वृन्दावन-क्षेत्रके विभिन्न तीर्थोंके सेवनका माहात्म्य

मोहिनी बोली- मथुरा और द्वादश वनोंका माहात्म्य मैंने सुना। अब कुछ वृन्दावनका रहस्य भी बताइये।

पुरोहित वसुने कहा- देवि ! मुझसे वृन्दावनका रहस्य सुनो। मथुरामण्डलमें स्थित श्रीवृन्दावन जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओसे परे, चिन्मय तुरीयांश रूप है। वह गोपीवल्लभ श्यामसुन्दरको एकान्त लीलाओंका निगूढ स्थल है, जहाँ सखोस्थलके समीप गिरिराज गोवर्धन शोभा पाता है। वृन्दावन वृन्दा देवीका तपोवन है। वह नन्दगाँवसे लेकर

यमुनाके किनारे-किनारे दूरतक फैला हुआ है। यमुनाके सुरम्य तटपर रमणीय तथा पवित्र वृन्दावन सुशोभित है। वृन्दावन में भी कुसुमसरोवर परम पुण्यमय स्थल है। उसके मनोहर तटपर वृन्दा देवीका अत्यन्त सुखदायक आश्रम है, जहाँ मध्याह्नकालमें सखाओं के साथ श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण नित्य विश्राम करते हैं।

मोहिनी !  जहाँ भगवान्ने तुम्हारे पिताको तत्वका साक्षात्कार कराया था, वह पुण्यस्थान वृन्दावनमें ब्रह्मकुण्डके नामसे प्रसिद्ध है। जो मनुष्य वहाँ मूलवेशका चिन्तन करते हुए स्नान करता है, वह नित्यविहारी श्यामसुन्दरके वैभवका कुछ चमत्कार देखता है। जहाँ श्रीकृष्णका तत्त्व जानकर इन्द्रने उन गोविन्ददेवका चिन्तन किया था, उस स्थानको गोविन्द-कुण्ड कहते हैं। वहाँ स्नान करके भी मनुष्य गोविन्दको पा लेता है। जहाँ एक होकर भी अनेक रूप धारण करके कुञ्जविहारी श्यामसुन्दरने गोपाङ्गनाओंके साथ रासलीला की थी, उसका भी वैसा ही माहात्म्य है। जहाँ नन्द आदि गोपोंने भगवान् श्रीकृष्णका वैभव देखा था, वह यमुनाजीके जलमें तत्त्वप्रकाश नामक तीर्थ कहा है। जहाँ गोपोंने कालियमर्दनकी लीला देखी थी, वह भी पुण्यतीर्थ बताया गया है, जो मनुष्योंके पापका नाश करनेवाला है। जहाँ स्त्री, बालक, गोधन और बछड़ोंसहित गोपोंको श्रीकृष्णने दावानलसे मुक्त किया, वह पुण्यतीर्थ स्नानमात्रसे सब पापोंका नाश करनेवाला है। जहाँ भगवान् श्रीकृष्णने घोड़ेका रूप धारण करनेवाले केशी नामक दैत्यको खेल-ही-खेलमें मार डाला था, वहाँ स्नान करनेवाला मानव विष्णुधामको पाता है। जहाँ भगवान्ने दुष्ट वृषभासुरको मारा था, वह पुण्यतीर्थ अरिष्टकुण्डके नामसे विख्यात है, जो स्नान करनेमात्रसे मुक्ति देनेवाला है। जहाँ भगवान्ने शयन, भोजन, विचरण, श्रवण, दर्शन- तथा विलक्षण कर्म किया, वह पुण्य क्षेत्र है, जो स्नानमावसे दिव्य गति प्रदान करनेवाला है। जहाँ पुण्यात्मा पुरुषोंने भगवान् का  श्रवण, चिन्तन, दर्शन, नमस्कार, आलिङ्गन, स्तवन और प्रार्थना की है, वह भी उत्तम गति देनेवाला तीर्थ है। जहाँ श्रीराधाने अत्यन्त कठोर तपस्या की थी, वह श्रीराधाकुण्ड स्नान, दान और जपके लिये परम पुण्यमय तीर्थ है। वत्स तीर्थ, चन्द्रसरोवर, अप्सरातीर्थ, रुद्रकुण्ड तथा कामकुण्ड से भगवान् श्रीहरिके उत्तम निवासस्थान हैं। विशाला, अलकनन्दा, मनोहर कदम्बखण्ड, विमलतीर्थ, धर्मकुण्ड, भोजन- स्थल, बलस्थान, बृहत्सानु (बरसाना), संकेतस्थान, नन्दिग्राम (नन्दगाँव), किशोरीकुण्ड, कोकिलवन, शेषशायी तीर्थ, क्षीरसागर, क्रीडादेश, अक्षयवट, रामकुण्ड, चीरहरण, भद्रवन, भाण्डीरवन, बिल्ववन, मानसरोवर, पुष्पपुलिन, भक्तभोजन, अक्रूरघाट, गरुडगोविन्द तथा बहुलावन-यह सब वृन्दावन नामक क्षेत्र है, जो सब ओरसे पाँच योजन विस्तृत है। वह परम पुण्यमय तीर्थ पुण्यात्मा पुरुषोंसे सेवित है और दर्शनमात्रसे ही मोक्ष देनेवाला है। वह अत्यन्त दुर्लभ है। देवतालोग भी उसका दर्शन चाहते हैं। वहाँकी आन्तरिक लीलाका दर्शन करने में देवतालोग तपस्यासे भी समर्थ नहीं हो पाते। जो सब ओरकी आसक्तियोंका त्याग करके वृन्दावनकी शरण लेते हैं, उनके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। जो वृन्दावनके नामका भी उच्चारण करता है, उसकी भी नन्दनन्दन श्रीकृष्णके प्रति सदा भक्ति बनी रहती है। पवित्र वृन्दावनके नर, नारी, वानर, कृमि, कीट-पत्तङ्ग, खग, मृग, वृक्ष और पर्वत भी निरन्तर श्रीराधाकृष्णका उच्चारण करते रहते हैं। जो श्रीकृष्णको मायासे मोहित हैं और जिनका चित्त कामरूपी मलसे मलिन हो रहा है, ऐसे पुरुषोंको स्वप्नमें भी वृन्दावनका दर्शन दुर्लभ है। जिन पुण्यात्मा पुरुषोंने श्रीवृन्दावनका दर्शन किया है, उन्होंने अपना जन्म सफल कर लिया। वे श्रीहरिके कृपापात्र हैं। विधिनन्दिनि! बहुत कहने-सुननेसे क्या लाभ, मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको भव्य एवं पुण्य वृन्दावनका सेवन करना चाहिये। सदा वृन्दावनका दर्शन करना चाहिये, सदा वहाँकी यात्रा करनी चाहिये तथा सदैव उसका सेवन और ध्यान करना चाहिये। इस पृथ्वीपर वृन्दावनक समान काविधक स्थान दूसरा कोई नहीं है।

