मत्स्य महा पुराण
प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि पराशरके वंशका वर्णन
मत्स्य उवाच
वसिष्ठस्तु महातेजा निमेः पूर्वपुरोहितः।
बभूवुः पार्थिवश्रेष्ठ यज्ञास्तस्य समंततः॥ १
श्रान्तात्मा पार्थिवश्रेष्ठ विशश्राम तदा गुरुः।
तं गत्वा पार्थिवश्रेष्ठो निमिर्वचनमब्रवीत्॥ २
भगवन् यष्टुमिच्छामि तन्मां याजय मा चिरम्।
तमुवाच महातेजा वसिष्ठः पार्थिवोत्तमम्॥ ३
कञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व तव यज्ञैः सुसत्तमैः।
श्रान्तोऽस्मि राजन् विश्रम्य याजयिष्यामि ते नृप॥ ४
एवमुक्तः प्रत्युवाच वसिष्ठं नृपसत्तमः।
पारलौकिककार्ये तु कः प्रतीक्षितुमुत्सहेत्॥ ५
न च मे सौहृदं ब्रह्मन् कृतान्तेन बलीयसा।
धर्मकार्ये त्वरा कार्या चलं यस्माद्धि जीवितम्॥ ६
धर्मपथ्यौदनो जन्तुर्मृतोऽपि सुखमश्नुते।
श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम्॥ ७
न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतं चास्य न वा कृतम्।
क्षेत्रापणगृहासक्तमन्यत्रगतमानसम्॥ ८
वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति।
न कालस्य प्रियः कश्चिद् द्वेष्यश्चास्य न विद्यते॥ ९
आयुष्ये कर्मणि क्षीणे प्रसह्य हरते जनम्।
प्राणवायोश्चलत्वं च त्वया विदितमेव च॥१०
यदत्र जीव्यते ब्रह्मन् क्षणमात्रं तदद्भुतम्।
शरीरं शाश्वतं मन्ये विद्याभ्यासे धनार्जने॥११
अशाश्वतं धर्मकार्ये ऋणवानस्मि संकटे।
सोऽहं सम्भृतसम्भारो भवन्मूलमुपागतः॥१२
नचेद्याजयसे मां त्वमन्यं यास्यामि याजकम्।
मत्स्यभगवान्ने कहा-राजसत्तम! महातेजस्वी वसिष्ठजी निमिके पूर्व पुरोहित थे। उनके सदा चारों ओर यज्ञ होते रहते थे। पार्थिव श्रेष्ठ! किसी समय यज्ञोंका सम्पादन करानेसे श्रान्त हुए गुरु वसिष्ठ विश्राम कर रहे थे, उसी समय राजाओंमें श्रेष्ठ निमिने उनके पास जाकर इस प्रकार कहा-'भगवन्! मैं यज्ञ करना चाहता हूँ, अत: मेरा यज्ञ कराइये, देर मत कीजिये।' यह सुनकर महातेजस्वी वसिष्ठजीने राजश्रेष्ठ निमिसे कहा-'राजन्! मैं आपके श्रेष्ठ यज्ञोंका अनुष्ठान करानेसे थक गया हूँ, अत: कुछ कालतक प्रतीक्षा कीजिये। नरेश! विश्राम कर लेनेके बाद मैं पुनः आपका यज्ञ कराऊँगा।' ऐसा कहे जानेपर राजश्रेष्ठ निमिने वसिष्ठजीको इस प्रकार उत्तर दिया-'ब्रह्मन्! परलोक-सम्बन्धी कार्यमें कौन मनुष्य प्रतीक्षा करना चाहेगा? बलवान् यमराजसे मेरी कोई मित्रता तो है नहीं, अतः धर्मकार्यमें शीघ्रता ही करनी चाहिये; क्योंकि जीवन क्षणभङ्गुर है। धर्मरूप ओदनको पथ्य बनानेवाला प्राणी मरनेपर भी सुखका उपभोग करता है। इसलिये कल होनेवाले कार्यको आज ही एवं दूसरे प्रहरमें सम्पादित होनेवाले कार्यको पूर्वप्रहरमें ही सम्पन्न कर लेना चाहिये; क्योंकि मृत्यु इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने अपना कार्य कर लिया है अथवा नहीं। अतः मृत्यु खेत, बाजार और गृहमें