यमराजके द्वारा ब्रह्माजीसे अपने कष्टका निवेदन और रुक्माङ्गदके प्रभावका वर्णन

तब यमराज बोले- पितामह ! पितामह !! नाथ! मेरी बात सुनिये। देव! किसीके प्रभावका जो खण्डन है, वह मृत्युसे भी अधिक दुःखदायक होता है। कमलोद्भव। जो पुरुष कार्यमें नियुक्त होकर स्वामीके उस आदेशका पालन नहीं करता; किंतु उनसे वेतन लेकर खाता है, वह काठका कीड़ा होता है। जो लोभवश प्रजा अथवा राजासे धन लेकर खाता है, वह कर्मचारी तीन सौ कल्पोंतक नरकमें पड़ा रहता है। जो अपना काम बनाता और स्वामीको लूटता है, वह मन्दबुद्धि मानव तीन सौ कल्पोतक घरका चूहा होता है। जो राजकर्मचारी राजाके सेवकोंको अपने घरके काम में लगाता है, वह बिल्ली होता है। देव। मैं सापकी मालासे धर्मपूर्वक प्रजाका शासन करता प्रभो! मुनियों तथा धर्मशास्त्र आदिके द्वारा भौति विचार करके पुण्यकर्म करनेवालेको पुण्यफलसे और पाप करनेवालेको पापके फलसे संयुक्त करता था। कल्पके आदिसे लेकर जबतक आपका वह दिन पूरा होता है, तबतक आपके ही आदेशके अनुसार मैं सब काम करता आया हूँ और आगे भी कर सकता हूँ, किंतु आज राजा रुक्माङ्गदने मेरा महान् तिरस्कार कर दिया है। जगन्नाथ ! उस राजाके भयसे समुद्रोंद्वारा घिरी हुई समूची पृथ्वीके लोग सर्वपापनाशक एकादशीके दिन भोजन नहीं करते हैं और उसके प्रभावसे भगवान् विष्णुके धाममें चले जाते हैं; वह भी अकेले नहीं, पितरों और पितामहींको भी साथ ले लेते हैं। इस लोकमें व्रत करनेवालोंके पितर तो वैकुण्ठलोकमें जाते ही हैं, उनके पितरों के पितर तथा माताके पिता-मातामह आदि भी विष्णुधामको चले जाते हैं, फिर उन सबके भी जो पिता-माता आदि हैं, उनके पूर्वज भी वैकुण्ठवासी हो जाते हैं। यही नहीं, उनकी पजियोंके पितर भी मेरी लिपिको मिटाकर विष्णुधामको चले जाते हैं। पिता आदिके साथ वीर्यका सम्बन्ध है और माताने तो गर्भमें ही धारण किया है। अतः उनकी सद्गति हो तो कोई अनुचित बात नहीं है। नियम यह है कि एक पुरुष जो कर्म करता है, उसका उपभोग भी वह अकेले ही करता है। ब्रह्मन् ! कर्तासे भिन्न जो उसके पिता हैं, उनके वीर्यसे उसका जन्म हुआ है और माताके पेटसे वह पैदा हुआ है। इसलिये वह जिसको पिण्ड देनेका अधिकारी है और जिससे उसका शरीर प्रकट हुआ है, ऐसे पिता और माता इन दोनों पक्षोंको वह तार सकता है। किंतु वह पब्रीका वीर्य तो है नहीं और न पत्नीने उसे गर्भ धारण किया है। अतः जगन्नाथ पति या दामादके पुण्यकी महिमासे उसकी पत्नी तथा श्वशुर पक्षके लोग कैसे परम पदको प्राप्त होते हैं? इसीसे मेरे सिरमें चक्कर आ रहा है। पद्मयोने! वह अपने साथ पिता, माता और पत्नी-इन तीन कुलोंका उद्धार