भूगोलका विस्तृत वर्णन

ऋषय ऊचुः

कति द्वीपा: समुद्रा वा पर्वता वा कति प्रभो।

कियन्ति चैव वर्षाणि तेषु नद्यश्च काः स्मृताः॥१

महाभूमिप्रमाणं च लोकालोकस्तथैव च।

पर्याप्तिः परिमाणं च गतिश्चन्द्रार्कयोस्तथा॥२

एतद् ब्रवीहि नः सर्वं विस्तरेण यथार्थवित्।

त्वदुक्तमेतत् सकलं श्रोतुमिच्छामहे वयम्॥३

सूत उवाच

द्वीपभेदसहस्त्राणि सप्त चान्तर्गतानि च।

न शक्यन्ते क्रमेणेह वक्तुं वै सकलं जगत्॥४

सप्तैव तु प्रवक्ष्यामि चन्द्रादित्यग्रहैः सह।

तेषां मनुष्यास्तर्केण प्रमाणानि प्रचक्षते॥५

अचिन्त्याः खलु ये भावास्तांस्तु तर्केण साधयेत्।

प्रकृतिभ्यः परं यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम्।। ६

सप्त वर्षाणि वक्ष्यामि जम्बूद्वीपं यथाविधम्।

विस्तरं मण्डलं यच्च योजनैस्तन्निबोधत॥७

योजनानां सहस्त्राणि शतं द्वीपस्य विस्तरः।

नानाजनपदाकीर्णं पुरैश्च विविधैः शुभैः ॥८

सिद्धचारणसंकीर्ण पर्वतैरुपशोभितम्।

सर्वधातुपिनद्धस्तैः शिलाजालसमुद्गतैः ।। ९

ऋषियोंने पूछा-प्रभो! इस भूतलपर कितने द्वीप हैं? कितने समुद्र और पर्वत हैं? कितने वर्ष (पृथ्वीके खण्ड) हैं? उनमें कौन-कौन-सी नदियाँ बतलायी जाती हैं? इस विस्तृत भूमिका प्रमाण कितना है? लोकालोक पर्वत कैसा है? तथा चन्द्रमा और सूर्यकी गति, अवस्थिति और परिमाण कितना है? यह सब हमें विस्तारपूर्वक बतलाइये, क्योंकि आप यथार्थवेत्ता हैं। हमलोग यह सारा विषय आपके मुखसे सुनना चाहते हैं ॥१-३॥

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! द्वीपोंके तो हजारों भेद हैं, परंतु वे सभी इन्हीं सात प्रधान द्वीपोंके अन्तर्गत हैं। इस सम्पूर्ण जगत्का क्रमशः वर्णन करना सम्भव नहीं है, अतः चन्द्रमा, सूर्य आदि ग्रहोंके साथ उन सात द्वीपोंका ही वर्णन कर रहा हूँ। साथ ही मनुष्यके अनुमानानुसार उनका प्रमाण भी बतला रहा हूँ; क्योंकि जो अचिन्त्य भाव हैं, उन्हें बुद्धि, ज्ञान एवं अनुमानद्वारा ही सिद्ध करनेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये । जो प्रकृतिसे परे है, वही अचिन्त्यका लक्षण है। अब मैं सातों वर्षों का वर्णन प्रारम्भ कर रहा हूँ। इनमें सर्वप्रथम योजनके परिमाणसे जम्बूद्वीपका जितना बड़ा विस्तृत मण्डल है, उसे बतला रहा हूँ, सुनिये। जम्बूद्वीपका विस्तार एक लाख योजन है। यह अनेकों प्रकारके सुन्दर देशों एवं नगरोंसे परिपूर्ण है। इसमें सिद्ध और चारण निवास करते हैं। यह सभी प्रकारकी धातुओंसे संयुक्त एवं शिलासमूहोंसे समन्वित पर्वतोंद्वारा सुशोभित

*महाभारत ६।६।१२ आदिका पाठ-अर्थ कुछ भिन्न होने पर भी यहाँ यही पाठ एवं अर्थ युक्तियुक्त है।

