नारद महा पुराण
गृहस्थ-सम्बन्धी शौचाचार, स्रान, संध्योपासन आदि तथा वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रम के धर्म
श्रीसनकजी कहते हैं--मुनिश्रेष्ठ! अब मैं गृहस्थका सदाचार बतलाता हूँ, सुनो। उन सदाचारोंके
पालन करनेवाले पुरुषों के सब पाप नष्ट हो जाते
में है, इसमें संशय नहीं है। ब्रह्मान। गृहस्थ पुरुष ब्राहामुहूर्त (सूर्योदयसे पूर्वको चार घड़ी। में
ते जलकर जो पुरुषार्थ (मोक्ष) साधानकी विरोधिनी न हो, ऐसी जीविकाका चिन्तन करे। दिनमें था संध्याके समय कानपर जनेक चढ़ाकर उत्तरकी ओर मुंह करके मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। यदि रातमें इसका अवसर आवे तो दक्षिणकी ओर मुंह करके बैठना चाहिये। द्विज सिरको वस्त्रसे ढककर और भूमिपर तृण बिछाकर शौचके लिये बैठे और उसके होनेतक मौन रहे। मार्गमें, गोशालामें, नदीके तटपर, पोखरे और घरके समीप, पेड़की छायामें, दुर्गम स्थानमें, अनिके समीप, देवालयके निकट, बगीचे में, जोते हुए खेतमें, चौराहेपर; ब्राह्मण, गाय, गुरुजन तथा स्त्रियोंके समीप; भूसी, अंगार, खप्पर या खोपड़ीमें तथा जलके भीतर-इत्यादि स्थानों में मल-मूत्र न करे। शौच (शुद्धि)-के लिये सदा यत्र करना चाहिये। शौच ही द्विजत्वका मूल है। जो शौचाचारसे रहित है उसके सब कर्म निष्फल होते हैं । शौच दो प्रकारका कहा गया है-एक बाहर शौच और दूसरा आभ्यन्तर-शौच। मिट्टी और जलसे जो ऊपर-ऊपरकी शुद्धि की जाती है, वही बाह्य-शौच है और भीतरके भावोंकी जो पवित्रता है उसे ही आपयन्तर शौच कहा गया है। मलत्यागके पश्चात् उठकर शुद्धिके लिये मिट्टी लावे। चूहे आदिकी खोदी हुई, फारसे उलाटी हुई तथा बावड़ी, कुँआ और पोखरेसे निकाली हुई मिट्टी शौचके लिये न लावे। अच्छी मिट्टी लेकर यजसे शुद्धिका सम्पादन करे। लिङ्ग में एक बार या तीन बार मिट्टी लगाकर धोये और अण्डकोषोंमें दो बार मिट्टी लगाकर जलसे धोये। रोषो पुरुषोंने मूत्रत्यागके पश्चात् इस प्रकार शारका विधान किया है। लिङ्गमें एक बार, गुदाद्वारमें पाँच बार, बायें हाथमें दस बार, फिर दोनों हाथों में सात बार तथा दोनों पैरों में तीन बार पृथक् मिट्टी लगानी और धोनी चाहिये। यह मल-त्यागके पश्चात् उसकै लेप और दुर्गन्धको दूर करनेके लिये शुद्धिका विधान किया गया है। ब्रह्मचारियोंके लिये इससे दुगुने शौचका विधान है। वानप्रस्थियोंके लिये तिगुना और संन्यासियोंके लिये गृहस्थकी अपेक्षा चौगुना शौच बताया गया है। मुनिश्रेष्ठ! कहीं रास्तेमें हो तो आधा ही पालन करे। रोगीके लिये या बड़ी भारी विपत्ति पड़नेपर भी नियमका बन्धन नहीं रहता। स्त्रियों और उपनयनरहित द्विजकुमारोंके लिये भी लेप और दुर्गन्ध दूर होनेतक ही शौचकी सीमा है। उसके बाद किसी श्रेष्ठ वृक्षकी छिलकेसहित लकड़ी लेकर उससे दाँतुन करे। बेल, असना, अपामार्ग (ऊँगा या चिरचिरा) नीम, आम और अर्क आदि वृक्षोंका दाँतुन होना चाहिये। पहले उसे जलसे धोकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिमन्त्रित करे-
आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजा: पशुवसूनि च।
ब्रह्म प्रज्ञा च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते ॥
(ना० पूर्व० २७। २५)
'वनस्पते ! तुम हमें आयु, यश, बल, तेज, प्रजा, पशु, धन, वेद, बुद्धि तथा धारणाशक्ति प्रदान करो।'
कनिष्ठिकाके अग्रभागके समान मोटा और दस अंगुल लंबा दाँतुन ब्राह्मण करे। क्षत्रिय नौ अंगुल, वैश्य आठ अंगुल, शूद्र और स्त्रियोंको चार अंगुलका दाँतुन करना चाहिये। दातुन न मिलनेपर बारह कुल्लोंसे मुख शुद्धि कर लेनी चाहिये। उसके बाद नदी आदिके निर्मल जलमें स्नान करे । वहाँ तीर्थीको प्रणाम करके सूर्यमण्डलमें भगवान् नारायणका आवाहन करे। फिर गन्ध आदिसे मण्डल बनाकर उन्हीं भगवान् जनार्दनका ध्यान करे। नारदजी! तदनन्तर पवित्र मन्त्रों और
*शौचे यत्रःसदा कार्यः शौचमूलो द्विजः स्मृतः।
शौचाचारविहीनस्य समस्तं कर्म निष्फलम्।।
तीर्थोंका स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिये-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधि कुरु॥
पुष्कराद्यानि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा।
आगच्छन्तु महाभागाः स्नानकाले सदा मम ।।
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची हावन्तिका।
पुरी द्वारावती ज्ञेयाः सप्तता मोक्षदायिकाः ।।
(ना० पूर्व० २७। ३३-५)
'गङ्गा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु तथा कावेरी नामवाली नदियाँ इस जलमें निवास करें। पुष्कर आदि तीर्थ और गङ्गा आदि परम सौभाग्यवती नदियाँ सदा मेरे स्नानकाल में यहाँ पधारें। अयोध्या, मधुरा, हरद्वार, काशी, काञ्ची, अवन्ती (उज्जैन) और द्वारकापुरी-इन सातोंको मोक्षदायिनी समझना चाहिये।'
