नारद महा पुराण
कुरुक्षेत्र-माहात्म्य
मोहिनी बोली- पुरोहितजी! आप बड़े कृपालु और धर्मज्ञ हैं। आपको बहुत-से विषयोंका ज्ञान है। आपने मुझे तीर्थराज प्रयागका माहात्म्य बताया है। समस्त मुख्य तीर्थोंमें जो शुभकारक कुरुक्षेत्र है, वह सम्पूर्ण लोकोंमें परम पवित्र है, अतः आप उसीका मुझसे वर्णन कीजिये।
पुरोहित वसुने कहा- मोहिनी! सुनो; मैं उत्तम पुण्य देनेवाले कुरुक्षेत्रका वर्णन करता हूँ, जहाँ जाकर स्नान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुरुक्षेत्रों मुनीश्वरोंद्वारा सेवित अनेक तीथं हैं। उन सबका मैं तुम्हें परिचय देता हूँ। वे श्रोताओंको भी मोक्ष देनेवाले हैं। ब्रह्मज्ञान, गया श्राद्ध, गायको संकटसे बचाते समय मृत्युको प्राप्त होना और कुरुक्षेत्रमें निवास करना-इन चारों साधनोंसे मोक्ष प्राप्त होता है। सरस्वती और दृषद्वती-इन दोनों देवनदियोंके बीचका जो देश है, उसे देवसेवित 'ब्रह्मावर्त' (कुरुक्षेत्र) कहते हैं। जो दूर रहकर भी 'मैं कुरुक्षेत्रमें जाऊँगा और वहीं निवास करूंगा' इस प्रकार सदा कहा करता है, वह भी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो धीर पुरुष वहाँ सरस्वतीके तटपर निवास करेगा, उसे निस्सन्देह ब्रहाज्ञान प्राप्त होगा। देवि। देवता, महर्षि और सिद्धगण कुरुक्षेत्रका सेवन करते हैं। उसके सेवनसे मनुष्य अपने-आपमें ही ब्रहाका साक्षात्कार करता है।
पहले उस स्थानपर पुण्यमय ब्रह्मसरोवर प्रकट हुआ। तत्पश्चात् वहाँ परशुरामकुण्ड हुआ और उसके बाद वह कुरुक्षेत्रके नामसे प्रसिद्ध हुआ। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिसका निर्माण किया था, वह सरोवर आज भी वहाँ स्थित है। तदनन्तर जो यह ब्रह्मवेदी है, वह उसकी बाह्यदिशामें स्थित है। मुनिवर मार्कण्डेयने जहाँ उत्तम तपस्या की, वहाँ प्लक्ष (पाकरके वृक्ष)- से प्रकट होकर सरस्वती नदी आयी है। धर्मात्मा मुनिने सरस्वतीका पूजन करके उनको स्तुति की। वहाँ उनके समीप जो तालाब था, उसको अपने जलसे भरकर सरस्वती नदी पश्चिम दिशाकी ओर चली गयौं। तदनन्तर राजा कुरुने आकर चारों ओरसे उस क्षेत्रको हलसे जोता। उसका विस्तार पाँच योजनका था। वहाँ दया, सत्य और क्षमा आदि गुणोंका उद्गम है। तभीसे समन्तपञ्चक नामक क्षेत्रको कुरुक्षेत्र कहा जाने लगा। देवि। यहाँ खान करनेवाले मानव अक्षय पुण्य लाभ करते हैं और वहाँ मरे हुए लोग विमानपर बैठकर ब्रह्मलोकमें जाते हैं। कुरुक्षेत्र में उपचास, दान, होम, जप और देवपूजन- ये सब अक्षयभावको प्राप्त होते हैं। कुरुक्षेत्रको ब्रह्मवेदीमें मरे हुए मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते। मोहिनी। जो कुरुक्षेत्रके वनों, तीर्थों और सरिताओकी पुण्यदायिनी यात्रा करता है, उसके लिये इहलोक और परलोक में भी कोई कमी नहीं रहती।