शर्कराशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य तथा राजा धर्ममूर्तिके  वृत्तान्त-प्रसङ्गमें लवणाचलदानका महत्व

ईश्वर उवाच

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि शर्कराशैलमुत्तमम्।

यस्य प्रदानाद् विष्णवर्करुद्रास्तुष्यन्ति सर्वदा॥१

अष्टभिः शर्कराभारैरुत्तमः स्यान्महाचलः।

चतुर्भिर्मध्यमः प्रोक्तो भाराभ्यामवरः स्मृतः॥२

भारेण वार्धभारेण कुर्याद् यः स्वल्पवित्तवान्।

विष्कम्भपर्वतान् कुर्यात् तुरीयांशेन मानवः ॥३

धान्यपर्वतवत् सर्वमासाद्यामरसंयुतम्।

मेरोरुपरि तद्वच्च स्थाप्य हेमतरुत्रयम्॥४

भगवान् शंकरने कहा-नारदजी! इसके पश्चात् मैं परमोत्तम शर्कराशैलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका दान करनेसे भगवान् विष्णु, रुद्र और सूर्य सदा संतुष्ट रहते हैं। आठ भार शक्करसे बना हुआ शर्कराचल उत्तम, चार भारसे बना हुआ मध्यम और दो भारसे बना हुआ अधम कहा गया है। जो मानव स्वल्प सम्पत्तिवाला हो, वह एक भार अथवा आधे भारसे भी शर्कराचल बनवा सकता है। प्रधान पर्वतके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंका भी निर्माण करना चाहिये। पुनः धान्यपर्वतकी तरह सारी सामग्री प्रस्तुत करके मेरुपर्वतकी भाँति इसके ऊपर भी स्वर्णमयी देवमूर्तिके साथ