तदनन्तर श्वासको रोके हुए पानीमें डुबको लगावे और अघमर्षण सूक्तका जप करे। फिर स्रानाङ्ग-तर्पण करके आचमनके पश्चात् सूर्यदेवको अर्घ्य दे। नारदजी! उसके बाद सूर्यभगवान्का ध्यान करके जलसे बाहर निकलकर बिना फटा हुआ शुद्ध धौतवस्त्र धारण करे। ऊपरसे दूसरा वस्त्र (चादर) भी ओढ़ ले। तत्पश्चात् कुशासनपर बैठकर संध्याकर्म प्रारम्भ करे। ब्रह्मन्! ईशानकोणकी ओर मुख करके गायत्री मन्त्रसे आचमन करे, फिर 'ऋतञ्च' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके विद्वान् पुरुष दुबारा आचमन करे। तदनन्तर अपने चारों ओर जल छिड़कर अपने-आपको उस जलसे आवेष्टित करे। अपने शरीरपर भी जल सौंचे। फिर प्राणायामका संकल्प लेकर प्रणवका उच्चारण करने के बाद प्रणवसहित सातों व्याहतियोंके तथा गायत्री मन्त्रके ऋषि, छन्द और देवताओंका स्मरण करते हुए (विनियोग करते हुए) भू: आदि सात व्याहृतियोंद्वारा मस्तक पर जलसे अभिषेक करे। तत्पश्चात् मन्त्रज्ञ पुरुष पृथक्-पृथक् करन्यास और अङ्गन्यास करे। पहले हृदया। प्रणवका न्यास करके मस्तकपर भू: का न्यास करे। फिर शिखामें शुव का, कवचमें स्व:का, नेत्रों में भूर्भुव:का तथा दिशाओंमें भूर्भुवः स्वः- इन तीनों व्याहतियोंका और अस्त्रका न्यास करे। तीन बार हथेलीपर ताल देना ही अरमन्यास है। तदनन्तर प्रातःकाल
1. ॐकारसहित व्याहतियोंका, गायत्री मन्त्रका तथा शिरोमन्त्रका विनियोग या उनके ऋषि, छन्द और देवताओंका स्मरण इस प्रकार है-
ॐकारस्य ब्रह्म ऋषिदेवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, सप्तव्याहतीनां प्रजापविषिर्गायत्र्युष्णिानुष्टुब्बृहती- पङ्क्तित्रिष्टुब्जगत्यश्छन्दांस्यनिवायुसूर्यबृहस्पतिवरुणेन्द्रविश्वेदेवा देवताः, तत्सवितुरिति विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता, आपो ज्योतिरिति शिरसः प्रजापतिऋषिर्यजुश्छन्दो ब्रह्माग्निवायुसूर्या देवताः प्राणायामे विनियोगः।
2.आधुनिक संध्याकी प्रतियोंमें न्यासकी विधि सूर्योपस्थानके बाद दी हुई है। परंतु नारदपुराणके अनुसार प्राणायामके पहले तथा जपके पहले भी न्यास करना चाहिये। मूलमें करन्यास और अङ्गन्यास दोनोंकी चर्चा की गयी है।
पर विधि केवल सङ्गन्यासकी ही दी गयी है। जिसका प्रयोग इस प्रकार होता है-
ॐ हृदयाय नमः। ॐ भू: से स्वाहा। ॐ भुवः शिखायै वषट्। ॐ स्वः कवचाय हुम्। ॐ भूर्भुवः नेत्राभ्यां वौषट्। ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट् ।
उपर्युक्त छ: मन्त्रवाक्य अङ्गन्यासके है। इनमेंसे पहले वाक्यका उच्चारण करके दाहिने हाधको हथेलीसे हृदयका स्पर्श करे। दूसरे वाक्यको पढ़कर अंगूठेसे मस्तकका स्पर्श करना चाहिये। तीसरे वाक्यका उच्चारण करके अंगुलियोंके अग्रभागसे शिखाका स्पर्श करे। चतुर्थ वाक्य पढ़कर दाहिने हाथको अंगुलियोंसे बायीं भुजाका और बायें हाथकी अंगुलियोंसे दाहिनी भुजाका स्पर्श करे। पञ्चम वाक्यसे अनामिका और अङ्गुष्टद्वारा दोनों नेत्रोंका स्पर्श करना चाहिये। छठा वाक्य बोलकर दाहिने हाथको बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिने ओरसे
कमलके आसनपर विराजमान संध्या (गायत्री)- देवीका आवाहन करे।
सबको वर देनेवाली तीन अक्षरोंसे युक्त ब्रह्मवादिनी गायत्रीदेवी! तुम वेदोंकी माता तथा ब्रायोनि हो! तुम्हें नमस्कार है। मध्याह्नकालमें वृषभपर आरूढ़ हुई, क्षेतवस्त्रसमातृत सावित्रीका आवाहन करे। जो रुद्रयोनि तथा रुद्रवादिनी है। सायंकाल के समय गरुड़पर चढ़ी हुई पीताम्बरसे आच्छादित विष्णुयोनि एवं विष्णुवादिनी सरस्वतीदेवीका आवाहन करना चाहिये । पाणव, मात ज्याइति, जिपदा गायत्री तथा शिर:शिखा
मन्त्र-इन सबका उच्चारण करते हुए क्रमशः पूरक, कुम्भक और विरेचन करे। प्राणायाममें बायीं नासिकाके छिद्रसे वायुको धीरे-धीरे अपने भीतर भरना चाहिये। फिर क्रमश: कुम्भक करके विरेचनद्वारा उसे बाहर निकालना चाहिये। तत्पश्चात् प्रात:कालकी संध्यामें 'सूर्यच मा' इत्यादि मन्त्र पढ़कर दो बार आचमन करे। मध्याह्नकालमें 'आपः पुनन्तु' इत्यादिसे और सायं संध्यामें 'अनिश्चमा'. इत्यादि मन्त्रसे आचमन करना चाहिये। इसके बाद 'आपो हि ष्ठा मयो भुवः' इत्यादि तीन ऋचाओंद्वारा मार्जन करे। फिर-
आगेकी ओर ले आवे। तर्जनी तथा मध्यमा अंगुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजावे। अङ्गन्याससे पहले करन्यास करना चाहिये। करन्यास-वाक्य इस प्रकार हो सकते हैं-
ॐ अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ॐ भूः तर्जनीभ्यां नमः। ॐ भुवः मध्यमाभ्यां नमः। ॐ स्वः अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ भूर्भुवः कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ भूर्भुवः स्वः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
इनमें प्रथम वाक्य बोलकर दोनों तर्जनीसे दोनों अङ्गुष्ठोंका, द्वितीय वाक्य बोलकर दोनों अनुष्ठोंसे दोनों तर्जनीका, तृतीय वाक्यसे अष्टोद्वारा ही दोनों मध्यमाओंका, चतुर्थ वाक्यसे दोनों अनामिकाओंका, पञ्चम वाक्यसे दोनों कनिष्ठिकाओंका और छठे वाक्यसे दोनों हथेलियों तथा उनके पृष्ठभागोंका परस्पर स्पर्श करना चाहिये।
आगच्छ वरदे देवि त्र्यक्षरे ब्रह्मवादिनि ।
गायत्रिच्छन्दसां मातब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते॥
(ना० पूर्व० २७। ४३-४)
मध्याहे वृषभारूढां शुक्लाम्बरसमावृताम् ।
सावित्री रुदयोनि चावाहयेगुद्रवादिनीम्॥
सायं तु गरुडारूढां पीताम्बरसमावृताम्।
सरस्वती विष्णुयोनिमाह्वयेद् विष्णुवादिनीम्॥
(ना० पूर्व०२७।४४-४६)
4. प्राणायाम-मन्त्र और उसकी विधि इस प्रकार है-