करके मेरे लोकका मार्ग त्यागकर विष्णुधाममें पहुँच जाता है। वैष्णवव्रत एकादशीका पालन करनेवाला पुरुष जैसी गतिको पाता है, वैसी यति और किसीको नहीं मिलती। एकादशीके दिन अपने शरीरमें आँवलेके फलका लेपन करके भोजन छोड़कर मनुष्य दुष्कर्मोंसे युक्त होनेपर भी भगवान् धरणीधरके लोकमें चला जाता है। देव ! अब मैं निराश हो गया हूँ। इसलिये आपके युगल चरणारविन्दोंकी सेवामें उपस्थित हुआ हूँ। आपकी सेवामें अपने दुःखका निवेदनमात्र कर देनेसे आप सबको अभयदान देते हैं। इस समय जगत् की सृष्टि, पालन और संहारके लिये जो समयोचित कार्य प्रतीत हो, उसे आप करें। अब पृथ्वीपर वैसे पापी मनुष्य नहीं है, जो मेरे भूतगणों द्वारा साँकल और पाशमें बोधकर मेरे समीप लाये जाये और मेरे अधीन हों। सूर्यक तापसे युक्त हो यमलोकका मार्ग था, तो अत्यन्त तीज हायवाले विष्णुभकाने नष्ट कर दिया, अतः समस्त जनसमुदाय कुम्भीपाककी यातनाको त्यागकर परात्पर श्रीहरिके धाममें चला जा रहा है। त्रिभुवनपूजित देव! निरन्तर जाते हुए मनुष्योंसे ठसाठस भरे रहनेके कारण भगवान् विष्णुके लोकका मार्ग घिस गया है। जगत्पते। मैं समझता हूँ कि भगवान् विष्णुके लोकका कोई माप नहीं है, वह अनन्त है। तभी तो सम्पूर्ण जीवसमुदायके जानेपर भी भरता नहीं है। राजा रुक्माङ्गदने एक हजार वर्षसे इस भूमण्डलका शासन प्रारम्भ किया है और इसी बीचमें असंख्य मानवोंको चतुर्भुज रूप दे पीत वस्त्र, वनमाला और मनोहर अङ्गरागसे सुशोभित करके उन्हें गरुड़की पीठपर बिठाकर वैकुण्ठधाममें पहुंचा दिया। देवेश! लक्ष्मीपतिका प्रिय भक्त रुक्माङ्गद यदि पृथ्वीपर रह जायगा तो वह सम्पूर्ण लोकको भगवान् विष्णुके अनामय धाम वैकुण्ठमें पहुँचा देगा। लीजिये यह रहा आपका दिया हुआ दण्ड और यह है पट; यह सब मैंने आपके चरणोंमें अर्पित कर दिया। देवेश्वर! राजा रुक्माङ्गदने मेरे अनुपम लोकपालपदको मिट्टीमें मिला दिया। धन्य है उसकी माता, जिसने उसे गर्भ धारण किया था। मातासे उत्पत्र हुआ अधिक गुणवान् पुत्र सम्पूर्ण दु:खोंका विनाश करनेवाला होता है। माताको क्लेश देनेवाले पुत्रके जन्म लेनेसे क्या लाभ? देव! कुपुत्रको जन्म देनेवाली माताने व्यर्थ ही प्रसवका कष्ट भोगा है! विरशे! नि:संदेह इस संसारमें एक ही नारी वीर पुत्रको जन्म देनेवाली है, जिसने मेरी लिपिको मिटा देनेके लिये रुक्माङ्गदको उत्पन्न किया है। देव। पृथ्वीपर अबतक किसी भी राजाने ऐसा कार्य नहीं किया था। अत: भगवन्। जो भयंकर नगाड़ा बजाकर मेरे लोकके मार्गका लोप कर रहा है और निरन्तर भगवान् विष्णुकी सेवामें लगा हुआ है, ठस समाजदके पृथ्वीके रायपर स्थित रहते मेरा जीवन सम्भव नहीं।