कमलसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाच

अतः परं प्रवक्ष्यामि तद्वत् कमलसप्तमीम्।

यस्याः संकीर्तनादेव तुष्यतीह दिवाकरः॥१

वसन्तामलसप्तम्यां स्नातः सन् गौरसर्षपैः।

तिलपात्रे च सौवर्णं निधाय कमलं शुभम्॥२

वस्त्रयुग्मावृतं कृत्वा गन्धपुष्पैः समर्चयेत्।

नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे ॥३

दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते।

ततो विकालवेलायामुदकुम्भसमन्वितम्॥४

विप्राय दद्यात् सम्पूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः।

शक्त्या च कपिलां दद्यादलङ्कृत्य विधानतः॥५

ईश्वरने कहा-ब्रह्मन् ! इसके बाद अब मैं कमलसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका नाम लेनेमात्रसे भी भगवान् सूर्यदेव प्रसन्न हो जाते हैं। व्रती मनुष्य वसन्त-ऋतुमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको पीली सरसोंयुक्त जलसे स्नान करके शुद्ध हो जाय और किसी तिलसे पूर्ण पात्रमें एक सुन्दर स्वर्णमय कमल स्थापित कर दे। फिर उसे दो वस्त्रोंसे आच्छादित कर गन्ध, पुष्प आदिद्वारा उसकी अर्चना करे। पूजनके समय 'पद्महस्ताय ते नमः', 'विश्वधारिणे ते नमः', 'दिवाकर तुभ्यं नमः', 'प्रभाकर ते नमोऽस्तु'-इन मन्त्रोंका उच्चारण (कर सूर्यको प्रणाम) करे। तदनन्तर सायंकाल वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषण आदिसे ब्राह्मणका पूजन कर उन्हें जलपूर्ण कलशसहित कमल दान कर दे। साथ ही एक कपिला गौको

अहोरात्रे गते पश्चादष्टम्यां भोजयेद् द्विजान्।

यथाशक्त्यथ भुञ्जीत मांसतैलविवर्जितम्॥ ६

अनेन विधिना शुक्लसप्तम्यां मासि मासि च।

सर्वं समाचरेद् भक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ ७

व्रतान्ते शयनं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।

गां च दद्यात् स्वशक्त्या तु सुवर्णाढ्यां पयस्विनीम्॥ ८

भोजनासनदीपादीन् दद्यादिष्टानुपस्करान्।

अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् कमलसप्तमीम्।

लक्ष्मीमनन्तामभ्येति सूर्यलोके महीयते॥ ९

कल्पे कल्पेततोलोकान्सप्त गत्वा पृथक् पृथक्।

अप्सरोभिः परिवृतस्ततो याति परां गतिम्॥१०

यः पश्यतीदं शृणुयाच्च मर्त्यः

पठेच्च भक्त्याथ मतिं ददाति।

सोऽप्यत्र लक्ष्मीमचलामवाप्य

गन्धर्वविद्याधरलोकभाक् स्यात्॥११

भी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक सुसज्जित करके दान करे। पुनः दिन-रात बीत जानेके बाद अष्टमी तिथिको अपनी सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन करावे। उसके बाद स्वयं भी मांस और तेलसे रहित अन्नका भोजन करे। प्रत्येक मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको इसी विधिके अनुसार कंजूसी छोड़कर भक्तिपूर्वक सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये। (एक वर्ष पूर्ण होनेपर) व्रतकी समाप्तिके समय स्वर्णमय कमलके साथ एक शय्याका भी दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे सुसज्जित एक दुधारू गौ तथा भोजन, आसन, दीप आदि अभीष्ट सामग्रियोंके भी दान करनेका विधान है। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार कमलसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, उसे अनन्त लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है और वह सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वह प्रत्येक कल्पमें अप्सराओंसे घिरा हुआ पृथक्-पृथक् सातों लोकोंमें भ्रमण करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस व्रतको देखता, सुनता, पढ़ता और इसे करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी इस लोकमें अचल लक्ष्मीका उपभोग कर अन्तमें गन्धर्व-विद्याधरलोकका भागी होता है॥१-११॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कमलसप्तमव्रतं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७८॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कमलसप्तमीव्रतनामक अठहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥७८ ॥