बारह मासोंके सप्तमी-सम्बन्धी व्रत और उनके माहात्म्य

सनातनजी कहते हैं- सुनो, अब मैं तुम्हें ससमीके व्रत बतलाता हूँ। चैत्र शुक्ला सप्तमीको गाँवसे बाहर किसी नदी या जलाशयमें स्नान करे। फिर घर आकर एक वेदी बनावे और उसे गोबरसे लीपकर उसके ऊपर सफेद बालू फैला दे। उसपर अष्टदल कमल लिखकर उसको कार्णिकामे भगवान सूर्यको स्थापना करे। पूर्वक इनमें यज्ञसाधक दो देवताओंका न्यास करे अग्रिकोणके दलमें दो यज्ञसाधक गन्धर्वोंका न्यास करे। दक्षिणदलमें दो अप्सराओंका न्यास करे। मुनिश्रेष्ठ! नैर्ऋत्य-दलमें दो राक्षसों को स्थापित करे। पश्चिमदलमें यज्ञमें सहायता पहुँचानेवाले काद्रवेयसंज्ञक दो महानागोंका न्यास करे। द्विजोत्तम! वायव्यदलमें दो यातुधानोंका, उत्तरदलमें दो ऋषियोंका और ऐशान्यदलमें एक प्रहका प्यास करे। इन सबका गन्य माला, चन्दन, धूप, दीप, अवेद्य और पान सुपारी आदिके द्वारा पूजन जारना चाहिये। इस प्रकार पूजा करके सूर्यदेव के लिये घीसे एक सौ आठ आहुति दे तथा अन्य लोगोंके लिये नाम-मन्त्रसे वेदीपर ही क्रमशः आठ-आठ आहुतियाँ दे। द्विजश्रेष्ठ ! तदनन्तर पूर्णाहुति दे और ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा आर्पित करे। इस प्रकार सब विधान करके मनुष्य पूर्ण सौख्य लाभ करता है और शरीरका अन्त होनेपर सूर्यमण्डल भेदकर परम पदको प्राप्त होता है।

वैशाख शुक्ला सप्तमीको राजा जहुने स्वयं क्रोधवश गङ्गाजीको पी लिया था और पुनः अपने दाहिने कानके छिद्रसे उनका त्याग किया था। अत: वहाँ प्रात:काल स्नान करके निर्मल जलमें गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि सम्पूर्ण उपचारोंद्वारा गङ्गाजीका पूजन करना चाहिये। तदनन्तर एक सहस्र घट दान करना चाहिये। 'गङ्गावत में यही कर्तव्य है। यह सब भक्तिपूर्वक किया जाय तो गङ्गाजी सात पीढ़ियोंको नि:संदेह स्वर्गमें पहुँचा देती हैं। इसी तिथिको 'कमलव्रत' भी बताया गया है। तिलसे भरे हुए पात्रमें सुवर्णमय सुन्दर कमल रखकर उसे दो वस्त्रोंसे ढंककर गन्ध, धूप आदिके द्वारा उसकी पूजा करे। तत्पश्चात्-

नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे।

दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥

(ना० पूर्व० ११६ । १५ १६)

'हाथमें कमल धारण करनेवाले भगवान् सूर्यको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वको धारण करनेवाले भगवान् सविताको नमस्कार है। दिवाकर! आपको नमस्कार है। प्रभाकर! आपको नमस्कार है।' इस प्रकार देवेश्वर सूर्यको नमस्कार करके सूर्यास्तके समय जलसे भरे हुए घड़े के साथ वह कमल और एक कपिला गाय ब्राह्मणको दान दे। उस दिन अखण्ड उपवास और दूसरे दिन भोजन करना चाहिये। ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे भोजन करानेसे व्रत सफल होता है। उसो दिन 'निम्बसप्तमी' का व्रत बताया जाता है। द्विज श्रेष्ठ नारद । उसमें 'ॐ खखोल्काय नमः' इस मन्बद्वारा नीमके पत्तेसे भगवान् भास्करकी पूजाका विधान है। पूजनके पक्षात् नीमका पत्ता खाय और मौन होकर भूमिपर शयन करे। दूसरे दिन बाहाणोको भोजन कराकर स्वयं भी भाई बन्युओके साथ भोजन करे। यह निम्बपत्रवत' है, जो इसका पालन करनेवाले पुरुषों को सब प्रकारका सुख देनेवाला है। इसी दिन 'शाकरासतमी' भी कही गयी है। शर्करासप्तमी अश्वमेध यज्ञका फल देनेवाली, सब दुःखोंको शान्त करनेवाली और सन्तानपरम्पराको बढ़ानेवाली है। इसमें शक्करका दान करना, शक्कर खाना और खिलाना कर्तव्य है। यह व्रत भगवान् सूर्यको विशेष प्रिय है। जो परम भक्तिभावसे इसका पालन करता है, वह सदतिको प्राप्त होता है।

