मत्स्य महा पुराण
प्रवरानुकीर्तनमें महर्षि विश्वामिन्नके वंशका वर्णन
मत्स्य उवाच
अत्रेरेवापरं वंशं तव वक्ष्यामि पार्थिव।
अत्रेः सोमः सुतः श्रीमांस्तस्य वंशोद्भवो नृप॥ १
विश्वामित्रस्तु तपसा ब्राह्मण्यं समवाप्तवान्।
तस्य वंशमहं वक्ष्ये तन्मे निगदतः शृणु॥ २
वैश्वामित्रो देवरातस्तथा वैकृतिगालवः ।
वतण्डश्च शलंकश्च ह्यभयश्चायतायनः॥ ३
श्यामायना याज्ञवल्क्या जाबाला: सैन्धवायनाः।
वाभ्रव्याश्च करीषाश्च संश्रुत्या अथ संश्रुताः॥ ४
उलूपा औपहावाश्च पयोदजनपादपाः ।
खरवाचो हलयमाः साधिता वास्तुकौशिकाः॥ ५
त्र्यार्षेयाः प्रवरास्तेषां सर्वेषां परिकीर्तिताः।
विश्वामित्रो देवरात उद्दालश्च महायशाः॥ ६
परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।
देवश्रवाः सुजातेयाः सौमुकाः कारुकायणाः॥ ७
तथा वैदेहराता ये कुशिकाश्च नराधिप।
त्र्यायोऽभिमतस्तेषां सर्वेषां प्रवरः शुभः॥ ८
देवश्रवा देवरातो विश्वामित्रस्तथैव च।
परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ९
धनंजयः कपर्देयः परिकूटश्च पार्थिव।
पाणिनिश्चैव त्र्याचेयाः सर्व एते प्रकीर्तिताः॥१०
विश्वामित्रस्तथाद्यश्च माधुच्छन्दस एव च।
त्र्यार्षेयाः प्रवरा ह्येते ऋषयः परिकीर्तिताः॥११
विश्वामित्रो मधुच्छन्दास्तथा चैवाघमर्षणः ।
परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥१२
कामलायनिजश्चैव अश्मरथ्यस्तथैव च।
व लिश्चापि त्र्यायः सर्वेषां प्रवरो मतः ॥ १३
मत्स्यभगवान्ने कहा-राजन्! अब मैं आपसे महर्षि अत्रिके ही वंशमें उत्पन्न अन्य शाखाका वर्णन कर रहा हूँ। नरेश्वर! महर्षि अत्रिके पुत्र श्रीमान् सोम हुए। उनके वंशमें विश्वामित्र उत्पन्न हुए, जिन्होंने अपनी तपस्याके बलसे ब्राह्मणत्वको प्राप्त किया। अब मैं उनके वंशका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। वैश्वामित्र (मधुच्छन्दा), देवरात, वैकृति, गालव, वतण्ड, शलंक, अभय, आयतायन, श्यामायन, याज्ञवल्क्य, जाबाल, सैन्धवायन, वाभ्रव्य, करीष, संश्रुत्य, संश्रुत, उलूप, औपहाव, पयोद, जनपादप, खरबाच, हलयम, साधित तथा वास्तुकौशिक-इन सभी ऋषियोंके वंश उत्पन्न होनेवालोंमें विश्वामित्र, देवरात तथा महायशस्वी उद्दाल-ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। नराधिप! देवश्रवा, सुजातेय, सौमुक, कारुकायण, वैदेहरात तथा कुशिक-इन सभी महर्षियोंके वंशमें देवश्रवा, देवरात तथा विश्वामित्र-ये तीनों प्रवर माने गये हैं। इन वंशजोंमें परस्पर विवाह निषिद्ध है। राजन्! धनंजय, कपर्देय, परिकूट तथा पाणिनि*-इनके वंशमें विश्वामित्र, धनंजय और माधुच्छन्दस-ये तीन प्रवर माने गये हैं। विश्वामित्र, मधुच्छन्दा और अघमर्षण-इन तीन ऋषियोंके वंशजोंमें भी परस्पर विवाह नहीं होते॥१-१२॥
कामलायनिज, अश्मरथ्य और वझुलि- इन ऋषियोंके विश्वामित्र, अश्मरथ्य और महातपस्वी वञ्जलि-ये तीनों प्रवर माने गये हैं।
* इससे सिद्ध है कि व्याकरण-कर्ता पाणिनि भी बहुत प्राचीन है।
