छन्दःशास्त्रका संक्षिप्त परिचय

सनन्दनजी कहते है-नारद! छन्द दो प्रकारके बताये जाते है-वैदिक और लौकिक । मात्रा और वर्णके भेदसे वे लौकिक या वैदिक छन्द भी पुन: दो-दो प्रकारके हो जाते हैं (मात्रिका छन्द और वर्णिक छन्द) ॥१॥ छन्दःशास्त्रके विद्वानोंने मगण, यगण, रगण, सगण, तगण, जगण, भगण और नगण तथा गुरु एवं लघु-इन्हींको छन्दोंकी सिद्धिमें कारण बताया है ॥ २ ॥ जिसमें सभी अर्थात् तीनों अक्षर गुरु हों उसे मगण (SSS) कहा गया है। जिसका आदि अक्षर लघु (और शेष दो अक्षर गुरु) हो, वह यगण (SS) माना गया है। जिसका मध्यवर्ती अक्षर लघु हो, वह रगण (|S) और जिसका अन्तिम अक्षर गुरु हो, वह सगण (|S) है ।। ३ ।। जिसमें अन्तिम अक्षर लघु हो, वह तगण (SS|) कहा गया है, जहाँ मध्य गुरु हो, वह जगण (|S|) और जिसमें आदि गुरु हो, यह भगण (S॥) है। मुने! जिसमें तीनों अक्षर लघु हो, वह नगण (||)

१. शास्त्रकारोंने द्विजातियोंके लिये उहों अनौसहित सम्पूर्ण वेदोंके अध्ययनका आदेश दिया है। उन्हीं अङ्गों से छन्द भी एक अङ्ग है। इसे वेदका चरण माना गया है-'छन्दः पादौ तु वेदस्य।' (पा०शि० ४५) 'अनुष्टुभा यजति, वृहत्या गायति, गायत्र्या स्तौति।' (पिं० सूत्रवृत्ति अध्याय १) (अनुष्टुप्से यजन करे, बृहतो सन्दद्वारा गान करे, गायत्री छन्दसे स्तुति करे) इत्यादि विधियोंका श्रवण होनेसे छन्दका ज्ञान परम आवश्यक सिद्ध होता है। छन्द न जाननेसे प्रत्यवाय भी होता है। जैसा कि छन्दोग ब्राह्मणका वचन है-'यो अविदिताःयच्छन्दोदैवतविनियोगेन ब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स स्थाणुं यछति गत वा पद्यते प्रमीयते वा पापीयान् भवति यातयामान्यस्य छन्दांसि भवन्ति।' (पिं० सूत्रवृत्ति अध्याय १) ( जो ऋषि छन्द, देवता तथा विनियोगको जाने बिना ब्राह्मणमन्त्रसे यज्ञ कराता और शिष्यों को पढ़ाता है, वह दूंठे काठके समान हो जाता है, नरकमें गिरता है, वेदोक्त आयुका पूरा उपभोग न करके बीचमें ही मृत्युको प्राप्त होता है अथवा महान् चापका भागी होता है। उसके किये हुए समस्त वेदपाठ यातयाम (प्रभाव-शून्य व्यर्थ) हो जाते हैं); इसलिये छन्दका ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिये। इसीके लिये इस छन्दःशास्त्रका आरम्भ हुआ है।

२. वेदमन्त्रों में जो गायत्री, अनुष्प्, बृहतो और त्रिष्टुप् आदि छन्द प्रयुक्त हुए हैं, उनको वैदिक छन्द कहते हैं। यथा-

तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

-यह गायत्री छन्द है।

३. इतिहास, पुराण, काव्य आदिके पद्योंमें प्रयुक्त जो छन्द है, वे लौकिक कहे गये हैं। यथा- सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेक शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।।

-यह 'श्लोक अनुष्टप् छन्द है।

४. परिगणित मात्राओंसे पूर्ण होनेवाले छन्दोको 'मात्रिक' कहते हैं।

कहा गया है। तीन अक्षरोंके समुदायका नाम गण है॥४॥ आर्या आदि छन्दोंमें चार मात्रावाले पाँच गण कहे गये हैं, जो चार लघुवाले गणसे युक्त हैं। यदि लघु अक्षरसे परे संयोग, विसर्ग और अनुस्वार हो तो वह लघुकी दीर्घताका बोधक होता है । इस छन्दःशास्त्रमें 'ग' का अर्थ गुरु या दीर्घ माना गया है और 'ल' का अर्थ लघु समझा जाता है। पय या श्लोकके एक चौथाई भागको पाद कहते हैं। विच्छेद या विरामका नाम 'यति' है॥५-६॥ नारद! वृत्त (छन्द)-के तीन भेद माने गये है-सम वृत्त, अर्धसम वृत्त तथा विषम वृत्त। जिसके चारों चरणों में समान लक्षण लक्षित होता हो, वह सम वृत्त कहलाता है॥७॥ जिसके प्रथम और तीसरे चरणों में एवं दूसरे तथा चौथे चरणों में समान लक्षण हों, वह अर्धसम वृत्त है। जिसके चारों चरणों में एक-

यदि काष्यमें ऐसे छन्दको चुना गया, जो जगण आदि अनिष्टकारी गोंसे संयुक्त हो तो उसकी शान्ति के लिये प्रारम्भमें भगववाचक एवं देवतावाचक शब्दोंका प्रयोग करना चाहिये; जैसा कि भामहका वचन है- देवतावाचकाः शब्द ये च भद्रादिवाचकाः । ते सर्वे नैव निन्द्याः स्युलिपितो गणतोऽपि वा ॥ (पिङ्गलसूत्रकी हलायुध-वृत्तिसे उद्धृत) 'जो देवतावाचक और मालदिवाचक शब्द हैं, वे सब लिपिदोष या गणदोषसे भी निन्दित नहीं होते।' (उनके द्वारा उक्त दोषोंका निवारण हो जाता है।)

२. यथा- सर्वगुरु अन्त्यगुरु मध्यगुरु इन भेदोंके नाम क्रमशः इस प्रकार है-कर्ण, करतल, पयोधर, वसुचरण और विष्ट ।

