नारद महा पुराण
वामदेवजीका पूर्वजन्ममें किये हुए 'अशून्यशयनव्रत को राजाके वर्तमान सुखका कारण बताना, राजाका मन्दराचलपर जाकर मोहिनीके गीत तथा रुप-दर्शन से मोहित होकर गिरना और मोहिनीद्वारा उन्हें आश्वासन प्राप्त होना
वसिष्ठजी कहते हैं- राजाका यह वचन सुनकर महाज्ञानी मुनीश्वर वामदेवजीने एक क्षणतक कुछ चिन्तन किया। फिर राजाके सुख-सौभाग्यका कारण जानकर वे इस प्रकार बोले।
वामदेवजीने कहा- महीपाल! तुम पूर्वजन्ममें | शूद्रजातिमें उत्पन्न हुए थे। उस समय दरिद्रता तथा दुष्ट भार्याने तुम्हारा बड़ा तिरस्कार किया था। तुम्हारी स्त्री पर-पुरुषका सेवन करती थी। राजन्! तुम ऐसी स्त्रीके साथ बहुत वर्षातक निवास करते हुए दुःखसे संतप्त होते रहे। एक समय किसी ब्राह्मणके संसर्गसे तुम तीर्थयात्राके लिये गये; फिर सब तीर्थों में घूमकर ब्राह्मणकी सेवामें तत्पर हो, तुम पुण्यमयी मथुरापुरीमें जा पहुँचे। महीपते ! वहाँ ब्राह्मणदेवताके सङ्गसे तुमने यमुनाजीके सब तीर्थों में उत्तम-विश्रामघाट नामक तीर्थमें स्नान करके भगवान् वाराहके मन्दिर में होती हुई पुराणकी कथा सुनी, जो 'अशून्यशयनव्रत के विषयमें थी; चार पारणसे जिसकी सिद्धि होती है, जिसका अनुष्ठान कर लेनेपर मेघके समान श्यामवर्ण देवेश्वर लक्ष्मीभर्ता जगन्नाथ, जो अशेष पापराशिका नाश करनेवाले हैं, प्रसन्न होते हैं। राजन्! तुमने अपने घर लौटकर वह पवित्र अशून्यशयनव्रत' किया, जो घरमें परम अभ्युदय प्रदान करनेवाला है। महीपते! श्रावण मासको द्वितीयाको यह पुण्यमयव्रत ग्रहण करना चाहिये। इससे जन्म, मृत्यु और जरावस्थाका नाश होता है। पृथ्वीपते ! इस व्रतमें फल, फूल, धूप, लाल-चन्दन, शय्यादान, वस्त्रदान और ब्राह्मणभोजन आदिके द्वारा लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुको पूजा करनी चाहिये। राजन् ! तुमने यह सब दुस्तर कर्म भी पूरा किया। महीपते । तुमने जो पहले पुण्यके फलस्वरूप सुख विस्तारपूर्वक बताये हैं, वे इसो व्रतसे प्राप्त हुए हैं, सुनो-जिसके ऊपर भगवान् जगन्नाथ प्रसन्न न हों, उसके यहाँ वे सुख निश्चय ही नहीं हो सकते। राजेना। इस जन्म में भी तुम (एकादशीसंयुक्त) द्वादशीव्रतके द्वारा श्रीहरिकी पूजा करते हो। राजन्! इससे तुम्हें निश्चितरूपसे भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त होगा।
राजा बोले-द्विज श्रेष्ठ ! आपकी आज्ञा हो तो मैं मन्दराचलपर जानेको उत्सुक हूँ। राज्य- शासनका गुरुतर भार अपने पुत्रके ऊपर छोड़कर मैं हलका हो गया हूँ। अब मेरे कर्तव्यका पालन मेरा पुत्र करेगा।