* हेमाद्रि, कल्पतरु, पद्मपुराणादिमें-यहाँ 'विलेपनैः' पाठ है।

मन्दारः पारिजातश्च तृतीयः कल्पपादपः।

एतद् वृक्षत्रयं मूर्ध्नि सर्वेष्वपि निवेशयेत्॥ ५

हरिचन्दनसंतानौ पूर्वपश्चिमभागयोः।

निवेश्यौ सर्वशैलेषु विशेषाच्छर्कराचले॥ ६

मन्दरे कामदेवस्तु प्रत्यग्वक्त्रः सदा भवेत्।

गन्धमादनशृङ्गे च धनदः स्यादुदङ्मुखः॥ ७

प्राङ्मुखो वेदमूर्तिश्च हंसः स्याद् विपुलाचले।

हैमी सुपार्श्वे सुरभिर्दक्षिणाभिमुखी भवेत्॥ ८

धान्यपर्वतवत् सर्वमावाहनविधानकम्।

कृत्वा तु गुरवे दद्यान्मध्यमं पर्वतोत्तमम्।

ऋत्विग्भ्यश्चतुरः शैलानिमान् मन्त्रानुदीरयन्॥ ९

सौभाग्यामृतसारोऽयं पर्वतः शर्करायुतः।

तस्मादानन्दकारी त्वं भव शैलेन्द्र सर्वदा॥१०

अमृतं पिबतां ये तु निपेतुर्भुवि शीकराः।

देवानां तत्समुत्थस्त्वं पाहि नः शर्कराचल॥११

मनोभवधनुर्मध्यादुद्भूता शर्करा यतः।

तन्मयोऽसि महाशैल पाहि संसारसागरात्॥१२

यो दद्याच्छर्कराशैलमनेन विधिना नरः।

सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः स याति परमं पदम्॥१३

चन्द्रतारार्कसंकाशमधिरुह्यानुजीविभिः

सहैव यानमातिष्ठेत् तत्र विष्णुप्रचोदितः ॥ १४

ततः कल्पशतान्ते तु सप्तद्वीपाधिपो भवेत्।

आयुरारोग्यसम्पन्नो यावजन्मार्बुदत्रयम्॥१५

भोजनं शक्तित: दद्यात् सर्वशैलेष्वमत्सरः।

सर्वत्राक्षारलवणमनीयात् तदनुज्ञया।

पर्वतोपस्करान् सर्वान् प्रापयेद् ब्राह्मणालयम्॥१६

ईश्वर उवाच

आसीत् पुरा बृहत्कल्पे धर्ममूर्तिर्जनाधिपः ।

सुहृच्छक्रस्य निहता येन दैत्याः सहस्रशः॥१७

मन्दार, पारिजात और कल्पवृक्ष-इन तीनों वृक्षोंकी भी स्वर्णनिर्मित मूर्ति स्थापित करे। इन तीनों वृक्षोंको तो प्राय: सभी पर्वतोपर स्थापित कर देना चाहिये। सभी पर्वतोंके पूर्व और पश्चिम भागमें हरिचन्दन और कल्पवृक्षको निविष्ट करना चाहिये। शर्कराचलमें तो इसका विशेषरूपसे ध्यान रखना चाहिये। मन्दराचलपर कामदेवकी मूर्ति सदा पश्चिमाभिमुखी, गन्धमादनके शिखरपर कुबेरकी मूर्ति उत्तराभिमुखी, विपुलाचलपर वेदमूर्ति-ब्रह्मा और हंसकी मूर्ति पूर्वाभिमुखी और सुपार्श्व पर्वतपर स्वर्णमयी गौकी मूर्ति दक्षिणाभिमुखी होनी चाहिये॥ १-८॥

तत्पश्चात् आवाहन आदि सारा विधान धान्यपर्वतकी भाँति करके अन्तमें इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए बिचला प्रधान पर्वत गुरुको और चारों विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। (वे मन्त्र इस प्रकारके अर्थवाले हैं-) 'शैलेन्द्र! यह शक्करद्वारा निर्मित पर्वत सौभाग्य और अमृतका सार है, इसलिये तुम मेरे लिये सदा आनन्दकारक होओ। शर्कराचल! देवताओंके अमृत-पान करते समय जो बूंदें भूतलपर टपक पड़ी थीं, उन्हींसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है; अत: तुम हमारी रक्षा करो। महाशैल! चूँकि शर्करा कामदेवके धनुषके मध्यभागसे प्रादुर्भूत हुई है और तुम शर्करामय हो, इसलिये संसारसागरसे मुझे बचाओ।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार शर्कराशैलका दान करता है, वह समस्त पापोंसे विमुक्त होकर परमपदको प्राप्त हो जाता है। वहाँ वह भगवान् विष्णुकी आज्ञासे अपने आश्रितोंके साथ ही सूर्य, चन्द्र और तारकाओंके समान कान्तिमान् विमानपर आरूढ़ होकर सुशोभित होता है। पुनः सौ कल्पोंके बाद तीन अरब जन्मोंतक भूतलपर दीर्घायु और नीरोगतासे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। सभी पर्वतदानोंमें मत्सररहित होकर अपनी शक्तिके अनुसार भोजन करनेका विधान है। सर्वत्र गुरुकी आज्ञासे अपनी शक्तिके अनुकूल क्षार (नमक)-रहित भोजन करना चाहिये। पुनः पर्वतदानकी सारी सामग्री ब्राह्मणके घर स्वयं भेजवा देनी चाहिये॥९-१६॥

ईश्वरने कहा-नारद! पहले बृहत्कल्पमें धर्ममूर्ति नामक एक राजा हुआ था। उसके तेजके सामने सूर्य और चन्द्रमा आदि भी कान्तिहीन हो जाते थे। वह इन्द्रका मित्र था। उसने हजारों दैत्योंका वध किया था।

