मत्स्य महा पुराण
सर्वफलत्याग-व्रतका विधान और उसका माहात्म्य
नन्दिकेश्वर उवाच
फलत्यागस्य माहात्म्यं यद् भवेच्छृणु नारद।
यदक्षयं परं लोके सर्वकामफलप्रदम्॥१
मार्गशीर्षे शुभे मासि तृतीयायां मुने व्रतम्।
द्वादश्यामथवाष्टम्यां चतुर्दश्यामथापि वा।
आरभेच्छुक्लपक्षस्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्॥२
अन्येष्वपि हि मासेषु पुण्येषु मुनिसत्तम।
सदक्षिणं पायसेन भोजयेच्छक्तितो द्विजान्॥३
नन्दिकेश्वर बोले-नारदजी! अब कर्म-'फलत्याग' नामक व्रतका जो महत्त्व है, उसे सुनिये। वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंके फलका प्रदाता और परलोकमें अक्षय फलदायक है। मुने! मङ्गलमय मार्गशीर्षमासमें शुक्लपक्षकी तृतीया, अष्टमी, द्वादशी अथवा चतुर्दशी तिथिको ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर इस व्रतको आरम्भ करना चाहिये। मुनिसत्तम! इसी प्रकार यह व्रत अन्य पुण्यप्रद महीनोंमें भी किया जा सकता है। उस समय अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये।
* मन्वादिके अनुसार पति आदिकी आज्ञाके बिना स्त्रीको व्रत करनेका अधिकार नहीं है।
अष्टादशानां धान्यानामवद्यं फलमूलकैः।
वर्जयेदब्दमेकं तु ऋते औषधकारणम्।
सवृषं काञ्चनं रुद्रं धर्मराजं च कारयेत्॥४
कूष्माण्डं मातुलुङ्गं च वार्ताकं पनसं तथा।
आम्रानातकपित्थानि कलिङ्गमथ वालुकम्॥५
श्रीफलाश्वत्थबदरं जम्बीरं कदलीफलम्।
काश्मरं दाडिमं शक्त्या कलधौतानि षोडश॥६
मूलकामलकं जम्बूतिन्तिडी करमर्दकम्।
कङ्कोलैलाकतुण्डीरकरीरकुटजं शमी॥७
औदुम्बरं नारिकेलं द्राक्षाथ बृहतीद्वयम्।
रौप्याणि कारयेच्छक्त्या फलानीमानि षोडश॥८
तानं तालफलं कुर्यादगस्तिफलमेव च।
पिण्डारकाश्मर्यफलं तथा सूरणकन्दकम्॥ ९
रक्तालुकाकन्दकं च कनकाहूं च चिर्भिटम्।
चित्रवल्लीफलं तद्वत् कूटशाल्मलिजं फलम्॥१०
आम्रनिष्पावमधुकवटमुद्गपटोलकम्
ताम्राणि षोडशैतानि कारयेच्छक्तितो नरः॥११
उदकुम्भद्वयं कुर्याद् धान्योपरि सवस्त्रकम्।
ततश्च कारयेच्छय्यां यथोपरि सुवाससी॥१२
भक्ष्यपात्रत्रयोपेतं यमरुद्रवृषान्वितम्।
धेन्वा सहैव शान्ताय विप्रायाथ कुटुम्बिने।
सपत्नीकाय सम्पूज्य पुण्येऽह्नि विनिवेदयेत्॥१३
यथा फलेषु सर्वेषु वसन्त्यमरकोटयः।
तथा सर्वफलत्यागवताद् भक्तिः शिवेऽस्तु मे॥१४
यथा शिवश्च धर्मश्च सदानन्तफलप्रदौ ।
तद्युक्तफलदानेन तौ स्यातां मे वरप्रदौ ॥१५
यथा फलान्यनन्तानि शिवभक्तेषु सर्वदा।
तथानन्तफलावाप्तिरस्तु जन्मनि जन्मनि॥१६
यथा भेदं न पश्यामि शिवविष्णवर्कपद्मजान्।
तथा ममास्तु विश्वात्मा शंकरः शंकरः सदा॥१७
इस व्रतमें औषधके अतिरिक्त सामान्यरूपसे निन्द्य फल और मूलके साथ अठारह* प्रकारके धान्य त्याज्य-वर्जनीय माने गये हैं, अत: उन्हें एक वर्षतक त्याग देना चाहिये। पुनः रुद्र, धर्मराज और वृषभकी स्वर्णमयी मूर्ति बनवायी जाय। इसी प्रकार यथाशक्ति कूष्माण्ड, मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), वातार्क (भाँटा), पनस (कटहल), आम, आम्रातक (आमड़ा), कपित्थ (कैथ), कलिङ्ग (तरबूज), बालुक (पनियाला), बेल, पीपल, बेर, जम्बीर (जमीरी नींबू), केला, काश्मर (गम्भारी) और दाडिम (अनार)-ये सोलह प्रकारके फल भी सोनेके बनवाये जायें। मूली, आँवला, जामुन, इमली, करमर्दक (करौंदा), कङ्कोल (शीतलचीनीकी जातिके एक वृक्षका फल), इलायची, तुण्डीर (कुंदरू), करीर (करील), कुटज (इन्द्रयव), शमी, गूलर, नारियल, अंगूर और दोनों बृहती (बनभंटा, भटकटैया)-इन सोलहोंको अपनी शक्तिके अनुसार चाँदीका बनवाना चाहिये॥१-८॥