पर्वतप्रभवाभिश्च नदीभिस्तु समंततः ।

प्रागायता महापार्श्वाः षडिमे वर्षपर्वताः॥१०

अवगाह्य ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ।

हिमप्रायश्च हिमवान् हेमकूटश्च हेमवान्॥११

सर्वतः सुमुखश्चापि निषधः पर्वतो महान्।

चातुर्वर्ण्यस्तु सौवर्णो मेरुश्चोल्बमयः स्मृतः ।

चतुर्विंशत्सहस्राणि विस्तीर्णं च चतुर्दिशम्॥ १२

वृत्ताकृतिप्रमाणश्च चतुरस्त्रः समाहितः।

नानावणैः समः पार्श्वः प्रजापतिगुणान्वितः ।। १३

नाभीबन्धनसम्भूतो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।

पूर्वतः श्वेतवर्णस्तु ब्राह्मण्यं तस्य तेन वै॥१४

पीतश्च दक्षिणेनासौ तेन वैश्यत्वमिष्यते।

भृङ्गिपत्रनिभश्चैव पश्चिमेन समन्वितः।

तेनास्य शूद्रता सिद्धा मेरो मार्थकर्मतः॥१५

पार्श्वमुत्तरतस्तस्य रक्तवर्णं स्वभावतः।

तेनास्य क्षत्रभावः स्यादिति वर्णाः प्रकीर्तिताः ।। १६

नीलश्च वैदूर्यमयः श्वेतः पीतो हिरण्मयः ।

मयूरबर्हवर्णश्च शातकौम्भः स शृङ्गवान्॥१७

एते पर्वतराजानः सिद्धचारणसेविताः ।

तेषामन्तरविष्कम्भो नवसाहस्रमुच्यते॥१८

मध्ये त्विलावृतं नाम महामेरोः समंततः।

चतुर्विंशत्सहस्राणि विस्तीर्णो योजनैः समः॥१९

मध्ये तस्य महामेरुर्विधूम इव पावकः।

वेद्यर्धं दक्षिणं मेरोरुत्तरार्धं तथोत्तरम्॥२०

वर्षाणि यानि सप्तात्र तेषां वै वर्षपर्वताः।

द्वे द्वे सहस्र विस्तीर्णा योजनैर्दक्षिणोत्तरम्॥ २१

जम्बूद्वीपस्य विस्तारस्तेषामायाम उच्यते।

नीलश्च निषधश्चैव तेषां हीनाश्च ये परे॥२२

उन पर्वतोंसे निकलनेवाली नदियोंसे यह चारों ओरसे व्याप्त है। इसमें पूर्वसे पश्चिमतक फैले हुए अत्यन्त विस्तृत छ: वर्षपर्वत हैं। इसमें पूर्व और पश्चिम-दोनों ओरके समुद्रोंतक फैला हुआ हिमवान् नामक पर्वत है, जो सदा बर्फसे ढका रहता है। इसके बाद सुवर्णसे व्याप्त हेमकूट नामक पर्वत है। तत्पश्चात् जो चारों ओरसे देखनेमें अत्यन्त सुन्दर है, वह निषध नामक महान् पर्वत है॥४-११३ ॥

इसके एक और सुवर्णमय मेरुपर्वत है, जिसके चारों पार्श्वभाग चार रंगोंके हैं और जो उल्बमय (गर्भाशयके समान) कहा जाता है। यह चारों दिशाओंमें चौबीस हजार योजनोंतक फैला हुआ है। इसका ऊपरी भाग वृत्तकी आकृतिका अर्थात् गोलाकार है तथा निचला भाग चौकोर है। इसके पार्श्वभाग नाना प्रकारकी रंग-बिरंगी समतल भूमियोंसे युक्त हैं, जिससे प्रजापतिके गुणोंसे युक्त सा दीखता है। यह अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके नाभि-बन्धनसे उद्भूत हुआ है। इसका पूर्वी भाग श्वेत रंगका है, इसीसे इसकी ब्राह्मणता झलकती है। इसका दक्षिणी भाग पीले रंगका है, इसीसे इसमें वैश्यत्वकी प्रतीति होती है। इसका पश्चिमी भाग भँवरेके पंख-सरीखा काला है, इसीसे इसकी शूद्रता तथा अर्थ और काम-दोनों दृष्टियोंसे मेरुके नामकी सार्थकता सिद्ध होती है। इसका उत्तरी भाग स्वभावसे ही लाल रंगका है, इसीसे इसका क्षत्रियत्व सूचित होता है। इस प्रकार मेरुके चारों रंगोंका विवरण बतलाया गया है। तदनन्तर नील पर्वत है, जो वैदूर्यमणिसे व्याप्त है। पुनः श्वेत पर्वत है, जो सुवर्णमय होनेके कारण पीले रंगका है तथा सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित शृङ्गवान् पर्वत है, जो मयूर-पिच्छ-सरीखे चित्र-विचित्र रंगोंवाला है। ये सभी पर्वतराज सदा सिद्धों एवं चारणोंसे सेवित होते रहते हैं। उनका भीतरी व्यास नौ हजार योजन बतलाया जाता है॥१२-१८॥