आसक्त या अन्यत्र कहीं आसक्त मनवाले मनुष्यको उसी प्रकार लेकर चल देती है, जैसे भेड़िया मृगके बच्चेको लेकर चला जाता है। कालका न तो कोई प्रिय है और न कोई द्वेष्य ही है। आयुके साधक कर्मके क्षीण होते ही वह बलपूर्वक मनुष्यका अपहरण कर लेता है। प्राणवायुकी चञ्चलता तो आप भी जानते ही हैं। ब्रह्मन्! ऐसी दशामें जो क्षणभर भी जीवित रहता है, यही आश्चर्य है। विद्याके अभ्यास और धनके उपार्जनमें शरीरको चिरस्थायी समझना चाहिये, किंतु धर्म-कार्यमें उसे क्षणभङ्गुर मानना चाहिये। ऐसे संकटके समय मैं ऋणी बन गया हूँ, अतः मैं सभी द्रव्योंका आयोजन कर आपके चरणोंके निकट आया हूँ। यदि इस समय आप मेरा यज्ञ नहीं करायेंगे तो मैं किसी अन्य याजकके पास जाऊँगा'॥१-१२३॥
एवमुक्तस्तदा तेन निमिना ब्राह्मणोत्तमः॥१३
शशाप तं निर्मि क्रोधाद् विदेहस्त्वं भविष्यसि।
श्रान्तं मां त्वं समुत्सृज्य यस्मादन्यं द्विजोत्तमम्॥१४
धर्मज्ञस्तु नरेन्द्र त्वं याजकं कर्तुमिच्छसि।
निमिस्तं प्रत्युवाचाथ धर्मकार्यरतस्य मे॥१५
विघ्नं करोषि नान्येन याजनं च तथेच्छसि।
शापं ददामि तस्मात् त्वं विदेहोऽथ भविष्यसि॥१६
एवमुक्ते तु तौ जातौ विदेहौ द्विजपार्थिवौ।
देहहीनौ तयोर्जीवौ ब्रह्माणमुपजग्मतुः॥१७
तावागतौ समीक्ष्याथ ब्रह्मा वचनमब्रवीत्।
अद्यप्रभृति ते स्थानं निमिजीव ददाम्यहम्॥१८
नेत्रपक्ष्मसु सर्वेषां त्वं वसिष्यसि पार्थिव।
त्वत्सम्बन्धात् तथा तेषां निमेषः सम्भविष्यति॥१९
चालयिष्यन्ति तु तदा नेत्रपक्ष्माणि मानवाः।
एवमुक्तो मनुष्याणां नेत्रपक्ष्मसु सर्वशः॥२०
जगाम निमिजीवस्तु वरदानात् स्वयम्भुवः।
वसिष्ठजीवो भगवान् ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ॥ २१
मित्रावरुणयोः पुत्रो वसिष्ठ त्वं भविष्यसि।
वसिष्ठेति च ते नाम तत्रापि च भविष्यति॥२२
जन्मद्वयमतीतं च तत्रापि त्वं स्मरिष्यसि।
एतस्मिन्नेव काले तु मित्रश्च वरुणस्तथा ॥ २३
बदर्याश्रममासाद्य तपस्तेपतुरव्ययम्।
तपस्यतोस्तयोरेवं कदाचिन्माधवे ऋतौ॥२४
पुष्पितद्रुमसंस्थाने शुभे दयितमारुते।
उर्वशी तु वरारोहा कुर्वती कुसुमोच्चयम्॥ २५
सुसूक्ष्मरक्तवसना तयोर्दृष्टिपथं गता।
तां दृष्ट्वेन्दुमुखीं सुद्धू नीलनीरजलोचनाम्॥२६
उभौ चुक्षुभतुर्देवौ तद्रूपपरिमोहितौ।
तपस्यतोस्तयोर्वीर्यमस्खलच्च मृगासने॥२७
स्कनं रेतस्ततो दृष्ट्वा शापभीता वराप्सरा।
चकार कलशे शुक्रं तोयपूर्णे मनोरमे॥२८
तस्मादृषिवरौ जातौ तेजसाप्रतिमौ भुवि।
वसिष्ठश्चाप्यगस्त्यश्च मित्रावरुणयोः सुतौ॥२९
