मत्स्य महा पुराण
शुभाशुभ शकुनोंका निरुपण
मनुरुवाच
गमनं प्रति राज्ञां तु सम्मुखादर्शने च किम् ।
प्रशस्तांश्चैव सम्भाष्य सर्वानेतांश्च कीर्तय॥१
मत्स्य उवाच
औषधानि त्वयुक्तानि धान्यं कृष्णं च यद् भवेत्।
कार्पासश्च तृणं राजशुष्कं गोमयमेव च॥२
इन्धनं च तथाङ्गारं गुडं तैलं तथाशुभम्।
अभ्यक्तं मलिनं मुण्डं तथा नग्नं च मानवम्॥३
मुक्तकेशं रुजार्तं च काषायाम्बरधारिणम्।
उन्मत्तकं तथा सत्त्वं दीनं चाथ नपुंसकम्॥४
अयः पङ्कस्तथा चर्म केशबन्धनमेव च।
तथैवोद्धृतसाराणि पिण्याकादीनि यानि च॥५
चण्डालश्वपचाश्चैव राजबन्धनपालकाः।
वधकाः पापकर्माणो गर्भिणी स्त्री तथैव च॥६
तुषभस्मकपालास्थि भिन्नभाण्डानि यानि च।
रिक्तानि चैव भाण्डानि मृतं शाट्रिकमेव च॥७
मनुजीने पूछा-भगवन् ! राजाओंके लिये यात्राके अवसरपर सम्मुख देखने या न देखने योग्य कौन- कौन-सी वस्तुएँ प्रशस्त मानी गयी हैं, उन सबका वर्णन कीजिये॥१॥
मत्स्यभगवान्ने कहा-राजन् ! अनुपयुक्त ओषधियाँ, काला अन्न, कपास, तृण, सूखा गोबर, ईंधन, अङ्गार, गुड़, तेल-ये सब अशुभ वस्तुएँ हैं। तेल लगाया हुआ, मलिन, मुण्डन कराया हुआ, नंगा, खुले बालोंवाला, रोगपीड़ित, काषाय वस्त्रधारी, पागल, दीन तथा नपुंसक व्यक्ति, लोहा, कीचड़, चमड़ा, केशका बन्धन, खली आदि सभी सारहीन वस्तुएँ, चाण्डाल, श्वपच, बन्धनमें डालनेवाले राजाके कर्मचारी, जल्लाद, पापी, गर्भिणी स्त्री, भूसी, राख, खोपड़ी, हड्डी, टूटे हुए सभी पात्र, खाली पात्र, लाश, सींगोंवाले पशु-
एवमादीनि चान्यानि अशस्तान्यभिदर्शने।
अशस्तो वाद्यशब्दश्च भिन्नभैरवजर्जरः॥ ८
पुरतः शब्द एहीति शस्यते न तु पृष्ठतः ।
गच्छेति पश्चाद् धर्मज्ञ पुरस्तात् तु विगर्हितः ।।
क्व यासि तिष्ठ मा गच्छ किं ते तत्र गतस्य तु।
अन्ये शब्दाश्च येऽनिष्टास्ते विपत्तिकरा अपि॥१०
ध्वजादिषु तथा स्थानं क्रव्यादानां विगर्हितम्।
स्खलनं वाहनानां च वस्त्रसङ्गस्तथैव च॥११
निर्गतस्य तु द्वारादौ शिरसश्चाभिघातिता।
छत्रध्वजानां वस्त्राणां पतनं च तथाशुभम्॥१२
ਵਏ निमित्ते प्रथमममङ्गल्यविनाशनम्।
केशवं पूजयेद् विद्वान् स्तवेन मधुसूदनम्॥१३
द्वितीये तु ततो दृष्टे प्रतीपे प्रविशेद् गृहम्।
अथेष्टानि प्रवक्ष्यामि मङ्गल्यानि तथानघ ॥१४
श्वेता: सुमनसः श्रेष्ठाः पूर्णकुम्भास्तथैव च।
जलजाः पक्षिणश्चैव मांसमत्स्याश्च पार्थिव॥१५
गावस्तुरंगमा नागा बद्ध एकः पशुस्त्वजः।
त्रिदशाः सुहृदो विप्रा ज्वलितश्च हुताशनः ॥१६
गणिका च महाभाग दूर्वा चार्दै च गोमयम्।
रुक्मं रूप्यं तथा तानं सर्वरत्नानि चाप्यथ॥१७
औषधानि च धर्मज्ञ यवाः सिद्धार्थकास्तथा।
नृवाह्यमानं यानं च भद्रपीठं तथैव च॥१८
खड्गं छत्रं पताका च मृदश्चायुधमेव च।
