मत्स्य महा पुराण
ययातिसे देवयानीको पुत्रप्राप्ति, ययाति और शर्मिष्ठका एकान्त-मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म
शौनक उवाच
ययातिः स्वपुरं प्राप्य महेन्द्रपुरसंनिभम्।
प्रविश्यान्तःपुरं तत्र देवयानीं न्यवेशयत्॥ १
देवयान्याश्चानुमते सुतां तां वृषपर्वणः ।
अशोकवनिकाभ्याशे गृहं कृत्वा न्यवेशयत्॥ २
वृतां दासीसहस्रेण शर्मिष्ठामासुरायणीम्।
वासोभिरन्नपानैश्च संविभज्य सुसंवृताम्॥ ३
देवयान्या तु सहितः स नृपो नहुषात्मजः ।
विजहार बहूनब्दान् देववन्मुदितो भृशम्॥ ४
ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते देवयानी वराङ्गना।
लेभे गर्भं प्रथमतः कुमारश्च व्यजायत॥ ५
गते वर्षसहस्रे तु शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।
ददर्श यौवनं प्राप्ता ऋतुं सा कमलेक्षणा॥ ६
चिन्तयामास धर्मज्ञा ऋतुप्राप्तौ च भामिनी।
ऋतुकालश्च सम्प्राप्तो न कश्चिन्मे पतिर्वृतः॥ ७
किं प्राप्तं किं च कर्तव्यं कथं कृत्वा सुखं भवेत्।
देवयानी प्रसूतासौ वृथाहं प्राप्तयौवना॥ ८
यथा तया वृतो भर्ता तथैवाहं वृणोमि तम्।
राज्ञा पुत्रफलं देयमिति मे निश्चिता मतिः।
अपीदानीं स धर्मात्मा रहो मे दर्शनं व्रजेत्॥ ९
शौनक उवाच
अथ निष्क्रम्य राजासौ तस्मिन् काले यदृच्छया।
अशोकवनिकाभ्याशे शर्मिष्ठां प्राप्य विस्मितः॥१०
तमेकं रहसि दृष्ट्वा शर्मिष्ठा चारुहासिनी।
प्रत्युद्गम्याञ्जलिं कृत्वा राजानं वाक्यमब्रवीत्॥११
शौनकजी कहते हैं-शतानीक! ययातिकी राजधानी महेन्द्रपुरी (अमरावती)-के समान थी। उन्होंने वहाँ आकर देवयानीको अन्त:पुरमें स्थान दिया तथा उसीकी अनुमतिसे अशोकवाटिकाके समीप एक महल बनवाकर उसमें वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाको उसकी एक हजार दासियोंके साथ ठहराया और उन सबके लिये अन्न, वस्त्र तथा पेय आदिकी अलग-अलग व्यवस्था कर दी। (देवयानी ययातिके साथ परम रमणीय एवं मनोरम अशोकवाटिकामें आती और शर्मिष्ठाके साथ वन-विहार करके उसे वहीं छोड़कर स्वयं राजाके साथ महलमें चली जाती थी। इस तरह वह बहुत समयतक प्रसन्नतापूर्वक आनन्द भोगती रही।) नहुषकुमार राजा ययातिने देवयानीके साथ बहुत वर्षोंतक देवताओंकी भाँति विहार किया। वे उसके साथ बहुत प्रसन्न और सुखी थे। ऋतुकाल आनेपर सुन्दरी देवयानीने गर्भ धारण किया और समयानुसार प्रथम पुत्रको जन्म दिया। इधर एक हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर युवावस्थाको प्राप्त हुई वृषपर्वाकी पुत्री कमलनयनी शर्मिष्ठाने अपनेको रजस्वलावस्थामें देखा और चिन्तामग्न हो मन-ही-मन कहने लगी-'मुझे ऋतुकाल प्राप्त हो गया, किंतु अभीतक मैंने पतिका वरण नहीं किया। यह कैसी परिस्थिति आ गयी। अब क्या करना चाहिये अथवा क्या करनेसे सुख होगा। देवयानी तो पुत्रवती हो गयी, किंतु मुझे जो युवावस्था प्राप्त हुई है, वह व्यर्थ जा रही है। जिस प्रकार उसने पतिका वरण किया है, उसी तरह मैं भी उन्हीं महाराजका क्यों न पतिके रूपमें वरण कर लूँ। मेरे याचना करनेपर राजा मुझे पुत्ररूप फल दे सकते हैं, इस बातका मुझे पूरा विश्वास है; परंतु क्या वे धर्मात्मा नरेश इस समय मुझे एकान्तमें दर्शन देंगे? ॥१-९॥
शौनकजी कहते हैं- शतानीक! शर्मिष्ठा इस प्रकार विचार कर ही रही थी कि राजा ययाति उसी समय दैववश महलसे बाहर निकले और अशोकवाटिकाके निकट शर्मिष्ठाको देखकर आश्चर्यचकित हो गये। मनोहर हासवाली शर्मिष्ठाने उन्हें एकान्तमें अकेला देखा। तब उसने आगे बढ़कर उनकी अगवानी की तथा हाथ जोड़कर राजासे यह बात कही-॥ १०-११॥