सोमसूर्यादयो यस्य तेजसा विगतप्रभाः।

अभवशतशो येन शत्रवश्च पराजिताः।

यथेच्छारूपधारी च मनुष्योऽप्यपराजितः ॥ १८

तस्य भानुमती नाम भार्या त्रैलोक्यसुन्दरी।

लक्ष्मीवद् दिव्यरूपेण निर्जितामरसुन्दरी॥१९

राज्ञस्तस्याग्र्यमहिषी प्राणेभ्योऽपि गरीयसी।

दशनारीसहस्त्राणां मध्ये श्रीरिव राजते॥२०

नृपकोटिसहस्त्रेण न कदाचित् स मुच्यते।

कदाचिदास्थानगतं पप्रच्छ स पुरोधसम्।

विस्मयेनावृतो राजा वसिष्ठमृषिसत्तमम्॥२१

राजोवाच

भगवन् केन धर्मेण मम लक्ष्मीरनुत्तमा।

कस्माच्च विपुलं तेजो मच्छरीरे सदोत्तमम्॥ २२

वसिष्ठ उवाच

पुरा लीलावती नाम वेश्या शिवपरायणा।

तया दत्तश्चतुर्दश्यां गुरवे लवणाचलः।

हेमवृक्षादिभिः सार्धं यथावद् विधिपूर्वकम्॥ २३

शूद्रः सुवर्णकारश्च नाम्ना शौण्डोऽभवत् तदा।

भृत्यो लीलावतीगेहे तेन हेम्ना विनिर्मिताः ।। २४

तरवः सुरमुख्याश्च श्रद्धायुक्तेन पार्थिव।

अतिरूपेण सम्पन्ना घटयित्वा बिना भृतिम्।

धर्मकार्यमिति ज्ञात्वा न गृह्णाति कथञ्चन ॥२५

उज्ज्वालिताश्च तत्पल्या सौवर्णामरपादपाः।

लीलावती गिरेः पार्श्व परिचर्यां च पार्थिव ॥२६

कृत्वा ताभ्यामशाठ्येन गुरुशुश्रूषणादिकम्।

सा च लीलावती वेश्या कालेन महतापि च ॥ २७

कालधर्ममनुप्राप्ता कर्मयोगेन नारद।

सर्वपापविनिर्मुक्ता जगाम शिवमन्दिरम्॥ २८

योऽसौ सुवर्णकारस्तु दरिद्रोऽप्यतिसत्त्ववान्।

न मौल्यमादाद् वेश्यातः स भवानिह साम्प्रतम्॥ २९

वह इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला मनुष्य होनेपर भी किसीसे परास्त नहीं हुआ था, अपितु उसके द्वारा सैकड़ों शत्रु पराजित हो चुके थे। उसकी पत्नीका नाम भानुमती था। वह त्रिलोकीमें सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी थी। उसने लक्ष्मीके समान अपने दिव्य रूपसे देवाङ्गनाओंको भी पराजित कर दिया था। वह दस हजार नारियोंके बीचमें लक्ष्मीकी तरह सुशोभित होती थी। राजा धर्ममूर्तिकी वह पटरानी उसे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। उसे असंख्य राजा सदा घेरे रहते थे। एक बार सभामण्डपमें आये हुए अपने पुरोहित महर्षि वसिष्ठसे उस राजाने विस्मयविमुग्ध हो ऐसा प्रश्न किया॥१७-२१॥

राजाने पूछा-भगवन्! किस धर्मके प्रभावसे मुझे सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई है? तथा किस धर्मके फलस्वरूप मेरे शरीरमें सदा प्रचुरमात्रामें उत्तम तेज विराजमान रहता है? ॥ २२॥

वसिष्ठजीने कहा-राजन्! पूर्वकालमें लीलावती नामकी एक वेश्या थी। वह शिवजीकी भक्ता थी। उसने चतुर्दशी तिथिके दिन विधिपूर्वक अपने गुरुको स्वर्णमय वृक्ष आदि उपकरणोंसहित लवणाचलका दान किया था। उन दिनों लीलावतीके घर एक शूद्रजातीय शौण्ड नामक सोनार नौकर था। भूपाल! उसने ही श्रद्धापूर्वक सुवर्णद्वारा वृक्षों और प्रधान देवताओंकी मूर्तियोंका निर्माण किया था। उसने बिना कुछ पारिश्रमिक लिये उन मूर्तियोंको गढ़कर अत्यन्त सुन्दर बनाया था और यह धर्मका कार्य है-ऐसा जानकर किसी भी प्रकारका कुछ वेतन भी नहीं लिया था। पृथ्वीपते! उस स्वर्णकारकी पत्नीने भी उन सुवर्णनिर्मित देवों एवं वृक्षोंकी मूर्तियोंको रगड़कर चमकीला बनाया था और लीलावतीके पर्वत-दानमें बड़ी परिचर्या की थी। उन दोनोंकी सहायतासे लीलावतीने गुरु-शुश्रूषा आदि कार्योंको सम्पन्न किया था। नारद! अधिक कालके व्यतीत होनेपर वह वेश्या लीलावती कर्मयोगके अनुसार जब कालधर्म (मृत्यु)- को प्राप्त हुई, तब समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको चली गयी। वह सोनार, जो दरिद्र होते हुए भी अत्यन्त सामर्थ्यशाली था और जिसने वेश्यासे कुछ भी मूल्य नहीं लिया था, इस समय इस जन्ममें तुम हो,

