मत्स्य महा पुराण
कश्यप-वंशका विस्तृत वर्णन
सूत उवाच
कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि पत्नीभ्यः पुत्रपौत्रकान्।
अदितिर्दितिर्दनुश्चैव अरिष्टा सुरसा तथा॥ १
सुरभिर्विनता तद्वत्ताम्रा क्रोधवशा इरा।
कद्रूविश्वा मुनिस्तद्वत्तासां पुत्रान् निबोधत॥ २
तुषिता नाम ये देवाश्चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।
वैवस्वतेऽन्तरे चैते ह्यादित्या द्वादश स्मृताः॥ ३
इन्द्रो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणो यमः।
विवस्वान् सविता पूषा अंशुमान् विष्णुरेव च॥ ४
एते सहस्रकिरणा आदित्या द्वादश स्मृताः।
मारीचात् कश्यपादाप पुत्रानदितिरुत्तमान्॥ ५
कृशाश्वस्य ऋषेः पुत्रा देवप्रहरणाः स्मृताः।
एते देवगणा विप्राः प्रतिमन्वन्तरेषु च॥ ६
उत्पद्यन्ते प्रलीयन्ते कल्पे कल्पे तथैव च।
दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपादिति नः श्रुतम्॥ ७
हिरण्यकशिपुं चैव हिरण्याक्षं तथैव च।
हिरण्यकशिपोस्तद्वज्जातं पुत्रचतुष्टयम्॥८
प्रहादश्चानुहादश्च संहादो हाद एव च।
प्रह्लादपुत्र आयुष्माशिबिर्बाष्कल एव च॥ ९
विरोचनश्चतुर्थश्च स बलिं पुत्रमाप्तवान्।
बलेः पुत्रशतं त्वासीद् बाणज्येष्ठं ततो द्विजाः॥१०
धृतराष्ट्रस्तथा सूर्यश्चन्द्रश्चन्द्रांशुतापनः।
निकुम्भनाभो गुर्वक्षः कुक्षिभीमो विभीषणः॥११
एवमाद्यास्तु बहवो बाणज्येष्ठा गुणाधिकाः।
बाणः सहस्रबाहुश्च सर्वास्त्रगणसंयुतः॥१२
तपसा तोषितो यस्य पुरे वसति शूलभृत्।
महाकालत्वमगमत् साम्यं यश्च पिनाकिनः॥१३
हिरण्याक्षस्य पुत्रोऽभूदुलूकः शकुनिस्तथा।
भूतसंतापनश्चैव महानाभस्तथैव च॥ १४
एतेभ्यः पुत्रपौत्राणां कोटयः सप्तसप्ततिः।
महाबला महाकाया नानारूपा महौजसः॥१५
सूतजी कहते हैं-(शौनकादि ऋषियो!) अब मैं कश्यपकी पत्नियोंसे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रोंका वर्णन करता हूँ। अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू, विश्वा और मुनि- ये तेरह कश्यपकी पत्नियाँ थीं। अब इनके पुत्रोंका वर्णन सुनिये। चाक्षुष मनुके कार्यकालमें जो तुषित नामके देवगण थे, वे ही वैवस्वत मन्वन्तरमें द्वादश आदित्यके नामसे प्रख्यात हुए। इनके नाम हैं-इन्द्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, यम, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् और विष्णु। ये सभी सहस्र किरणोंसे सम्पन्न हैं और द्वादश आदित्य कहे जाते हैं। अदितिने मरीचि-नन्दन कश्यपके संयोगसे इन श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्त किया था। महर्षि कृशाश्वके पुत्र देवप्रहरण नामसे विख्यात हुए। द्विजवरो! ये देवगण प्रत्येक मन्वन्तर तथा प्रत्येक कल्पमें उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं। हमने सुना है कि दितिने महर्षि कश्यपके सम्पर्कसे हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्रोंको प्राप्त किया था। हिरण्यकशिपुके उसीके समान पराक्रमी प्रहाद, अनुहाद, संहाद और हाद नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए। उनमेंसे प्रह्लादके चार पुत्र हुए-आयुष्मान्, शिबि, बाष्कल और चौथा विरोचन। उस विरोचनने बलिको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। विप्रवरो! बलिके सौ पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें बाण ज्येष्ठ था। इसके