पृथ्वीके मध्य भागमें इलावृत नामक वर्ष है, जो महामेरु पर्वतके चारों ओर फैला हुआ है। यह चौबीस हजार योजनकी समतल भूमिमें विस्तृत है। इसके मध्य भागमें महामेरु नामक पर्वत है, जो धूमरहित अग्निके समान चमकता रहता है। मेरु पर्वतका आधा दक्षिणी भाग दक्षिण मेरु और आधा उत्तरी भाग उत्तर मेरुके नामसे प्रसिद्ध है। इस प्रकार जो सात वर्ष बतलाये गये हैं, उनमें पृथक्-पृथक् सात वर्षपर्वत हैं, जो दक्षिणसे उत्तरतक दो-दो हजार योजनके परिमाणमें फैले हुए हैं। जम्बूद्वीपका विस्तार इन्हीं वर्षों तथा पर्वतोंके विस्तारके बराबर कहा जाता है। इनमें नील और निषध-ये दोनों विशाल पर्वत हैं

श्वेतश्च हेमकूटश्च हिमवाञ्शृङ्गवांश्च यः।

जम्बूद्वीपप्रमाणेन ऋषभः परिकीर्त्यते॥२३

तस्माद् द्वादशभागेन हेमकूटोऽपि हीयते।

हिमवान् विंशभागेन तस्मादेव प्रहीयते।

अष्टाशीतिसहस्राणि हेमकूटो महागिरिः॥ २४

अशीतिर्हिमवाशैल आयतः पूर्वपश्चिमे।

द्वीपस्य मण्डलीभावाद् ह्रासवृद्धी प्रकीर्तिते॥२५

वर्षाणां पर्वतानां च यथाभेदं तथोत्तरम्।

तेषां मध्ये जनपदास्तानि वर्षाणि सप्त वै॥ २६

प्रपातविषमैस्तैस्तु पर्वतैरावृतानि तु।

सप्त तानि नदीभेदैरगम्यानि परस्परम्॥ २७

वसन्ति तेषु सत्त्वानि नानाजातीनि सर्वशः।

इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम्॥२८

हेमकूटं परं तस्मान्नाम्ना किम्पुरुषं स्मृतम्।

हेमकूटाच्च निषधं हरिवर्षं तदुच्यते॥ २९ ९

हरिवर्षात् परं चापि मेरोस्तु तदिलावृतम्।

इलावृतात्परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम्॥ ३०

रम्यकादपरं श्वेतं विश्रुतं तद्धिरण्यकम्।

हरण्यकात् परं चैव शृङ्गशाकं कुरुं स्मृतम्॥ ३१

धनुःसंस्थे तु विज्ञेये देवर्षे दक्षिणोत्तरे।

दीर्घाणि तस्य चत्वारि मध्यमं तदिलावृतम्॥३२

पूर्वतो निषधस्येदं वेद्य) दक्षिणं स्मृतम्।

परं त्विलावृतं पश्चाद् वेद्यर्थं तु तदुत्तरम्॥ ३३

तयोर्मध्ये तु विज्ञेयो मेरुर्यत्र त्विलावृतम्।

दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु॥ ३४

उदगायतो महाशैलो माल्यवान् नाम पर्वतः।

द्वात्रिंशता सहस्त्रेण प्रतीच्यां सागरानुगः॥ ३५

माल्यवान् वै सहस्त्रैक आनीलनिषधायतः।

द्वात्रिंशत् त्वेवमप्युक्तः पर्वतो गन्धमादनः॥३६

