सौभाग्यशयन-व्रत तथा जगद्धात्री सतीकी आराधना

मत्स्य उवाच

तथैवान्यत् प्रवक्ष्यामि सर्वकामफलप्रदम्।

सौभाग्यशयनं नाम यत् पुराणविदो विदुः॥१

पुरा दग्धेषु लोकेषु भूर्भुवःस्वर्महादिषु।

सौभाग्यं सर्वभूतानामेकस्थमभवत् तदा।

वैकुण्ठं स्वर्गमासाद्य विष्णोर्वक्षःस्थलस्थितम्॥२

ततः कालेन महता पुनः सर्गविधौ नृप।

अहङ्कारावृते लोके प्रधानपुरुषान्विते॥३

स्पर्धायां च प्रवृत्तायां कमलासनकृष्णयोः।

पिङ्गाकारा* समुद्भूता वह्वेर्चालातिभीषणा।

तयाभितप्तस्य हरेर्वक्षसस्तद् विनिःसृतम्॥४

वक्षःस्थलं समाश्रित्य विष्णौ सौभाग्यमास्थितम्।

रसं रूपं न तद् यावत् प्राप्नोति वसुधातले॥५

उत्क्षिप्तमन्तरिक्षे तद् ब्रह्मपुत्रेण धीमता।

दक्षेण पीतमात्रं तद् रूपलावण्यकारकम्॥६

बलं तेजो महज्जातं दक्षस्य परमेष्ठिनः ।

शेषं यदपतद् भूमावष्टधा तद् व्यजायत॥७

ततस्त्वोषधयो जाताः सप्त सौभाग्यदायिकाः।

इक्षवो रसराजश्च निष्यावा राजधान्यकम्॥८

विकारवच्च गोक्षीरं कुसुम्भं कुङ्कुमं तथा।

लवणं चाष्टमं तद्वत् सौभाग्याष्टकमुच्यते॥९

मत्स्यभगवान्ने कहा-राजन्! इसी प्रकार एक दूसरा व्रत बतलाता हूँ, जो समस्त मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है। उसका नाम है-'सौभाग्यशयन'। इसे पुराणोंके विद्वान् ही जानते हैं। पूर्वकालमें जब भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोक आदि सम्पूर्ण लोक दग्ध हो गये, तब समस्त प्राणियोंका सौभाग्य एकत्रित हो गया। वह वैकुण्ठलोकमें जाकर भगवान् श्रीविष्णुके वक्षःस्थलमें स्थित हो गया। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् जब पुनः सृष्टि-रचनाका समय आया, तब प्रकृति और पुरुषसे युक्त सम्पूर्ण लोकोंके अहंकारसे आवृत हो जानेपर श्रीब्रह्माजी तथा भगवान् श्रीविष्णुमें स्पर्धा जाग्रत् हुई। उस समय एक पीले रंगकी (अथवा शिवलिङ्गके आकारकी) अत्यन्त भयंकर अग्निज्वाला प्रकट हुई। उससे भगवान्का वक्षःस्थल तप उठा, जिससे वह सौभाग्यपुञ्ज वहाँसे गलित हो गया। श्रीविष्णुके वक्षःस्थलका आश्रय लेकर स्थित वह सौभाग्य अभी रसरूप होकर धरतीपर गिरने भी न पाया था कि ब्रह्माजीके बुद्धिमान् पुत्र दक्षने उसे आकाशमें ही रोककर पी लिया। दक्षके पीते ही वह अद्भुत रूप और लावण्य प्रदान करनेवाला सिद्ध हुआ। ब्रह्म-पुत्र दक्षका बल और तेज बढ़ गया। उनके पीनेसे बचा हुआ जो अंश पृथ्वीपर गिर पड़ा, वह आठ भागोंमें बँट गया। उनमेंसे सात भागोंसे सात सौभाग्यदायिनी ओषधियाँ उत्पन्न हुईं, जिनके नाम इस प्रकार हैं-ईंख, रसराज (पारा), निष्पाव (सेम), राजधान्य (शालि या अगहनी), गोक्षीर (क्षीरजीरक), कुसुम्भ (कुसुम नामक) पुष्प, कुङ्कुम (केसर) तथा आठवाँ पदार्थ नमक है। इन आठोंको सौभाग्याष्टक कहते हैं ॥१-९॥

* कहीं-कहीं लिङ्गाकारा पाठ है; जिसका शिव, स्कन्द आदि पुराणोंकी तथा शिवरात्रि-व्रत कथाके लिङ्गोद्भव-वृत्तान्तसे तात्पर्य माना जाना चाहिये।