तब उन निमिद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ब्राह्मणश्रेष्ठ वसिष्ठने क्रोधपूर्वक निमिको शाप देते हुए कहा-'नरेन्द्र! यदि तुम धर्मके ज्ञाता होकर भी मुझ थके हुए पुरोहितका परित्याग कर किसी अन्य ब्राह्मणश्रेष्ठको याजक बनाना चाहते हो तो तुम शरीररहित हो जाओगे।' तब निमिने उत्तर दिया-'मैं धार्मिक कार्यके लिये उद्यत हूँ, किंतु आप इसमें विघ्न डाल रहे हैं तथा दूसरेके द्वारा यज्ञ सम्पन्न होने देना भी नहीं चाहते, अतः मैं भी आपको शाप दे रहा हूँ कि आप भी विदेह हो जायँगे।' ऐसा कहते ही वे दोनों ब्राह्मण और राजा शरीररहित हो गये। तब उन दोनोंके देहहीन जीव ब्रह्माके पास गये। उन दोनोंको आया हुआ देखकर ब्रह्मा इस प्रकार बोले-'निमिरूप जीव! आजसे मैं तुम्हारे लिये एक स्थान दे रहा हूँ। राजन्! तुम सभी प्राणियोंके नेत्रोंके पलकोंमें निवास करोगे। तुम्हारे संयोगसे ही उनके निमेष-उन्मेष (आँखका खुलना और बंद होना) होंगे। तब सभी मानव नेत्रोंके पलकोंको चलाते रहेंगे।' इस प्रकार कहे जानेपर निमिका जीव ब्रह्माके वरदानसे सभी मनुष्योंके नेत्र-पलकोंपर स्थित हो गया। १३-२०॥
तदनन्तर भगवान् ब्रह्माने वसिष्ठके जीवसे कहा- 'वसिष्ठ! तुम मित्रावरुणके पुत्र होओगे। वहाँ भी तुम्हारा नाम वसिष्ठ ही होगा और तुम्हें बीते हुए दो जन्मोंका स्मरण बना रहेगा। इसी समय मित्र और वरुण दोनों बदरिकाश्रममें आकर दुष्कर तपस्यामें तत्पर थे। इस प्रकार उन दोनोंके तपस्यामें रत रहनेपर किसी समय वसन्त-ऋतुमें जब सभी वृक्ष और लताएँ पुष्पित थीं, मन्द-मन्द मनोहर पवन प्रवाहित हो रहा था, सुन्दरी उर्वशी पुष्पोंको चुनती हुई वहाँ आयी। वह महीन लाल वस्त्र धारण किये हुए थी। संयोगवश वह उन दोनों तपस्वियोंकी आँखोंके सामने आ गयी। उसके नेत्र नील कमलके समान थे तथा मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर था। उस सुन्दर भौंहोंवाली उर्वशीको देखकर उसके रूपपर मोहित हो उन दोनों तपस्वियोंका मन क्षुब्ध हो उठा। तब तपस्या करते हुए ही उन दोनोंका वीर्य मृगासनपर स्खलित हो गया। तब शापसे भयभीत हुई सुन्दरी उर्वशीने उस वीर्यको जलपूर्ण मनोरम कलशमें रख दिया। उस कलशसे वसिष्ठ और अगस्त्य नामक दो ऋषिश्रेष्ठ उत्पन्न हुए, जो भूतलपर अनुपम तेजस्वी थे। वे मित्र और वरुणके पुत्र कहलाये। तदनन्तर वसिष्ठने
वसिष्ठस्तूपयेमेऽथ भगिनीं नारदस्य तु।
अरुंधती वरारोहां तस्यां शक्तिमजीजनत्॥३०
शक्तेः पराशरः पुत्रस्तस्य वंशं निबोध मे।
यस्य द्वैपायनः पुत्रः स्वयं विष्णुरजायत॥३१
प्रकाशो जनितो लोके येन भारतचन्द्रमाः।
येनाज्ञानमोऽन्धस्य लोकस्योतन्मीलनं कृतम्।
पराशरस्य तस्य त्वं शृणु वंशमनुत्तमम्॥ ३२
काण्डशयो वाहनपो जैह्मपो भौमतापनः ।
गोपालिरेषां पञ्चम एते गौराः पराशराः॥३३
प्रपोहया वाह्यमयाः ख्यातेयाः कौतुजातयः।
हर्यश्विः पञ्चमो ह्येषां नीला ज्ञेयाः पराशराः॥३४
काष्र्णायनाः कपिमुखाः काकेयस्था जपातयः।
पुष्करः पञ्चमश्चैषां कृष्णा ज्ञेयाः पराशराः ॥३५
श्राविष्ठायनबालेयाः स्वायष्टाश्चोपयाश्च ये।
इषीकहस्तश्चैते वै पञ्च श्वेताः पराशराः॥३६
वाटिको बादरिश्चैव स्तम्बा वै क्रोधनायनाः।
क्षैमिरेषां पञ्चमस्तु एते श्यामाः पराशराः॥३७
खल्यायना वाष्र्णायनास्तैलेयाः खलु यूथपाः
तन्तिरेषां पञ्चमस्तु एते धूम्राः पराशराः॥ ३८