अतिरिक्त, धृतराष्ट्र, सूर्य, चन्द्र, चन्द्रांशुतापन, निकुम्भनाभ, गुर्वक्ष, कुक्षिभीम, विभीषण तथा इसी प्रकारके और भी बहुत-से पुत्र थे, जो बाणसे छोटे, परंतु सभी श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न थे। उनमें बाणके सहस्र भुजाएँ थीं और वह समस्त अस्त्रसमूहोंका ज्ञाता था। उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर त्रिशूलधारी भगवान् शंकर उसके नगरमें निवास करते थे। उसने (अपनी तपस्याके प्रभावसे) पिनाकधारी शंकरजीकी समतावाले महाकालपदको प्राप्त कर लिया था। (दितिके द्वितीय पुत्र) हिरण्याक्षके उलूक, शकुनि, भूतसंतापन और महानाभनामक पुत्र हुए। इनसे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रोंकी संख्या सतहत्तर करोड़ थी। वे सभी महान् बलशाली, विशाल शरीरवाले, नाना प्रकारका रूप धारण करनेमें समर्थ और महान् ओजस्वी थे॥१-१५॥
दनुः पुत्रशतं लेभे कश्यपाद् बलदर्पितम्।
विप्रचित्तिः प्रधानोऽभूद् येषां मध्ये महाबलः॥१६
द्विमूर्धा शकुनिश्चैव तथा शङ्कुशिरोधरः।
अयोमुखः शम्बरश्च कपिशो वामनस्तथा॥१७
मारीचिर्मेघवांश्चैव इरागर्भशिरास्तथा।
विद्रावणश्च केतुश्च केतुवीर्यः शतहृदः॥१८
इन्द्रजित् सप्तजिच्चैव वज्रनाभस्तथैव च।
एकचक्रो महाबाहुर्वजाक्षस्तारकस्तथा ॥१९
असिलोमा पुलोमा च बिन्दुर्बाणो महासुरः।
स्वर्भानुर्वृषपर्वा च एवमाद्या दनोः सुताः ॥२०
स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या शची चैव पुलोमजा।
उपदानवी मयस्यासीत्तथा मन्दोदरी कुहूः॥२१
शर्मिष्ठा सुन्दरी चैव चन्द्रा च वृषपर्वणः।
पुलोमा कालका चैव वैश्वानरसुते हि ते॥२२
बह्वपत्ये महासत्त्वे मारीचस्य परिग्रहे।
तयोः षष्टिसहस्राणि दानवानामभूत् पुरा॥२३
पौलोमान् कालकेयांश्च मारीचोऽजनयत् पुरा।
अवध्या येऽमराणां वै हिरण्यपुरवासिनः॥२४
चतुर्मुखाल्लब्धवरास्ते हता विजयेन तु।
विप्रचित्तिः सैंहिकेयान् सिंहिकायामजीजनत्॥ २५
हिरण्यकशिपोर्ये वै भागिनेयास्त्रयोदश।
व्यंसः कल्पश्च राजेन्द्र नलो वातापिरेव च ॥२६
इल्वलो नमुचिश्चैव श्वसृपश्चाजनस्तथा।
नरकः कालनाभश्च सरमाणस्तथैव च ॥२७
कालवीर्यश्च विख्यातो दनुवंशविवर्धनाः।
संहादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः स्मृताः॥२८
अवध्याः सर्वदेवानां गन्धर्वोरगरक्षसाम्। ।
ये हता भर्गमाश्रित्य त्वर्जुनेन रणाजिरे॥ २९
षट् कन्या जनयामास ताम्रा मारीचबीजतः।
शुकी श्येनी च भासी च सुग्रीवी गृधिका शुचिः॥ ३०
इसी प्रकार दनुने भी कश्यपके संयोगसे सौ बलशाली पुत्रोंको प्राप्त किया, जिनमें महाबली विप्रचित्ति प्रधान था। इसके अतिरिक्त द्विमूर्धा, शकुनि, शंकुशिरोधर, अयोमुख, शम्बर, कपिश, वामन, मारीचि, मेघवान्, इरागर्भशिरा, विद्रावण, केतु, केतुवीर्य, शतहृद, इन्द्रजित्, सप्तजित्, वज्रनाभ, एकचक्र, महाबाहु, वज्राक्ष, तारक, असिलोमा, पुलोमा, बिन्दु, महासुर बाण, स्वर्भानु और वृषपर्वा-ये तथा इसी प्रकारके और भी दनुके पुत्र थे। इनमें स्वर्भानुकी प्रभा, पुलोमाकी शची, मयकी उपदानवी, मन्दोदरी और कुहू, वृषपर्वाकी शर्मिष्ठा, सुन्दरी और चन्द्रा तथा वैश्वानरकी पुलोमा और कालका नामकी कन्याएँ थीं। इनमें महान् बलशालिनी एवं बहुत-सी संतानोंवाली पुलोमा और कालका मरीचि-पुत्र कश्यपकी पत्नियाँ थीं। इन दोनोंसे पूर्वकालमें साठ हजार दानवोंकी उत्पत्ति हुई थी। पूर्वकालमें मरीचिनन्दन कश्यपने* (इन्हीं पुलोमा और कालकाके गर्भसे) पौलोम और कालकेय संज्ञक दानवोंको पैदा किया