३. जैसे-रामं रामः । रामस्य । यहाँ राम' शब्दके 'म' में हस्व अकार है, तथापि उसमें अनुस्वार और विसर्गका सम्बन्ध होनेसे वह दीर्घ ही माना जाता है। इसी प्रकार स्य' यह संयुक्त अक्षर परे होनेसे 'रामस्य' में मकारके परवर्ती अकारको दीर्घ समझा जाता है। पादके अन्त में जो लभु अक्षर हो, वह भी विकल्पसे 'गुरु' माना जाता है।

४. सम वृत्तका उदाहरण-

मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगले कजलकला ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता।

प्युतत्काशी शाटी वृधुकटितटे हाटकमयी भवामि त्वा गौरी नगपतिकिशोरोमविरतम् ॥

(इस शिखरिणी छन्दके चारों चरणोंमें एक समान हस्व-दीर्घवाले सत्रह सत्रह अक्षर है।)

५. अर्धसम वृत्तका उदाहरण-

त्रिभुवनकमनं तमालवर्ण रविकरगौरवराम्बरं दद्धाने । वपुरलककुलावृताननाज विजयसखे रतिरस्तु मेऽनवधा। यह युणिताना' छन्द है। इसके प्रथम और तृतीय चरण एक समान लक्षणवाले बारह बारह अक्षरके हैं। उनमें २

दूसरेसे भिन्न लक्षण लक्षित होते हों, वह विषम वृत्त है ॥ ८॥ एक अक्षरके पादसे आरम्भ करके एक-एक अक्षर बढ़ाते हुए जबतक छब्बीस अक्षरका पाद पूरा हो तबतक पृथक् पृथक् छन्द बनते हैं। छब्बीस अक्षरसे अधिकका चरण होनेपर चण्डवृष्टिप्रपात आदि दण्डक बनते हैं। तीन या छ: पादोंसे गाथा' होती है। अब क्रमश: एकसे छब्बीस अक्षरतकके पादवाले छन्दोंकी संज्ञा सुनो ॥९-१०॥ उक्ता, अत्युक्ता, मध्या, प्रतिष्ठा, सुप्रतिष्ठा, गायत्री, उष्णिक, अनुष्टप, बृहती, पति, त्रिष्टुप, जगती, अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्वरी, अष्टि, अत्यष्टिधृति, विधुति (या अतिधृति), कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अतिकृति या अभिकृति तथा उत्कृति ॥११-१३॥ ये छन्दोंकी

नगण, परगण और १ यगण हैं और द्वितीय तथा चतुर्थ चरणमें एक-से लक्षणवाले तेरह-तेरह अक्षर हैं। इनमें १ नगण,

२ जगण, १ रगण और १ गुरु है। अर्धसम वृत्तोंमें 'पुष्पिताग्रा' के अतिरिक्त हरिणप्लुता तथा वैतालीय या विषोगिनी आदि और भी अनेक छन्द होते हैं। चैतालीय अथवा वियोगिनीके प्रथम और तृतीय चरणों में २ सगण, १ जगण और १ गुरु होते हैं। द्वितीय और चतुर्थ चरणों में सगण, १ भगण, हरगण, १ लघु और १ गुरु होते हैं। पादान्तमें विराम होता है।

उदाहरण-

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि।

अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते. सुतम्॥

'हरिणप्लुता' (में विषम पादोंमें ३ सगण, १ लघु, १ गुरु होते हैं और सम पादोंमें १ नगण, २ भगण और १ रगण होते हैं।

इसके दूसरे, चौथे पाद हुतविलम्बितके ही समान हैं।)

उदाहरण-

स्कुटफेनच्या हरिणप्लुता बलिमनोजतटा तरणे: सुटा।

कलहसकुलारवशालिनी विहरतो हरति स्म हरेमनः ॥

१. विषम वृत्तका उदाहरण-

नलिनेक्षणं शशिमुखं च रुचिरदशन घनच्छविम्।

चारुचरणकमल कमलाशितमात्रज व्रजमहेन्द्रनन्दनम्॥

(-इस उद्रता' नामक छन्दमें चारों चरणों के भित्र-भित्र लक्षण हैं। इसके प्रथम पादमें साज, स, ल; २ में न.स.ज.ग;

३ में भ, न,र,लग और ४ में स, ज, स, ज, ग होते हैं)

२. छब्बीस अमरोंसे अधिकका एक एक चरण होनेपर जो छन्द बनता है उसे, 'दण्डक' कहते हैं। सत्ताईस अक्षरोंके

दण्डकका नाम 'चन्डवृष्टिप्रपात' है। इसमें दो 'नगण' और सात 'रण' होते हैं। पादान्तमें विराग होता है।

उदाहरण-

इह हि भवति दण्डकारण्यदेशे स्थिति: पुण्यभाजां मुनीनां मनोहारिणी

त्रिदशाविजयितीर्थदुप्पदशग्रीवलगीविरामेण रामेण संसेविते।

जनकयजनभूमिसम्भूतसीमन्तिनीसीमसीतापदार्शपूता बमे

भुवननमितापादपद्यानिश्चानाम्बिकातीर्थयात्रागजाने कामद्धाकुले

३.आचार्य पिकलके मतमें पिङ्गल सूत्रों में जिनके नामका उल्लेख नहीं हुआ है

उदाहरण-

SS

'अन्यस्त्रीभिः सहस्त्याज्यः।'

(३) तीन-तीन अक्षरोंके चार पादोंसे 'मध्या' नामक छन्द बनता है। प्रस्तारसे उसके भेदोंकी संख्या आठ होती है। इसके प्रथम भेदका, जिसमें तीनों अक्षर गुरु होते हैं, आचार्य पिङ्गलने 'नारी' नाम नियत किया है।

उदाहरण-

SSS

१-'सर्वासा नारीणाम् । भर्ता स्यादाराध्यः॥"

S|S

२-'प्राणतः प्रेयसी। राधिका श्रीपतेः।।'

