मत्स्य महा पुराण
वनमें राजा ययातिकी तपस्या और उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति
शौनक उवाच
एवं स नाहुषो राजा ययातिः पुत्रमीप्सितम्।
राज्येऽभिषिच्य मुदितो वानप्रस्थोऽभवन्मुनिः॥१
उषित्वा वनवासं स ब्राह्मणैः सह संश्रितः।
फलमूलाशनो दान्तो यथा स्वर्गमितो गतः॥२
स गतः स्वर्गवासं तु न्यवसन्मुदितः सुखी।
कालस्य नातिमहतः पुनः शक्रेण पातितः ।। ३
विवश: प्रच्युतः स्वर्गादप्राप्तो मेदिनीतलम्।
स्थितश्चासीदन्तरिक्षे स तदेति श्रुतं मया॥४
तत एव पुनश्चापि गतः स्वर्गमिति श्रुतिः।
राज्ञा वसुमता सार्धमष्टकेन च वीर्यवान्।
प्रतर्दनेन शिबिना समेत्य किल संसदि॥५
शौनकजीकहते हैं-शतानीक!इस प्रकार नहुषनन्दन राजा ययाति अपने प्रिय पुत्र पूरुका राज्याभिषेक करके प्रसन्नतापूर्वक वानप्रस्थ मुनि हो गये। वे वनमें ब्राह्मणोंके साथ रहकर कठोर व्रतका पालन करते हुए फल-मूलका आहार तथा मन और इन्द्रियोंका संयम करते थे, इससे वे स्वर्गलोकमें गये। स्वर्गलोकमें जाकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ सुखपूर्वक रहने लगे और बहुत कालके बाद इन्द्रद्वारा वे पुनः स्वर्गसे नीचे गिरा दिये गये।स्वर्गसे भ्रष्ट हो पृथ्वीपर गिरते समय वे भूतलतक नहीं पहुँचे, आकाशमें ही स्थिर हो गये, ऐसा मैंने सुना है। फिर यह भी सुनने में आया है कि वे पराक्रमी राजा ययाति मुनिसमाजमें राजा वसुमान्, अष्टक, प्रतर्दन और शिबिसे मिलकर पुनः वहींसे साधु पुरुषोंके सङ्गके प्रभावसे स्वर्गलोकमें चले गये॥१-५॥
शतानीक उवाच
कर्मणा केन स दिवं पुनः प्राप्तो महीपतिः।
कथमिन्द्रेण भगवन् पातितो मेदिनीतले॥ ६
सर्वमेतदशेषेण श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।
कथ्यमानं त्वया विप्र देवर्षिगणसंनिधौ॥ ७
देवराजसमो ह्यासीद् ययातिः पृथिवीपतिः ।
वर्धनः कुरुवंशस्य विभावसुसमद्युतिः ।। ८
तस्य विस्तीर्णयशसः सत्यकीर्तेर्महात्मनः ।
श्रोतुमिच्छामि देवेश दिवि चेह च सर्वशः॥ ९
शौनक उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि ययातेरुत्तमां कथाम्।
दिवि चेह च पुण्यार्थां सर्वपापप्रणाशिनीम्॥१०
ययाति हुषो राजा पूरुं पुत्रं कनीयसम्।
राज्येऽभिषिच्य मुदितः प्रवव्राज वनं तदा॥११
अन्तेषु स विनिक्षिप्य पुत्रान् यदुपुरोगमान्।
फलमूलाशनो राजा वनेऽसौ न्यवसच्चिरम्॥१२
स जितात्मा जितक्रोधस्तर्पयन् पितृदेवताः।
अग्नींश्च विधिवज्जुह्वन् वानप्रस्थविधानतः॥१३
अतिथीन् पूजयन् नित्यं वन्येन हविषा विभुः।
शिलोञ्छवृत्तिमास्थाय शेषान्नकृतभोजनः॥१४
पूर्ण सहस्त्रं वर्षाणामेवंवृत्तिरभूनृपः।
अम्बुभक्षः स चाब्दांस्त्रीनासीनियतवाङ्मनाः॥१५
ततस्तु वायुभक्षोऽभूत् संवत्सरमतन्द्रितः।
पञ्चाग्निमध्ये च तपस्तेपे संवत्सरं पुनः॥१६
एकपादस्थितश्चासीत् षण्मासाननिलाशनः ।
पुण्यकीर्तिस्तत: स्वर्ग जगामावृत्य रोदसी॥१७