व्रती मनुष्य सम्पत्तिके अनुकूलताड़-फल, अगस्तफल, पिण्डारक (विकंकत या पिड़ार), काश्मर्य (गम्भारी)- फल, सूरणकन्द (जमीकन्द), रतालू, धतूरा, चिर्भिट (ककड़ी या पिहटिया), चित्रवल्ली (तेजपात)-फल, काले सेमलका फल, आम, निष्पाव (सेम या मटर), महुआ, बरगद, मूंग और परवल-इन सोलहोंका ताँबेसे निर्माण कराये। तत्पश्चात् वस्त्रसे सुशोभित दो कलश सप्तधान्यके ऊपर स्थापित करे। वह तीन भोजन-पात्रोंसे युक्त हो और उसपर धर्मराज, रुद्र और वृषकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित करे। साथ ही दो सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित एक शय्या भी प्रस्तुत करे। फिर उस पुण्यप्रद दिनमें यह सारा उपकरण एक गौके साथ किसी शान्त स्वभाववाले एवं कुटुम्बी सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके उसे दान कर दे और इस प्रकार प्रार्थना करे-'जिस प्रकार सभी फलोंमें करोड़ों देवता निवास करते हैं, उसी प्रकार सर्वफलत्याग-व्रतके अनुष्ठानसे शिवजीमें मेरी भक्ति हो। जैसे शिव और धर्म-दोनों सदा अनन्त फलके दाता कहे गये हैं, अत: उनसे युक्त फलका दान करनेसे वे दोनों मेरे लिये भी वरदायक हों। जिस प्रकार शिवभक्तोंको सदा अनन्त फलकी प्राप्ति होती रहती है, उसी तरह मुझे प्रत्येक जन्ममें अनन्त फलकी प्राप्ति हो। जैसे मैं ब्रह्मा, विष्णु, शंकर और सूर्यमें कोई भेद नहीं मानता, वैसे ही विश्वात्मा भगवान् शंकर सदा मेरे लिये कल्याणकारक हों'॥९-१७॥
* अठारह प्रकारके धान्योंकी बात यहाँके अतिरिक्त मत्स्यपुराणके अगले दानप्रकरणमें (विशेषकर २७६।७, २७७।११ आदिमें) भी आयी है, पर इसमें उनका पूर्ण विवरण कहीं नहीं आया है। ये अठारह धान्य-याज्ञवल्क्य-स्मृ० १। २०८ की अपरार्क व्याख्या, व्याकरणमहाभाष्य ५।२।४, वाजसने० संहिता १८। १२, दानमयूख तथा विधानपारिजात आदिके अनुसार इस प्रकार हैं-सावाँ, धान, जौ, मूंग, तिल, अणु (कँगनी), उड़द, गेहूँ, कोदो, कुलथी, सतीन (छोटी मटर), सेम, आढ़की (अरहर) या मयुष्ट (उजली मटर), चना, कलाय, मटर, प्रियङ्गु (सरसों, राई या टाँगुन) और मसूर। अन्य मतसे मयुष्टादिकी जगह अतसी और नीवार ग्राह्य हैं।
इति दत्त्वा च तत् सर्वमलङ्कृत्य च भूषणैः ।
शक्तिश्चेच्छयनं दद्यात् सर्वोपस्करसंयुतम्॥१८
अशक्तस्तु फलान्येव यथोक्तानि विधानतः।
तथोदकुम्भसंयुक्तौ शिवधर्मी च काञ्चनौ॥१९
विप्राय दत्त्वा भुञ्जीत वाग्यतस्तैलवर्जितम्।
अन्यान्नपि यथाशक्त्या भोजयेच्छक्तितो द्विजान्॥ २०
एतद् भागवतानां तु सौरवैष्णवयोगिनाम्।
शुभं सर्वफलत्यागवतं वेदविदो विदुः॥२१
नारीभिश्च यथाशक्त्या कर्तव्यं द्विजपुङ्गव।
एतस्मान्नापरं किञ्चिदिह लोके परत्र च।
व्रतमस्ति मुनिश्रेष्ठ यदनन्तफलप्रदम्॥२२
सौवर्णरौप्यताम्रेषु यावन्तः परमाणवः।
भवन्ति चूर्ण्यमानेषु फलेषु मुनिसत्तम।
तावद् युगसहस्राणि रुद्रलोके महीयते॥२३