यह दूसरा उदाहरण मध्याका तृतीय भेद है। इसे 'मगी' छन्द कहते हैं। इसबै प्रत्येक चरणमें एक-एक रगण होता है।

(४) चार-चार अक्षरोंके चार पादवाले छन्द-समूहका नाम 'प्रतिष्ठा' है। प्रस्ताइसके सोलह भेद होते हैं। इसके प्रथम

भेदका नाम 'कन्या' है। उदाहरण पदिये-

SSSS

भास्वत्कन्या सैका धन्या। यस्याः कूले कृष्णोऽखेलत् ॥

(५) पाँच-पाँच अक्षरके चार पादवाले छन्दसमुदायका नाम 'सुप्रतिष्ठा' है। प्रस्तारसे इसके बत्तीस भेद होते हैं। इनमें सातवाँ भेद 'पंक्ति' है, उसे यहाँ बतलाया जाता है। भगण तथा दो गुरु अक्षरोंसे पंक्ति छन्दकी सिद्धि होती है।

उदाहरण-

SI|SS

कृष्णसनाथा

तर्णकपंक्तिः। यामुनकच्छे चारु चचार॥

(६) जिसके चारों चरणोंमें छ-छ: अक्षर हों, उस उन्द-समूहका नाम गायत्री है। प्रस्तारसे इसके चौसठ भेद होते है। इसके प्रथम भेदका नाम विद्युल्लेखा, तेरह भेदका नाम तनुमध्या, स्रोलहवेंका नाम शशिवदना तथा उन्तीसर्वेका नाम वसुमती है। यहाँ केवल इन्हीं चरणोंका उल्लेख किया जाता है। दो मगण (555555) होनेसे विद्युल्लेखा, एक तगण (SS|)

और एक यगण (1SS) होनेसे तनुमध्या, एक नगण (I||) और एक यगण (1SS) होनेसे शशिवदना तथा एक तगण (SS|) और एक सगण (||S) होनेसे वसुमती नामक छन्द बनता है। उदाहरण क्रमशः इस प्रकार है-

'विद्युल्लेखा-

SSSSSS

गोगोपीगोपानां प्रेयांस प्राणेशम् ।

विद्युल्लेखावस्त्र वन्देऽहं गोविन्दम्॥

'तनुमध्या'-

SS ||SS

प्रीत्या प्रतिवेलं नानाविधखेलम्।

सेवे गततन्द्र वृन्दावनचन्द्रम् ॥

'शशिवदना'-

||||SS

परममुदारं

वसुमती-

SS|||S

भक्तर्तिकदनं संसिद्धिसदनम्।

नौमीन्दुवदनं गोविन्दमधुना।।

सात-सात अक्षरोंके चार पादवाले छन्दसमुदायको उष्णिक् कहा गया है, प्रस्तारसे इसके एक सौ अठ्ठाईस भेद होते हैं। इनमेंसे पचीसवाँ भेद मदलेखा और तीसवाँ भेद कुमारललिता के नामसे प्रसिद्ध है। मगण, सगण तथा एक गुरु-इन सात अक्षरोंसे मदलेखा तथा जगण, सगण और एक गुरुसे कुमारललिता छन्दकी सिद्धि होती है। प्रथमका उदाहरण यों है-

रङ्गे बाहुविरुग्णाद् दन्तीन्द्रान्मलेखा।

लग्राभून्मुरशत्रौ कस्तूरीरचर्चा।।

 (८) आठ अक्षरयाले चार पदोंसे यो छन्द बनते है, उनकी जातिवाचक संज्ञा अनुष्टुप्' है। प्रस्तारसे अनुहपके दो सौ छप्पन भेद होते है। इसके विद्युन्माला, माणवकाकीड, चित्रपदा, हंसरुत, प्रमाणिका या नगस्वरूपिणी, समानिका, श्लोक तमा वितान आदि मनेक भेद-प्रभेद है।रलोक-छन्दके प्रत्येक चरण छठा अक्षर गुरु और पाँचवा तयु होता है। प्रथम और तृतीय चरणोंमें सातवाँ अक्षर दीर्घ होता है तथा द्वितीय तथा चतुर्ष चरणों में वह हस्य हुआ करता है। शेष अक्षरोंका विशेष नियम- होनेसे इस श्लोक-सन्दके भी बहुत-से अवान्तर भेद हो जाते हैं। उपर्युक्त छन्दों में विद्युन्माला अनुष्टुप्का प्रथम भेद है। क्योंकि उसमें सभी अक्षर गुरु होते है। इसमें चार-चार अक्षरोंपर विराम होता है। प्रमाणिका या नगस्वरूपिणी छियासीवाँ भेद है। इसमें जगण, रगण र लघु तथा १ गुरु होते हैं। प्रमाणिका और समानिकाके सिवा अनुष्ठपके जितने भेद है, वे सब वितानके अन्तर्गत भाने जाते हैं। यहाँ विद्युन्माला, नगस्वरूपिणी, लोक (अनुष्ठप) तथा माणवकाक्रीडका एक-एक उदाहरण दिया जाता है-

'विद्युन्माला'-

S S S S S S S S

विद्युन्मालालोलान् भोगान् मुक्त्वा मुक्तौ यत्नं कुर्यात् । ध्यानोत्पन्नं निःसामान्यं सौख्यं भोक्तुं यद्याकाक्षेत् ॥

'नगस्वरूपिणी'-

शिवताण्डवस्तोत्र 'नगस्वरूपिणी' छन्दमें ही लिखा गया है। उसके एक-एक पद्यमें दो-दो नगस्वरूपिणी छन्द आ गये हैं। कुछ लोग उस संयुक्तछन्दको 'पझचामर' आदि नाम देते है। इसमें ज र ज. र ज. और १ गुरु होते हैं। उदाहरण यह है-

| S | S | S | S | S | S |

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमनिलिम्पनिर्झरीविलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि ।

धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥

'श्लोक'

