मत्स्यपुराणकी विषय-सूची तथा इस पुराणके पाठ, श्रवण और दानका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं- द्विजश्रेष्ठ ! अब मैं तुम्हें मत्स्यपुराणका परिचय देता हूँ, जिसमें वेदवेत्ता व्यासजीने इस भूतलपर सात कल्पोंके वृत्तान्तको संक्षिप्त करके कहा है। नृसिंहवर्णन आरम्भ करके चौदह हजार श्लोकोंका मत्स्यपुराण कहा गया है। मनु और मत्स्यका संवाद, ब्रह्माण्डका वर्णन, ब्रह्मा, देवता और असुरोंको उत्पत्ति, मरुदणका प्रादुर्भाव, मदनद्वादशी, लोकपालपूजा, मन्वन्तर- वर्णन, राजा पृथुके राज्यका वर्णन, सूर्य और वैवस्वत मनुकी उत्पत्ति, बुध-संगमन पितृवंशका वर्णन, वाडकाल, पितृतीर्थ-प्रचार, सोमको उत्पत्ति सोमवंशका कथन, राजा ययातिका चरित्र कार्तवीर्य अर्जुनका चरित्र, सरिवंश वर्णन, भाशाप, भगवान् विष्णुका एबीपर इस बार जन्म (अवतार) पुरुवंशका कीर्तन, इलाकामाशका वर्णन पहले क्रियायोग, फिर  पुराणकीर्तन नक्षत्रव्रत, पुरुषव्रत, मार्तण्डशयनव्रत, श्रीकृष्णाष्टमीव्रत, रोहिणीचन्द्र  नामक व्रत, तड़ागविधिकी महिमा, वृक्षोत्सर्ग, सौभाग्यशयनवत, अगस्त्यव्रत, अनन्ततृतीयाव्रत, रसकल्याणिनीव्रत, आनन्दकरीव्रत, सारस्वतव्रत, उपरागाभिषेक (ग्रहणखान) विधि, ससमीशयनव्रत, भीमद्वादशी, अनङ्गशयनव्रत, अशून्यशयनव्रत, अङ्गारकव्रत, सप्तमीसप्तकव्रत, विशोकद्वादशीव्रत, दस प्रकारका मेरुप्रदान, ग्रहशान्ति, ग्रहस्वरूपकथा, शिवचतुर्दशी, सर्वफलत्याग, रविवारव्रत, संक्रान्तिस्नान, विभूतिद्वादशीव्रत, पाठीव्रत-माहात्म्य, स्नानविधिका वर्णन, प्रयागका माहात्य, द्वीप और लोकोंका वर्णन, अन्तरिक्षमें गमन, ध्रुवको महिमा, देवेश्वरोंके भवन, त्रिपुरका प्रकाशन, श्रेष्ठ पितरोंकी महिमा, मन्वन्तर निर्णय, चारों युगोंकी उत्पत्ति, युगधर्म- निरूपण, वाङ्गकी उत्पत्ति, तारकासुरकी उत्पत्ति, तारकासुरका माहात्य, ब्रह्मदेवानुकीर्तन, पार्वतीका प्राकर, शिवतपोवन, मदनदेहदाह, रतिशोक, गोरी तपोवन, शिवका गौरीको प्रसन्न करना,

पार्वती तथा ऋषियोंका संवाद, पार्वतीविवाह- मङ्गल, कुमार कार्तिकेयका जन्म, कुमारकी विजय, तारकासुरका भयंकर वध, नृसिंहभगवान् की कथा, ब्रह्माजीकी सृष्टि, अन्धकासुरका वध, वाराणसी-माहात्म्य, नर्मदा-माहात्म्य, प्रवर-गणना, पितृगाथाका कीर्तन, उभयमुखी गौका दान, काले मृगचर्मका दान, सावित्रीकी कथा, राजधर्मका वर्णन, नाना प्रकारके उत्पातोंका कथन, ग्रहणान्त, यात्रानिमित्तक वर्णन, स्वप्रमङ्गलकीर्तन, ब्राह्मण और वाराहका माहातप्य, समुद्र-मन्थन, कालकूटकी शान्ति, देवासुर संग्राम, वास्तुविद्या, प्रतिमालक्षण, देवमन्दिर निर्माण, प्रासादलक्षण, मण्डपलक्षण, भविष्य राजाओंका वर्णन, महादानवर्णन तथा कल्पकीर्तन-इन सब विषयोंका इस पुराणमें वर्णन किया गया है। जो पवित्र, कल्याणकारी तथा आयु और कीर्ति बढ़ानेवाले इस पुराणका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। जो इस पुराणको लिखकर सुवर्णमय मत्स्य और गौके साथ विषुव योगमें ब्राहाणको सत्कारपूर्वक दान देता है, वह परम पदको प्रास होता है।