ज्येष्ठ शुक्ला सप्तमीको साक्षात् भगवान् सूर्यस्वरूप इन्द्र उत्पन्न हुए हैं। ब्रह्मन् ! जो उपवासपूर्वक जितेन्द्रियभावसे विधि-विधानके साथ उनको पूजा करता है, वह देवराज इन्द्रके प्रसादसे स्वर्गलोकमें स्थान पाता है। विप्रेन्द्र! आषाढ़ शुक्ला सप्तमीका विवस्वान् नामक सूर्य प्रकट हुए थे, अत: उस तिथिम गन्ध, पृष्य आदि पृथक्-पृथक सामग्रियों द्वारा उनको भनी गति पूजा करके मनुष्य भगवान् सूर्यक मायुज्य ग्राम कर लेता है।

श्रावण शुक्ला सप्तमीको 'अव्यङ्ग' नामक शुभ व्रत करना चाहिए इसमें सूर्यदेवको पूजाके अन्नमें उनका प्रमजताके लिये कपासके सूतका बना हुआ साढ चार हाथका वस्त्रदान करना चाहिये। यह व्रत विशेष कल्याणकारी है। यदि यह सप्तमी हस्त नक्षत्रसे युक्त हो तो पापनाशिनी कही गयी है। इसमें किया हुआ दान, जप और होम सब अक्षय होता है। भाद्रपद शुक्ला सप्तमीको 'आमुक्ताभरणव्रत' बतलाया गया है। इसमें उमासहित भगवान् महेश्वरकी पूजाका विधान है। गङ्गाजल आदि षोडशोपचारसे भगवान्का पूजन, प्रार्थना और नमस्कार करके सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये उनका विसर्जन करना चाहिये। इसीको 'फलसप्तमी' भी कहते हैं। नारियल, बैगन, नारंगी, बिजौरा नीबू, कुम्हड़ा, बनभंटा और सुपारी-इन सात फलोंको महादेवजीके आगे रखकर सात तन्तुओं और सात गाँठोंसे युक्त एक डोरा भी चढ़ावे। फिर पराभक्तिसे उनका पूजन करके उस डोरेको स्त्री बायें हाथमें बाँध ले और पुरुष दाहिने हाथमें। जबतक वर्ष पूरा न हो जाय तबतक उसे धारण किये रहे। सात ब्राहाणोंको खोर भोजन कराकर उन्हें विदा करे। उसके बाद बुद्धिमान् पुरुष व्रतको पूर्णताके लिये स्वयं भी भोजन करे। पहले बताये हुए सातों फल सात ब्राह्मणोंको देने चाहिये। विप्रवर! इस प्रकार सात वर्षातक व्रतका पालन करके विधिवत् उपासना करनेपर व्रतधारी मनुष्य महादेवजीका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। आश्विनके शुक्ल पक्षमें जो सप्तमी आती है, उसे 'शुभ सप्तमी' जानना चाहिये। उसमें स्नान और पूजा करके तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी आज्ञा ले व्रतका आरम्भ करके कपिला गायका पूजन एवं प्रार्थना करे-

त्वामहं दशि कल्याणि प्रीयतामर्यमा स्वषम्।

पालय त्वं जगत्कृत्स्नं यतोऽसि धर्मसम्भवा॥

(ना० पूर्व ११ )

'कल्याणी। मैं तुम्हारा दान करता हूँ. इससे साक्षात् भावान सूर्य प्रसव हो। तुम सम्पूर्ण जगत् का पालन कारो, क्योकि धर्मसे उत्पन्न हुई हो।' ऐसा कहकर वेदवेत्ता ब्राह्मणको नमस्कार करके उसे गाय और दक्षिणा दे। ब्रह्मन्! फिर स्वयं पञ्चगव्य पान करके रहे। इस प्रकार व्रत करके दूसरे दिन उत्तम ब्राह्मणों को भोजन करावे और उनसे शेष बचे हुए प्रसादस्वरूप अन्नको स्वयं भोजन करे। जिसने श्रद्धापूर्वक इस शुभ सप्तमी नामक व्रतको किया है, वह देवदेव महादेवजीके प्रसादसे भोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