यतः प्रवृत्तिभूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।

माणषकाक्रीडमें भगण, तगण, एक लघु और एक गुरु

जैसे-

S | | S S | | S

आदिगतं तुर्यगतं पञ्चमकं चान्त्यगतम्। स्याद् गुरु चेत् तत् कथितं माणवकाक्रीडमिदम्

(११) ग्यारा-ग्यारह अक्षरके चार चरणोंसे जिस छन्दसमुदायको सिद्धि होती है, उसका नाम त्रिष्टुप् है। प्रस्वास्सै इसके २०४८ भेद होते है। त्रिष्टुप्के ही अनेक अवान्तर भेद इनाक्या, उपेनवा, उपजाति, दोधक, शालिनी, रघोडता और स्वागता आदि नामोंसे प्रसिम है। ये त्रिष्टुप्के किस संख्या वाले भेद है ? इसका जान मूलोक रीतिसे कर लेना चाहिये। यहाँ उक्त सात छन्दोंके लक्षण और उदाहरण क्रमशः प्रस्तुत किये जाते हैं, क्योंकि प्राचीन और अर्वाचीन ग्रन्थों में इनके प्रयोग अधिक मिलते हैं।

(1) इन्द्रवना छन्द'-(में २ वगण, १ जगण और २ गुरु होते है-)

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।

हुन्दैषिमुक्ताः सुखदुःखसर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥

(२) 'उपेन्द्रवा'- (में १ जगण, १ तगण, १ जगण और दो गुरु होते है।) इन्द्रवज्राके प्रत्येक चरणका पहला अक्षर

हस्व हो जाय तो उपेन्द्रवज्रा- ।-सद बन जाता है।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्व मम

(३) इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा-दोनोंके मेलसे जो छन्द बनता है, उसका नाम 'उपजाति' है। उपजातिमें कोई चरण या पाद इन्द्रवडाका होता है, तो कोई उपेन्द्रवजाका । प्रस्तारवश उपजातिके चौदह भेद होते हैं। उन भेदोंके नाम इस प्रकार है-कीर्ति, वाणी, माला, शाला, हंसी, माया, जाया, बाला, आा, भद्रा, प्रेमा, रामा, ऋद्धि तथा बुद्धि। इनका स्वरूप निम्राङ्कित चक्रमें देखिये-

माला पूर्वोक्त चक्रके अनुसार यह 'उपजाति' का बुद्धि नामक भेद है। इसीको विपरीतपूर्वा और आख्यानकी भी कहते हैं।

सत्तामान्नं निर्षिशेष निहिं स त्वं साक्षाद् विष्णुरम्पारमदीपः ।

'रघोद्धता'-(-में रसण, नाम, रगण, एक लघु और एक गुरु होते है-)

उदाहरण-

SS । । । SSS

रामनाम जपता कुतो भयं सर्वतापशमनकभेषजम्।

पश्य तात मम गात्रसनिधी पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना ॥

'स्वागता'-(-में रगण, नगण, भगण, दो गुरु होते है-)

उदाहरण-

SS । । । S । । S S

कुन्ददामकृतकौतुकवेषो गोपगोधनवृतो यमुनायाम्।

नन्दसूनुरनपे तव वरसो नर्मदः प्रणयिनां विजहार ।

इनके सिवा सुमुखी, वातोर्मी, श्रीभ्रमर-विलसित, यन्ता, भद्रिका, श्येनिका, मौक्तिकमाला तथा उपस्थिता आदि और भी अनेक छन्द हैं। इनके लक्षण, उदाहरण अन्यत्र देखने चाहिये।

(१२) जिसके चारों चरण बारह-बारह अक्षरोंसे बनते हैं, उस छन्दसमुदायका नाम 'जगती' है। प्रस्तारसे इसके ४०९६ भेद होते हैं। इसके भेदोंमेंसे केवल वंशस्थ, इन्द्रवंशा, हुतविलम्बित, तोटक, भुजङ्गप्रयात, सग्विणी, प्रमिताक्षरा और वैश्वदेवी छन्दोंके ही लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं-

'वंशस्थ'-(-में जगण, तगण, जगण तथा रगण-ये चार गण होते हैं। पादके अन्तमें यति है।)

उदाहरण-

S S S S ISIS

सशङ्खचक्र सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसील्हेक्षणम्।

सहारवक्षःस्थलकौस्तुभत्रियं नमामि विष्णु शिरसा चतुर्भुजम् ॥

'इन्द्रवंशा'-(-में तगण, तगण, जगण तथा रगण प्रयुक्त होते हैं तथा पादान्तमें यति या विराम है। वंशस्थके प्रत्येक चरणका पहला अक्षर गुरु कर दिया जाय तो वह इन्द्रवंशा उन्द हो जाता है।)

उदाहरण-

S SS S । । SSS

यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं यद्वन्दनं यच्छ्वणं यदहणम्।

लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ॥

वंशस्थ और इन्द्रवंशाके चरणोंके मेंलसे भी चौदह प्रकारको 'उपजाति' बनती है। पूर्व चक्रमें 'उ' के स्थानमें 'व' लिख दिया जाय तो वह इन्द्रवंशा तथा वंशस्थकी उपजातिका प्रस्तार-चक्र हो जायगा। इन चौदह उपजातियोंके नाम इस प्रकार है-

वैरासिकी, २- रताख्यानकी इन्दुमा पुष्टिदा उपमेया अथवा रामणीयक सौरभेयी शीलातुरा वासन्तिका मन्दहासा शिशिरा वैधात्री शङ्गुचूडा रमणा तथा कुमारी। इन सबके उदाहरण ग्रन्थान्तरोंमे उपलब्ध होते हैं। यहाँ प्रथम उपजातिका एक उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें प्रथम चरण वंशस्थका और शेष तीन चरण इन्द्रवंशाके हैं।

SS S । । SSS

किरातहूणान्ध्रलिन्दपुल्कसा आभीरकङ्का यवनाः खसादयः।

येने च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः शुद्ध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः।।

द्रूतविलम्बित-(-में नगण, भगण, भगण, रगण-ये चार गण होते है। पादान्तमें यति होती है।)