तथा श्वेत, हेमकूट, हिमवान् और शृङ्गवान्–ये अपेक्षाकृत उनसे छोटे हैं। ऋषभ पर्वत जम्बूद्वीपके समान ही विस्तारवाला बतलाया जाता है। हेमकूट पर्वत ऋषभ पर्वतके बारहवें भागसे न्यून है और हिमवान् उसके बीसवें अंशसे कम है। हेमकूट नामक महान् पर्वत अठासी हजार योजनके परिमाणवाला कहा जाता है तथा हिमवान् पर्वत पूर्वसे पश्चिमतक अस्सी हजार योजनमें फैला हुआ है। जम्बूद्वीपके मण्डलाकारमें स्थित होनेके कारण इन पर्वतोंका न्यूनाधिक्य बतलाया गया है। पर्वतोंकी ही भाँति वर्षों में भी भिन्नता है। वे सभी एक-दूसरेसे उत्तर दिशाकी ओर फैले हुए हैं। इनके बीचमें देश बसे हुए हैं, जो सात वर्षों में विभक्त हैं। ये सभी वर्ष ऐसे पर्वतोंसे घिरे हुए हैं, जो झरनोंके कारण अगम्य हैं। इसी प्रकार सात नदियोंके विभाजनसे ये परस्पर गमनागमनरहित हैं। इन वर्षों में सब ओर अनेकों जातियोंके प्राणी निवास करते हैं। यह हिमवान् पर्वतसे सम्बन्धित वर्ष भारतवर्षके नामसे विख्यात है॥१९-२८॥

हिमवान्के बाद हेमकूटतकका प्रदेश किम्पुरुष नामसे कहा जाता है तथा हेमकूटसे आगे निषध पर्वततक हरिवर्ष कहलाता है। हरिवर्षके बाद मेरुपर्वततकका प्रदेश इलावृतवर्षके नामसे तथा इलावृतके बाद नीलपर्वततकका प्रदेश रम्यकवर्षके नामसे विख्यात है। रम्यकवर्षके बाद श्वेतपर्वततकका जो प्रदेश है, वह हिरण्यकवर्षके नामसे प्रसिद्ध है। हिरण्यकवर्षके बाद शृङ्गशाक नामक वर्ष है, जिसे कुरुवर्ष भी कहते हैं। मेरुपर्वतके दक्षिण और उत्तर दिशामें धनुषके आकारमें दो वर्ष स्थित हैं। उन्हींके मध्यमें इलावृतवर्ष है। निषध पर्वतके पूर्व दिशामें मेरुकी वेदीका अर्धभाग दक्षिणवेदी और इलावृतसे पश्चिमकी ओर वेदीका आधा भाग उत्तरवेदीके नामसे विख्यात है। इन्हीं दोनोंके बीचमें मेरुकी स्थिति समझनी चाहिये, जहाँ इलावृतवर्ष अवस्थित है। नील पर्वतके दक्षिण और निषध पर्वतके उत्तर माल्यवान् नामक पर्वत है, जिसकी गणना विशाल पर्वतोंमें है। यह उत्तरसे दक्षिणकी ओर लम्बा है। यह पश्चिम दिशामें सागरपर्यन्त बत्तीस हजार योजनमें फैला हुआ है। इस प्रकार माल्यवान् पर्वत नील और निषध पर्वतोंके बीचमें एक हजार योजनके विस्तारमें स्थित है। इसी तरह गन्धमादन पर्वत भी बत्तीस हजार