सप्तद्वीपपतिर्जातः सूर्यायुतसमप्रभः।

यथा सुवर्णकारस्य तरवो हेमनिर्मिताः।

सम्यगुज्वालिताः पल्या सेयं भानुमती तव॥३०

उज्वालनादुज्वलरूपमस्याः

संजातमस्मिन् भुवनाधिपत्यम्।

यस्मात् कृतं तत् परिकर्म रात्रा-

वनुद्धताभ्यां लवणाचलस्य॥३१

तस्माच्च लोकेष्वपराजितत्व-

मारोग्यसौभाग्ययुता च लक्ष्मीः ।

तस्मात्त्वमप्यत्र विधानपूर्वं

धान्याचलादीन् दशधा कुरुष्व॥ ३२

तथेति सत्कृत्य स धर्ममूर्ति-

र्वचो वसिष्ठस्य ददौ च सर्वान्।

धान्याचलादीशतशो मुरारे-

लॊकं जगामामरपूज्यमानः ॥३३

पश्येदपीमानधनोऽतिभक्त्या

स्पृशेन्मनुष्यैरपि दीयमानान्।

शृणोति भक्त्याथ मतिं ददाति

विकल्मषः सोऽपि दिवं प्रयाति॥३४

दुःस्वप्नं प्रशममुपैति पाठ्यमानैः

शैलेन्द्रैर्भवभयभेदनैर्मनुष्यैः ।

यः कुर्यात् किमु मुनिपुंगवेह सम्यक्

शान्तात्मा सकलगिरीन्द्रसम्प्रदानम्॥ ३५

जो दस हजार सूर्योंके समान कान्तिमान् और सातों द्वीपोंके अधीश्वररूपसे उत्पन्न हुए हो। सोनारकी जिस पत्नीने स्वर्णनिर्मित वृक्षों एवं देव-मूर्तियोंको अत्यन्त चमकीला बनाया था, वही यह भानुमती तुम्हारी पटरानी है॥ २३-३०॥

मूर्तियोंको उज्ज्वल करनेके कारण इसे इस जन्ममें सुन्दर गौरवर्णका शरीर और भुवनेश्वरीका पद प्राप्त हुआ है। चूँकि तुम दोनोंने दत्तचित्त होकर रात्रिमें लवणाचलके दान-प्रसंगमें सहायक रूपसे कर्म किया था, इसीलिये तुम्हें लोकमें अजेयता, नीरोगता और सौभाग्यसम्पन्नता लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई है। इस कारण तुम भी इस जन्ममें विधानपूर्वक दस प्रकारके धान्याचल आदि पर्वतोंका दान करो। तब राजा धर्ममूर्तिने 'तथेति-ऐसा ही करूँगा' कहकर वसिष्ठजीके वचनोंका आदर किया और सैकड़ों बार धान्याचल आदि सभी पर्वतोंका दान किया, जिसके फलस्वरूप देवगणोंद्वारा पूजित होकर भगवान् मुरारिके लोकको प्राप्त हुआ। निर्धन मनुष्य भी यदि उत्कृष्ट भक्तिपूर्वक इन पर्वत-दानोंको देखता है, मनुष्योंद्वारा दान करते समय उनका स्पर्श कर लेता है, उनकी कथाएँ सुनता है और उन्हें करनेके लिये सम्मति देता है तो वह भी पापरहित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। मुनिपुंगव! जब इस लोकमें मनुष्यद्वारा भव-भयको विदीर्ण करनेवाले इन शैलेन्द्रोंके प्रसङ्गका पाठ करनेसे दुःस्वप्न शान्त हो जाते हैं, तब जो मनुष्य स्वयं शान्तचित्तसे विधिपूर्वक इन सम्पूर्ण पर्वतदानोंको करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है?॥ ३१-३५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पर्वतप्रदानमाहात्म्यं नाम द्विनवतितमोऽध्यायः॥९२॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पर्वतप्रदानमाहातम्य नामक बानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥९२॥