कार्तिकके शुक्ल पक्षमें 'शाकसप्तमी' नामक व्रत करना चाहिये। उस दिन स्वर्णकमलसहित सात प्रकारके शाक सात ब्राह्मणोंको दान करे और स्वयं शाक भोजन करके ही रहे। दूसरे दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें भोजन-दक्षिणा दे और स्वयं भी मौन होकर भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमीको 'मित्र- व्रत' बताया गया है। भगवान् विष्णुका जो दाहिना नेत्र है, वही साकार होकर कश्यपके तेज और अदितिके गर्भसे 'मित्र' नामधारी दिवाकरके रूपमें प्रकट हुआ है। अत: ब्रह्मन् ! इस तिथिमें शास्त्रोक्त विधिसे उन्हीका पूजन करना चाहिये। पूजन करके मधुर आदि सामग्रियोंसे सात ब्राह्मणों को भोजन करावे और उन्हें सुवर्ण-दक्षिणा देकर विदा करे। तत्पश्चात् स्वयं भी भोजन करे। विधिपूर्वक इस व्रतका पालन करके मनुष्य निश्चय ही सूर्यके लोकमें जाता है। पौष शुक्ला सप्तमीको 'अभयव्रत' होता है। उस दिन उपवास करके पृथ्वीपर खड़ा हो तीनों समय सूर्यदेवकी पूजा करे। तत्पश्चात् दूधमिश्रित अन्नसे बँधा हुआ एक सेर मोदक ब्राह्मणको दान करके सात ब्राह्मणों को भोजन करावे और उन्हें सुवर्णकी दक्षिणा दे विदा करके स्वयं भी भोजन करे। यह सबको अभय देनेवाला माना गया है। दूसरे ब्राह्मण उसी दिन 'मार्तण्डव्रत'का उपदेश करते है। दोनों एक ही देवता होनेके कारण विद्वानोंने उन्हें एक ही व्रत कहा है। माघ मासके कृष्ण पक्षकी सप्तमीको 'सर्वाप्ति' नामक व्रत होता है। उस दिन उपवास करके सुवर्णक बने हुए सूर्यविम्बकी गन्ध, पुष्प आदिसे पूजा करे तथा रात्रिमें जागरण करके दूसरे दिन सात ब्राह्मणोंको खीर भोजन करावे। उन ब्राह्मणोंको दक्षिणा, नारियल और अगुरु अर्पण करके दूसरी दक्षिणाके साथ सुवर्णमय सूर्यविम्ब आचार्यको समर्पित करे। फिर विशेष प्रार्थनापूर्वक उन्हें विदा करके स्वयं भोजन करे। यह व्रत सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला कहा गया है। इस व्रतके प्रभावसे सर्वथा अद्वैतज्ञान सिद्ध होता है।

माघ शुक्ला सप्तमीको 'अचलाव्रत' बताया गया है। यह त्रिलोचनजयन्ती' है। इसे सर्वपापहारिणी माना गया है। इसीको 'रथसप्तमी' भी कहते हैं, जो 'चक्रवर्ती' पद प्रदान करनेवाली है। उस दिन सूर्यको सुवर्णमयी प्रतिमाको सुवर्णमय घोड़े जुते हुए सुवर्णक ही रथपर बिठाकर जो सुवर्ण दक्षिणाके साथ भावभक्तिपूर्वक उसका दान करता है, वह भगवान् शङ्करके लोकमें जाकर आनन्द भोगता है। यही 'भास्करसप्तमो' भी कहलाती है, जो करोड़ों सूर्य-ग्रहणोंके समान है। इसमें अरुणोदयके समय स्नान किया जाता है। आक और बेरके सात-सात पत्ते सिरपर रखकर स्नान करना चाहिये। इससे सात जन्मोंके पापोंका नाश होता है। इसी सप्तमीको 'पुत्रदायक' व्रत भी बताया गया है। स्वयं भगवान् सूर्यने कहा है-'जो माघ शुक्ला सप्तमीको विधिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, उसपर अधिक सन्तुष्ट होकर मैं अपने अंशसे उसका पुत्र होऊँगा।' इसलिये उस दिन इन्द्रियसंयमपूर्वक दिन-रात उपवास करे और दूसरे दिन होम करके ब्राह्मणोंको दही, भात, दूध और खीर आदि भोजन करावे। फाल्गुन शुक्ला सप्तमीको 'अर्कपुट' नामक व्रतका आचरण करे। अर्कके पत्तोंसे अर्क. (सूर्य)- का पूजन करे और अर्कके पत्ते ही खाय तथा 'अर्क' नामका सदा जप करे। इस प्रकार किया हुआ यह 'अर्कपुटव्रत' धन और पुत्र देनेवाला तथा सब पापोंका नाश करनेवाला है। कोई-कोई विधिपूर्वक होम करनेसे इसे 'यजन्नत' मानते हैं। द्विज श्रेष्ठ ! सब मासोंकी सम्पूर्ण ससमी तिथियों में भगवान् सूर्यकी आराधना समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली बतायी गयी है।