प्राचीन कल्पकी बात है। वृन्दावनमें गोवर्धन नामके एक द्विजने बड़ी भारी तपस्या की। वह समस्त संसारसे विरक्त हो गया था। देवताओंके स्वामी अविनाशी भगवान् विष्णु अपनी लीलाभूमिमें उस ब्राह्मणको वर देनेके लिये गये। ब्राह्मणने देखा देवदेवेश्वर श्रीहरिने अपने हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे हैं। उनका वक्षःस्थल सुन्दर कौस्तुभमणिसे सुशोभित है। कानोंमें मकराकृति कुण्डल झलमला रहे हैं। माथेपर सुन्दर किरीट चमक रहा है। हाथोंमें कड़े शोभा पाते हैं। पैरोंमें मधुर रुनझुन करनेवाले नपुर शोभा दे रहे हैं। उनका आगेका पूरा अङ्ग वनमालासे घिर गया है। वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित है। नूतन मेघके समान श्यामवर्ण शरीरपर विद्युत्की-सी कान्तिवाला रेशमी पीताम्बर प्रकाशित हो रहा है। नाभि और ग्रीवा सुन्दर हैं। कपोल और नासिका सुधर हैं। दाँतोंकी पङ्क्ति स्वच्छ है। मुखपर मनोहर मुसकानकी छटा छा रही है। जानु, ऊरु, भुजाएँ तथा शरीरका मध्यभाग सुन्दर हैं। कृपाके तो वे महासागर ही हैं। सदा आनन्दमें डूबे रहते हैं। इनके मुखारविन्दसे सदा प्रसन्नता बरसती रहती है। इस प्रकार भगवान् की झाँको देखकर ब्राह्मण सहसा उठ खड़े हुए और पृथ्वीपर दण्डकी भाँति लेटकर उन्होंने भगवान्को साष्टाङ्ग प्रणाम किया। फिर भगवानके द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर गोवर्धन ब्राह्मण श्रीहरिसे बोले- 'प्रभो! आप मुझे दोनों चरणोंसे दबाकर मेरी पीठपर खड़े रहें, यही मेरे लिये वर है।' गोवर्धनका यह वचन सुनकर भक्तवत्सल भगवान्ने बार बार इसपर विचार किया, फिर वे उसकी पोतपर चढ़कर खड़े हो गये। तब ब्राहाणने फिर कहा-'देष! जगत्पते। मेरी पीठपर खड़े हुए आपको अब मैं उतार नहीं सकता, इसलिये इसी रूपमें स्थित हो जाइये।' तभीसे विश्वात्मा भगवान् पर्वतरूपधारी गोवर्धन ब्राहाणका त्याग न करके प्रतिदिन योगीवनमें जाते हैं। कृष्णावतारमें भगवान्ने गोवर्धन ब्राह्मणको अपने सारूप्यभावको प्राप्त हुआ जानकर उसे नन्द आदिके द्वारा गिरिराज-पूजनके व्याजसे भोजन कराया। अन्नकूट तथा दुग्ध आदिके द्वारा पर्वतरूपधारी ब्राह्मणको तृप्त करनेके पथात् उसे प्यासा जानकर भगवान्ने नूतन मेघोंका जल पिलाया। इस कार्यसे भगवान् वासुदेवका वह मित्र हो गया। देवि। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक विभिन्न उपचारोंसे गोवर्धन पर्वतकी पूजा और प्रदक्षिणभावसे परिक्रमा करता है, उसका फिर इस संसार में जन्म नहीं होता। भगवान्के निवाससे गोवर्धन पर्वत परम पवित्र हो गया है।