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् ॥
पहले दाहिने हाथके अङ्गुष्ठसे नासिकाका दायाँ छिद्र बंद करके बायें छिद्रसे वायुको अंदर खींचे। साथ हो नाभिदेशमें नीलकमलदलके समान श्यामवर्ण चतुर्भुज भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए प्राणायाम-मत्रका तीन बार पाठ कर जाय। (यदि तीन बार पाठ न हो सके तो एक ही बार पाठ करे और अधिकके लिये अभ्यास बढ़ावे।) इसको पूरक कहते हैं। पूरकके पश्चात् अनामिका और कनिष्ठिका अंगुलियोंसे नासिकाके बायें छिद्रको भी बंद करके तबतक श्वास रोके रहे, जबतक कि प्राणायाम-मन्त्रका तीन बार(या शक्तिके अनुसार एक बार) पाठ न हो जाय। इस समय ह्रदय के बीच कमलासनपर विराजमान अरुण-गौरमिश्रित वर्णवाले चतुर्मुख ब्रह्माजीका ध्यान करे। यह कुम्भक क्रिया है। इसके बाद अँगूठा हटाकर नासिकाके दाहिने छिद्रसे वायुको धीरे-धीरे स्फटिक के समान श्वेत वर्णवाले त्रिनेधारी भगवान् शंकर का ध्यान करे। यह रेचक क्रिया है, यह सब मिलकर एक प्राणायाम कहलाता है।
सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु।
दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योस्मान्द्वेष्टि।
यं च वयं द्विष्मः।
-इस मन्त्रको पढ़ते हुए हथेलीमें जल लेकर नासिकासे उसका स्पर्श कराये और भीतरके काम- क्रोधादि शत्रु उस जलमें आ गये, ऐसी भावना करके दूर फेंक दे। इस प्रकार शत्रुवर्गको दूर भगाकर 'द्रुपदादिव मुमुचानः' इत्यादि मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलको अपने सिरपर डाले। उसके बाद 'ऋतच सत्यम्' इत्यादि मन्त्रसे अघमर्षण करके 'अन्तश्वरसि' इत्यादि मन्त्रद्वारा एक ही बार जलका आचमन करे। देवर्षे ! तदनन्तर सूर्यदेवको विधिपूर्वक गन्ध, पुष्प और जलकी अञ्जलि दे। प्रात:काल स्वस्तिकाकार अञ्जलि बाँधकर भगवान् सूर्यका उपस्थान करे। मध्याह्नकालमें दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर और सायंकाल बाँहें नीचे करके उपस्थान करे । इस प्रकार प्रात: आदि तीनों समयके लिये पृथक्-पृथक् विधि है। नारदजी ! सूर्योपस्थानके समय 'उदुत्यं जातवेदसम्', चित्रं देवानामुदगादनीकम्', 'तच्चक्षुर्देवहितम्' इन तीन ऋचाओंका जप करे। इसके सिवा सूर्यदेवता- सम्बन्धी अन्य मन्त्रोंका, शिव-सम्बन्धी मन्त्रोंका तथा विष्णुदेवता-सम्बन्धी मन्त्रोंका भी जप किया जा सकता है। सूर्योपस्थानके बाद 'तेजोऽसि' तथा 'गायत्र्यस्येकपदी' इत्यादि मन्त्रोंको पढ़कर भगवान् सविताके तेजःस्वरूप गायत्रीको अथवा परमात्म-तेजकी स्तुति-प्रार्थना करे। तदनन्तर पुनः तीन बार अङ्गन्यास करके ब्रह्मा, रुद्ध तथा विष्णुकी स्वरूपभूता शक्तियोंका चिन्तन करे। (प्रात:काल ब्रह्माकी, मध्याह्नमें रूदको सायेकाल विष्णुकी शक्तिरूपसे क्रमश: गायत्री, सावित्री और सरावतीका चिन्तन करना चाहिये। उनका क्रमशः ध्यान इस प्रकार है-)
ब्रह्माणी चतुराचनाक्षवलयं कुम्भी कारः शुक्लुवौ
शिक्षणात्यकणेन्दुकातिवदना गुरूपिणी वास्तिका।
हसारोहणकेलिखणखण्मणेबिम्बार्षिता भूषिता
गायत्री परिभाविता भवतु नः संपत्समृद्धथै सदा॥
(ना० पूर्व। २७ । ५५)
'प्रात:कालमें गायत्रीदेवी ऋग्वेदस्वरूपा बालिकाके रूपमें विराज रही हैं। ये ब्रह्माजीकी शक्ति हैं। इनके चार मुख हैं। इन्होंने अपने हाथोंमें अक्षवलय, कलश, सुक् और सुवा धारण कर रखा है। इनके मुखकी कान्ति अरुण चन्द्रमाके समान कमनीय है। ये हंसपर चढ़नेकी क्रीड़ा कर रही हैं। उस समय इनके मणिमय आभूषण खनखन करने लगते हैं। मणिके बिम्बोंसे ये कूजित और विभूषित हैं। ऐसी गायत्रीदेवी हमारे ध्यानकी विषय होकर दैवी सम्पत्ति बढ़ाने में सहायक हों।'
रुद्राणी नवयौवना त्रिनयना वैयाघ्रचर्माम्बरा
खरवागात्रिशिखाक्षसूत्रवलयाऽभीतिः श्रियै चास्तु नः।
विद्युहामजटाकलापविलसद्बालेन्दुमौलिमुंदा
सावित्री वृषवाहना सिततनुयया यजूरूपिणी ॥
(ना. पूर्व-। २७। ५६)
'मध्याह्नकालमें वही गायत्री सावित्री' नाम धारण करती हैं। ये रुद्रकी शक्ति हैं। नूतन
यौवनसे सम्पत्र हैं। इनके तीन नेत्र है। व्याघ्रका चर्म इन्होंने वस्त्रके रूपमें धारण कर रखा है। इनके हाथोंमें खट्वाङ्ग, त्रिशूल, अक्षवलय और अभयकी मुद्रा है। तेजोमयी विद्युत्के समान देदीप्यमान जटामें बालचन्द्रमाका मुकुट शोभा पा रहा है। ये आनन्दमें मग्न है। वृषभ इनका वाहन है। शरीरका रंग (कपूरके समान) गौर है और यजुर्वेद इनका स्वरूप है। इस रूपमें ध्यान करने योग्य सावित्री हमारे ऐश्वर्यकी वृद्धि करें।'
ध्येया सा च सरस्वती भगवती पीताम्बरालङ्कता
श्यामा श्यामतनुर्जरा परिलसद् गात्राञ्चिता वैष्णवी।
तार्क्ष्यस्था मणिनूपुरामदलसद्गवेयभूषोज्वला
हस्तालङ्कृतशङ्खचक्रगदापा श्रियै चास्तुनः॥
(ना० पूर्व० २७। ५७)
'सायंकालमें वही गायत्री विष्णुशक्ति भगवती सरस्वतीका रूप धारण करती हैं। उनके श्रीअङ्ग पीताम्बरसे अलङ्कृत होते हैं। उनका रंग-रूप श्याम है। शरीरको एक-एक अवयव श्याम है। विभिन्न अङ्गोंमें जरावस्थाके लक्षण प्रकट होकर उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वे गरुड़पर बैठी हैं। मणिमय नूपुर, भुजबंद और सुन्दर हार, हमेल आदि भूषणोंसे उनकी स्वाभाविक प्रभा और बड़ गयी है। उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और उत्तम गदा तथा पद्म सुशोभित हैं। इस रूपमें ध्यान करनेयोग्य सरस्वतीदेवी हमारी श्रीवृद्धि करें।'