परिमण्डलयोर्मध्ये मेरुः कनकपर्वतः।

चातुर्वर्ण्यसमो वर्णैश्चतुरस्रः समुच्छ्रितः॥३७

नानावर्णः स पार्श्वेषु पूर्वान्ते श्वेत उच्यते।

पीतं तु दक्षिणं तस्य भृङ्गिपत्रनिभं परम्।

उत्तरं तस्य रक्तं वै इति वर्णसमन्वितः॥३८

मेरुस्तु शुशुभे दिव्यो राजवत् स तु वेष्टितः।

आदित्यतरुणाभासो विधूम इव पावकः॥ ३९

योजनानां सहस्राणि चतुराशीति सूच्छ्रितः।

प्रविष्टः षोडशाधस्तादष्टाविंशतिविस्तृतः॥४०

विस्तराद् द्विगुणश्चास्य परीणाहः समंततः।

स पर्वतो महादिव्यो दिव्यौषधिसमन्वितः॥४१

भुवनैरावृतः सर्वैर्जातरूपपरिष्कृतैः।

तत्र देवगणाश्चैव गन्धर्वासुरराक्षसाः।

शैलराजे प्रमोदन्ते सर्वतोऽप्सरसां गणैः॥४२

स तु मेरुः परिवृतो भुवनैर्भूतभावनैः।

यस्येमे चतुरो देशा नानापार्श्वेषु संस्थिताः ॥ ४३

भद्राश्वं भारतं चैव केतुमालं च पश्चिमे।

उत्तराश्चैव कुरवः कृतपुण्यप्रतिश्रयाः॥ ४४

विष्कम्भपर्वतास्तद्वन्मन्दरो गन्धमादनः।

विपुलश्च सुपार्श्वश्च सर्वरत्नविभूषिताः॥ ४५

अरुणोदं मानसं च सितोदं भद्रसंज्ञितम्।

तेषामुपरि चत्वारि सरांसि च वनानि च॥ ४६

तथा भद्रकदम्बस्तु पर्वते गन्धमादने।

जम्बूवृक्षस्तथाश्वत्थो विपुलेऽथ वटः परम्॥ ४७

गन्धमादनपार्श्वे तु पश्चिमेऽमरगण्डिकः ।

द्वात्रिंशतिसहस्राणि योजनैः सर्वतः समः॥ ४८

तत्र ते शुभकर्माण: केतुमाला: परिश्रुताः।

तत्र कालानलाः सर्वे महासत्त्वा महाबलाः॥४९

स्त्रियश्चोत्पलवर्णाभाः सुन्दर्यः प्रियदर्शनाः।

तत्र दिव्यो महावृक्षः पनसः पत्रभासुरः ।।५०

योजन विस्तृत बतलाया गया है। इन दोनोंके मण्डलके मध्यमें मेरु नामक स्वर्णमय पर्वत है। यह चार प्रकारके रंगोंसे युक्त, चौकोर और अत्यन्त ऊँचा है ॥२९-३७॥

उसके पार्श्वभाग अनेक प्रकारके रंगोंसे विभूषित हैं। इसका पूर्वीय भाग श्वेत, दक्षिणी भाग पीला, पश्चिमका भाग भ्रमरके पंखके समान काला और उत्तरी हिस्सा लाल है। इस प्रकार यह चार रंगोंसे युक्त कहा जाता है। इस तरह चारों ओरसे पर्वतोंसे घिरा हुआ दिव्य पर्वत मेरु राजाकी भाँति सुशोभित होता है। इसकी कान्ति तरुण सूर्य अर्थात् मध्याह्नकालिक सूर्यकी-सी है। यह धूमरहित अनिके सदृश चमकता रहता है। पृथ्वीके ऊपर इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। यह सोलह हजार योजनतक पृथ्वीके नीचे धंसा हुआ है और अट्ठाईस हजार योजनतक फैला हुआ है। चारों ओरसे इसका फैलाव विस्तारसे दुगुना है। यह महान् दिव्य पर्वत मेरु दिव्य ओषधियोंसे परिपूर्ण तथा सभी सुवर्णमय भुवनोंसे घिरा हुआ है। इस पर्वतराजपर देवगण, गन्धर्व, असुर और राक्षस सर्वत्र अप्सराओंके साथ रहकर आनन्दका अनुभव करते हैं। यह मेरु प्राणियोंके निमित्त-कारणभूत भुवनोंसे घिरा हुआ है। इसके विभिन्न पार्श्वभागोंमें चार देश अवस्थित हैं। उनके नाम हैं-(पूर्वमें) भद्राश्व, (दक्षिणमें) भारत, (पश्चिममें) केतुमाल और (उत्तरमें) किये हुए पुण्योंके आश्रयस्थानरूप उत्तरकुरु। इसी प्रकार उसके चारों दिशाओंमें सभी प्रकारके रत्नोंसे विभूषित मन्दर, गन्धमादन, विपुल और सुपार्श्व नामक विष्कम्भ पर्वत भी विद्यमान हैं। उनके ऊपर अरुणोद, मानस, सितोद और भद्र नामक सरोवर और अनेकों वन हैं तथा मन्दर पर्वतपर भद्रकदम्ब, गन्धमादनपर जामुन, विपुलपर पीपल और सुपार्श्वपर बरगदका वृक्ष है॥३८-४७॥

गन्धमादनके पश्चिम भागमें अमरगण्डिक नामक पर्वत है, जो सब ओरसे बत्तीस हजार योजनकी समतल भूमिसे सम्पन्न है। वहाँकै शुभ कर्म करनेवाले निवासी केतुमाल नामसे विख्यात हैं। वे सभी कालाग्निके समान भयानक, महान् सत्त्वसम्पन्न एवं महाबली होते हैं। वहाँकी स्त्रियों के शरीरका रंग लाल कमलके समान होता है। वे परम सुन्दरी एवं देखने में आह्लादकारिणी होती हैं। उसपर कटहलका एक महान् दिव्य वृक्ष है, जिसके पत्ते अत्यन्त चमकीले हैं।

