नारद महा पुराण
गङ्गाजीके तटपर किये जानेवाले स्नान,तर्पण, पूजन तथा विविध प्रकारके दानोंकी महिमा
पुरोहित वसु कहते हैं- राजपत्नी मोहिनी! अब गङ्गाजीमें स्रान-तर्पण आदि कर्मोका फल बतलाया जाता है। देवि ! यदि गङ्गाजीके तट पर संध्योपासना की जाय तो द्विजोंको पवित्र करनेवाली गायत्रीदेवी किसी साधारण स्थानकी अपेक्षा वहाँ लाख गुना पुण्य प्रकट करने में समर्थ होती हैं। मोहिनी ! यदि पुत्रगण श्रद्धापूर्वक गङ्गाजीमें पितरोंको जलाञ्जलि दें तो वे उन्हें अक्षय तथा दुर्लभ तृप्ति प्रदान करते हैं। गङ्गाजीमें तर्पण करते समय मनुष्य जितने तिल हाथमें लेता है, उतने सहस वर्षांतक पितृगण स्वर्गवासी होते हैं। सब लोगोंके जो कोई भी पितर पितृलोकमें विद्यमान हैं, वे गङ्गाजीके शुभ जलसे तर्पण करनेपर परम तृप्तिको प्राप्त होते हैं। शुभानने! जो जन्मकी सफलता अथवा संतति चाहता है, वह गङ्गाजोके समीप जाकर देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे। जो मनुष्य मृत्युको प्राप्त होकर दुर्गतिमें पड़े हैं, वे अपने वंशजोंद्वारा कुश, तिल और गङ्गाजलसे तृस किये जानेपर वैकुण्ठधाममें चले जाते हैं। जो
कोई पुण्यात्मा पितर स्वर्गलोकमें निवास करते हैं, उनके लिये यदि गङ्गाजलसे तर्पण किया जाय तो वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। जो मनुष्य गङ्गाजीमें स्नान करके प्रतिदिन शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह निश्चय ही एक ही जन्ममें मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अग्रिहोत्र, वेद तथा बहुत दक्षिणावाले यज्ञ भी गङ्गाजीपर शिवलिङ्ग-पूजाके करोड़वें अंशके बराबर भी नहीं हैं। जो पितरों अथवा देवताओंके उद्देश्यसे गङ्गाजलद्वारा अभिषेक करता है, उसके नरकनिवासी पितर भी तत्काल तृप्त हो जाते हैं। मिट्टीके घड़े की अपेक्षा ताँबेके पड़ेसे किया हुआ स्नान दसगुना उत्तम माना गया है। इसी प्रकार अय, नैवेद्य, बलि और पूजा आदिमें भी क्रमशः समझने चाहिये। उत्तरोत्तर पात्रमें विशेषता होने के कारण फलमें भी विशेषता होती है। जो धन होते हुए भी मोहबत विस्तृत चिधिका पालन नहीं करता, यह उस कर्मक पलका भागी नहीं होता।
देवताओका न पुण्यमय होता है।दर्शनसे स्पर्श उत्तम है। स्पर्शसे पूजन श्रेष्ठ है और पूजनमें भी घृतके द्वारा कराया हुआ देवताका ज्ञान परम उत्तम माना गया है। गङ्गाजलसे जो स्नान कराया जाता है, उसे विद्वान् पुरुष घृतस्त्रानके ही तुल्य कहते हैं। जो ताँबेके पात्र में मगधदेशीय मापके अनुसार एक प्रस्थ गङ्गाजल रखकर उसमें दूसरे-दूसरे विशेष द्रव्य मिलाकर उस मिश्रित जलके द्वारा अपने पितरोंसहित देवताओंको एक बार भी अर्घ्य देता है, वह पुत्र-पौत्रों के साथ स्वर्गलोकको जाता है। जल, क्षीर, कुशाग्र, घृत, दधि, मधु, लाल कनेरके फूल तथा लाल चन्दन-इन आठ अङ्गोंसे युक्त अर्घ्य सूर्यके लिये देनेयोग्य कहा गया है। जो श्रेष्ठ मानव गङ्गाजीके तटपर भगवान् विष्णु, शिव, सूर्य, दुर्गा तथा ब्रह्माजीकी स्थापना करता है और अपनी शक्तिके अनुसार उनके लिये मन्दिर बनवाता है, उसे अन्य तीर्थों में यह सब करनेकी अपेक्षा गङ्गाजीके तटपर कोटि-कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन गङ्गाजीके तटकी मिट्टीसे यथाशक्ति उत्तम लक्षणयुक्त शिवलिङ्ग बनाकर उनकी प्रतिष्ठा करके मन्त्र तथा पत्र पुष्प आदिसे यथासाध्य पूजा करता और अन्तमें विसर्जन करके उन्हें गङ्गामें ही डाल देता है, उसे अनन्त पुण्यको प्राप्ति होती है। जो नरश्रेष्ठ सर्वानन्ददायिनी गङ्गाजीमें स्नान करके भक्तिपूर्वक 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर-मन्त्रका जप करता है, मुक्ति उसके हाथमें ही आ जाती है। जो नियमपूर्वक छ: मासतक गङ्गाजीमें 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रका जप करता है, उसके पास सब सिद्धियाँ उपस्थित हो जाती हैं। जो गङ्गाजीके समीप प्रणवसहित 'नमः शिवाय' मन्त्रका विधिपूर्वक चौबीस लाख जप करता है, वह साक्षात् शङ्कर(- के समान) है। 