इस प्रकार ध्यान करके गायत्री मन्त्रका जप करे। प्रात: और मध्याह्नकालमें खड़े होकर तथा सायंकालमें बैठकर भक्तिभावसे गायत्रीके ध्यानमें ही मनको लगाये हुए जप करना चाहिये। प्रति समयकी संध्योपासनामें गायत्रोदेवीका एक हजार जप उत्तम, एक सौ जप मध्यम तथा कम-से-कम दस बार जप साधारण माला गया है। आरम्भ
प्रणव फिर 'भूर्भुवःस्वः' ठसके बाद 'तत्सवितुः' इत्यादि त्रिपदा गायत्री-यही जपनेयोग्य गायत्री- मन्त्रका स्वरूप है। मुने। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और यतिके द्वारा जो गायत्री मन्त्रका जप होता है, उसमें छ: प्रणव लगावे अथवा आदि-अन्तमें प्रणव लगाकर मन्त्रको उसमें सम्पुटित कर दे। परंतु गृहस्थके लिये केवल आदिमें एक प्रणव लगानेका नियम है। ऐसा ही मन्त्र उसके लिये जपनेयोग्य है। तदनन्तर यथाशक्ति जप करके उसे भगवान् सूर्यको निवेदित करे। फिर गायत्री तथा सूर्यदेवताके लिये एक-एक अञ्जलि जल छोड़े। तत्पश्चात् 'उत्तरे शिखरे देवि' इत्यादि मन्त्रसे गायत्रीदेवीका विसर्जन करते हुए कहे-'देवि! श्रीब्रह्मा, शिव तथा भगवान् विष्णुकी अनुमति लेकर सादर पधारो।' इसके बाद दिशाओं और दिग्देवताओंको हाथ जोड़कर प्रणाम करनेके अनन्तर प्रात:काल आदिका न दूसरा कर्म भी विधिपूर्वक सम्पन्न करे। देवर्षे! गृहस्थ पुरुष तो प्रात:काल और मध्याह्नकालमें स्नान करे। परंतु वानप्रस्थी तथा संन्यासीको तीनों समय स्नान करना चाहिये। जो रोग आदिसे कष्ट न पा रहे हों उनके लिये तथा पथिकोंके लिये एक ही बार स्नानका विधान किया गया है। मुनीश्वर! न संध्योपासनके अनन्तर द्विज हाथमें कुश धारण न करके ब्रहायज्ञ करे। यदि दिनमें बताये गये कर्म प्रमादवश न किये गये हों तो रातके पहले पहरमें उन्हें क्रमशः पूर्ण कर लेना चाहिये। जो धूर्त बुद्धिवाला द्विज आपत्तिकाल न होनेपर भी संध्योपासन नहीं करता, उसे सब धर्मोंसे भ्रष्ट एवं पाखण्डी समझना न चाहिये। जो कपटपूर्ण झूठी युक्ति देनेमें चतुर होनेके कारण संध्या आदि कर्मोको अनावश्यक हुए उनका त्याग करता है, उसे में महापातकियोंका सिरमौर समझना चाहिये2।
तैत्तिरीय आरण्यकमें 'उत्तमे शिखरे' ऐसा पाठ मिलता है। इस पुराणमें 'उत्तरे शिखरे' आया है।
यस्तु संध्यादिकर्माणि कूटयुक्तविशारदः।
परित्यजति तं विद्यान्महापातकिनां वरम्।।
संध्योपासनाके बाद विधिपूर्वक देवपूजा तथा बलिवैश्वदेव-कर्म करना चाहिये। उस समय आये हुए अतिथिका अन्न आदिसे भलीभाँति सत्कार करना चाहिये। उनके आनेपर मीठे वचन बोलना चाहिये। उन्हें घरमें ठहरनेके लिये स्थान देकर अन्न-जल अथवा कन्द मूल फलसे उनकी पूजा करनी चाहिये। जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौटता है, वह उसे अपना पाप दे बदले में उसका पुण्य लेकर चला जाता है। जिसका नाम और गोत्र पहलेसे ज्ञात न हो और जो दूसरे गाँवसे आया हो, ऐसे व्यक्तिको विहान् पुरुष 'अतिथि' कहते हैं। उसका श्रीविष्णुकी भांति पूजन करना चाहिये। ब्रह्मन्! प्रतिदिन पितरोंकी तृप्तिके उद्देश्यसे अपने ग्रामके निवासी एक श्रोत्रिय एवं वैष्णत बाह्मणको अन्न आदिसे तृप्त करना चाहिये । पो पञ्चमहायज्ञोका त्यागी है, उसे विद्वान् लोग ब्रह्म तारा कहते हैं। इसलिये प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक पञ्चमहायज्ञका अनुष्ठान
करना चाहिये। देवयज्ञ, भूतयज, पितृयज्ञ, मनुष्ययज्ञ तथा ब्रहायज्ञ-इनको पशयज्ञ कहते है। भृत्य और मित्रादिवर्गके साथ स्वयं मौन होकर भोजन करना चाहिये। द्विज कभी अभक्ष्य पदार्थको न खाय । सुपात्र व्यक्तिका त्याग न करे, उसे अवश्य भोजन करावे। जो अपने आसनपर पैर रखकर अथषा आधा वस्त्र पहनकर भोजन करता है या मुखसे उगले हुए अन्नको खाता है, विद्वान् पुरुष उसे 'शराबी' कहते हैं। जो आधा खाये हुए मोदक, फल और प्रत्यक्ष नमकको पुन: खाता है, वह गोमांसभोजी कहा जाता है। द्विजको चाहिये कि वह पानी पीते, आचमन करते तथा भक्ष्य पदार्थोंका भोजन करते समय मुखसे आवाज न करे। यदि वह उस समय मुँहसे आवाज करता है तो नरकगामी होता है। मौन होकर अन्नकी निन्दा न करते हुए हितकर अन्नका भोजन करना चाहिये। भोजनके पहले एक बार जलका आचमन करे और इस प्रकार कहे 'अमृतोपस्तरणमसि'- (हे अमृतरूप जल! तू भोजनका आश्रय अथवा आसन है)। फिर भोजनके अन्तमें एक बार जल पीये और कहे-'अमृतापिधानमसि' (हे अमृत ! तू भोजनका आवरण-उसे ढकनेवाला है)। पहले प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान–इनके निमित्त अन्नकी पाँच आहुतियाँ अपने मुख में डालकर आचमन कर ले। उसके बाद भोजन आरम्भ करे। विप्रवर नारदजी! इस प्रकार भोजनके पश्चात् आचमन करके शास्त्रचिन्तनमें तत्पर होना चाहिये। रातमें भी आये हुए अतिथिका यथाशक्ति भोजन, आसन तथा शयनसे अथवा कन्द मूल फल आदिसे सत्कार करे । मुने। इस प्रकार गृहस्थ पुरुष सदा सदाचारक पालन करे। जिस समय वह सदाचारको त्याग
अतिधियस्य भनाशी हातनियत ।
स तस्मै दुष्कृतं दत्वा पुण्यमादाय गच्छति।।