उदाहरण-

।।। S।। S।। S                    । S

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्यटुता युधि विक्रमः।

यशसि चाभिरुचिष्यसन खुधी प्रकृतिसिसमिदं हि महात्मनाम्।

"तोटकवृत्त'-(में चार सगण होते हैं और पापातमें विराग हुआ करता है-)

उदाहरण-

। । S । । S । । S     । । S             

अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् ।

इदयं मधुरं गमनं मधुर मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥

'भुजङ्गप्रयात'-(-में चार यगण और पादान्त विराम होते हैं-)

उदाहरण-

S SS SS SS S

अयं त्वत्कथामृष्टपीयूषना मनोवारण: क्लेशदावाप्रिदग्धः ।

तृषार्तोऽवगाढो न सस्मार दाव न निष्कामति ब्रह्मसम्पत्रकरः ॥

'स्रग्विणी'-(में चार रगण तथा पादान्तमें विराम होते हैं-)

उदाहरण-

SS SS S ।       S S     । S

स्वागतं ते प्रसोदेश तुभ्यं नमः श्रीनिवास श्रिया कान्तया त्राहि नः।

स्वामृतेऽधीश ना मख: शोभते शीर्षहीन: कबन्धो यथा पूरुषः ॥

'प्रमिताक्षरा-(-में सगण, जगण, सगण, सगण तथा पादान्तमें विराम होते हैं-)

उदाहरण-

परिशुद्धवाक्यरचनातिशय परिषिशती प्रवणयोरमतम् ।

प्रमिताक्षरापि विपुलार्थवती कविभारती हरति मे हृदयम्॥

'वैश्वदेवी'-(में २ मंगण और २ यगण होते हैं तथा पाँचवें, सातवे अक्षरोंपर विराम होता है-)

उदहारण-

S S S S S S

अर्चामन्येषां त्वं विहायामराणामद्वैतेनैकं विष्णुमभ्यर्च भक्त्या।

तत्राशेषात्मन्यचिंते भाविनी ते भ्रातः सम्पत्राऽऽराधना वैश्वदेवी॥

उपयुक्त छन्दोंके अतिरिक्त बृहतोके अन्य भेद पुट, जलोढतगति, नत, कुसुमविचित्रा, चशलाक्षिका, कान्तोत्पीडा, वाहिनी, नवमालिनी, चन्द्रवर्म, प्रमुदितवदना, प्रियंवदा, मणिमाला, ललिता, मोहितोचला, जलधरमाला, प्रभा, मालती तथा अभिनव तामरस आदिके भी लक्षण और उदाहरण ग्रन्थान्तरों में मिलते हैं।

(१३) तेरह-तेरह अक्षरोंके चार पादोंसे सम्पन्न होनेवाले छन्द-समूहका नाम अतिजगती' है। प्रस्तारसे इसके ११९२ भेद होते हैं। अतिजगतीके भेदोंमें ही एक 'प्रहर्षिणी' नामक भेद है। इसके प्रत्येक पादमें मगण, नगण, जगण, रगण तथ गुरु होते हैं। तीन तथा दस अक्षरोंपर यति होती है।

उदाहरण-

जागर्ति प्रसभविपाकसंविधात्री श्रीविष्णोर्ललितकपोलजा नदी चेत्।

संकीर्ण यदि भवितास्ति को विषादः संवादः सकलजगत्पितामहेन।।

इसके सिवा क्षमा, अतिरुचिरा, मत्तमयूर, गौरी, मञ्जुभाषिणी और चन्दिका आदि भेद भी ग्रन्थान्तरोंमें वर्णित है। उनके उदाहरण वहीं देखने चाहिये।

चौदह-चौदह अक्षरोंके चार पादोंवाले छन्दसमुदायको शक्वरी कहते है। प्रस्तारसे इसके भेद होते हैं। इसके भेदों में वसन्ततिलका नामक छन्द यहाँ बतलाया जाता है। इसमें तगण, भगण, जगण और गुरु होते हैं। पादान्तमें विराम होता है। वसन्ततिलकाको ही कुछ विद्वान् सिंहोन्नता और उद्धर्षिणी भी कहते हैं।

उदाहरण-

S SISIS ।। S S S

या दोहनेश्वहनने मथनोपलेपप्रेड्खेखनाभरुदितोक्षणमार्जनादौ।

गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥

इसके सिवा असेबाधा, अपराजिता तथा प्रहरणकलिता आदि और भी अनेक भेद हैं। उनमेसे प्रहरणकलिताका उदाहत्व यहाँ दिया जाता है, प्रहरणकलितामें २ नगण, १ भगण, १ नगण, १ लघु १ गुरु होते हैं। सात-सात अक्षरोंपर विराम होता है।

यथा-

।। ।। ।।S।।।।।।। S

सुरमुनिमनुजैरुपचितचरणां रिपुभयचकितत्रिभुवनशरणाम्।

प्रणमत महिषासुरवधकुपिता प्रहरणकलितां पशुपतिदयिताम् ।

(१५) पंद्रह-पंद्रह अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दोंका नाम 'अतिशक्वरी' है। प्रस्तारसे इसके ३२७६८ भेद होते हैं। इन भेदोंमें चन्द्रावर्ता और मालिनी-ये दो ही यहाँ बताये जाते हैं। ४ नगण और १ सगणसे 'चन्द्रावर्ता छन्द बनता है। इसमें सात और आठ अक्षरोंपर विराम है। यदि छ: और नौ अक्षरोंपर विराम हो तो इसका नाम 'माला' होता है। इसी तरह आठ

और सात अक्षरोंपर विराम होनेसे उसकी 'मणिनिकर' संज्ञा होती है। चन्द्रावर्ताका उदाहरण इस प्रकार है-

।।।।।।।।।।।।।। S

पटुजवपवनचलितजललहरीतरलितविहगनिचयरवमुखरम्

विकसितकमलसुरभिशुचिसलिलं प्रविशति हरिरिह शरदि शुभसरः ।।

'मालिनी'-(-में २ नगण, १ मगण और २ भगण होते हैं। इसमें सात और आठ अक्षरोंपर विराम होता है-)