राजाकी बात सुनकर वामदेवजी इस प्रकार बोले-'नृपश्रेष्ठ ! पुत्रका यह सबसे महान् कर्तव्य है कि वह सदा प्रेमपूर्वक पिताको क्लेशसे मुक्त करता रहे। जो मन, वाणी और शरीरकी शक्तिसे सदा पिताकी आज्ञाका पालन करता है, उसे प्रतिदिन गङ्गास्त्रानका फल मिलता है। जो पिताकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके गङ्गास्नान करनेके लिये जाता है, उस पुत्रकी शुद्धि नहीं होती-यह वैदिक श्रुतिका कथन है । भूपाल ! तुम इच्छानुसार यात्रा करो। तुमने अपना सब कर्तव्य पूरा कर लिया।'
मुनिके ऐसा कहनेपर श्रीमान् राजा रुक्माङ्गद घोड़ेपर चढ़कर शीघ्र गतिसे चले, मानो साक्षात् वायुदेव जा रहे हों। मार्गमें अनेकानेक पर्वत, वन, नदी, सरोवर तथा उपवन आदि सम्पूर्ण आश्चर्यमय दृश्योंको देखते हुए वे राजाधिराज रुक्माङ्गद थोड़े ही समयमें श्वेतगिरि, गन्धमादन और महामेरुको लांघकर उत्तर-कुरुवर्षको देखते हुए मन्दराचलपर्वतपर जा पहुँचे, जो सब ओरसे सुवर्णसे आच्छादित था। वहाँ रहे थे। अनेकानेक कन्दराएँ उस पर्वतको शोभा बढ़ा रही थीं। सहस्रों नदियोंसे पूर्ण मन्दराचल गाजीके शुभ जलसे भी प्रक्षालित हो रहा था। यह सब देखते हुए राजा रुक्माङ्गद उस महापर्वतके
*एतद्धि परमं कृत्यं पुत्रस्य नृपपुङ्गव।
यत्क्लेशात् पितरं प्रेम्णा विमोचयति सर्वदा।।
पितुर्वचनकारी च मनोवाक्कायशक्तितः।
तस्य भागीरथीस्रानमहन्यहनि जायते।।
निरस्य पितृवाक्यं तु व्रजेत्स्नातुं सुरापगाम्।
नो शुद्धिस्तस्य पुत्रस्य इतीत्थं वैदिकी श्रुतिः।।
समीप जा पहुंचे। तत्पश्चात् उन्होंने समस्त मृग आदि पशुओं और पक्षियोंके समुदायको एक संगीतकी ध्वनिसे खिंचकर शीघ्रतापूर्वक एक ओर जाते देखा। वह ध्वनि मोहिनीके मुखसे निकले हुए संगीतकी थी। उनको जाते देख राजा रुक्माङ्गद स्वयं भी उन्हींके साथ शीघ्रतापूर्वक चल दिये। मोहिनीके मुखसे निकले हुए संगीतकी ध्वनि राजाके भी कानमें पड़ी, जिससे मोहित होकर उन्होंने घोड़ा वहीं छोड़ दिया और पर्वतीय मार्गको लाँघते हुए वे क्षणभरमें सहसा उसके पास पहुँच गये। उन्होंने देखा, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिवाली एक दिव्य नारी पर्वतपर बैठी है, मानो गिरिराजनन्दिनी पार्वतीकी रूपराशि उसके रूपमें अभिव्यक्त हुई हो। उसे देखकर राजा उसके पास खड़े हो उस मोहिनीका रूप निहारने लगे। देखते-देखते वे मोहित होकर वहीं गिर पड़े। मोहिनीने वीणाको रख दिया और गीत बन्द कर दिया। वह देवी राजाके समीप गयी। मोहिनी सन्तप्त राजा रुक्माङ्गदसे मधुर मनोरम वचनोंमें बोली-'राजन्! उठिये। मैं आपके वशमें हूँ। क्यों मू से आप अपने इस शरीरको क्षीण कर रहे हैं। भूपाल! आप तो पृथ्वीके इस महान् भारको तिनकेके समान समझकर ढोते आये हैं। फिर आज आप मोहित क्यों हो रहे हैं? दृढ़तापूर्वक अपनेको सँभालिये। आप धीर हैं, वीर हैं। आपकी चेष्टाएँ उदारतापूर्ण हैं। राजराजेश्वर। यदि मेरे साथ अत्य-स मनोरम एवं मनोऽनुकूल क्रीड़ा करनेकी आपके मनमें इच्छा हो तो मुझे धर्मयुक्त दान देकर अपनी दासीकी भांति मेरा उपभोग कीजिये।