शर्मिष्ठोवाच
सोमश्चेन्द्रश्च वायुश्च यमश्च वरुणश्च वा।
तव वा नाहुष गृहे कः स्त्रियं द्रष्टुमर्हति ॥१२
रूपाभिजनशीलैर्हि त्वं राजन् वेत्थ मां सदा।
सा त्वां याचे प्रसाद्येह रन्तुमेहि नराधिप॥१३
ययातिरुवाच
वेद्मि त्वां शीलसम्पन्नां दैत्यकन्यामनिन्दिताम्।
रूपं तु ते न पश्यामि सूच्यग्रमपि निन्दितम्॥१४
मामब्रवीत् तदा शुक्रो देवयानी यदावहम्।
नेयमाह्वयितव्या ते शयने वार्षपर्वणी॥१५
शर्मिष्ठोवाच
न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति
न स्त्रीषु राजन् न विवाहकाले।
प्राणात्यये सर्वधनापहारे
पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥१६
पृष्टास्तु साक्ष्ये प्रवदन्ति चान्यथा
भवन्ति मिथ्यावचना नरेन्द्र ते।
एकार्थतायां तु समाहितायां
मिथ्यावदन्तं ह्यनृतं हिनस्ति॥१७
ययातिरुवाच
राजा प्रमाणं भूतानां स विनश्येन्मृषा वदन्।
अर्थकृच्छ्रमपि प्राप्य न मिथ्या कर्तुमुत्सहे॥१८
शर्मिष्ठोवाच
समावेतौ मतौ राजन् पतिः सख्याश्च यः पतिः।
समं विवाह इत्याहुः सख्या मेऽसि पतिर्यतः॥१९
ययातिरुवाच
दातव्यं याचमानस्य हीति मे व्रतमाहितम्।
त्वंच याचसि कामं मां ब्रूहि किं करवाणि तत्॥२०
शर्मिष्ठोवाच
अधर्मात् त्राहि मां राजन् धर्मं च प्रतिपादय।
त्वत्तोऽपत्यवती लोके चरेयं धर्ममुत्तमम्॥२१
त्रय एवाधना राजन् भार्या दासस्तथा सुतः।
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम्॥ २२ *
शर्मिष्ठाने कहा-नहुषनन्दन! चन्द्रमा, इन्द्र, वायु, यम अथवा वरुण ही क्यों न हों, आपके महलमें कौन किसी स्त्रीकी ओर दृष्टि डाल सकता है? (अतएव मैं यहाँ सर्वथा सुरक्षित हूँ।) महाराज! मेरे रूप, कुल और शील कैसे हैं, यह तो आप सदासे ही जानते हैं। मैं आज आपको प्रसन्न करके यह प्रार्थना करती हूँ कि मुझे ऋतुदान दीजिये-मेरे ऋतुकालको सफल बनाइये ॥ १२-१३ ।।
ययातिने कहा-शर्मिष्ठे ! तुम दैत्यराजकी सुशील और निर्दोष कन्या हो। मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारे शरीर अथवा रूपमें सूईकी नोक बराबर भी ऐसा स्थान नहीं है, जो निन्दाके योग्य हो; परंतु क्या करूँ, जब मैंने देवयानीके साथ विवाह किया था, उस समय शुक्राचार्यने मुझसे स्पष्ट कहा था कि 'वृषपर्वाकी पुत्री इस शर्मिष्ठाको अपनी सेजपर न बुलाना' ॥१४-१५ ॥
शर्मिष्ठाने कहा-राजन्! परिहासयुक्त वचन असत्य हो तो भी वह हानिकारक नहीं होता। अपनी स्त्रियों के प्रति, विवाहके समय, प्राणसंकटके समय तथा सर्वस्वका अपहरण होते समय यदि कभी विवश होकर असत्य भाषण करना पड़े तो वह दोषकारक नहीं होता। ये पाँच प्रकारके असत्य पापशून्य बताये गये हैं। महाराज! गवाही देते समय किसीके पूछनेपर जो अन्यथा (असत्य) भाषण करते हैं, वे मिथ्यावादी कहलाते हैं; परंतु जहाँ दो व्यक्तियोंके (जैसे देवयानीका तथा मेरा) कल्याणका प्रसङ्ग उपस्थित हो, वहाँ एकका (अर्थात् मेरा) कल्याण न करना असत्य भाषण है, जो वक्ताकी (अर्थात् आपकी) हानि कर सकता है॥१६-१७॥
ययाति बोले-देवि! सब प्राणियोंके लिये राजा ही प्रमाण है। यदि वह झूठ बोलने लगे तो उसका नाश हो जाता है। अतः अर्थ-संकटमें पड़नेपर भी मैं गलत काम नहीं कर सकता ॥ १८ ॥
शर्मिष्ठाने कहा-राजन्! अपना पति और सखीका पति-दोनों बराबर माने गये हैं। मेरी सखीने आपको अपना पति बनाया है, अतः मैंने भी बना लिया ॥ १९॥