उदाहरण-

।।।।। ISISIS ।। S S

असितगिरिसमं स्यात् कजलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाणा लेखनी पत्रमुवी।

लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामोश पारं न याति ॥

(१६) सोलह-सोलह अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्द समुदायका नाम 'अष्टि' है। प्रस्तारसे इसके भेदोंकी संख्या ६५५३६ होती है। इसके भेदोंमें दोके लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं। एकका नाम है ऋषभगजविलासित और दूसरेका नाम है वाणिनी । अधभगजविलसितमें भगण, रगण, तीन नगण तथा एक गुरु होते हैं। सात, नौ अक्षरोंपर विराम होता है।

'वत्तपत्रपतित' में मान गए मगच भाव, काम एक लघु एक गुरु होते है।यस-सात अक्षरोपर विराम होस )

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अद्य कुरुष कर्म सकतं पदि परदिवसे मित्र विषेषमस्ति भवतः किमु चिरमसि तत्।

जीचितमल्पकालकलनालघुतरतरल नश्यति वेशपत्रपतित हिमसलिलपिव।

'मन्दाक्रान्ता' (में मगन भगए पापा, पण तगण और दो गुरु होते है।४, ६, ७ अक्षरोपर विराम होता है। (इसके प्रत्येक कणके अन्तिम सात अक्षर कम कर देनेपर 'हसी' छन्द बन जाता है।)

उदाहरण-

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वहांपीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकार विभ्रासः कनककपिशं वैजयन्ती च मालाम्।

रन्ध्रान् वेणारघरसुषया पूरयन गोपयन्दैन्दरमे स्वपदरमण प्राविशद्रीतकीर्तिः॥

'शिखरिणी' (-में गए मगण, सगण, नगण, भगण, एक लघु, एक गुरु होते है तथा ६.११ अक्षरोंपर विराम होता है।)

उदाहरण-

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महिम्रः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिब्रह्मादीनामपि तदवसन्त्रास्त्वयि गिरः।

अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ।।

(१८) अठारह-अठारह अक्षरोंके चार चरणोंसे बननेवाले नन्द-समूहको संज्ञा 'धृति' कही गयी है। प्रस्तारसे इसके २१॥ भेद होते हैं। उनमें से एक ही भेद 'कुसुमितलतावेल्लिता' नामक छन्दका लक्षण और उदाहरण दिया जाता है। इसमें भगण गण गण और तीन भगण होते हैं। ५, ६, ७ अक्षरोंपर विराम होता है।

उदाहरण-

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धन्यानामेताः कुसुमिततावेस्तितोत्फुल्लवृक्षाः सोत्कण्ठे कुजत्परभूतकलासापकोलाहतिन्यः ।

मध्वादौ माद्यन्मधुकरकलोगोतङ्कारम्या ग्रामान्त:स्रोतः परिसरभुवः प्रोतिमुत्पादयन्ति ।

(१९) उन्नीस-उन्नीस अक्षरोंके चार चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्द-समुदायको विति' या 'अतिति' कहते हैं। प्रस्तारसे इल्के ५२४२४८ भेद होते हैं। इनमेंसे एक भेद 'शार्दूलविक्रीडित' नामसे प्रसिस है, जिसमें मगण, सगण, जगण, सगण, दो तगण और एक गुरु होते हैं तथा भारह और सात अक्षरोंपर विराम होता है।

उदाहरण-

यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुवन्ति दिव्यैः स्तवैर्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः।

ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनी यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः।।

(20) बीस-बीस अक्षरों के चार पादोंसे निष्पन्न होनेवाला छन्दसमूहका नाम कृति है। प्रस्तारसे इसके भेद होते हैं। उनमेंसे के लक्षण और उदाहरण यहाँ बतलाये जाते है। पहलेका सुवदना और दूसरेका नाम वृत्त है। सुवदनामें मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, भगण, लघु और गुरु होते है। अक्षरों पर विराम होता है।

उदाहरण-

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या पीनोद्गाढतुङ्गस्तनजघनघनाभोगालसगतिर्यस्याः कर्णावतंसोत्पलरुचिजयिनी दीर्घे च नयने।

श्यामा सीमन्तिनीनां तिलकमिव मुखे या च त्रिभुवने प्रत्यक्षं पार्वती मे भवतु भगवती स्रेहात्सुवदना।।

वृत्त(में एक गुरु एक लघुके क्रमसे अक्षर होते हैं। पादान्तमें विराम होता है।)

उदाहरण-

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जन्तुमात्रदुः खकारि कर्म निर्मितं भवत्यनर्थहेतु तेन सर्वमात्मतुल्यमीक्षमाण उत्तमं सुखं लभस्व।

विद्धि बुद्धिपूर्वकं ममोपदेशवाक्यमेतदादरेण वृत्तमेतदुत्तमं महाकुलप्रसूतजन्मनां हिताय।।

(21) इक्कीस-इक्कीस अक्षरोंके चार पादोंमें पूर्ण होनेवाले छन्दोंकी जातिवाचक संज्ञा प्रकृति है। प्रस्तारसे इसके भेद होते हैं। इनमें से एक भेद स्नग्धरा के नामसे प्रसिद्ध है। इसमें मगण, रगण, भगण, और तीन यगण होते हैं। सात-सात अक्षरोंपर विराम होता है।

उदाहरण-

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ब्रह्माण्ड खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती स्वीकादापतन्ती कनकगिरिगुहागण्डरौलात्स्खलन्ती।

क्षोणीपृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूर्निभरं भतर्सयन्ती पाथोधि पबन्ती सुरनगरसरित्पावनी नः पुनातु ॥

(२२) बाईस-बाईस अक्षरोंके चार पादोंसे परिपूर्ण होनेवाले छन्दोंका नाम 'आकृति' है। प्रस्तारसे इसकी भेद-संख्या ४१९४३०४ होती है। इसके एक प्रेद 'भद्रक का उदाहरण यहाँ दिया जाता है। भद्रकके प्रत्येक पादमें भगण, रगण, नगम, रमण, नगण, रगण, नगण, एक गुरु होते हैं। दस, बारह अक्षरोंपर विराम होता है।