अज्ञातगोमामानं अन्यपामादुपागतम्।
विपश्वितोतिथिं प्राह्रुर्विष्णुवत् तं प्रपूजयेत्।।
2. प्राणाय स्वाहा अपानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा, समानया स्वाहा, उदानाय स्वाहा-इस प्रकार कहता हुआ पाँच ग्रास ले।
देता है, उस समय प्रायश्चित्तका भागी होता है।
साधुशिरोमणे! अपने शरीरको सफेद बाल आदि दोषोंसे युक्त देखकर अपनी पत्नीको पुत्रोंक संरक्षणमें छेड़ दे। स्वयं घरसे विरक्त होकर वनमें चला जाय अथवा पत्नीको भी साथ ही लेता जाय। वहाँ तीनों समय सान करे। नख, दाढ़ी, मूंछ और जय धारण किये रहे। नीचे भूमिपर सोये। ब्रह्मचर्यका पालन करे और पञ्चमहायज्ञोंके अनुष्ठानमें तत्पर रहे। प्रतिदिन फल-मूलका भोजन करे और स्वाध्यायमें लगा रहे। भगवान् विष्णुके भजनमें संलग्न होकर सब प्राणियोंके प्रति दयाभाव रखे। गाँवमें पैदा हुए फल-मूलको त्याग दे। प्रतिदिन आठ ग्रास भोजन करे तथा रातमें उपवासपूर्वक रहे। वानप्रस्थ-आश्रममें रहनेवाला द्विज उबटन, तेल, मैथुन, निद्रा औरआलस्य त्याग दे। वानप्रस्थी पुरुष शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् नारायणका चिन्तन तथा चान्द्रायण आदि तपोमय व्रत करे। सर्दी-गरमी आदि द्वन्द्वोंको सहन करे। सदा अग्निकी सेवा (अग्रिहोत्र)-में संलग्न रहे।
जब मनमें सब वस्तुओंकी ओरसे वैराग्य हो जाय तभी संन्यास ग्रहण करे, अन्यथा वह पतित हो जाता है। संन्यासीको वेदान्तके अभ्यासमें तत्पर, शान्त, संयमी और जितेन्द्रिय, द्वन्द्वोंसे रहित तथा ममता और अहंकारसे शून्य रहना चाहिये। वह साम-दम आदि गुणोंसे युक्त तथा काम-क्रोधादि दोषोंसे दूर रहे। संन्यासी द्विज नग्न रहे या पुराना कौपीन पहने। उसे अपना मस्तक मुंड़ाये रहना चाहिये। वह शत्रु-मित्र तथा मान-अपमानमें समान भाव रखे। गाँव में एक रात और नगरमें अधिक-से-अधिक तीन रात रहे। संन्यासी सदा भिक्षासे ही जीवन निर्वाह करे। किसी एकके घरका अन्न खानेवाला न हो। जब चूल्हेकी आग बुझ जाय,घरके लोगोंका खाना-पीना हो गया हो, कोई बाकी न हो, उस समय किसी उत्तम द्विजके घरमें, जहाँ लड़ाई-झगड़ा न हो, भिक्षाके लिये संन्यासीको जाना चाहिये। संन्यासी तीनों काल स्नान और भगवान् नारायणका ध्यान करे। और मनको जीतकर इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए प्रतिदिन प्रणवका जप करता रहे। अगर कोई लम्पट संन्यासी कभी एक में अक्तिका अन्न खाकर रहने लगे तो दस हजार प्रायश्चित्त करनेपर भी उसका उद्धार नहीं दिखायी देता। ब्रह्मन् ! यदि संन्यासी लोभवश केवल शरीरके न ही पालन-पोषणमें लगा रहे तो उसे चाण्डालके में समान समझना चाहिये। सभी वर्गों और आश्रमोंमें उसकी निन्दा होती है। संन्यासी अपने आत्मस्वरूप भगवान् नारायणका चिन्तन करे। जो रोग-शोकसे का रहित, द्वन्द्वोंसे परे, ममताशून्य, शान्त, मायातीत, ईर्ष्यारहित, अव्यय, परिपूर्ण, सच्चिदानन्दस्वरूप की ज्ञानमय, निर्मल, परम ज्योतिर्मय, सनातन, अधिकारी, अनादि, अनन्त जगत्की चिन्मयताके कारण गुणातीत हो तथा परात्पर परमात्मा हैं, उन्हींका नित्य ध्यान करना चाहिये। वह उपनिषद्-वाक्योंका पाठ एवं वेदान्तशास्त्रके अर्थका विचार करता रहे। जितेन्द्रिय था| रहकर सदा सहस्रों मस्तकवाले भगवान् श्रीहरिका वह ध्यान करे । जो ईर्ष्या छोड़कर इस प्रकार भगवान् के ध्यानमें तत्पर रहता है, वह परमानन्दस्वरूप उत्कृष्ट सनातन ज्योतिको प्राप्त होता है। जो द्विज इस तरह क्रमश: आश्रमसम्बन्धी आचारोंका पालन करता मान है, वह परम धाममें जाता है। वहाँ जाकर कोई - शोक नहीं करता। वर्ण और आश्रम-सम्बन्धी से धर्मक पालनमें तत्पर एवं सब पापोंसे रहित भगवद्भक्त अन्न भगवान विष्णके परम धामको प्राप्त होते हैं।
श्राद्धकी विधि तथा उसके विषय में अनेक ज्ञातव्य विषयों का वर्णन
श्रीसनकजी कहते हैं- मुनिश्रेष्ठ! मैं श्राद्धकी उत्तम विधिका वर्णन करता हूँ, सुना। उसे सुनकर मनुष्य स पापों से मुक्त हो जाता है। पिताकी क्षयाह तिथिके पहले दिन स्नान करके एक समय भोजन करे। जमीनपर सोये, ब्रह्मचर्यका पालन करे तथा रातमें ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे। श्राद्धकर्ता पुरुष दाँतुन करना, पान खाना, तेल और उबटन लगाना, मैथुन, औषध-सेवन तथा दूसरेके अन्नका भोजन अवश्य त्याग दे। रास्ता चलना, दूसरे गाँव जाना, कलह, क्रोध और मैथुन करना, बोझ ढोना तथा दिनमें सोना-ये सब कार्य श्राद्धकर्ता और श्राद्धभोक्ताको छोड़ देने चाहिये। यदि श्राद्धमें निमन्त्रित पुरुष मैथुन करता है तो वह ब्रह्महत्याको प्राप्त होता और नरकमें जाता है। श्राद्धमें वेदके ज्ञाता और वैष्णव ब्राह्मणको नियुक्त करना चाहिये। जो अपने वर्ण और आश्रमधर्मके पालनमें तत्पर, परम शान्त, उत्तम कुलमें उत्पन्न, राग-द्वेषसे रहित, पुराणों के अर्थज्ञानमें निपुण, सब प्राणियोंपर दया करनेवाला, देवपूजापरायण, स्मृतियोंका तत्त्व जाननेमें कुशल, वेदान्त-तत्त्वका ज्ञाता, सम्पूर्ण लोकोंके हितमें संलग्र, कृतज्ञ, उत्तम गुणयुक्त, गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर तथा उत्तम शास्त्रवचनोंद्वारा धर्मका उपदेश देनेवाला हो, उसे श्राद्धमें निमन्त्रित करे।