सुभगे ! तुम्हीं बताओ। इस पृथ्वीपर श्रीकृष्णकी विविध क्रीडाओंसे सुशोपित यमुनाका रमणीय पुलिन वृन्दावनके सिवा और कहाँ है? इसलिये सब प्रकारसे प्रयत्न करके दूसरे पवित्र तथा पुण्यदायक वनों, नदियों और पर्वतोंको छोड़कर मनुष्योंको सदा वृन्दावनका सेवन करना चाहिये। जहाँ यमुना-जैसी पुण्यदायिनी नदी हैं, जहाँ गिरिराज गोवर्धन-जैसा पुण्यमय पर्वत है, उस वृन्दावनसे बढ़कर पावन बन इस पृथ्वीपर दूसरा कौन है? उस वृन्दावनमें मोरपंखका मुकुट धारण किये, कनेरके फूलोंसे कानोंका शृङ्गार किये, नटवर-वेषधारी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण गोपों, गौओं तथा गोपाङ्गनाओंके साथ नित्य विचरण करते हैं। उनकी वंशीकी मधुर ध्वनिके सामने हंसीका मधुर कलरव फीका लगता है। वैजयन्ती-माला उनके सारे अङ्गोंको घेरे रहती है। जहाँ स्वभावसे ही क्रूर जीव-जन्तु अपना सहज वैर छोड़कर अकारण स्नेह करनेवाले सुहृदोंकी भाँति रहते हुए भगवत्सुखका ही आश्रय लेते हैं, उस वृन्दावनमें जाकर, जैसे जीव भगवान् को पा ले, उस प्रकार भगवत्सुखका अनुभव करके जो फिर पन्दावनको छोड़कर कहीं अन्यन्न चला जाता है, वह श्रीकृष्णकी मायाको पिटारीरूप इस जगत्में क्या कहीं भी सुखी हो सकता है? वह वृन्दावनधाम समस्त वसुधाका पुण्यरूप है। उसका आश्रय लेकर मेरा चित्त इस अज्ञानान्धकारमय जगत्को नीचे करके स्वयं सदाके लिये सबके ऊपर स्थित है। भगवान् गोपीनाथ यहाँ पग-पगपर प्रेमसे द्रवितचित्त हो नीच-ऊँचका विचार नहीं करते; अपने सब भक्तोंका उसार कर ही देते हैं। जो व्रजके गोपों, गोपियों, खगों, मृगों, पर्वतों, गौओं, भूभागों तथा धूलकणोंका भी दर्शन एवं स्मरण करके उन्हें प्रणाम करता है, उसके प्रेमपाशमें आबद्ध हो भगवान् श्रीकृष्ण उस भक्तके अन्त:करणमें अपने प्रति दास्यभावका उदय करा देते हैं; उन व्रजराज श्यामसुन्दरके सिवा दूसरा कौन देवता सेवनके योग्य हो सकता है? मोहिनी! यह वृन्दावनका माहात्म्य तुम्हें संक्षेपसे बताया गया है। संसार-भयसे डरे हुए पापहीन मनुष्योंको सदा इस वृन्दावनका ही श्रवण, कीर्तन, स्मरण तथा ध्यान करना चाहिये। जो मनुष्य पवित्रभावसे वृन्दावनके माहात्म्यका श्रवण करता है, वह भी निस्संदेह साक्षात् विष्णुरूप ही है।