इन्द्रद्युम्न सरोवरमें स्नानकी विधि, ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाको श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राके अभिषेकका उत्सव

पुरोहित वसु कहते हैं- ब्रह्मपुत्री मोहिनी ! वहाँसे उस लीर्थों जाय जो अखगेधयक्षके अङ्गसे उत्पन्न हुआ है। उसका नाम है इन्द्रधुप-सरोवर। वह पवित्र एवं शुभ तीर्थ है। बुद्धिमान् पुरुष वहाँ जाकर पवित्रमावसे आचमन करे और मन-ही-मन भगवान् श्रीहरिका ध्यान करके चलमें उतरे। उस समय इसमन्चका उच्चारण करे-

अधुमेधाडसम्भूत तीर्थ सचिनासन।

स्रानं त्वयि करोम्यद्य पापं हर नमोस्तु ते।।

अश्वमेधयज्ञके अङ्गसे प्रकट हुए तथा सम्पूर्ण पापोंके विनाशक तीर्थ ! आज मैं तुम्हारे जलमें स्नान करता हूँ। मेरे पाप हर लो। तुमको नमस्कार है।

इस प्रकार मन्त्रका उच्चारण करके विधिपूर्वक स्रान करे और देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा अन्यान्य लोगोंका तिल और जलसे तर्पण करके मौनभावसे आचमन करे। फिर पितरोंको पिण्डदान दे भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन करे। ऐसा करनेवाला मानव दस अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है। इस प्रकार पञ्चतीर्थका सेवन करके एकादशीको उपवास करे। जो मनुष्य ज्येष्ठ शुक्ला पूर्णिमाको भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करता है वह पूर्वोक्त फलका भागी होकर दिव्यलोकमें क्रीड़ा करके उस परम पदको प्राप्त होता है, जहाँसे पुनः लौटकर नहीं आता। पृथ्वीपर जितने तीर्थ, नदी, सरोवर, पुष्करिणी, तालाब, बावड़ी, कुआँ, हृद और समुद्र हैं, वे सब ज्येष्ठके शुक्लपक्षकी दशमीसे लेकर पूर्णिमातक एक सप्ताह प्रत्यक्षरूपसे पुरुषोत्तम-तीर्थमें जाकर रहते हैं। यह उनका सदाका नियम है। सती मोहिनी! इसीलिये वहाँ स्नान, दान, देव-दर्शन आदि जो कुछ पुण्यकार्य उस समय किया जाता है, वह अक्षय होता है। मोहिनी! ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी दशमी तिथि दस प्रकारके पापोंको हर लेती है। इसीलिये उसे 'दशहरा' कहा गया है। जो उस दिन उत्तम व्रतका पालन करते हुए बलराम, श्रीकृष्ण एवं सुभद्रादेवीका दर्शन करता है वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें जाता है। जो मनुष्य फाल्गुनकी पूर्णिमाके दिन एकचित्त हो पुरुषोत्तम श्रीगोविन्दको झूलेपर विराजमान देखता है वह उनके धाममें जाता है। सुलोचने ! जिस दिन विषुव-योग हो, वह दिन प्राप्त होने पर विधिपूर्वक पश्चतीर्थका सेवन करके बलराम श्रीकृष्या और सुभदाका दर्शन करनेवाला मनुष्य समस्त बोका दुर्लभ फल पाला है और सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोक में जाता है। जो वैसाखके शुक्लपक्षमें तृतीयाको श्रीकृष्णाके चन्दनचचित स्वरूपका दर्शन करता है, वह उनके धाममें जाता है। ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाको यदि वृषराशिके सूर्य और ज्येष्ठा नक्षत्रका योग हो तो उसे 'महाज्येष्ठी' पूर्णिमा कहते हैं। उस समय मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक पुरुषोत्तम-क्षेत्रकी यात्रा करनी चाहिये। मोहिनी ! महाज्येष्ठी पर्वको श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राका दर्शन करके मनुष्य बारह यात्राओंका फल पाता है। प्रयाग, कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य, पुष्कर, गया, हरिद्वार, कुशावर्त, गङ्गासागर-सङ्गम, कोकामुख- शूकरतीर्थ, मथुरा, मरुस्थल, शालग्रामतीर्थ, वायुतीर्थ, मन्दराचल, सिन्धुसागरसङ्गम, पिण्डारक, चित्रकूट, प्रभास, कनखल, शङ्खोद्धार, द्वारका, बदरिकाश्रम, लोहकूट, सर्वपापमोचन-अश्वतीर्थ, कर्दमाल, कोटितीर्थ, अमरकण्टक, लोलार्क, जम्बूमार्ग, सोमतीर्थ, पृथूदक, उत्पलावर्तक, पृथुतुङ्ग, कुब्जतीर्थ, एकाम्रक, केदार, काशी, विरज, कालञ्जर, गोकर्ण, श्रीशैल, गन्धमादन, महेन्द्र, मलय, विन्ध्य, पारियात्र, हिमालय, सहा, शुक्तिमान, गोमान्, अर्बुद, गङ्गा, यमुना, सरस्वती, गोमती तथा ब्रह्मपुत्र आदि तीर्थमें जो पुण्य होता है और महाभागे । गोदावरी, भीमरथी, तुगभद्रा, नर्मदा, तापी, पयोष्णी, कावेरी, क्षिप्रा, चर्मण्यवती, वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा (चनाव), शतद्रू (शतलज), बाहुदा, ऋषिकुल्या, मरुधा, विपाशा (व्यास), दृषद्वती, सरयू, आकाशगङ्गा, गण्डकी, महानदी, कोशिकी (कोसी), करतोया, त्रिस्त्रोत्रा, मधुवाहिनी तथा महानदी : वैतरणी और अन्यान्य नदियाँ, जिनका नाम यहाँ - नहीं लिया गया है, वे सभी पुण्यमें श्रीकृष्णदर्शनकी समानता नहीं कर सकती। सूर्य राहणके समय खान और दानरो जो फल होता है, महाज्येष्ठी चर्चको भगवान श्रीकृष्णका दर्शन करके मनुष्य भी फलको प्रात कर लेता है।