किसी अङ्गसे हीन अथवा अधिक अङ्गवाला, कदर्य, रोगी, कोढ़ी, बुरे नखोंवाला, अपने व्रतको खण्डित करनेवाला, ज्योतिषी, मुर्दा जलानेवाला, कुत्सित वचन बोलनेवाला, परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए स्वयं विवाह करनेवाला), देवल, दुष्ट, निन्दक, असहनशील, धूर्त, गाँवभरका पुरोहित, असत्-शास्त्रोंमें अनुराग रखनेवाला, वर्षलीपति, कुण्डगोलक, यज्ञके अनधिकारियोंसे यज्ञ करानेवाला, पाखण्डपूर्ण आचरणवाला, अकारण सिर मुंड़ानेवाला, परायी स्त्री और पराये धनका लोभ रखनेवाला, भगवान् विष्णुकी भक्तिसे रहित, भगवान् शिवकी भक्तिसे विमुख, वेद बेचनेवाला, व्रतका विक्रय करनेवाला, स्मृतियों तथा मन्त्रोंको बेचनेवाला, गवैया, मनुष्योंकी झूठी प्रशंसाके लिये कविता करनेवाला, वैद्यक-शास्त्रसे जीविका चलानेवाला, वेदनिन्दक, गाँव और वनमें आग लगानेवाला, अत्यन्त कामी, रस बेचनेवाला, झूठी युक्ति देने में तत्पर रहनेवाला-ये सब ब्राह्मण यत्नपूर्वक श्राद्धमें त्याग देने योग्य हैं। श्राद्धसे एक दिन पहले या श्राद्धके दिन ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। श्राद्धकर्ता पुरुष हाथमें कुश लेकर इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए विद्वान् ब्राह्मणको निमन्त्रण दे और इस प्रकार कहे 'हे साधुशिरोमणे! श्राद्ध में अपना समय देकर मुझपर कृपा प्रसाद करें।'
तदनन्तर प्रात:काल उठकर सबेरेका नित्यकर्म समाप्त करके विद्वान् पुरुष कुतपकालमें श्राद्ध प्रारम्भ करे। दिनके आठवें मुहूर्तमें जब सूर्यका तेज कुछ मन्द हो जाता है, उस समयको 'कुतपकाल' कहते हैं। उसमें पितरोंकी तृप्तिके लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है। ब्रह्माजीने पितरोंको अपराह्नकाल ही दिया है। मुनिश्रेष्ठ! विभिन्न द्रव्योंके साथ जो कव्य असमयमें पितरोंके लिये दिया जाता है, उसे राक्षसका भाग समझना चाहिये। वह पितरोंके पास नहीं पहुँच पाता है। सायंकालमें दिया हुआ कव्य राक्षसका भाग हो जाता है। उसे देनेवाला नरकमें पड़ता है और उसको भोजन करनेवाला भी नरकगामी होता है। ब्रह्मन् ! यदि निधनतिथिका मान पहले दिन एक दण्ड ही हो और दूसरे दिन वह अपराह्नतक - व्याप्त हो तो विद्वान् पुरुषको दूसरे ही दिन श्राद्ध करना चाहिये। किंतु मृत्युतिथि यदि दोनों दिन अपराह्नकालमें व्याप्त हो तो क्षयपक्षमें पूर्वतिथिको श्राद्धमें ग्रहण करना चाहिये और वृद्धिपक्षमें
१. वृषली शूद्रजातिकी स्त्रीको कहते हैं। स्मृतियोंके अनुसार जो कन्या अविवाहित अवस्थामें अपने पिताके यहाँ रजस्वला हो जाती है, उसकी भी वृषली संज्ञा होती है।
२. सम्पूर्ण दिन १५ मुहूर्तका होता है। उसमें आठवाँ मुहूर्त मध्याह्नके बाद आता है। वही पितरोंके श्राद्धके
लिये उत्तम माना गया है, उसीका नाम 'कुतप' है।
परतिथिको। यदि पहले दिन क्षयातिथि चार घड़ी हो और दूसरे दिन पह सार्षकालातक प्यास हो तो श्राद्धके लिये दूसरे दिनवाली तिथि ही उत्तम मानी गयी है। द्विजोत्तम! निमन्त्रित ब्राह्मणोंक एकत्र होनेपर प्रायश्चित्तसे शुद्ध हृदयवाला श्राद्धकर्ता पुरुष उनसे श्राद्धके लिये आज्ञा ले। ब्राह्मणोंसे श्राद्धके लिये आज्ञा मिल जानेपर श्राद्धकर्ता पुरुष फिर उनमेंसे दोको विश्वेदेव श्राद्धके लिये और तीनको विधिपूर्वक पितृश्राद्धके लिये निमन्त्रित करे। अथवा देवश्राद्ध तथा पितृश्राद्धके लिये एक-एक ब्राह्मणको ही निमन्त्रित करे। श्राद्धके लिये आज्ञा लेकर एक-एक मण्डल बनावे। ब्राह्मणके लिये चौकोर, क्षत्रियके लिये त्रिकोण तथा वैश्यके लिये गोल मण्डल बनाना आवश्यक समझना चाहिये और शूद्रको मण्डल न बनाकर केवल भूमिको सींच देना चाहिये। योग्य ब्राह्मों के अभावमें भाईको, पुत्रको अथवा अपने-आपको ही श्राद्धमें नियुक्त करे। परंतु वेदशास्त्रके ज्ञानसे रहित ब्राह्मणको श्राद्धमें नियुक्त न करे। ब्राहाणोंके पैर धोकर उन्हें आचमन करावे और नियत आसनपर बैठाकर भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए उनकी विधिपूर्वक पूजा करे। ब्राह्मणों के बीचमें तथा श्राद्धमण्डपके द्वारदेशमें श्रासकर्ता पुरुष 'अपहता असुरा रक्षासि वेदिषदः।' इस ऋचाका उच्चारण करते हुए तिल बिखेरे। जौ और कुर्शीद्वारा विश्वेदेवोंको आसन दे। हाथमें जौ और कुश लेकर कहे-'विश्वेषां देवानाम् इदम् आसनम्' ऐसा कहकर विश्वेदेवोंके बैठनेके लिये आसनरूपसे उस कुशाको रख दे और प्रार्थना करे-हे विश्वेदेवो! आपलोग इस देवश्राद्धमें अपना क्षण (समय) दें और प्रतीक्षा करें। अक्षय्योदक और आसन समर्पणके वाक्यमें विश्वेदेवों और पितरोंके लिये षष्ठी विभक्तिका प्रयोग करना चाहिये। आवाहन-वाक्यमें द्वितीया विभक्ति बतायी गयी है। अन्न समर्पणके वाक्यमें चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग होना चाहिये। शेष कार्य सम्बोधनपूर्वक करना चाहिये। कुशकी पवित्रीसे युक्त दो पात्र लेकर उनमें 'शं नो देवी' इत्यादि ऋचाका उच्चारण करके जल डाले। फिर 'यवोऽसि' इत्यादि मन्त्र बोलकर उसमें जव डाले। उसके बाद चुपचाप बिना मन्त्रके ही गन्ध और पुष्प छोड़ दे। इस प्रकार अर्घ्यपात्र तैयार हो जानेपर 'विश्वेदेवाः स' इत्यादि मन्त्रसे विश्वेदेवोंका आवाहन करे। तदनन्तर 'या दिव्या आप:' इत्यादि मन्त्रसे अर्ध्यको अभिमन्त्रित करके एकाग्रचित्त हो पितृ और मातामह-सम्बन्धी विश्वेदेवोंको संकल्पपूर्वक क्रमशः अर्घ्य दे। उसके बाद गन्ध, पत्र, पुष्प, यज्ञोपवीत, धूप, दीप आदिके द्वारा उन देवताओंका पूजन करे। तत्पश्चात् विश्वेदेवोंसे आज्ञा लेकर पितृगणोंका पूजन करे। उनके लिये सदा तिलयुक्त कुशोंवाला आसन मा चाहिये। उन्हें अर्घ्य देनेके लिये द्विज पूर्ववत् तीन पात्र रखे। 