पीतं यद् ब्रह्मपुत्रेण योगज्ञानविदा पुनः।

दुहिता साभवत् तस्य या सतीत्यभिधीयते॥१०

लोकानतीत्य लालित्याल्ललिता तेन चोच्यते।

त्रैलोक्यसुन्दरीमेनामुपयेमे पिनाकधृक्॥११

त्रिविश्वसौभाग्यमयी भुक्तिमुक्तिफलप्रदा।

तामाराध्य पुमान् भक्त्या नारी वा किं न विन्दति॥१२

मनुरुवाच

कथमाराधनं तस्या जगद्धात्र्या जनार्दन।

तद्विधानं जगन्नाथ तत् सर्वं च वदस्व मे॥१३

मत्स्य उवाच

वसन्तमासमासाद्य तृतीयायां जनप्रिय।

शुक्लपक्षस्य पूर्वाहे तिलैः स्नानं समाचरेत्॥१४

तस्मिन्नहनि सा देवी किल विश्वात्मना सती।

पाणिग्रहणकैर्मन्त्रैरवसद् वरवर्णिनी॥१५

तया सहैव देवेशं तृतीयायामथार्चयेत्।

फलैर्नानाविधैधूपैर्दीपैर्नैवेद्यसंयुतैः ॥१६

प्रतिमां पञ्चगव्येन तथा गन्धोदकेन तु।

स्नापयित्वार्चयेद् गौरीमिन्दुशेखरसंयुताम्॥१७

नमोऽस्तु पाटलायै तु पादौ देव्याः शिवस्य तु।

शिवायेति च संकीर्त्य जयायै गुल्फयोर्द्वयोः ॥ १८

त्रिगुणायेति रुद्राय भवान्यै जङ्घयोर्युगम्।

शिवं भद्रेश्वरायेति विजयायै च जानुनी।

संकीर्त्य हरिकेशाय तथोरू वरदे नमः॥१९

ईशायै च कटिं देव्याः शंकरायेति शंकरम्।

कुक्षिद्वयं च कोटव्यै शूलिने शूलपाणये॥ २०

मङ्गलायै नमस्तुभ्यमुदरं चाभिपूजयेत्।

सर्वात्मने नमो रुद्रमीशान्यै च कुचद्वयम्॥२१॥

योग और ज्ञानके तत्त्वको जाननेवाले ब्रह्मपुत्र दक्षने पूर्वकालमें जिस सौभाग्य-रसका पान किया था, उसके अंशसे उन्हें एक कन्या उत्पन्न हुई; जिसे सती नामसे अभिहित किया जाता है। अपनी सुन्दरतासे तीनों लोकोंको पराजित कर देनेके कारण वह कन्या लोकमें ललिता* के नामसे भी प्रसिद्ध है। पिनाकधारी भगवान् शंकरने उस त्रिभुवनसुन्दरी देवीके साथ विवाह किया। सती तीनों लोकोंकी सौभाग्यरूपा हैं। वे भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। उनकी भक्तिपूर्वक आराधना करके नर या नारी क्या नहीं प्राप्त कर सकती॥१०-१२॥

मनुजीने पूछा-जनार्दन! जगद्धात्री सतीकी आराधना कैसे की जाती है? जगन्नाथ! उसके लिये जो विधान हो, वह सब मुझे बतानेकी कृपा कीजिये ॥१३॥

मत्स्यभगवान्ने कहा-जनप्रिय! चैत्रमासके शुक्लपक्षकी तृतीयाको दिनके पूर्वभागमें मनुष्य तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। उस दिन परम सुन्दरी भगवती सतीका विश्वात्मा भगवान् शंकरके साथ वैवाहिक मन्त्रोंद्वारा विवाह हुआ था, अतः तृतीयाको सती देवीके साथ ही भगवान् शंकरका भी पूजन करे। पञ्चगव्य तथा चन्दनमिश्रित जलके द्वारा गौरी और भगवान् चन्द्रशेखरकी प्रतिमाको स्नान कराकर धूप, दीप, नैवेद्य तथा नाना प्रकारके फलोंद्वारा उन दोनोंकी पूजा करनी चाहिये। 'पाटलायै नमोऽस्तु', 'शिवाय नमः' इन मन्त्रोंसे क्रमशः पार्वती और शिवके चरणोंका, 'जयायै नमः', 'शिवाय नमः' से दोनोंकी घुट्ठियोंका, 'त्रिगुणाय रुद्राय नमः', 'भवान्यै नमः' से गुल्फोंका, 'भद्रेश्वराय नमः', 'विजयायै नमः' से घुटनोंका 'हरिकेशाय नमः', 'वरदायै नमः' से ऊरुओंका, 'शङ्कराय नमः 'ईशायै नमः' से दोनों कटिभागका, 'कोटव्यै नमः', 'शूलिने नमः' से दोनों कुक्षिभागोंका, 'शूलपाणये नमः', 'मङ्गलायै नमः' से उदरका पूजन करना चाहिये। 'सर्वात्मने नमः', 'ईशान्यै नमः' से दोनों स्तनोंकी,

