नारद महा पुराण
पुरोहित वसुका भगवत्कृपासे वृन्दावन-वास, देवर्षि नारदके द्वारा शिव-सुरभि-संवादके रूपमें भावी श्रीकृष्णचरितका वर्णन
पुरोहित वसु कहते हैं- देवि! महाभागे! यह जो तीथोका उत्तम माहात्म्य बताया है, उसे तुम सब तीर्थोंमें धूमकर प्राप्त करो।
सूतजी बोले- ब्राह्मणो! मोहिनीसे ऐसा कहकर उसके पुरोहित वसु उसके द्वारा बारंबार किये - हुए सत्कार और पूजाको स्वीकार करके ब्रह्मलोकको है
चले गये। वहाँ जगत्वष्टा विधाता ब्रह्माजीके समीप जाकर उन्होंने प्रणाम किया और मोहिनीका सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। ब्राहाण वसुका वचन सुनकर ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये और बोले-'वत्स। तुमने बड़े पुण्यका कार्य किया है। तुमने मुझे मोहिनीका उत्तम वृत्तान्त बताया है, उससे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें कोई वर दूंगा। तुम इच्छानुसार कोई वर माँगो।' जगद्विधाता ब्रह्माजीके द्वारा ऐसा कहनेपर विप्रवर बसुने उन प्रणाम करके वृन्दावनवासका वर पौगा।
मुनीश्वरो! यह सुनकर जगतकी सृष्टि करनेवाले शरणागतक्लेशहारी ब्रह्माजी चारों मुखोंसे मुसकराते हुए बोले-'तथास्तु-ऐसा ही हो।' वसुका मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने विधाताको प्रणाम करके वृन्दावनको प्रस्थान किया और यहाँ एकाप्रचित्त हो वे तपस्या करने लगे। तपस्या करते-करते ब्राह्मण वसुके पाँच हजार वर्ष व्यतीत हो गये। इससे संतुष्ट होकर साक्षात् भगवान् श्यामसुन्दर अपने दो-तीन प्रिय सखाऑकि साथ आकर उन श्रेष्ठ द्विजसे बोले-'विप्रवर! मैं तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट हूँ। बोलो, क्या चाहते हो?' तब वसुने उठकर भगवान्को साष्टाङ्ग प्रणाम किया। वे बोले-'देव। मैं सदा वृन्दावनमें निवास करना चाहता हूँ।' द्विजवरो। तदनन्तर श्रीकृष्णने उन्हें मनोवाञ्छित वर दिया। फिर वसुने उन्हें प्रणाम किया और भगवान् पुनः अन्तर्धान हो गये। तभीसे ब्राह्मण वसु इच्छानुसार रूप धारण करके भावान् श्रीकृष्णकी वृन्दावनीय लीलामका चिन्तन करते हुए वहाँ सदा निवास करते हैं।
एक दिनकी बात है, विप्रवर वसु भगवान् का चिन्तन करते हुए यमुनाजीके किनारे बैठे हुए थे। इतने में ही उन्होंने देखा-ब्रह्माजीके पुत्र नारदजी वृन्दावनमें आये हुए हैं। अपने परमगुरु नारदजीको देखकर उन्होंने नमस्कार किया और भगवद्भक्ति बढ़ानेवाले नाना प्रकारके धर्म पूछे। उनके इस प्रकार पूछनेपर अध्यात्मदर्शी नारदजीने उनसे भगवान् विष्णुके भावी चरित्रके विषयमें सब बातें इस प्रकार कहीं-'ब्रह्मन्! एक दिन मैं कैलासवासी भगवान् शङ्करका दर्शन करने और वृन्दावनके भावी रहस्यके विषयमें पूछनेके लिये उनके समीप गया था। जिन्होंने अपनी महिमासे समस्त ब्रह्माण्डमण्डलको व्याप्त कर रखा है। सिद्धसमुदायसे घिरे हुए उन देवेश महेश्वरको प्रणाम करके मैंने अपना कल्याणमय अभीष्ट प्रश्न उनके सामने रखा। तब महादेवजी मुसकराते हुए मुझसे बोले-'ब्रह्मकुमार! तुमने भगवान् श्रीहरिके भविष्य चरित्रके विषयमें जो बात पूछी है, उसे मैं बता रहा हूँ। एक समय मैंने गोलोकमें रहनेवाली सुरभिका दर्शन किया और गोमाता सुरभिसे भविष्यके विषयमें प्रश्न किया। मेरे प्रश्नके उत्तरमें सुरभिने श्रीहरिके