'शं नो देवी०' इत्यादि मन्त्रसे जल डालकर 'तिलोऽसि सोमदैवत्यो' इत्यादि मन्त्रसे तिल डाले। फिर 'उशन्तस्त्वा' इत्यादि मन्त्रद्वारा पितरोंका आवाहन करके ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो या दिव्या आपः इत्यादि मन्त्र से
अघ्र्य को अभिमन्त्रित करके पूर्वक संकल्पपूर्वक पितरोंको समर्पित करे (मर्म्यपात्रको ठलटकर पितरंकि वामपागमे रखाना चाहिये)। साधुतिरोमणे। तदनन्तर गन्ध, पत्र, पुष्प, धूप, दीप, वस्व और आभूषणसे अपनी शक्तिके अनुसार उन सबकी पूजा करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष घृतसहित अन्नका ग्रास ले 'अग्नी करिष्ये' (अग्रिमें होम करूँगा) ऐसा कहकर उन ब्राह्मणोंसे इसके लियेआज्ञा ले। मुने! 'करवै' अथवा 'करवाणि' (करूँ?) ऐसा कहकर श्राद्धकतकि पूछनेपर ब्राह्मण लोग 'कुरुष्व'"क्रियताम्' अथवा 'कुरु'(करो) ऐसा कहें। इसके बाद अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार उपासनाग्रिकी स्थापना करके उसमें पूर्वोक्त अन्नके ग्रासकी दो आहुतियाँ डाले। उस समय 'सोमाय पितृमते स्वधा नमः' ऐसा उच्चारण करे। फिर 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नमः' ऐसा उच्चारण करे। विद्वान् पुरुष अन्तमें स्वधाकी जगह स्वाहा लगाकर भी पितृयज्ञकी भाँति आहुति दे सकते हैं। इन्हीं दो आहुतियोंसे पितरोंको अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है। अग्निके अभावमें अर्थात् यजमानके अग्निहोत्री न होनेपर ब्राह्मणके हाथमें दानरूप होम करनेका विधान है * । ब्रह्मन्! जैसा आचार हो, उसके अनुसार ब्राह्मणके हाथ या अग्निमें उक्त होम करना चाहिये। पार्वण उपस्थित होनेपर अग्रिको दूर नहीं करना चाहिये। विप्रवर! यदि पार्वण उपस्थित होनेपर अपनी उपास्य अपि दूर हो तो पहले नूतन अग्निकी स्थापना करके उसमें होम आदि आवश्यक कार्य करनेके पक्षात् विद्वान् पुरुष उस अग्निका विसर्जन कर दे। यदि क्षयाए (निधनदिन) तिथि प्राप्त हो और उपासना दूर हो तो अपने अग्निहोत्री द्विज भाइयोंसे विधिपूर्वक श्राद्धकर्म सम्पन्न करावे। द्विजश्रेष्ठ श्राद्धकर्ता प्राचीनावीती होकर (जनेऊको दाहिने कंधेपर करके) अग्निमें होम करे और होमावशिष्ट अन्नको ब्राह्मणके पात्रोंमें भगवत्स्मरणपूर्वक डाले। फिर स्वादिष्ट भक्ष्य, भोज्य, लेह्य आदिके द्वारा ब्राह्मणोंका पूजन करे। तदनन्तर एकाग्रचित्त हो विश्वेदेव और पितर–दोनोंके लिये अन्न परोसे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करे-
आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः॥
ये यत्र विहिताः श्राद्धे सावधाना भवन्तु ते।
(नार पूर्व० २८ । ५७-५८)
'महान् बलवान् महाभाग विश्वेदेवगण यहाँ पधारें और जो जिस श्राद्धमें विहित हों वे उसके लिये सावधान रहें।'
इस प्रकार विश्वेदेवोंसे प्रार्थना करे। 'ये देवासः' इत्यादि मन्त्रसे भी उनकी अभ्यर्थना करनी चाहिये। देवपक्षके ब्राह्मणोंसे भी ऐसी ही प्रार्थना करे। उसके बाद 'ये चेह पितरो' इत्यादि मन्त्रसे पितरोंकी अभ्यर्थना करके निम्राङ्कित मन्त्रसे उनको नमस्कार करे-
अमूर्तानां च मूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्॥
नपस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां योगचक्षुषाम्।
(ना० पूर्व०२८। ५९-६०)
'जिनका तेज सब ओर प्रकाशित हो रहा है, जो ध्यानपराय तथा योगदृष्टि से सम्पन्न है, उन मूर्त पितरोंको तथा अमूर्त पितरोंको भी मैं सदा नमस्कार करता हूँ।'
*आजकल अपात्रक पार्वण आदि श्राद्धों में अग्नौकरण होम की दोनों आहुतियाँ मुकटस्थिल जल में डाली जाती है। परन्तु प्राचीन मत उपासनाग्रिमें ही हवन करने वाला है। आश्वलायनका वचन है। अग्रौकरणहोमं तु कुर्यादौपासनानले और अग्रिके अभाव में पितृस्वरुप ब्राह्माणों के हाथों हवन करने का विधान है जैसा कि आश्वलायनका वचन है। अर्थात् पितृपाणिणु अतः नादरपुराणका मूलोक वचन अन्य स्मृतिकारों के मत से भी मिलता-जुलता है।
पुरुष भगवान् नारायणका चिन्तन करते हुए दिये हुए हविष्य तथा श्राद्धकर्मको भगवान् विष्णुकी सेवामें समर्पित कर दे। इसके बाद वे सब ब्राह्मण मौन होकर भोजन प्रारम्भ करें। यदि कोई ब्राह्मण उस समय हँसता या बात करता है तो वह हविष्य राक्षसका भाग हो जाता है। पाक आदिकी प्रशंसा (या निन्दा) न करे। सर्वथा मौन रहे।भोजनपात्रको हाथसे स्पर्श किये हुए ही भोजन करे। यदि कोई श्राद्धमें नियुक्त हुआ ब्राह्मण पात्रको सर्वथा छोड़ देता है तो उसे श्राद्धहन्ता जानना चाहिये। वह नरकमें पड़ता है। भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंमेंसे कुछ लोग यदि एक-दूसरेका स्पर्श कर लें और अन्नका त्याग न करके उसे खालें तो उस स्पर्शजनित दोषका निवारण करनेके लिये उन्हें आठ सौ गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये। जब ब्राह्मणलोग भोजन करते हों उस समय श्राद्धकर्ता पुरुष श्रद्धापूर्वक कभी पराजित न होनेवाले अविनाशी भगवान् नारायणका स्मरण करे। रक्षोघ्नमन्त्र', वैष्णवसूक्त तथा विशेषत: पितृसम्बन्धी मन्त्रोंका पाठ करे। इसके सिवा पुरुषसूक्त, त्रिणाचिकेत', त्रिमधु, त्रिसुपर्ण', पवमानसूक्त तथा यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंका
जप करे। अन्यान्य पुण्यदायक प्रसंगोंका चिन्तन करे। इतिहास, पुराण तथा धर्मशास्त्रोंका भी पाठ करे। नारदजी! जबतक ब्राह्मणलोग भोजन करें, तबतक इन सबका जप या पाठ करना चाहिये। जब वे भोजन कर लें, उस समय परोसनेवाले पात्रमें बचा हुआ उच्छिष्टके समीप भूमिपर बिखेर दे। यह विकिरान्न कहलाता है।
उस समय 'मधुवाता ऋतायते' इत्यादि सूक्तका जप करे। नारदजी! इसके बाद श्राद्धकर्ता पुरुष स्वयं दोनों पैर धोकर भलीभाँति आचमन कर ले। फिर ब्राह्मणोंके आचमन कर लेनेपर पिण्डदान करे। स्वस्तिवाचन कराकर अक्षय्योदक दे (तर्पण करें)। उसे देकर एकाग्रचित्त होकर ब्राह्मणोंका अभिवादन करे। उलटे हुए अर्घ्यपात्रोंको सीधा करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे और उनसे स्वस्तिवाचनपूर्वक आशीर्वाद ले। जो द्विज अर्घ्यपात्रको हिलाये या सीधा किये बिना (दक्षिणा लेते और) स्वस्तिवाचन करते हैं, उनके पितर एक वर्षतक उच्छिष्ट भोजन करते हैं। स्मृति-कथित 'गोत्रं नो वर्धताम्''दातारो नोऽभिवर्धन्ताम्' इत्यादि वचन कहकर ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद ग्रहण करे। तदनन्तर उन्हें प्रणाम करे और उन्हें यथाशक्ति
1. 'ॐ अपहता असुरा रक्षासि वेदिषदः' इत्यादि।
2. 'इदं विष्णुर्विचक्रमे', 'विष्णोः कर्माणि पश्यत', 'विष्णोः क्रमोऽसि सपबहा', 'विष्णोर्नु के वीणि प्रवोचम्', 'विष्णो रराटमसि विष्णोः।
3. 'आयन्तु नः पितरः', 'उदीरतामवर', 'ये चेह पितरो', 'कर्जवहन्तीरमृत' इत्यादि।
4. 'सहस्रशीर्षाः पुरुषः' इत्यादि।
5. द्वितीय कठके अन्तर्गत अयं वाव यः पवते' इत्यादि तीन अनुवाक।
6. 'मधुवाता' इत्यादि तीन ऋचाएँ।
7. 'ब्रह्ममेतु माम्' इत्यादि तीन अनुवाक।
8. विकिरान उन पितरोंका भाग है जो आगमें जलकर मर गये हों अथवा
जिनका दाह-संस्कार न हुआ हो। पितृ-सम्बन्धी ब्राह्मणके आगे उनके जूठनके समीप दक्षिणाग्र कुश बिछाकर परोसनेकी थालीमें बचे अन्नको बिखेर देना चाहिये। फिर तिल और जल लेकर निम्नाङ्कित श्लोक पढ़ते हुए वह अन्न समर्पित करना चाहिये।
अग्निदग्धाच ये जीवा येऽष्यदग्धाः कुले मम।
भूमौ दत्तेन तोयेन तृप्ता यान्तु पर्य गतिम् ।।
(याज्ञ० आचार० २४१ वे श्लोककी मिताक्षरा टीका)
दक्षिणा, गन्ध एवं ताम्बूल अर्पित करे। उलटे हुए अर्घ्यपात्रको उत्तान करनेके बाद हाथमें लेकर 'स्वधा' का उच्चारण करे। फिर 'बाजे बाजे' इत्यादि ऋचाको पढ़कर पितरोंका, देवताओंका विसर्जन करे।
श्राद्ध-भोजन करनेवाला ब्राह्मण तथा श्राद्धकर्ता यजमान दोनों उस रातमें मैथुनका त्याग करें। उस दिन स्वाध्याय तथा रास्ता चलनेका कार्य यत्नपूर्वक छोड़ दें। जो कहीं जानेके लिये यात्रा कर रहा हो, जिसे कोई रोग हो तथा जो धनहीन हो, वह पुरुष पाक न बनाकर कच्चे अन्नसे श्राद्ध करे और जिसकी पत्नी रजस्वला होनेसे स्पर्श करने योग्य न हो, वह दक्षिणारूपसे सुवर्ण देकर श्राद्धकार्य सम्पन्न करे। यदि धनका अभाव हो और ब्राह्मण भी न मिलें तो बुद्धिमान् पुरुष केवल अत्रका पाक बनाकर पितृसूक्तके मन्त्रसे उसका होम करे। ब्रह्मन् ! यदि उसके पास अन्नमय हविष्यका अभाव हो तो यथाशक्ति घास ले आकर पितरोंकी तृसिके उद्देश्यसे गौओंको अर्पण करे। अथवा स्नान करके विधिपूर्वक तिल और जलसे पितरोंका तर्पण करे। अथवा विद्वान् पुरुष निर्जन वनमें चला जाय और मैं महापापी दरिद्र हूँ यह कहते हुए उच्चस्बरसे रुदन करे। मुनीश्वर । जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक ग्राम करते हैं, वे सम्पत्तिशाली होते हैं और उनकी संतानपरम्पराका नाश नहीं होता। जो श्राद्ध में पितरोंका पूजन करते हैं, उनके द्वारा साक्षात् भगवान् विष्णु पूजित होते हैं और जगदीश्वर भगवान् विष्णुके पूजित होनेपर सब देवता संतुष्ट हो जाते हैं। देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, सिद्ध और मनुष्यके रूपमें सनातम भगवान् विष्णु ही विराजमान हैं। उन्हींसे यह स्थावर-जंगमरूप जगत् उत्पन्न हुआ है। अत: दाता और भोक्ता सब भगवान् विष्णु ही हैं। भगवान् विष्णु सम्पूर्ण जगत् के आधार सर्वभूतस्वरूप तथा अविनाशी हैं। उनके स्वभावकी कहीं भी तुलना नहीं है, वे ही हव्य और कव्यके भोक्ता हैं। एकमात्र भगवान् जनार्दन ही परब्रह्म परमात्मा कहलाते हैं। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार तुमसे श्राद्धकी उत्तम विधिका वर्णन किया गया। इस विले श्राद्ध करनेवालोंका पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। जो श्रेष्ठ द्विज श्राद्धकालमें भक्तिपूर्वक इस प्रसंगका पाठ करता है, उसके पितर संतुष्ट होते हैं और संतति बढ़ती है।