*इसमें वर्णित–'सौभाग्य' एवं 'ललिता' देवीके रहस्य का सामञ्जस्य-स्थापन तथा पूर्ण चित्रण भास्करराय 'ललितासहस्रनाम के परम श्रेष्ठ 'सौभाग्य-भास्कर-भाष्य' में मत्स्य भारतीने नुराणके नामोल्लेखपूर्वक किया है।

शिवं वेदात्मने तद्वद् रुद्राण्यै कण्ठमर्चयेत्।

त्रिपुरघ्नाय विश्वेशमनन्तायै करद्वयम्॥ २२

त्रिलोचनाय च हरं बाहू कालानलप्रिये।

सौभाग्यभवनायेति भूषणानि सदार्चयेत्।

स्वाहास्वधायै च मुखमीश्वरायेति शूलिनम्॥ २३

अशोकमधुवासिन्यै पूज्यावोष्ठौ च भूतिदौ।

स्थाणवे तु हरं तद्वद्धास्यं चन्द्रमुखप्रिये ॥ २४

नमोऽर्धनारीशहरमसिताङ्गीति नासिकाम्।

नम उग्राय लोकेशं ललितेति पुनर्भुवौ॥ २५

शर्वाय पुरहन्तारं वासव्यै तु तथालकान्।

नमः श्रीकण्ठनाथायै शिवकेशांस्ततोऽर्चयेत्।

भीमोग्रसमरूपिण्यै शिरः सर्वात्मने नमः॥२६

शिवमभ्यर्च्य विधिवत् सौभाग्याष्टकमग्रतः।

स्थापयेद् घृतनिष्यावकुसुम्भक्षीरजीरकान्॥ २७

रसराजं च लवणं कुस्तुम्बुरुं तथाष्टकम्।

दत्तं सौभाग्यमित्यस्मात् सौभाग्याष्टकमित्यतः॥ २८

एवं निवेद्य तत् सर्वमग्रतः शिवयोः पुनः ।

रात्रौ शृङ्गोदकं प्राश्य तद्वद् भूमावरिन्दम ॥२९

पुनः प्रभाते तु तथा कृतस्नानजपः शुचिः।

सम्पूज्य द्विजदाम्पत्यं वस्त्रमाल्यविभूषणैः ॥३०

सौभाग्याष्टकसंयुक्तं सुवर्णचरणद्वयम्।

प्रीयतामत्र ललिता ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥३१

एवं संवत्सरं यावत् तृतीयायां सदा मनो।

कर्तव्यं विधिवद्भक्त्या सर्वसौभाग्यमीप्सुभिः ॥ ३२

प्राशने दानमन्त्रे च विशेषोऽयं निबोध मे।

शृङ्गोदकं चैत्रमासे वैशाखे गोमयं पुनः॥३३

ज्येष्ठे मन्दारकुसुमं बिल्वपत्रं शुचौ स्मृतम्।

श्रावणे दधि सम्प्राश्यं नभस्ये च कुशोदकम्॥३४

क्षीरमाश्वयुजे मासि कार्तिके पृषदाज्यकम्।

मार्गे मासे तु गोमूत्रं पौषे सम्प्राशयेद् घृतम्॥ ३५

'वेदात्मने नमः', 'रुद्राण्यै नमः' से कण्ठकी, 'त्रिपुरघ्नाय नमः', 'अनन्तायै नमः' से दोनों हाथोंकी पूजा करे ॥ १४-२२ ॥