था, जो हिरण्यपुरमें निवास करते थे तथा ब्रह्मासे वरदान प्राप्त होनेके कारण वे देवताओंके लिये भी अवध्य थे; परंतु विजय (अर्जुन)- ने उनका संहार कर डाला। विप्रचित्तिने सिंहिकाके गर्भसे सैंहिकेय-संज्ञक पुत्रोंको जन्म दिया, जिनकी संख्या तेरह थी। ये हिरण्यकशिपुके भानजे थे। उनके नाम ये हैं-व्यंस, कल्प, राजेन्द्र, नल, वातापि, इल्वल, नमुचि, श्वसृप, अजन, नरक, कालनाभ, सरमाण तथा प्रसिद्ध कालवीर्य। ये सभी दनु-वंशको बढ़ानेवाले थे। दैत्य संहादके पुत्र निवातकवचके नामसे विख्यात हुए। वे सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वो, नागों और राक्षसोंद्वारा अवध्य थे; किंतु अर्जुनने शिवजीका आश्रय ग्रहण करके रणभूमिमें उन्हें यमलोकका पथिक बना दिया। ताम्राने कश्यपसे शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, गृध्रिका और शुचि नामक छः कन्याओंको जन्म दिया।
*वाल्मी० रामा० १।१।२० आदि, भागवत०१।६।३१, ३।१२।३२,४।१।१३, ९।१।१०, विष्णुपुराण १।१५। १३१, २१ । ८, मत्स्य० ३।६, ४। २६, ११५। ९, वायु० ५०। १६८, ५२। २५, १०१। ३५, ४९, ब्रह्माण्ड० २।३२। ९६, २॥ २१॥ ४३-१४ आदिके अनुसार मरीचि ऋषिके एकमात्र पुत्र कश्यप ही हैं। किसी-किसी पुराणमें उनका एक दूसरा पुत्र 'पौर्णमास' भी निर्दिष्ट है।
शुकी शुकानुलूकांश्च जनयामास धर्मतः।
श्येनी श्येनांस्तथा भासी कुररानप्यजीजनत्॥ ३१
गृधी गृध्रान् कपोतांश्च पारावतविहङ्गमान्।
हंससारसक्रौञ्चांश्च प्लवान्छुचिरजीजनत्॥ ३२
अजाश्वमेषोष्ट्रखरान् सुग्रीवी चाप्यजीजनत्।
एष ताम्रान्वयः प्रोक्तो विनतायां निबोधत॥३३
गरुडः पततां नाथो अरुणश्च पतत्रिणाम्।
सौदामिनी तथा कन्या येयं नभसि विश्रुता॥३४
सम्पातिश्च जटायुश्च अरुणस्य सुतावुभौ
सम्पातिपुत्रो बभ्रुश्च शीघ्रगश्चापि विश्रुतः॥ ३५
जटायुषः कर्णिकारः शतगामी च विश्रुतौ।
सारसो रज्जुबालश्च भेरुण्डश्चापि तत्सुताः॥ ३६
तेषामनन्तमभवत् पक्षिणां पुत्रपौत्रकम्।
सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणामभवत् पुरा ॥ ३७
सहस्त्रशिरसां कद्रूः सहस्त्रं चापि सुव्रत।
प्रधानास्तेषु विख्याता: षड्विंशतिररिंदम॥ ३८
शेषवासुकिकर्कोटशङ्खरावतकम्बलाः
धनञ्जयमहानीलपद्माश्वतरतक्षकाः ॥३९
एलापत्रमहापद्मधृतराष्ट्रबलाहकाः
शङ्खपालमहाशङ्खपुष्पदंष्ट्रशुभाननाः॥४०
शङ्कुरोमा च बहुलो वामनः पाणिनस्तथा।
कपिलो दुर्मुखश्चापि पतञ्जलिरिति स्मृताः॥४१
एषामनन्तमभवत् सर्वेषां पुत्रपौत्रकम्।
प्रायशो यत् पुरा दग्धं जनमेजयमन्दिरे॥४२
रक्षोगणं क्रोधवशा स्वनामानमजीजनत्।
दंष्टिणां नियुतं तेषां भीमसेनादगात् क्षयम्॥४३
रुद्राणां च गणं तद्वद् गोमहिष्यो वराङ्गनाः।
सुरभिर्जनयामास कश्यपात् संयतव्रता॥ ४४
मुनिर्मुनीनां च गणं गणमप्सरसां तथा।
तथा किन्नरगन्धर्वानरिष्टाजनयद् बहून्॥ ४५
तृणवृक्षलतागुल्ममिरा सर्वमजीजनत्।
विश्वा तु यक्षरक्षांसि जनयामास कोटिशः॥४६
तत एकोनपञ्चाशन्मरुतः कश्यपाद् दितिः।
जनयामास धर्मज्ञान् सर्वानमरवल्लभान्॥ ४७
इनमें शुकीने धर्मके संयोगसे शुक और उलूकोंको उत्पन्न किया। श्येनीसे श्येन (बाज) तथा भासीसे कुरर(चकवा)- की उत्पत्ति हुई। गृध्रीने गीधों, पँडुकियों और कबूतरोंको पैदा किया। शुचिके गर्भसे हंस, सारस, क्रौंच और प्लव (कारण्डव या विशेष जलपक्षी) प्रादुर्भूत हुए। सुग्रीवीने बकरा, घोड़ा, भेंड़ा, ऊँट और गधोंको जन्म दिया। इस प्रकार यह ताम्राके वंशका वर्णन किया, अब विनताकी वंश-परम्पराके विषयमें सुनिये॥ १६-३३॥