पराशराणां सर्वेषां व्यायः प्रवरो मतः।
पराशरश्च शक्तिश्च वसिष्ठश्च महातपाः।
परस्परमवैवाह्या सर्व एते पराशराः॥३९
उक्तास्तवैते नृप वंशमुख्याः
पराशराः सूर्यसमप्रभावाः।
येषां तु नाम्नां परिकीर्तितेन
पापं समग्रं पुरुषो जहाति ॥ ४०
देवर्षि नारदकी बहन सुन्दरी अरुन्धतीसे विवाह किया और उसके गर्भसे शक्ति नामक पुत्रको उत्पन्न किया। शक्तिके पुत्र पराशर हुए। अब मुझसे उनके वंशका वर्णन सुनिये। स्वयं भगवान् विष्णु पराशरके पुत्र-रूपमें द्वैपायन नामसे उत्पन्न हुए, जिन्होंने इस लोकमें भारतरूपी चन्द्रमाको प्रकाशित किया, जिससे अज्ञानान्धकारसे अन्धे हुए लोगोंके नेत्र खुल गये। अब उन पराशरके श्रेष्ठ वंशकी परम्परा सुनिये॥२१-३२॥
काण्डशय, वाहनप, जैह्मप, भौमतापन और पाँचवें गोपालि-ये गौर पराशर नामसे प्रसिद्ध हैं। प्रपोहय, वाह्यमय, ख्यातेय, कौतुजाति और पाँचवें हर्यश्वि-इन्हें नील पराशर जानना चाहिये। कार्णायन, कपिमुख, काकेयस्थ, जपाति और पाँचवें पुष्कर-इन्हें कृष्ण पराशर समझना चाहिये। श्राविष्ठायन, बालेय, स्वायष्ट, उपय और इषीकहस्त-ये पाँच श्वेत पराशर हैं। वाटिक, बादरि, स्तम्ब, क्रोधनायन और पाँचवें क्षैमि-ये श्याम पराशर हैं। खल्यायन, वार्णायन, तैलेय, यूथप और पाँचवें तन्ति-ये धूम्र पराशर हैं। इन सभी पराशरोंके पराशर, शक्ति और महातपस्वी वसिष्ठ-ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इन सभी पराशरोंका परस्पर विवाह-सम्बन्ध निषिद्ध है। राजन्! मैंने आपसे सूर्यके समान प्रभावशाली पराशरवंशी गोत्रप्रवर्तक ऋषियोंका वर्णन कर दिया। इनके नामोंके परिकीर्तनसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥३३-४०॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने पराशरवंशवर्णनं नामैकाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥२०१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तनमें पराशर-वंश-वर्णन नामक दो सौ एकवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥२०१॥
Summary of chapter 203 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya describes the extraordinary spiritual rewards achieved through the systematic performance of Pitṛ-pūjā and water Tarpaṇa rites. Bhagavān Matsya asserts that no spiritual endeavor, temple consecration, or Vedic sacrifice yields full fruit if a householder neglects the worship of their ancestral fathers. The text outlines how offering plain water mixed with sesame seeds, Kusha grass, and milk satisfies the Pitṛs for a full year, while offerings made on auspicious tithis like Amāvāsyā or during Pitṛ-paksha grant imperishable satisfaction, liberating both the performer and their ancestors from karmic bondages.