उदाहरण-

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भद्रकगीतिभिः सकृदपि स्तुवन्ति भव ये भवन्तमभयं भक्तिभरायनप्रशिरसः प्रणम्य तवं पादयोः सुकृतिनः ।

ते परमेश्वरस्य पदवीमवाप्य सुखमाप्नुवन्ति विपुलं मर्त्यभुवं स्पृशन्ति न पुनर्मनोहरसुरावलीपरिवृताः॥

(२३) तेईस-तेईस अक्षरोंके चार-चरणोंसे सिद्ध होनेवाले छन्दसमुदायको 'विकृति' कहते हैं। प्रस्तारसे इसके८३८८६०८ भेद होते हैं। इनमें 'अश्वललित' और 'मत्ताकोडा' नामक दो छन्दोंके उदाहरण यहाँ दिये जाते हैं। प्रत्येक पादमें नगण, जगण, भगण, जगण, भगण, जगण, भगण, १ लघु १ गुरु होनेसे 'अश्वललित' छन्द होता है।

उदाहरण-

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पवनविधूतवीचिचपलं विलोकयति जीवितं तनुभृतां वपुरपि हीयमानमनिशं जरावनितया वशीकृतमिदम्।

सपदि निपीडनव्यतिकरं यमादिव नराधिपानरपशुः परवनितामवेक्ष्य कुरुते तथापि हतलुखिरवललितम्॥

'मत्ताक्रीडा' (में २ मगण, १ तगण, ४ नगण, १ ला १ गुरु होते हैं। आठ और पंद्रह अक्षरोंपर विराम होता है।)

उदाहरण-

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वन्दे देवं श्रीगोविन्दं प्रणयपरवशमतिकरुणहदयं मात्रा वई दाम्रा साम्ना स्तुतमपि सुतमिव निजमिह सभयम्।

हन्तुं याऽऽगात्तस्यै मातुर्व्यतरदतुलनिजगतिमतिविमलां गा गोपोर्गोपान् योऽगोपायदिह विधृतगिरिरुपचित।।

(24) चौबीस-चौबीस अक्षरोंके चार चरणोंसे जो छन्द बनते हैं, उनका नाम संस्कृति है। प्रस्तारसे इसके भेद होते हैं। इनमें तन्वी नामक छन्दका उदाहरण दिया जाता है। उसमें भगण, तगण, नगण, सगण, भगण, यगण, होते हैं। अक्षरोंपर विराम होता है।

नाथ तवाहं तव पदकमलं सेवितुमेव मनसि मम कामो नाम सुधासोदरमतिमधुरं में रमना रसयतु नितरां वै।

प्रेमिजना ये प्रभुगुणरसिकास्तेषु सदैव भवतु मम वासो देव दयां दर्शय वस ह्रदये त्वां न विनेह जगति मम बन्धुः।।

(25) पच्चीस-पच्चसी अक्षरोंके चार पादोंसे सम्पन्न होनेवाले छन्दोंको अतिकृति या अभिकृति कहते हैं। प्रस्तारसे इनके भेद होते हैं। इनमेंसे एक भेदका नाम क्रौश्चपदा है। उसके प्रत्येक चरणमें भगण, मगण, सगण, भगण नगण, तथा गुरु होते हैं। अक्षरोंपर विराम होता है।

उदाहरण-

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माधव भक्तिं देह्मविभक्तिं तव चरणयुगलशरणमुपगतः संहर पापं दर्शिततापं निजगुणगणतिमुमनय नितराम्।

मोहन रुपं रम्यमनूपं प्रकटय शमय विषयविषमनिशं वादय वंशी मानसदंशी तिमिनभह्रदयविहितवरवडिशाम्।।

(26)छब्बीस-छब्बीस अक्षरोंके चार चरणोंसे जो छन्द बनते है, उनकी जातिवाचक संज्ञा उत्कृति है। प्रस्तारसे इसके भेद होते है। इनमें से दो भेद बताये जाते है।एकाक नाम भुजङ्गविजृम्भित और दूसरेका अपवाह है। भुजङ्गविजृम्भित-(में 2 मगण, 1तगण, 3नगण, 1रगण, 1लघु, 1 गुरु होते हैं। अक्षरोंपर विराम होता है।)

संज्ञाएँ हैं, प्रस्तारसे इनके अनेक भेद होते हैं। सम्पूर्ण गुरु अक्षरवाले पादमें प्रथम गुरुके नीचे लघु लिखना चाहिये, फिर दाहिनी ओरकी पक्तिको ऊपरकी पतितके समान भर दे। तात्पर्य यह कि शेष स्थानों में ऊपरके अनुसार गुरु लघु आदि भरे। इस क्रियाको बराबर करता जाय। इसे करते हुए ऊनस्थान अर्थात् बायीं ओरके शेष स्थानमें गुरु ही लिखे। यह किया तबतक करता रहे, जबतक कि सभी लघु अक्षरों की प्राप्ति न हो जाय। इसे 'प्रस्तार' कहा गया है ॥१४-१५।। (प्रस्तार नष्ट हो जानेपर यदि उसके किसी भेदका स्वरूप जानना हो तो उसे जाननेकी विधिको 'नष्ट प्रत्यय' कहते हैं।) यदि नष्ट अङ्क सम है तो उसके लिये एक लघु लिखे और उसका आधा भी यदि सम गुरुके नीचे आधा भी यदि सम हो तो उसके लिये पुनः एक लघु लिखे। यदि नष्ट अङ्क विषम हो तो उसके तात्पर्य यह कि लिये एक गुरु लिखे और उसमें एक जोड़कर गुरु-लघु आदि आधा करे। वह आधा भी यदि विषम हो तो उसके लिये भी गुरु ही लिखे यह क्रिया तबतक करता रहे, जबतक अभीष्ट अक्षरोंका पाद प्राप्त न हो जाय। (प्रस्तारके किसी भेदका स्वरूप तो

