शुभाशुभ स्वप्नोंके लक्षण

मनुरुवाच

स्वप्नाख्यानं कथं देव गमने प्रत्युपस्थिते।

दृश्यन्ते विविधाकाराः कथं तेषां फलं भवेत्॥ १

मत्स्य उवाच

इदानीं कथयिष्यामि निमित्तं स्वप्नदर्शने।

नाभिं विनान्यगात्रेषु तृणवृक्षसमुद्भवः॥ २

चूर्णनं मूर्ध्नि कांस्यानां मुण्डनं नग्नता तथा।

मलिनाम्बरधारित्वमभ्यङ्गः पङ्कदिग्धता॥ ३

उच्चात् प्रपतनं चैव दोलारोहणमेव च।

अर्जनं पङ्कलोहानां हयानामपि मारणम्॥ ४

रक्तपुष्पद्रुमाणां च मण्डलस्य तथैव च।

वराहक्ष्खरोष्ट्राणां तथा चारोहणक्रिया॥ ५

भक्षणं पक्षिमत्स्यानां तैलस्य कृसरस्य च।

नर्तनं हसनं चैव विवाहो गीतमेव च॥ ६

तन्त्रीवाद्यविहीनानां वाद्यानामभिवादनम्।

स्त्रोतोऽवगाहगमनं स्नानं गोमयवारिणा॥ ७

पङ्कोदकेन च तथा महीतोयेन चाप्यथ।

मातुः प्रवेशो जठरे चितारोहणमेव च॥ ८

शक्रध्वजाभिपतनं पतनं शशिसूर्ययोः ।

दिव्यान्तरिक्षभौमानामुत्पातानां च दर्शनम्॥ ९

देवद्विजातिभूपालगुरूणां क्रोध एव च।

आलिङ्गनं कुमारीणां पुरुषाणां च मैथुनम्॥१०

हानिश्चैव स्वगात्राणां विरेचवमनक्रिया।

दक्षिणाशाभिगमनं व्याधिनाभिभवस्तथा ॥११

फलापहानिश्च तथा पुष्पहानिस्तथैव च।

गृहाणां चैव पातश्च गृहसम्मार्जनं तथा॥१२

क्रीडा पिशाचक्रव्यादवानरर्भनरैरपि।

परादभिभवश्चैव तस्माच्च व्यसनोद्भवः ॥१३

काषायवस्त्रधारित्वं तद्वत् स्त्रीक्रीडनं तथा।

स्नेहपानावगाहौ च रक्तमाल्यानुलेपनम् ॥१४

एवमादीनि चान्यानि दुःस्वप्नानि विनिर्दिशेत्।

एषां संकथनं धन्यं भूयः प्रस्वापन तथा॥१५

मनुजीने पूछा-देव! यात्राके समयके स्वप्नका वृत्तान्त कैसा है? विविध प्रकारके वैसे यों भी स्वप्न अनेक दिखायी पड़ते हैं, उनका फल कैसा होता है (बतलायें) ।। १ ।।

मत्स्यभगवान्ने कहा-मनो! अब मैं स्वप्नोंके शुभाशुभ लक्षणोंको बतला रहा हूँ! नाभिके अतिरिक्त अन्य अङ्गोंमें तृण एवं वृक्षका उगना, मस्तकपर कांसेका कूटा जाना, मुण्डन, नग्नता, मलिन वस्त्रोंका धारण करना, तेल लगाना, कीचमें धंसना, लेप, ऊँचे स्थानसे गिरना, झूलेपर चढ़ना, कीचड़ और लोहेको इकट्ठा करना, घोड़ोंको मारना, लाल पुष्पवाले वृक्षों, मण्डल, शूकर, रीछ, गधे और ऊँटोंपर चढ़ना, पक्षी, मछली, तेल और खिचड़ीका भोजन, नाचना, हँसना, विवाह, गायन, वीणाको छोड़कर अन्य वाद्योंका स्वागत करना, जलके सोतेमें स्नान करनेके लिये जाना, गोबर लगाकर जलमें स्नान करना, इसी प्रकार कीचड़युक्त जलमें तथा पृथ्वीके थोड़े जलमें नहाना, माताके उदरमें प्रवेश करना, चितापर चढ़ना, इन्द्रध्वजका गिरना, चन्द्रमा और सूर्यका पतन, दिव्य, अन्तरिक्ष तथा भौम उत्पातोंका दर्शन, देवता, द्विजाति, राजा और गुरुका क्रोध, कुमारी कन्याओंका आलिङ्गन, पुरुषोंके साथ सम्भोग, अपने ही शरीरका नाश, विरेचन, वमन, दक्षिण दिशाकी यात्रा, किसी व्याधिसे पीड़ित होना, फलों तथा पुष्पोंकी हानि, घरोंका गिरना, घरोंकी सफाई होना, पिशाच, मांसभक्षी जीव, वानर, रीछ और मनुष्यके साथ क्रीडा करना, शत्रुसे पराजित होना या उसकी ओरसे किसी प्रकारकी आपत्तिका प्रकट होना, काषायवस्त्रको धारण करनाअथवा वैसेवस्त्रवाली स्त्रीके साथ क्रीडा करना, तेल-पान या उसीमें स्नान करना, लाल पुष्प और लाल चन्दनको धारण करना तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से दुःस्वप्न कहे गये हैं। इन्हें देखनेके बाद दूसरेसे कह देना तथा पुनः सो जाना कल्याणकारक है॥२-१५॥