एतत् समस्तकलुषापहरं जनाना-
माजीवनाय मनुजेषु च सर्वदा स्यात्।
जन्मान्तरेष्वपि न पुत्रवियोगदुःख-
माप्नोति धाम च पुरंदरलोकजुष्टम्॥ २४
यो वा शृणोति पुरुषोऽल्पधनः पठेद् वा
देवालयेषु भवनेषु च धार्मिकाणाम्।
पापैर्वियुक्तवपुरत्र पुरं मुरारे-
रानन्दकृत् पदमुपैति मुनीन्द्र सोऽपि ॥ २५
इस प्रकार आभूषणोंसे अलंकृत कर वह सारा सामान ब्राह्मणको दान कर दे। यदि सम्पत्तिरूपी शक्ति हो तो समस्त उपकरणोंसे युक्त शय्या भी देनी चाहिये। यदि असमर्थ हो तो पूर्वोक्त फलोंका ही विधिपूर्वक दान करे। तत्पश्चात् शिव और धर्मराजकी स्वर्णमयी मूर्तिको दोनों कलशोंके साथ ब्राह्मणको दान करके स्वयं मौन होकर तेलरहित पदार्थोंका भोजन करे। इसके बाद यथाशक्ति अन्य ब्राह्मणोंको भी भोजन करानेका विधान है। वेदवेत्तालोग सूर्य, विष्णु और शिवके उपासक भक्तोंके लिये इस मङ्गलमय सर्वफल-त्यागव्रतको बतलाते हैं। द्विजपुंगव! स्त्रियोंको भी यथाशक्ति इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ! इस लोक या परलोकमें इससे बढ़कर कोई दूसरा ऐसा व्रत नहीं है, जो अनन्त फलका प्रदायक हो। मुनिसत्तम! फलोंको चूर्ण कर देनेपर उनमें लगे हुए सोने, चाँदी और ताँबेके जितने परमाणु होते हैं, उतने सहस्र युगोंतक व्रती रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस व्रतका जीवनपर्यन्त अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंके समस्त पापोंको यह विनष्ट कर देता है, उन्हें जन्मान्तरमें भी पुत्रवियोगका कष्ट नहीं भोगना पड़ता और मरणोपरान्त वे इन्द्रलोकमें चले जाते हैं। मुनीश्वर ! जो निर्धन पुरुष देव-मन्दिरों अथवा धर्मात्मा पुरुषोंके गृहोंमें इस व्रत-माहात्म्यको सुनता अथवा पढ़ता है, उसका शरीर इस लोकमें पापसे मुक्त हो जाता है और मरणोपरान्त वह विष्णुलोकमें आनन्ददायक स्थान प्राप्त कर लेता है॥१८-२५ ।।
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सर्वफलत्यागमाहात्म्यं नाम षण्णवतितमोऽध्यायः॥ ९६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सर्वफलत्याग-माहात्म्य नामक छानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥९६॥
Summary of chapter 96 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya expounds upon the profound spiritual philosophy of Phala-Tyāga, the conscious renunciation of the fruits of sacred vows and ritual actions offered unconditionally to Parameshvara. The Lord explains that while performing vows for earthly rewards yields temporary celestial enjoyment, performing the exact same rites with detachment and offering all accumulated merit to Bhagavān Vishṇu grants eternal spiritual liberation. The text provides guidance for practitioners who are physically unable to maintain complete fasts, explaining how mental renunciation, partial fasting during daylight hours, and steady devotion yield full spiritual fruit. The Lord asserts that pure love and surrender to the Supreme Lord transcend external ritual austerity.