तस्य पीत्वा फलरसं संजीवन्ति समायुतम्।

तस्य माल्यवतः पार्श्वे पूर्वे पूर्वा तु गण्डिका।

द्वात्रिंशच्च सहस्राणि तत्रापि शतमुच्यते॥५१

भद्राश्वस्तत्र विज्ञेयो नित्यं मुदितमानसः।

भद्रमालवनं तत्र कालाम्रश्च महाद्रुमः॥५२

तत्र ते पुरुषाः श्वेता महासत्त्वा महाबलाः।

स्त्रियः कुमुदवर्णाभाः सुन्दर्यः प्रियदर्शनाः॥५३ |

चन्द्रप्रभाश्चन्द्रवर्णाः पूर्णचन्द्रनिभाननाः।

चन्द्रशीतलगात्राश्च स्त्रियो ह्युत्पलगन्धिकाः॥५४

दशवर्षसहस्त्राणि आयुस्तेषामनामयम्।

कालाम्रस्य रसं पीत्वा ते सर्वे स्थिरयौवनाः॥५५

सूत उवाच

इत्युक्तवानृषीन् ब्रह्मा वर्षाणि च निसर्गतः।

पूर्वं ममानुग्रहकृद् भूयः किं वर्णयामि वः॥५६

एतच्छ्रुत्वा वचस्ते तु ऋषयः संशितव्रताः।

जातकौतूहलाः सर्वे प्रत्यूचुस्ते मुदान्विताः॥५७

ऋषय ऊचुः

पूर्वापरौ समाख्यातौ यौ देशौ तौ त्वया मुने।

उत्तराणां च वर्षाणां पर्वतानां च सर्वशः॥५८

आख्याहि नो यथातथ्यं ये च पर्वतवासिनः।

एवमुक्तस्तु ऋषिभिस्तेभ्यस्त्वाख्यातवान् पुनः॥५९

सूत उवाच

शृणुध्वं यानि वर्षाणि पूर्वोक्तानि च वै मया।

दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु॥६०

वर्ष रमणकं नाम जायन्ते यत्र वै प्रजाः।

उसके फलोंका रस पीकर वहाँके निवासी दस हजार वर्षांतक जीवित रहते हैं। माल्यवान्के पूर्वी भागमें पूर्वगण्डिका नामक पर्वत है, जो बत्तीस हजार योजन लम्बा और सौ योजन चौड़ा कहा जाता है। उसकी तलहटीमें भद्राश्व नामक देश है, जहाँके निवासी सदा प्रसन्न-मन रहते हैं। वहाँ भद्रमाल नामक वन है, जिसमें कालान नामक एक महान् वृक्ष है। वहाँके निवासी पुरुष गोरे, महान् सत्त्वसम्पन्न एवं महाबली होते हैं तथा कुछ स्त्रियाँ कुमुदिनीकी-सी कान्तिवाली, परम सुन्दरी एवं देखनेमें प्रिय लगनेवाली होती हैं। इसी प्रकार कुछ स्त्रियाँ गौर वर्णवाली होती हैं, उनकी कान्ति चन्द्रमा-सरीखी उज्ज्वल होती है और उनका मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान चमकदार होता है। उनका शरीर भी चन्द्रमाके समान शीतल होता है और उससे कमलकी-सी गन्ध निकलती है। कालाम्र वृक्षोंके फलोंका रस पान कर वहाँके सभी निवासियोंकी युवावस्था स्थिर बनी रहती है और वे नीरोग रहकर दस हजार वर्षांतक जीवित रहते हैं॥४८-५५॥

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! पूर्वकालमें ब्रह्माने स्वभावतः मुझपर कृपा कर जिन वर्षों का वर्णन किया था, उनका विवरण मैं आपलोगोंको बतला चुका। अब पुनः आपलोगोंसे किसका वर्णन करूँ? सूतजीकी यह बात सुनकर वे सभी व्रतनिष्ठ ऋषि विस्मयविमुग्ध हो गये। तत्पश्चात् वे प्रसन्नतापूर्वक बोले॥ ५६-५७॥