विश्वामित्रश्चाश्मरथ्यो वझुलिश्च महातपाः ।
परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥१४
विश्वामित्रो लोहितश्च अष्टकः पूरणस्तथा।
विश्वामित्र: पूरणश्च तयोर्ती प्रवरौ स्मृतौ ॥१५
परस्परमवैवाह्याः पूरणाश्च परस्परम्।
लोहिता अष्टकाश्चैषां त्र्याचेया: परिकीर्तिताः॥१६
विश्वामित्रो लोहितश्च अष्टकश्च महातपाः ।
अष्टका लोहितैर्नित्यमवैवाह्याः परस्परम्॥१७
उदरेणुः क्रथकश्च ऋषिश्चोदावहिस्तथा।
आर्षेयोऽभिमतस्तेषां सर्वेषां प्रवरः स्मृतः॥१८
ऋणवन् गतिनश्चैव विश्वामित्रस्तथैव च।
परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥१९
उदुम्बरः सैषिरिटिर्ऋषिस्त्राक्षायणिस्तथा।
शाट्यायनि: करीराशी शालंकायनिलावकी।
मौञ्जायनिश्च भगवांस्त्र्याचेयाः परिकीर्तिताः॥२०
खिलिखिलिस्तथा विद्यो विश्वामित्रस्तथैव च।
परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः ॥ २१
एते तवोक्ताः कुशिका नरेन्द्र
महानुभावाः सततं द्विजेन्द्राः।
येषां तु नाम्नां परिकीर्तितेन
पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥२२
इनमें भी परस्पर विवाह निषिद्ध है। विश्वामित्र, लोहित, अष्टक और पूरण-इनके विश्वामित्र और पूरण-ये दो प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध निषिद्ध है। पूरण, लोहित तथा अष्टक- इन ऋषियोंके विश्वामित्र, लोहित तथा महातपस्वी अष्टक प्रवर माने गये हैं। इनमें अष्टक वंशवालोंका लोहित वंशवालोंके साथ परस्पर विवाह नहीं होता। उदरेणु, क्रथक तथा उदावहि-इन सबके ऋणवन्, गतिन तथा विश्वामित्र-ये तीन प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह निषिद्ध है। उदुम्बर, सैषिरिटि, त्राक्षायणि, शाट्यायनि, करीराशी, शालंकायनि, लावकि तथा ऐश्वर्यशाली मौञ्जायनि-इन ऋषियोंके खिलिखिलि, विद्य तथा विश्वामित्र-ये तीन ऋषि प्रवर माने गये हैं। इनमें परस्पर विवाह-सम्बन्ध नहीं होता। नरेन्द्र! मैंने आपसे इन कुशिकवंशी महानुभाव द्विजेन्द्रोंका वर्णन कर चुका। इनके नामसंकीर्तनसे मनुष्य समग्र पापोंसे मुक्त हो जाता है। १३-२२ ।।
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तने विश्वामित्रवंशानुवर्णनं नामाष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तन-प्रसङ्गमें विश्वामित्रवंशानुवर्णन नामक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९८ ॥
Summary of chapter 200 of the Matsya Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Matsya concludes the Gotra and Pravara section by detailing the sacred lineages descending from Maharshi Vashishṭha and Maharshi Agastya. The text lists major sub-clans like Parāshara, Shakti, and Kundina for Vashishṭha, and the Agastya Pravaras, establishing the complete framework of ancestral lineages that preserve the spiritual heritage of Sanātana Dharma.