भविष्य चरित्रके विषयमें इस प्रकार कहा–'महेश्वर! इस समय राधाके साथ भगवान् श्रीकृष्ण इस गोलोकधाममें सुखपूर्वक रहते हैं और गोपों तथा गोपियोंको सुख देते हैं। शिव! वे किसी समय भूलोकके भीतर मथुरा-मण्डलमें प्रकट हो वृन्दावनमें अद्भुत लीला करेंगे। तत्पश्चात् ब्रह्माजीके द्वारा भूभारहरणके लिये प्रार्थना करने पर श्रीहरि भी पृथ्वीपर है वासुदेवरूपसे प्रकट होंगे। वसुदेवके घरमें जन्म लेकर, यादवनन्दन श्रीकृष्ण पीछे कंसासुरके भयसे नन्दके ब्रजमें चले जायेंगे। वहाँ जाकर श्रीहरि अपने निकट आयी हुई बालघातिनी पूतनाको प्राणहीन कर देंगे। दानव चक्रवात (तृणावर्त)-को तथा देवपीडक महाकाय वत्सासुरको भी मौतके घाट उतार देंगे। कालियनागका दमन करके उसे यमुनासे उजाड़ देंगे। दुःसह धेनुकासुरको मारकर वकासुर और अघासुरके भी प्राण हर लेंगे। दाव, प्रदाव तथा प्रलम्बासुरका भी वध करेंगे। ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण तथा मतवाले कुबेर-पुत्रोंका भी दर्प चूर्ण करके श्रीहरि वृषासुरका वध करेंगे। तदनन्तर मथुरामें जाकर धनुष तोड़कर श्रेष्ठ हाथी कुवलयापीडका वध, करेंगे। तत्पश्चात् चाणूर आदि मल्लों और अपने मामा कंसको भी श्रीकृष्ण मार गिरायेंगे। फिर कैदमें पड़े हुए माता-पिताको मुक्त करके कालयवनको मारकर वे जरासन्धके भयसे द्वारकामें जा बसेंगे। तदनन्तर भगवान् श्रीहरि क्रमश: रुक्मिणी, सत्यभामा, सत्या, जाम्बवती, केकयराजकुमारी भद्रा, लक्ष्मणा, मित्रवृन्दा तथा कालिन्दीके साथ विवाह करेंगे। फिर भौमासुरको मारकर सोलह हजार स्त्रियोंका पाणिग्रहण करेंगे। इसके बाद पौण्डुक, शिशुपाल, दन्तवक्त्र, विदूरथ और शाल्बको मारकर बलभद्ररूपसे द्विचिद बंदर और बल्वलका संहार करेंगे। फिर षट्पुरवासी दैत्योंके साथ वज्रनाभ, सुनाभ और वरदानसे बढ़े हुए त्रिशरीर दैत्यका वध करेंगे। शिवजी! फिर पृथ्वीका भार उतारनेको उत्सुक हो श्रीकृष्ण कौरव और पाण्डवपक्षके वीरोंको परस्पर एक-दूसरेको निमित्त बनाकर मार डालेंगे। इसी प्रकार यदुवंशियोंको यदुवंशियोंसे आपसमें ही लड़ाकर श्रीहरि अपने कुलका संहार कर डालेंगे और अपने अनुगामी बलरामजीके साथ फिर अपने परम धाममें चले जायेंगे। शम्भो! इस प्रकार मैंने श्रीहरिके भविष्य चरित्रका वर्णन किया है। जाओ, जब भूतलपर भगवान् अवतार लेंगे, उस समय तुम वह सब कुछ देखोगे।' ब्रह्मकुमार नारद! सुरभिका वह वचन सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई और मैं पुन: अपने स्थानपर आ गया। वही बात मैंने तुम्हें भी बतायी है। समय आनेपर तुम भी गोकुलपति श्रीकृष्णके चरित्रका अवलोकन करोगे।' वसुजी! त्रिशूलधारी भगवान् शङ्करका यह वचन सुनकर मेरा रोम-रोम हर्षसे खिल उठा है। मैं वीणा बजाकर भगवान् के गुण गाता और उसी में मस्त रहता हुआ इस आतुर जगत्को आनन्द प्रदान करता रहता हूँ। द्विजश्रेष्ठ! यह भविष्यमें होनेवाली बात है, जो मैंने तुझे बतायी है।'
सूतजी कहते हैं- विप्रवर वसुसे ऐसा कहकर देवर्षि नारदजी वीणा बजाते और यदुनन्दन श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए वहाँसे चले गये। ब्राह्मणो! द्रजमें नारदजीका वह बचन सुनकर विप्रवर वसुका चित्त प्रसन्न हो गया और वे भावी श्रीकृष्णलीलाके दर्शनके लिये उत्सुक हो सदा वृन्दावनमें रहने लगे।