(विनताके दो पुत्र) गरुड़ और अरुण आकाशचारी छोटे-बड़े समस्त पक्षियोंके स्वामी हैं। (उसकी तीसरी संतान) सौदामिनी नामकी कन्या है, जो गगन-मण्डलमें विख्यात है। अरुणके सम्पाति और जटायु नामके दो पुत्र हुए। उनमें सम्पातिके पुत्र बभ्रु और शीघ्रग नामसे विख्यात हुए। जटायुके दो पुत्र कर्णिकार और शतगामी नामसे प्रसिद्ध हुए। इनके अतिरिक्त जटायुके सारस, रज्जुबाल और भेरुण्डनामक पुत्र भी थे। इन पक्षियोंके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अनन्त है। सुव्रत! सुरसा तथा कद्रूके गर्भसे सहस्र फणोंवाले एक-एक हजार सोकी उत्पत्ति हुई। परन्तप! उनमें छब्बीस प्रधान हैं। उनके नाम ये हैं- शेष, वासुकि, कर्कोटक, शङ्ख, ऐरावत, कम्बल, धनञ्जय, महानील, पद्म, अश्वतर, तक्षक, एलापत्र, महापद्म, धृतराष्ट्र, बलाहक, शंखपाल, महाशंख, पुष्पदंष्ट्र, शुभानन, शंकुरोमा, बहुल, वामन, पाणिन, कपिल, दुर्मुख और पतञ्जलि। इन सभी सोके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अगणित थी, परंतु प्राचीनकालमें जनमेजयके सर्पयज्ञमें (इनमेंसे) प्राय: अधिकांश जला दिये गये। क्रोधवशाने अपने ही नामवाले (क्रोधवश नामक) दंष्ट्रधारी एक लाख राक्षसोंको जन्म दिया, जो भीमसेनद्वारा नष्ट कर दिये गये। संयत व्रतवाली सुरभिने महर्षि कश्यपके संयोगसे रुद्रगणों तथा सुन्दर अङ्गोंवाली गायों और भैंसोंको उत्पन्न किया। मुनिने मुनि-समुदाय तथा अप्सरा-समूहको पैदा किया, उसी प्रकार अरिष्टाने बहुत-से किन्नर और गन्धर्वोको जन्म दिया। इससे समस्त तृण, वृक्ष, लता और झाड़ी आदिकी उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार विश्वाने करोड़ों यक्षों और राक्षसोंको पैदा किया तथा दितिने कश्यपके सम्पर्कसे उनचास मरुतोंको उत्पन्न किया, जो सभी धर्मज्ञ और देवप्रिय थे॥३४-४७॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदिसर्गे कश्यपान्वयो नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें कश्यप-वंश-वर्णन नामक छठा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥६॥
Summary of chapter 6 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya expounds upon the expansive progeny of the great progenitor Maharshi Kaśyapa and his wives, who were the daughters of Daksha Prajāpati. From Aditi, Maharshi Kaśyapa begot the twelve Ādityas, including Indra, Dhātā, Bhaga, Tvashṭā, Mitra, Varuṇa, Aryamā, Vivasvān, and Bhagavān Vishṇu Himself in His Vāmana manifestation, who represent divine light, law, and cosmic order. From Diti were born the powerful Daityas, including Hiraṇyāksha and Hiraṇyakashipu, whose immense strength frequently challenged the Devas. From Danu descended the ninety-nine Dānavas led by Viprachitti, renowned for their mastery over illusions and warfare. The chapter documents how Maharshi Kaśyapa's other wives gave birth to various categories of living beings, where Kadrū brought forth the Nāgas, Vinatā bore Garuḍa and Aruṇa, Surabhi produced cows and quadrupeds, Krodhavashā birthed carnivorous creatures, and Muni generated the celestial Apsaras, illustrating the unified divine origin of all creation.