फिर 'त्रिलोचनाय नमः', 'कालानलप्रियायै नमः' से बाँहोंका, 'सौभाग्यभवनाय नमः' से आभूषणोंका नित्य पूजन करे। 'स्वाहास्वधायै नमः', 'ईश्वराय नमः' से दोनोंके मुखमण्डलका, 'अशोकमधुवासिन्यै नमः' इस मन्त्रसे ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले ओठोंका, 'स्थाणवे नमः', 'चन्द्रमुखप्रियायै नमः' से मुँहका, अर्धनारीश्वराय नमः', 'असिताङ्यै नमः' से नासिकाका, 'उग्राय नमः', 'ललितायै नमः' से दोनों भौंहोंका, 'शर्वाय नमः', 'वासव्यै नमः' से केशोंका, श्रीकण्ठनाथाय नमः' से केवल शिवके बालोंका पूजन करे तथा 'भीमोग्रसमरूपिण्यै नमः', 'सर्वात्मने नमः' से दोनोंके मस्तकोंका पूजन करे। इस प्रकार शिव और पार्वतीकी विधिवत् पूजा कर उनके आगे सौभाग्याष्टक रखे। निष्पाव (सेम), कुसुम्भ, क्षीरजीरक, रसराज, इक्षु, लवण, कुङ्कुम तथा राजधान्य-इन आठ वस्तुओंको देनेसे सौभाग्यकी प्राप्ति होती है, इसलिये इनकी 'सौभाग्याष्टक' संज्ञा है। शत्रुदमन! इस प्रकार शिवपार्वतीके आगे सब सामग्री निवेदन करके रातमें सिंघाड़ा खाकर अथवा शृङ्गोदक पान करके भूमिपर शयन करे। फिर सबेरे उठकर स्नान और जप करके पवित्र हो माला, वस्त्र और आभूषणोंके द्वारा ब्राह्मण-दम्पतिका पूजन करे। इसके बाद सौभाग्याष्टकसहित शिव और पार्वतीकी सुवर्णमयी प्रतिमाओंको ललितादेवीकी प्रसन्नताके लिये ब्राह्मणको निवेदन करे ॥२३-३१॥

मनो! इस प्रकार सम्पूर्ण सौभाग्यकी अभिलाषावाले मनुष्योंको एक वर्षतक प्रत्येक तृतीया तिथिको भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजन करना चाहिये। केवल भोजन और दानके मन्त्रोंमें कुछ विशेषता है, उसे मुझसे सुनिये। चैत्रमासमें शृङ्गोदक, वैशाखमें गोबर, ज्येष्ठमें मन्दारका पुष्प, आषाढ़में बिल्वपत्र, श्रावणमें दही, भाद्रपदमें कुशोदक, आश्विनमासमें दूध, कार्तिकमें दही मिला हुआ घी, मार्गशीर्षमासमें गोमूत्र, पौषमें घृत,