उसके जानने की विधिको उद्दिष्ट कहते हैं।) उद्दिष्ट में गुरु-लघु बोधक जो चिन्ह हों, उनमें पहले अक्षरपर एक लिखे और क्रमशः दूसरे अक्षरों पर दूने अङ्क लिखता जाय फिर लघु के ऊपर जो अङ्क हों नरोंकी प्राप्ति न हो ज्ञात हो; किंतु संख्या ज्ञात न हो तो उसके

उदाहरण-

हेलोदञ्चन्नयञ्रत्यादप्रकटविकटनटभरो रणत्करतालकः चारुप्रेङ्खच्चूडाबर्हः श्रुतितरलनवकिसलयस्तरङ्गितहारधृत्।

त्रस्यत्रागस्त्रीभिर्भक्त्या मुकुलितकरकमलयुगं कृतस्तुतिरज्युतः पायाद् वश्छिन्दन् कालिन्दीहदकृतनिजवसतिबृहद् भुजङ्गविजृम्भितम्।।

श्रीकण्ठं त्रिपुरदहनममृतकिरणशकललितशिरसं रुद्रं भूतेशं हतमुनिमखमखिलभुवनमितचरणयुगमीशानम्।

सर्वज्ञः वृभभगमनमहिपतिकृतवलयरुचिकरमाराध्यं तं वन्दे भवभयभिदमभिमतफलवितरणगुरुमुमया युक्तम्।।

करकमलयुगं कुतस्तुतिरच्युतः पायाद्वश्छिन्दन् कालिन्दीहदकृतनिजवसतिवृहद् जाविम्भितम् ।।

उदमैं ९ माण, 5 नगण, १ सगण, २ गुरु होते हैं। ९,६,६,५ अक्षरोपर विराम होता है।)

उन्हें जोड़कर उसमें एक और मिला दे तथा वही उदिष्ट स्वरूपकी संख्या बतावे। ऐसा पुराणवेत्ता विद्वानोंका कथन है। (अमुक छन्दके प्रस्तारमें एक गुरुवाले या एक लघुवाले, दो लघुवाले या दो गुरुवाले, तीन लघुवाले या तीन गुरुवाले भेद कितने हो सकते हैं। यह पृथक्-पृथक् जाननेकी जो प्रक्रिया है, उसे 'एकद्रयादिलगक्रिया' कहते हैं।) छन्दके अक्षरोंकी जो संख्या हो, उसमें एक अधिक जोड़कर उतने ही एकाङ्क ऊपर-नीचेके क्रमसे लिखे। उन एकाडोंको ऊपरकी अन्य पइक्ति, जोड़ दे; किंतु अन्त्यके समीपवर्ती अङ्कको न जोड़े और ऊपरके एक-एक अङ्कको त्याग दे। ऊपरके सर्व गुरुवाले पहले भेदसे नीचेतक गिने। इस रीतिसे प्रथम भेद सर्वगुरु, दूसरा भेद एक गुरु और तीसरा भेद द्विगुरु होता है। इसी तरह नीचेसे ऊपरकी ओर ध्यान देनेसे सबसे नीचेका सर्वलघु, उसके ऊपरका एक लघु, तीसरा भेद द्विलघु इत्यादि होता है। इस प्रकार 'एकट्यादिलगक्रिया' जाननी चाहिये। लगक्रियाके अङ्कोंको जोड़ देनेसे उस छन्दके प्रस्तारकी पूरी संख्या ज्ञात हो जाती है। यही संख्यान प्रत्यय कहलाता है, अथवा उद्दिष्ट पर दिये हुए अङ्कोंको जोड़कर उसमें एकका योग कर दिया जाय तो वह भी प्रस्तारकी पूरी संख्याको प्रकट कर देता है। छन्दके प्रस्तारको अङ्कित करनेके लिये जो स्थानको नियमन किया जाता है, उसे अध्वयोग प्रत्यय कहते हैं। प्रस्तारकी जो संख्या है, उसे दुना करके एक घटा देनेसे जो अङ्क आता है, उतने ही अंगुलका उसके प्रस्तारके लिये अध्या या स्थान कहा गया है ।। १६२० ॥ मुने! यह छन्दोंका किंचित् लक्षण बताया गया है। प्रस्ताद्वारा प्रतिपादित होनेवाले उनके भेद प्रभेदोंकी संख्या अनन्त है ॥ २१॥

(पूर्वभाग द्वितीय पाद अध्याय ५७)

१-जैसे कोई पूछे कि चार अक्षरके पादवाले छन्दमें जहाँ प्रथम तीन गुरु और अन्तमें एक लघु हो तो उसकी संख्या क्या है अर्थात् वह उस छन्दका कौन-सा भेद है? इसको जानने के लिये पहले उदिष्टके गुरु-लघुको निम्राङ्कित रीतिसे अङ्कित करके

उनके ऊपर क्रमशः द्विगुण अङ्क स्थापित करे-

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तत्पशात् केवल लधुके अङ्क ८ में एक और जोड़ दिया गया तो ९ हुआ। यही उदिटको संख्या है। अर्थात् वह उस छन्दका नवाँ भेद है।

 २.निमाङ्कित कोष्ठकसे यह बात स्पष्ट हो जाती है- अर्थात् चार अक्षरवाले उन्दके प्रस्तारमें : लभुषाला १भेद, एक गुरु तीन लघुनाला ४ भेद, २ गुरु और दो लघुवाला भेद, लोन गुरु और १ लघुवाला ४ भेद और चार गुरुवाला १भेद होगा।

३.यथा-चार अक्षरके प्रस्तारमें लगक्रियाके अङ्क १-४-६+४.१ होते हैं, इनका योग सोलह होता है। अत: चार अक्षरके यादवाले छन्दके सोलह भेद होंगे अथवा उद्दिष्टके अकू है१.२-४.८ इसका योग हुआ १५. इनमें एकका योग करनेसे प्रस्तार संख्या १ ६ प्रकट हो जाती है।