'नमः शिवाय -यह पञ्चाक्षरी मन्त्र सिद्ध-विद्या है। उसको जपनेवाला साक्षात् शिव (-के समान) ही है, इसमें संशय नहीं है। 'अपवित्रः पवित्रो वा-इस मन्त्रका जप करनेवाला पुरुष पातकरहित हो जाता है। गङ्गाजीके पूजित होनेपर सब देवताओंकी पूजा हो जाती है। अत: सर्वथा प्रयत्न करके देवनदी गङ्गाकी पूजा करनी चाहिये। गङ्गाजीके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं। वे सम्पूर्ण अङ्गोंसे सुशोभित होती हैं। उनके एक हाथमें रत्नमय कलश, दूसरेमें श्वेत कमल, तीसरेमें वर और चौथेमें अभय है। वे शुभ-स्वरूपा हैं। उनके श्रीअङ्गोंपर श्वेत वस्त्र सुशोभित होता है। मोती और मणियों के हार उनके आभूषण हैं। उनका मुख परम सुन्दर है। वे सदा प्रसन्न रहती हैं। उनका इदब-कमल करणारससे सदा आई बना रहता है। उन्होंने बसुधापर सुधाधारा बहा रखी है। तीनो लोक सदा उनके चरणो में नमस्कार करते है। इस प्रकार जलमयी गलाका ध्यान
*अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्यां गतोपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्माभ्यन्तरः शुचिः।।
करके उनकी पूजा करनेवाला पुरुष पुण्यका भागी होता है। जो इस प्रकार पंद्रह दिन भी निरन्तर पूजा करता है, वही देवताओं के समान हो जाता है और दीर्घकालतक पूजा करनेसे फलमें भी अधिकता होती है। पूर्वकालमें राजा जहुने वैशाख शुक्ला सप्तमीको क्रोधपूर्वक गाजीको पी लिया था और फिर अपने कानके दाहिने छिद्रसे उन्हें निकाल दिया। शुभानने ! उस स्थानपर आकाशकी मेखलारूप गङ्गाजीका पूजन करना चाहिये। वैशाख मासकी अक्षय-तृतीयाको तथा कार्तिकमें भी रातको जागरण करते हुए जौ और तिलसे भक्तिभावपूर्वक विष्णु, गङ्गा और शिवकी पूजा करनी चाहिये। उक्त सामग्रियोंके सिवा उत्तम गन्ध, पुष्य, कुंकुम, अगरु, चन्दन, तुलसीदल, बिल्वपत्र, बिजौरा नीबू आदि, धूप, दीप और नैवेद्यसे वैभव-विस्तारके अनुसार पूजा करनी उचित है। गङ्गाजीके तटपर किया हुआ यज्ञ, दान, तप, जप, श्राद्ध और देवपूजा आदि सब कर्म कोटि-कोटिगुना फल देनेवाला होता है। जो अक्षय-तृतीयाको गङ्गाजीके तटपर विधिपूर्वक घृतमयी धेनुका दान करता है, वह पुरुष सहस्रों सूर्योके समान तेजस्वी और सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न हो हंसभूषित सुवर्ण-रत्नमय विचित्र विमानपर बैठकर अपने पितरोंके साथ कोटिसहस्र एवं कोटिशत कल्पोंतक ब्रहालोकमें पूजित होता है। इसी प्रकार जो (कभी) गङ्गातटपर शास्त्रीय विधिसे गोदान करता है, वह उस गायके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। यदि गङ्गातटपर वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक कपिला गौका दान दिया जाय तो वह गौ नरकमें पड़े हुए सम्पूर्ण पितरोंको तत्काल स्वर्ग पहुँचा देती है। जो गङ्गातटपर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्यभगवान्की प्रीतिके लिये ब्राह्मणोंको ग्रामदान करता है, उसे सम्पूर्ण दानोंका जो पुण्य है, समस्त यज्ञोंका जो फल है तथा सब प्रकारके तप, व्रत और पुण्यकर्मोका जो फल बताया गया है, वह सहलगुना होकर मिलता है। उस दानके प्रभावसे दाता पुरुष करोड़ों सूर्योके समान तेजस्वी विमानपर बैठकर अपनी रुचिके अनुसार श्रीविष्णुधाममें अथवा श्रीशिवधाममें प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा-विहार करता है। देवता उसकी स्तुति करते रहते हैं। देवि! जो अक्षयतृतीयाके दिन गङ्गातटपर श्रेष्ठ ब्राह्मणको सोलह माशा सुवर्ण दान करता है, वह भी दिव्यलोकोंमें पूजित होता है। अन्नदान करनेसे विष्णुलोककी और तिलदानसे शिवलोककी प्राप्ति होती है। रत्नदानसे ब्रह्मलोक, गोदान और सुवर्णदानसे इन्द्रलोक तथा सुवर्णसहित वस्त्रदानसे गन्धर्वलोकको प्राप्ति होती है। विद्यादानसे मुक्तिदायक ज्ञान पाकर मनुष्य निरञ्जन ब्रहाको प्राप्त कर लेता है।