माघे कृष्णतिलं तद्वत् पञ्चगव्यं च फाल्गुने।

ललिता विजया भद्रा भवानी कुमुदा शिवा॥ ३६

वासुदेवी तथा गौरी मङ्गला कमला सती।

उमा च दानकाले तु प्रीयतामिति कीर्तयेत्॥ ३७

मल्लिकाशोककमलं कदम्बोत्पलमालतीः ।

कुब्जकं करवीरं च बाणमम्लानकुङ्कुमम्॥ ३८

सिन्धुवारं च सर्वेषु मासेषु क्रमश: स्मृतम्।

जपाकुसुम्भकुसुमं मालती शतपत्रिका॥३९

यथालाभं प्रशस्तानि करवीरं च सर्वदा।

एवं संवत्सरं यावदुपोष्य विधिवन्नरः॥ ४०

स्त्री भक्ता वा कुमारी वा शिवमभ्यर्च्य भक्तितः।

व्रतान्ते शयनं दद्यात् सर्वोपस्करसंयुतम्॥ ४१

उमामहेश्वरं हैमं वृषभं च गवां सह।

स्थापयित्वाथ शयने ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ४२

अन्यान्यपि यथाशक्ति मिथुनान्यम्बरादिभिः।

धान्यालङ्कारगोदानैरभ्यर्चेद् धनसंचयैः।

वित्तशाठ्येन रहितः पूजयेद् गतविस्मयः ॥ ४३

एवं करोति यः सम्यक् सौभाग्यशयनव्रतम्।

सर्वान् कामानवाप्नोति पदमानन्त्यमश्रुते।

फलस्यैकस्य त्यागेन व्रतमेतत् समाचरेत्॥ ४४

य इच्छन् कीर्तिमानोति प्रतिमासं नराधिप।

सौभाग्यारोग्यरूपायुर्वस्त्रालङ्कारभूषणैः

न वियुक्तो भवेद् राजन् नवार्बुदशतत्रयम्॥ ४५

यस्तु द्वादश वर्षाणि सौभाग्यशयनव्रतम्।

करोति सप्त चाष्टौ वा श्रीकण्ठभवनेऽमरैः।

पूज्यमानो वसेत् सम्यग् यावत्कल्पायुतत्रयम्॥ ४६

नारी वा कुरुते वापि कुमारी वा नरेश्वर।

सापि तत्फलमाप्नोति देव्यनुग्रहलालिता॥ ४७

शृणुयादपि यश्चैव प्रदद्यादथवा मतिम्।

सोऽपि विद्याधरो भूत्वा स्वर्गलोके चिरं वसेत्॥ ४८

माघमें काला तिल और फाल्गुनमें पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये तथा दानके समय ललिता, विजया, भद्रा, भवानी, कुमुदा, शिवा, वासुदेवी, गौरी, मङ्गला, कमला, सती और उमा प्रसन्न हों-ऐसा कीर्तन करे। मल्लिका, अशोक, कमल, कदम्ब, उत्पल (नीलकमल), मालती, कुब्जक, करवीर (कनेर), बाण (कचनार या काश), ताजा कुङ्कुम और सिन्दुवार-इनके पुष्प क्रमशः सभी मासोंमें उपयुक्त माने गये हैं। जपाकुसुम, कुसुम्भ- कुसुम, मालती और शतपत्रिकाके पुष्प यदि मिल सकें तो प्रशस्त माने गये हैं, किंतु करवीर (कनेर) पुष्प तो सदा सभी महीनोंमें ग्राह्य है। इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतका विधिपूर्वक अनुष्ठान कर पुरुष, स्त्री या कुमारी भक्तिके साथ शिवजीकी पूजा करे। व्रतकी समाप्तिके समय सम्पूर्ण सामग्रियोंसे युक्त शय्या दान करे। उस शय्यापर शिव-पार्वतीकी सुवर्णमयी प्रतिमा और स्वर्णनिर्मित गौके साथ बैलको स्थापित कर ब्राह्मणको दान करे॥३२-४२॥

अन्यान्य ब्राह्मण-दम्पतियोंका भी वस्त्र, धान्य, अलंकार, गोदान और प्रचुर धनसे पूजन करना चाहिये। कृपणता छोड़कर दृढ़ निश्चयके साथ भगवान्का पूजन करे। जो मनुष्य इस प्रकार उत्तम सौभाग्यशयन नामक व्रतका भलीभाँति अनुष्ठान करता है, उसकी सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं। अथवा (यदि वह निष्कामभावसे इस व्रतको करता है तो) उसे नित्यपदकी प्राप्ति होती है। इस व्रतका आचरण करनेवाले पुरुषको एक फलका परित्याग कर देना चाहिये। राजन्! प्रतिमास इसका आचरण करनेवाला पुरुष यश और कीर्ति प्राप्त करता है। नरेश्वर! (सौभाग्य-शयनका दान करनेवाला पुरुष) सौभाग्य, आरोग्य, सुन्दर रूप, आयु, वस्त्र, अलंकार और आभूषणोंसे नौ अरब तीन सौ वर्षोंतक वञ्चित नहीं होता। जो बारह, आठ या सात वर्षांतक सौभाग्यशयन-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह श्रीकण्ठ (महादेव) के लोकमें देवगणोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर तीस कल्पोंतक निवास करता है। नरेश्वर! जो विवाहिता स्त्री या कुमारी इस व्रतका पालन करती है, वह भी ललितादेवीके अनुग्रहसे लालित होकर पूर्वोक्त फलको प्राप्त करती है। जो इस व्रतकी कथाको श्रवण करता है अथवा दूसरोंको इसे करनेकी सलाह देता है, वह भी विद्याधर होकर चिरकालतक स्वर्गलोकमें निवास करता है।

इदमिहमदनेन पूर्वमिष्ट

शतधनुषा कृतवीर्यसूनुना च।

कृतमथ वरुणेन नन्दिना वा

किमुजननाथ ततो यदुद्भवः स्यात्॥ ४९

जननाथ! पूर्वकालमें कामदेवने, राजा शतधन्वाने, कार्तवीर्य अर्जुनने, वरुणदेवने तथा नन्दीने भी इस अद्भुत व्रतका अनुष्ठान किया था। इस प्रकार इस व्रतके अनुष्ठानसे जैसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है, उसके विषयमें और अधिक क्या कहा जाय॥ ४३-४९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सौभाग्यशयनव्रतं नाम षष्टितमोऽध्यायः॥६०॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सौभाग्यशयनव्रत नामक साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥६०॥