ऋषियोंने पूछा-मुने! पूर्व और पश्चिम दिशामें स्थित जो देश हैं; उनके विषयमें तो आप हमलोगोंको बतला चुके। अब उत्तर दिशामें स्थित वर्षों और पर्वतोंका वर्णन कीजिये। साथ ही उन पर्वतोंपर निवास करनेवाले लोगोंका चरित्र भी यथार्थरूपसे बतलाइये। ऋषियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर सूतजीने पुनः उनसे वर्णन करना आरम्भ किया ॥ ५८-५९ ॥

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! पहले मैं आपलोगोंसे जिन वर्षों के विषयमें वर्णन कर चुका हूँ, (उनके अतिरिक्त अन्य वर्षों का वर्णन) सुनिये। नीलपर्वतसे दक्षिण और निषध पर्वतसे उत्तर दिशामें रमणक नामक वर्ष है, जहाँकी

रतिप्रधाना विमला जायन्ते यत्र मानवाः।

शुक्लाभिजनसम्पन्नाः सर्वे ते प्रियदर्शनाः॥६१

तत्रापि च महावृक्षो न्यग्रोधो रोहिणो महान्।

तस्यापि ते फलरसं पिबन्तो वर्तयन्ति हि॥६२

दशवर्षसहस्त्राणि दशवर्षशतानि च।

जीवन्ति ते महाभागाः सदा हृष्टा नरोत्तमाः॥६३

उत्तरेण तु श्वेतस्य पार्श्वे शृङ्गस्य दक्षिणे।

वर्षं हिरण्वतं नाम यत्र हैरण्वती नदी॥६४

महाबला महासत्त्वा नित्यं मुदितमानसाः।

शुक्लाभिजनसम्पन्नाः सर्वे च प्रियदर्शनाः॥६५

एकादश सहस्त्राणि वर्षाणां ते नरोत्तमाः।

आयुष्प्रमाणं जीवन्ति शतानि दश पञ्च च॥६६

तस्मिन् वर्षे महावृक्षो लकुचः पत्रसंश्रयः।

तस्य पीत्वा फलरसं तत्र जीवन्ति मानवाः॥६७

शृङ्गासाह्वस्य शृङ्गाणि त्रीणि तानि महान्ति वै।

एकं मणियुतं तत्र एकं तु कनकान्वितम्।

सर्वरत्नमयं चैकं भुवनैरुपशोभितम्॥६८

उत्तरे चास्य शृङ्गस्य समुद्रान्ते च दक्षिणे।

कुरवस्तत्र तद्वर्षं पुण्यं सिद्धनिषेवितम्॥६९

तत्र वृक्षा मधुफला दिव्यामृतमयाऽऽपगाः ।

वस्त्राणि ते प्रसूयन्ते फलैश्चाभरणानि च॥७०

सर्वकामप्रदातारः केचिद् वृक्षा मनोरमाः।

अपरे क्षीरिणो नाम वृक्षास्तत्र मनोरमाः।

ये रक्षन्ति सदा क्षीरं षड्रसं चामृतोपमम्॥७१

सर्वा मणिमयी भूमिः सूक्ष्मा काञ्चनवालुका।

सर्वत्र सुखसंस्पर्शा निःशब्दाः पवनाः शुभाः।। ७२

देवलोकच्युतास्तत्र जायन्ते मानवाः शुभाः।

शुक्लाभिजनसम्पन्नाः सर्वे ते स्थिरयौवनाः॥७३

मिथुनानि प्रजायन्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः।

तेषां ते क्षीरिणां क्षीरं पिबन्ति ह्यमृतोपमम्॥७४

एकाहाज्जायते युग्मं समं चैव विवर्धते।

समं रूपं च शीलं च समं चैव म्रियन्ति वै॥७५

प्रजाएँ विशेष विलासिनी एवं स्वच्छ गौरवर्णवाली होती हैं। वहाँ उत्पन्न हुए सारे मानव गौरवर्ण, कुलीन और देखने में प्रिय लगनेवाले होते हैं। वहाँ भी रोहिण नामक एक महान् बरगदका वृक्ष है, उसीके फलोंका रस पान करके वहाँके निवासी जीवन-निर्वाह करते हैं। वे सभी महान् भाग्यशाली श्रेष्ठ पुरुष सदा प्रसन्न रहते हुए ग्यारह हजार वर्षांतक जीवित रहते हैं। श्वेत पर्वतके उत्तर और शृङ्गवान् पर्वतके दक्षिण पार्श्वमें हिरण्वत नामक वर्ष है, जहाँ हैरण्वती नामकी नदी प्रवाहित होती है। वहाँके निवासी श्रेष्ठ मानव, महाबली, महापराक्रमी, नित्य प्रसन्नचित्त, गौरवर्ण, कुलीन और देखने में मनोरम होते हैं। वे बारह हजार पाँच सौ वर्षोंकी आयुतक जीवित रहते हैं। उस वर्षमें पत्तोंसे आच्छादित लकुच (बड़हर)- का एक महान् वृक्ष है, उसके फलोंका रस पीकर वहाँके मानव जीवनयापन करते हैं। शृङ्गवान् पर्वतके तीन शिखर हैं, जो बड़े ऊँचे-ऊँचे हैं। उनमेंसे एक मणिसे परिपूर्ण, एक सुवर्णसे सम्पन्न और एक सर्वरत्नमय एवं भुवनोंसे सुशोभित है॥६०-६८॥