कल्कस्नानं तिलै)मो ब्राह्मणानां च पूजनम्।

स्तुतिश्च वासुदेवस्य तथा तस्यैव पूजनम्॥१६

नागेन्द्रमोक्षश्रवणं ज्ञेयं दुःस्वप्ननाशनम्।

स्वप्नास्तु प्रथमे यामे संवत्सरविपाकिनः॥१७

षभिर्मासैर्द्वितीये तु त्रिभिर्मासैस्तृतीयके।

चतुर्थे मासमात्रेण पश्यतो नात्र संशयः॥१८

अरुणोदयवेलायां दशाहेन फलं भवेत्।

एकस्यां यदि वा रात्रौ शुभं वा यदि वाशुभम्॥१९

पश्चाद् दृष्टस्तु यस्तत्र तस्य पाकं विनिर्दिशेत्।

तस्माच्छोभनके स्वप्ने पश्चात् स्वप्नो न शस्यते॥२०

शैलप्रासादनागाश्ववृषभारोहणं हितम्।

द्रुमाणां श्वेतपुष्पाणां गमने च तथा द्विज ॥२१

द्रुमतृणोद्भवो नाभौ तथैव बहुबाहुता।

तथैव बहुशीर्षत्वं फलितोद्भव एव च॥२२

सुशुक्लमाल्यधारित्वं सुशुक्लाम्बरधारिता।

चन्द्रार्कताराग्रहणं परिमार्जनमेव च॥२३

शक्रध्वजालिङ्गनं च तदुच्छ्रायक्रिया तथा।

भूम्यम्बुधीनां ग्रसनं शत्रूणां च वधक्रिया॥२४

जयो विवादे द्यूते च संग्रामे च तथा द्विज।

भक्षणं चार्द्रमांसानां मत्स्यानां पायसस्य च॥२५

दर्शनं रुधिरस्यापि स्नानं वा रुधिरेण च।

सुरारुधिरमद्यानां पानं क्षीरस्य चाथ वा॥२६

अन्त्रैर्वा वेष्टनं भूमौ निर्मलं गगनं तथा।

मुखेन दोहनं शस्तं महिषीणां तथा गवाम्॥२७

सिंहीनां हस्तिनीनां च वडवानां तथैव च।

प्रसादो देवविप्रेभ्यो गुरुभ्यश्च तथा शुभः ॥ २८

अम्भसा त्वभिषेकस्तु गवां शृङ्गस्नुतेन वा।

चन्द्राद् भ्रष्टेन वा राजज्ञेयो राज्यप्रदोहि सः॥२९

राज्याभिषेकश्च तथा छेदनं शिरसस्तथा।

मरणं वह्निदाहश्च वह्निदाहो गृहादिषु॥३०

लब्धिश्च राज्यलिङ्गानां तन्त्रीवाद्याभिवादनम्।

तथोदकानां तरणं तथा विषमलङ्घनम्॥३१

 (ऐसे स्वप्न देखनेपर) खली लगाकर स्नान, तिलसे हवन और ब्राह्मणोंका पूजन करे। भगवान् वासुदेवकी स्तुति उनकी पूजा और गजेन्द्रमोक्षकी कथाका श्रवण आदिका दुःस्वप्नका नाशक समझना चाहिये। रात्रिके पहले पहरमें देखे गये स्वप्न देखनेवालेको नि:संदेह एक वर्षमें, दूसरे पहरमें देखे गये छ: महीनेमें, तीसरे पहरमें देखे गये तीन महीने में तथा चतुर्थ पहरमें देखे गये एक महीनेमें फल देते हैं। सूर्योदयके समय देखे जानेपर दस दिनमें ही फल प्राप्त होता है। यदि एक ही रातमें शुभ और अशुभ-दोनों प्रकारके स्वप्न दिखायी पड़ें तो उनमें जो पीछे दीख पड़ा हो, उसीका फल कहना चाहिये। इसलिये शुभ स्वप्नके देखनेपर मनुष्यको पुनः नहीं सोना चाहिये॥१६-२०॥

