नारद महा पुराण
नर्मदाके तीर्थोका दिग्दर्शन तथा उनका माहात्म्य
मोहिनी बोली- द्विज श्रेष्ठ ! मैंने सेतुतीर्थका उत्तम माहात्म्य सुन लिया। अब नर्मदाके तीर्थ- समुदायका वर्णन सुनना चाहती हूँ।
पुरोहित वसुने कहा- मोहिनी! मैं नर्मदाके दोनों तटोंपर विद्यमान तीर्थोका वर्णन करता हूँ। उत्तर तटपर ग्यारह और दक्षिण तटपर तेईस तीर्थ हैं। नर्मदा और समुद्रके संगमको पैंतीसवाँ तीर्थ कहा गया है। ॐकार-तीर्थके दोनों ओर अमरकण्टक पर्वतसे दो कोस दूरतक सब दिशाओंमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ विद्यमान हैं। एक करोड़ तीर्थ तो कपिलासंगममें हैं। अशोकवनिकामें एक लाख तीर्थ प्रतिष्ठित हैं। अङ्गारगर्ताके सौ और कुब्जाके दस हजार तीर्थ कहे गये हैं। वायुसंगममें सहस्र और सरस्वतीसंगममें सौ तीर्थ स्थित हैं। शुक्ल-तीर्थमें दो सौ, विष्णु-तीर्थमें एक हजार तीर्थ हैं। माहिष्मतीमें एक सहस और शूलभेद-तीर्थमें दस हजार तीथोकी स्थिति मानी गयी है। देवग्राममें एक सहस और उलूक-तीर्थ में
सात सौ तीर्थ हैं। मणि नदीक संगममें आठ तीर्थ हैं। वैद्यनाथमें एक सौ आठ और घटेश्वरमें भी उतने ही तीर्थ हैं। नर्मदा-समुद्र-संगममें डेढ़ लाख तीर्थों का निवास बताया गया है। व्यासद्वीपमें अट्ठासी हजार एक सौ तीर्थ हैं। करञ्जासंगममें दस हजार आठ तीर्थ हैं। एरण्डीसंगममें एक सौ आठ तीर्थ हैं। धूतपाप-तीर्थमें अड़सठ और कोकिलमें डेढ़ करोड़ तीर्थ हैं। नरेश्वरि ! रोमकेशमें सहस्र, द्वादशार्क में सहस्र तथा शुक्ल-तीर्थमें आठ लाख दो हजार तीर्थ हैं। सभी संगौमें एक सौ आठ तीर्थों की स्थिति मानी गयी है। कावेरी-संगम या नन्द-तीर्थमें पांच सौ अवान्तर तीर्थ हैं। भृगुक्षेत्रमें एक करोड़ और भारभूतिमें एक सौ आठ तीर्थ विद्यमान हैं। अक्रूरेश्वरमें डेढ़ सौ और विमलेश्वरमें एक लाख तीर्थ हैं। शुभानने। सूर्यके दस, कपिलके नौ, चन्द्रमाके आठ और नन्दीके एक करोड़ आठ तीर्थ हैं। स्तवकॉमें दो सौ चौदह तीर्थ हैं। ये सब शैवतीर्थहै। वैष्णवतीर्थ बाईस है। ब्राह्मतीर्थ तो सभी है। अट्ठाईस शाक्ततीर्ष है। उनमें भी सात तीर्थ मातृकाओंके हैं। उनमेंसे तीन ब्राझीके हैं। भद्रे ! दो वैष्णवी और दो रौद्री-तीर्थ हैं। ब्राह्मी और वैष्णवीके सिवा शेष स्थानों में रुद्रशक्ति विद्यमान हैं। सुमुखि! एक तीर्थ क्षेत्रपालका भी बताया गया है। मोहिनी ! नर्मदामें गुप्त और प्रकट बहुत-से अवान्तर तीर्थ हैं। वायुदेवताने भूतल, अन्तरिक्ष और धुलोकमें जो साढ़े तीन करोड़ तीर्थ बताये हैं, वे सब नर्मदामें विद्यमान हैं। महाभागे! जो मानव इनमें जहाँ-कहीं भी स्रान करता है, वह शुद्धचित्त होकर उत्तम गति पाता है। नर्मदाके तटपर किया हुआ मान, दान, जप, होम, वेदाध्ययन और पूजन सब अक्षय हो जाता है। देवि। इस प्रकार मैंने तुमसे नर्मदाके तीर्थ- समुदायका वर्णन किया है। यह स्मरण करनेवाले मनुष्योंके भी महापातकका निवारण करनेवाला है। जो मानव नर्मदाके तीर्थोका यह संग्रह सुन लेता है अथवा पढ़ता या सुनाता है, भद्रे ! वह भी पापोंसे मुक्त हो जाता है।