ययाति बोले-याचकोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ दी जायँ, ऐसा मेरा व्रत है। तुम भी मुझसे अपने मनोरथकी याचना करती हो; अत: बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ॥२०॥
शर्मिष्ठाने कहा-राजन्! मुझे अधर्मसे बचाइये और धर्मका पालन कराइये। मैं चाहती हूँ, आपसे संतानवती होकर इस लोकमें उत्तम धर्मका आचरण करूँ। महाराज! तीन व्यक्ति धनके अधिकारी नहीं होते-पत्नी, दास और पुत्र। उनकी सम्पत्ति भी उसीकी होती है, जहाँ ये
*यह श्लोक स्वल्पान्तरसे मनुस्मृति ८। ४१६, नारदस्मृति ५। ३९, महाभारत १। ८२ । २२ आदिमें भी है। मेधातिथि, गोविन्दराज, कुल्लूक भट्ट, राघवानन्द आदि मनुके सभी व्याख्याता इस श्लोकका तात्पर्य धनके व्ययमें अभिभावककी सहमति लेने में ही चरितार्थ मानते हैं। नीलकण्ठकी व्याख्या केवल प्रस्तुत प्रसङ्गसे ही सम्बद्ध है।
देवयान्या भुजिष्यास्मि वश्या च तव भार्गवी।
सा चाहं च त्वया राजन् भजनीये भजस्व माम्॥२३
शौनक उवाच
एवमुक्तस्तया राजा तथ्यमित्यभिजज्ञिवान्।
पूजयामास शर्मिष्ठां धर्मं च प्रतिपादयन्॥२४
स समागम्य शर्मिष्ठां यथाकाममवाप्य च।
अन्योऽन्यं चाभिसम्पूज्य जग्मतुस्तौ यथागतम्॥२५
तस्मिन् समागमे सुभ्रूः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।
लेभे गर्भ प्रथमतस्तस्मान्नृपतिसत्तमात्॥ २६
प्रजज्ञे च ततः काले राज्ञी राजीवलोचना।
कुमारं देवगर्भाभमादित्यसमतेजसम्॥२७
जाते-जिसके अधिकारमें रहते हैं; अर्थात् पत्नीके धनपर पतिका, सेवकके धनपर स्वामीका और पुत्रके धनपर पिताका अधिकार होता है। मैं देवयानीकी सेविका हूँ और देवयानी आपके अधीन है; अतः राजन्! वह और मैं-दोनों ही आपके सेवन अपनाने योग्य हैं। इसलिये आप मुझे भी अङ्गीकार कीजिये।। २१-२३॥
शौनकजी कहते हैं-शर्मिष्ठाके ऐसा कहनेपर राजाने उसकी बातोंको ठीक समझा। उन्होंने शर्मिष्ठाका सत्कार किया और धर्मानुसार उसे अपनी भार्या बनाया। फिर शर्मिष्ठाके साथ सहवास करके एक-दूसरेका आदर-सत्कार करनेके पश्चात् दोनों जैसे आये थे, वैसे ही अपने-अपने स्थानपर चले गये। सुन्दर भौंहोंवाली वृषपर्वा-कुमारी शर्मिष्ठाने उस सहवासमें नृपश्रेष्ठ ययातिसे प्रथम गर्भ धारण किया। शतानीक! तदनन्तर समय आनेपर कमलके समान नेत्रोंवाली शर्मिष्ठाने देवबालक-जैसे सुन्दर एवं सूर्यके समान तेजस्वी एक कुमारको उत्पन्न किया॥२४-२७॥
॥ इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित नामक एकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥३१॥
Summary of chapter 31 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya describes how Princess Śarmishṭhā, residing in an isolated palace cottage assigned to her by Devayānī, approached King Yayāti in secret when her fertile period arrived. She pleaded with him that a woman's desire for motherhood must not be thwarted by unrighteous conditions, arguing that since she was Devayānī's servant, her person also belonged to Devayānī's husband. Yielding to her earnest entreaties and spiritual reasoning, King Yayāti united with Śarmishṭhā in secret, and from their union were born three courageous sons named Druhyu, Anu, and Puru. For years the secret remained hidden, until Devayānī noticed three radiant boys playing in the gardens whose striking physical resemblance to King Yayāti revealed the truth.