द्विज! पर्वत, राजमहल, हाथी, घोड़ा, वृषभ-इनपर आरोहण करना हितकारक है तथा श्वेत पुष्पोंवाले वृक्षोंपर चढ़ना शुभप्रद है। नाभिमें वृक्ष और तृणका उत्पन्न होना, अनेक बाहुओंका होना, अनेक सिरोंका होना, फलदान, उद्भिज्जोंका दर्शन, सुन्दर श्वेत माला धारण करना, श्वेत वस्त्र पहनना, चन्द्रमा, सूर्य और ताराओंको हाथसे पकड़ना या उन्हें स्वच्छ करना, इन्द्रधनुषका आलिङ्गन करना या उसे ऊपर उठाना, पृथ्वी और समुद्रोंको निगलना, शत्रुओंका संहार करना, संग्राम, विवाद और जूएमें जीतना, कच्चा मांस, मछली और खीरका खाना, रक्तका दर्शन या रक्तसे स्नान, मदिरा, रक्त, मद्य अथवा दुग्धका पीना, अपनी आँतोंसे पृथ्वीको बाँधना, निर्मल आकाशको देखना, भैंस, गाय, सिंहिनी, हथिनी तथा घोड़ियोंको मुखसे दुहना, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी प्रसन्नता-ये स्वप्न शुभदायक होते हैं ॥ २१-२८॥

राजन्! गौओंके सींगसे चूनेवाले अथवा चन्द्रमासे गिरे हुए जलसे अभिषेक होना राज्यप्रद समझना चाहिये। राज्याभिषेक, सिरका कटना, मृत्यु, अग्निका प्रज्वलित होना या घरमें आग लगना, राज्यचिह्नोंकी स्वर सुनायी पड़ना, जलमें तैरना, दुर्गम स्थानोंको पार करना,

हस्तिनीवडवानां च गवां च प्रसवो गृहे।

आरोहणमथाश्वानां रोदनं च तथा शुभम्॥ ३२

वरस्त्रीणां तथा लाभस्तथालिङ्गनमेव च।

निगडैर्बन्धनं धन्यं तथा विष्ठानुलेपनम्॥ ३३

जीवतां भूमिपालानां सुहृदामपि दर्शनम्।

दर्शनं देवतानां च विमलानां तथाम्भसाम्॥ ३४

शुभान्यथैतानि नरस्तु दृष्ट्वा

प्राप्नोत्ययत्नाद् ध्रुवमर्थलाभम्।

स्वप्नानि वै धर्मभृतां वरिष्ठ

व्याधेर्विमोक्षं च तथातुरोऽपि॥ ३५

घरमें हथिनी, घोड़ी तथा गायोंका बच्चा देना, घोड़ेपर सवार होना तथा रोना-ये स्वप्न शुभदायक होते हैं। सुन्दरी स्त्रियोंकी प्राप्ति तथा उनका आलिङ्गन, जंजीरोंद्वारा बन्धन, मलका लेपन, जीवित राजाओं तथा मित्रोंका दर्शन, देवताओं तथा निर्मल जलका दर्शन-ये स्वप्न शुभ कहे गये हैं। धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ राजन् ! मनुष्य इन शुभदायक स्वप्नोंको देखकर बिना प्रयासके ही निश्चितरूपमें धन प्राप्त कर लेता है तथा रोगग्रस्त व्यक्ति भी रोगसे मुक्त हो जाता है ॥ २९-३५ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्ते स्वप्नाध्यायो नाम द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४२॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें यात्राप्रसंगमें स्वप्नविवेक नामक दो सौ बयालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ।। २४२ ॥