राजलिङ्गानि सर्वाणि शवं रुदितवर्जितम्॥१९
घृतं दधि पयश्चैव फलानि विविधानि च।
स्वस्तिकं वर्धमानं च नन्द्यावर्ते सकौस्तुभम्। २०
वादित्राणां सुखः शब्दो गम्भीरः सुमनोहरः।
गान्धारषड्जऋषभा ये च शस्तास्तथा स्वराः॥ २१
वायुः सशर्करो रूक्षः सर्वत्र समुपस्थितः।
प्रतिलोमस्तथा नीचो विज्ञेयो भयकृद् द्विज ॥ २२
अनुकूलो मृदुः स्निग्धः सुखस्पर्शः सुखावहः।
रूक्षा रूक्षस्वरा भद्राः क्रव्यादाः परिगच्छताम्॥२३
ये तथा इनके अतिरिक्त और भी वस्तुएँ देखनेमें अशुभ मानी गयी हैं। वाद्योंके भयानक तथा बिना तालके रूखे स्वर भी अशुभ कहे गये हैं। धर्मज्ञ! सामनेसे 'आओ'-ऐसा शब्द कहना शुभ है, किंतु पीछेसे नहीं। इसी तरह पीछेसे 'जाओ' यह कहना शुभ है, किंतु वही आगेसे कहना अशुभ है। 'कहाँ जा रहे हो, रुको, मत जाओ; तुम्हारे वहाँ जानेसे क्या लाभ?'-इस प्रकारके जो दूसरे अनिष्ट शब्द हैं, वे सभी विपत्तिकारक हैं। ध्वजा, पताका आदिपर मांसभक्षी पक्षियोंका बैठना, वाहनोंका फिसलना तथा वस्त्रका अटक जाना निन्दित माना गया है। द्वारसे निकलते समय सिरमें चोट लगना तथा छत्र, ध्वजा और वस्त्रादिका गिरना अशुभकारक है। प्रथम बार अपशकुन दीखनेपर विद्वान् राजाको चाहिये कि वह अशुभविनाशक एवं मधुहन्ता भगवान् केशवकी स्तोत्रोंद्वारा पूजा करे। दूसरी बार पुनः अपशकुन दिखायी पड़नेपर उसे घरमें लौट जाना चाहिये॥२-१३॥
अनघ! अब मैं शुभ-सूचक अभीष्ट शकुनोंका वर्णन कर रहा हूँ। राजन्! श्वेत फूल, भरा हुआ घट, जलजन्तु, पक्षी, मांस, मछलियाँ, गौएँ, घोड़े, हाथी, अकेला बँधा हुआ पशु, बकरा, देवता, मित्र, ब्राह्मण, जलती हुई अग्नि, वेश्या, दूर्वा, गीला गोबर, सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, सभी प्रकारके रत्न, ओषधियाँ, जौ, पीली सरसों, मनुष्योंको ढोता हुआ वाहन, सुन्दर सिंहासन, तलवार, छत्र, पताका, मिट्टी, हथियार, सभी प्रकारके राजचिह्न, रुदनरहित मुर्दा, घी, दही, दूध, विविध प्रकारके फल, स्वस्तिक', वर्धमान', नन्द्यावर्त, कौस्तुभमणि, वाद्योंके सुखदायक, मनोहर एवं गम्भीर शब्द, गान्धार, षड्ज तथा ऋषभ आदि स्वर शुभदायक माने गये हैं। द्विज! यदि बालूके कणोंसे युक्त रूखी वायु सर्वत्र प्रतिकूल दिशामें पृथ्वीका स्पर्श करके बह रही हो तो उसे भयकारी जानना चाहिये। अनुकूल दिशामें बहनेवाली मृदु, शीतल एवं सुखस्पर्शी वायु सुखदायिनी होती है। निष्ठुर एवं रूखे स्वरमें बोलनेवाले मांसभक्षी जीव यात्रियोंके लिये कल्याणकारक होते हैं।
१. ऐसे स्तोत्रोंमें विष्णुसहस्रनाम, गजेन्द्रमोक्ष, (महापुरुषविद्या) 'जितं ते पुण्डरीकाक्ष' आदि श्रेष्ठ हैं।