इस शृङ्गवान् पर्वतके उत्तर और दक्षिण समुद्र-तटतक उत्तरकुरु नामक वर्ष है जो परम पुण्यप्रद एवं सिद्धोंद्वारा सुसेवित है। वहाँ नदियोंमें दिव्य अमृततुल्य जल प्रवाहित होता है। वृक्ष मधुसदृश मीठे फलवाले होते हैं और उन्हींसे वस्त्र, फल और आभूषणोंकी उत्पत्ति होती है। उनमेंसे कुछ वृक्ष तो अत्यन्त सुन्दर और सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं तथा दूसरे कुछ ऐसे मनोहर वृक्ष हैं, जिनसे दूध निकलता है। वे सदा दूध और अमृततुल्य सुस्वादु छहों रसोंकी रक्षा करते हैं। वहाँकी सारी भूमि मणिमयी है जिसपर सुवर्णकी महीन बालुका बिखरी रहती है। चारों ओर सुख-स्पर्शवाली शब्दरहित शीतल-मंद-सुगन्ध वायु बहती रहती है। वहाँ देवलोकसे च्युत हुए धर्मात्मा मानव ही जन्म धारण करते हैं। वे सभी गौरवर्ण, कुलीन और स्थिर जवानीसे युक्त होते हैं। वे जोड़ेके रूपमें उत्पन्न होते हैं, उनमें स्त्रियाँ अप्सराओंकी भाँति सुन्दरी होती हैं। वे उन दूधसे भरे हुए वृक्षोंके अमृततुल्य दूधका पान करते हैं। वे प्राणी एक ही दिन जोड़ेके रूपमें उत्पन्न होते हैं, साथ-ही-साथ बढ़ते हैं, उनका रूप तथा शील-स्वभाव एक-

एकैकमनुरक्ताश्च चक्रवाकमिव ध्रुवम्।

अनामया ह्यशोकाश्च नित्यं मुदितमानसाः॥७६

दशवर्षसहस्त्राणि दशवर्षशतानि च।

जीवन्ति च महासत्त्वा न चान्या स्त्री प्रवर्तते॥७७

सूत उवाच

एवमेव निसर्गो वै वर्षाणां भारते युगे।

दृष्टः परमधर्मज्ञाः किं भूयः कथयामि वः॥७८

आख्यातास्त्वेवमृषयः सूतपुत्रेण धीमता।

उत्तरश्रवणे भूयः पप्रच्छुः सूतनन्दनम्॥७९

सा होता है और वे एक साथ ही प्राण-त्याग भी करते हैं। वे चक्रवाककी तरह निश्चितरूपसे परस्पर अनुरक्त, नीरोग, शोकरहित और सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं। वे महापराक्रमी मानव ग्यारह हजार वर्षांतक जीवित रहते हैं। वहाँ कोई पुरुष दूसरा विवाह नहीं करता ॥६९-७७॥

सूतजी कहते हैं-परम धर्मज्ञ ऋषियो! इस प्रकार मैंने भारतीय युगमें वर्षों की सृष्टि देखी है (जिसका वर्णन कर दिया), अब पुनः आपलोगोंको क्या बतलाऊँ। बुद्धिमान् सूतपुत्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ऋषियोंने पुन: उत्तरवर्ती वर्षों के विषयमें सुननेके लिये सूतनन्दनसे जिज्ञासा प्रकट की॥ ७८-७९ ॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे द्वीपादिवर्णनं नाम त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११३॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें द्वीपादिवर्णन नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥११३ ॥