शतानीकने पूछा- भगवन्! किस कर्मसे वे भूपाल पुनः स्वर्गमें पहुंचे थे? तथा इन्द्रने उन्हें भूतलपर क्यों ढकेल दिया था? विप्रवर! मैं ये सारी बातें पूर्णरूपसे यथावत् सुनना चाहता हूँ। इन ब्रह्मर्षियोंके समीप आप इस प्रसंगका वर्णन करें। कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले अग्निके समान तेजस्वी राजा ययाति देवराज इन्द्रके समान थे। उनका यश चारों ओर फैला था। देवेश! मैं उन सत्यकीर्ति महात्मा ययातिका चरित्र, जो इहलोक और स्वर्गलोकमें सर्वत्र प्रसिद्ध है, सुनना चाहता हूँ॥६-९॥
शौनकजी कहते हैं-शतानीक! ययातिकी उत्तम कथा इहलोक और स्वर्गलोकमें भी पुण्यदायक है। यह सब पापोंका नाश करनेवाली है, मैं तुमसे उसका वर्णन करता हूँ। नहुष-पुत्र महाराज ययातिने अपने छोटे पुत्र पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके यदु आदि अन्य पुत्रोंको सीमान्त (किनारेके देशों)-में रख दिया। फिर बड़ी प्रसन्नताके साथ वे वनमें चले गये। वहाँ फल-मूलका आहार करते हुए उन्होंने दीर्घकालतक निवास किया। उन्होंने अपने मनको शुद्ध करके क्रोधपर विजय पायी और प्रतिदिन देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करते हुए वानप्रस्थाश्रमकी विधिसे शास्त्रीय विधानके अनुसार अग्निहोत्र प्रारम्भ किया। वे राजा शिलोञ्छवृत्तिका आश्रय ले यज्ञशेष अन्नका भोजन करते थे। भोजनसे पूर्व वनमें उपलब्ध होनेवाले फल, मूल आदि हविष्यके द्वारा अतिथियोंका आदर-सत्कार करते थे। राजाको इसी वृत्तिसे रहते हुए पूरे एक हजार वर्ष बीत गये। उन्होंने मन और वाणीपर संयम करके तीन वर्षोंतक केवल जलका आहार किया। तत्पश्चात् वे आलस्यरहित हो एक वर्षतक केवल वायु पीकर रहे। फिर एक वर्षतक पाँच अग्नियोंके बीच बैठकर तपस्या की। इसके बाद छः महीनेतक हवा पीकर वे एक पैरसे खड़े रहे। तदनन्तर पुण्यकीर्ति महाराज ययाति पृथ्वी और आकाशमें अपना यश फैलाकर स्वर्गलोकमें चले गये॥१०-१७॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे यातिचरिते पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥३५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक पैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३५ ॥
Summary of chapter 35 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya describes King Yayāti's departure from his capital after renouncing all royal opulence, kingdoms, and sensory attachments. Accompanied by his wives Devayānī and Śarmishṭhā, the elderly monarch retired to the holy hermitage of Bhṛgu-tīrtha to observe the austere vows of Vānaprastha. He engaged in severe asceticism, eating only wild roots and fallen leaves, controlling his senses through intense breath control, and meditating continuously upon Bhagavān Vishṇu. Through decades of unshakeable tapasya and unwavering devotion, King Yayāti purified his subtle body, conquered all material desires, and ultimately cast off his mortal frame, ascending directly to the elevated celestial realms of Svarga.