२. ऐसा प्रासाद जिसमें पूर्वकी ओर द्वार न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३४)
३. वह प्रासाद जिसमें दक्षिणकी ओर दरवाजा न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३३)
४. एक प्रकारका मकान, जिसमें पश्चिमकी और द्वार न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३२)
मेघाः शस्ता घनाः स्निग्धा गजबृंहितनि:स्वनाः।
अनुलोमास्तडिच्छस्ताः शक्रचापं तथैव च॥२४
अप्रशस्ते तथा ज्ञेये परिवेषप्रवर्षणे।
अनुलोमा ग्रहाः शस्ता वाक्पतिस्तु विशेषतः ।। २५
आस्तिक्यं श्रद्दधानत्वं तथा पूज्याभिपूजनम्।
शस्तान्येतानि धर्मज्ञ यच्च स्यान्मनसः प्रियम्॥ २६
मनसस्तुष्टिरेवात्र परमं जयलक्षणम्।
एकतः सर्वलिङ्गानि मनसस्तुष्टिरेकतः ॥ २७
यानोत्सुकत्वं मनसः प्रहर्षः
शुभस्य लाभो विजयप्रवादः।
मङ्गल्यलब्धिः श्रवणं च राजन्
ज्ञेयानि नित्यं विजयावहानि ॥२८
हाथियोंकी चिग्घाड़के समान गम्भीर शब्द करनेवाले चिकने घने मेघ शुभदायी होते हैं। पीछेसे चमकनेवाली बिजलीका प्रकाश तथा इन्द्रधनुष प्रशंसनीय हैं। यात्रामें सूर्य एवं चन्द्रमाके मण्डल तथा घनघोर वृष्टिको अशुभ समझना चाहिये। अनुकूल दिशामें उदित हुए ग्रहोंको, विशेषकर बृहस्पतिको शुभसूचक कहा गया है। धर्मज्ञ! (यात्राकालमें) आस्तिकता, श्रद्धा, पूज्योंके प्रति पूज्यभाव और मनकी प्रसन्नता-ये सभी प्रशंसनीय हैं। यात्राकालमें मनका संतोष विजयका परम लक्षण है। तुलनामें एक ओर सभी शुभ शकुन और एक ओर अपने मनकी प्रसन्नताको मानना चाहिये। राजन्! वाहनोंकी उत्सुकता, मनका आनन्दातिरेक, शुभ शकुनोंकी प्राप्ति, विजयसूचक प्रवाद, माङ्गलिक वस्तुओंकी उपलब्धि तथा श्रवण-इन्हें नित्य विजयप्रद जानना चाहिये॥१४-२८॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्ते मङ्गलाध्यायो नाम त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके यात्रा-प्रसंगमें मङ्गलाध्याय नामक दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४३ ॥
Summary of chapter 245 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya describes King Bali welcoming the radiant dwarf Brāhmaṇa with deep reverence, washing His holy feet, and offering to grant any gift of land, gold, cows, or kingdoms. Bhagavān Vāmana modestly requested merely three paces of land measured by His small feet for performing fire sacrifices. Despite warnings from his guru Śukrāchārya, who recognized the visitor as Bhagavān Vishṇu Himself, King Bali steadfastly stood by his solemn vow of charity, pouring sanctified water to seal the divine gift.