वहाँ एक सजल कूप है जो बड़ा ही पवित्र और सर्वतीर्थमय है। ज्येष्ठकी पूर्णिमाको उसमें पातालगङ्गा, भोगक्ती लिखितरूपसे प्रत्यक्ष हो जाती है। अतः मोहिनी! ज्येहकी पूर्णिमाको श्रीकृष्णा, बलराम और सुभद्राको स्नान कराने के लिये सुवर्ण आदिके कलशोंमें उस कूपसे जल निकाला जाता है। इसके लिये एक सुन्दर मझ बनवाकर उसे पताका आदिसे अलंकृत किया जाता है। वह सुदृढ़ और सुखपूर्वक चलने योग्य बना होता है। वस्त्र और फूलोंसे उसे सजाया जाता है। वह बूब विस्तृत होता है और धूपसे सुवासित किया जाता है। उसपर श्रीकृष्ण और बलरामको सान करानेके लिये पीत वस्त्र बिछाया जाता है। उसे सजानेके लिये मोतियोंके हार लटकाये जाते हैं। भौति-भौतिके वाद्योंकी ध्वनि होती रहती है। सती! उस मनपर एक ओर भगवान् श्रीकृष्ण और दूसरी ओर भगवान् बलराम विराजते हैं। बीच में सुभद्रादेवीको पधराकर जय-जयकार और मङ्गलघोषके साथ स्नान कराया जाता है। मोहिनी! उस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य जातिके लाखों स्त्री-पुरुष उन्हें घेरे रहते हैं। गृहस्थ, स्नातक, संन्यासी और ब्रह्मचारी सभी मञ्चपर विराजमान भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामको सान कराते हैं । सुन्दरी ! पूर्वोक्त सभी तीर्थ अपने पुष्पमिश्रित जलोंसे पृथक्- पृथक् भगवान्को खान कराते हैं। उस समय मुनिलोग वेद-पाठ और मन्त्रोच्चारण करते हैं। सामगानके साथ भाँति-भांतिकी स्तुतियों के पुण्यमय शब्द होते रहते हैं। आकाशमें यक्ष, विद्याधर, सिस, किलर, अप्सराएँ, देव, गन्धर्व, चारण, आदित्य, वसु, रुद, साष्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, लोकपाल तथा अन्य लोग भी भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति करते हैं-'देवदेवेश्वर! पुराणपुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। जगत्पालक भगवान जगन्नाथ ! आप सृष्टि, स्थिति और संहार करनेवाले हैं। जो त्रिभुवनको धारण करनेवाले, ब्राह्मणभक्त, मोक्षके कारणभूत और समस्त मनोवाञ्छित फलोंके दाता हैं, उन भगवान् को हम प्रणाम करते हैं*।' मोहिनी! इस प्रकार आकाशमें खड़े हुए देवता श्रीकृष्ण, महाबली बलराम और सुभद्रादेवीकी स्तुति करते हैं। देवताओंके बाजे बजते और शीतल वायु चलती है। उस समय आकाशमें उमड़े हुए मेघ पुष्पमिश्रित जलकी वर्षा करते हैं। मुनि, सिद्ध और चारण जय-जयकार करते हैं। तत्पश्चात् इन्द्र आदि समस्त देवता, ऋषि, पितर, प्रजापति, नाग तथा अन्य स्वर्गवासी मङ्गल सामग्रियोंक साथ विधि और मन्त्रयुक्त अभिषेकोपयोगी द्रव्य लेकर भगवान् का अभिषेक करते हैं।