद् दुरासदम्॥३४

अट्टालकैर्यन्त्रशतनिभिश्च

सचक्रशूलोपलकम्पनैश्च।

द्वारैर्महामन्दरमेरुकल्पैः प्राकार-

शृङ्गै सुविराजमानम्॥३५

सतारकाख्येन मयेन गुप्त

स्वस्थं च गुप्तं तडिमालिनापि।

को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थों

मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम्॥३६

दानव दुर्गकी रचना करनेके लिये उद्यत हो विचार करने लगा। मेरे द्वारा निर्मित होनेवाला यह त्रिपुर दुर्ग कैसा बनाया जाय, जिससे उस दिव्य पुरमें निस्संदेह मेरे अतिरिक्त अन्य कोई निवास न कर सके तथा उसके द्वारा छोड़े गये एक बाणसे यह पुर बींधा न जा सके। देवगण उसे नष्ट करनेकी चेष्टा करेंगे ही, किंतु मुझे तो अपनी बुद्धिसे विचार कर लेना चाहिये। उनमें एक-एक पुरका विस्तार सौ योजनका करना है तथा उनके विष्कम्भ (स्तम्भ या शहतीर) भी एक-एक सौ योजनके बनाने हैं॥२१-३३ ॥

इन पुरोंका निर्माण पुष्य नक्षत्रके योगमें होगा। इसी पुष्य नक्षत्रके योगमें ये तीनों पुर आकाशमण्डलमें परस्पर मिल जायँगे। जो मनुष्य पुष्य नक्षत्रके योगमें इन तीनों पुरोंको परस्पर मिला हुआ पा लेगा, वही एक बाणके प्रहारसे इन्हें नष्ट कर सकेगा। उनमेंसे एक पुर भूतलपर लौहमय, दूसरा गगनतलमें रजतमय और तीसरा रजतमय पुरसे ऊपर सुवर्णमय होगा। इस प्रकार तीनों पुरोंसे युक्त होनेके कारण वह त्रिपुर नामसे विख्यात होगा। इनके अन्तर्भागमें सौ योजन विस्तारवाले विष्कम्भ (बाधक स्तम्भ) रहेंगे, जिससे यह दूसरोंद्वारा दुष्प्राप्य होगा। वह त्रिपुर अट्टालिकाओं, एक ही बारमें सौ मनुष्योंका वध करनेवाले यन्त्रों, चक्र, त्रिशूल, उपल और ध्वजाओं, मन्दराचल और सुमेरु गिरि-सरीखे द्वारों और शिखर-सदृश परकोटोंसे सुशोभित होगा। उनमें तारक लौहमय पुरकी और मय सुवर्णमय पुरकी रक्षा करेंगे तथा आकाशस्थित रजतमय पुरकी रक्षामें विद्युन्माली नियुक्त रहेगा। ऐसी दशामें एकमात्र भगवान् शंकरको छोड़कर दूसरा कौन इस त्रिपुरका विनाश करनेमें समर्थ हो सकेगा॥३१-३६॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥१२९॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥१२९ ॥