निरुत्त-वर्णन

सनन्दनजी कहते हैं-अब मैं निरुक्तका वर्णन करता हूँ, जो वेदका कर्णरूप उत्तम अङ्ग है। यह वैदिक धातुरूप है, इसे पाँच प्रकारका बताया गया है ॥ १ ॥ उसमें कहीं वर्णका आगम होता है, कहीं वर्णका विपर्यय होता है, कहीं वर्गीका विकार होता है और कहीं वर्णका नाश माना गया है ॥२॥ नारद! जहाँ चर्णकि विकार अथवा नाशद्वारा जो धातुके साथ विशेष अर्थका प्रकाशक संयोग होता है, वह पाँचवाँ उत्तम योग कहा गया है ॥ ३ ॥ वर्णके आगमसे 'हंस':' पदकी सिद्धि होती है। वर्णो के विपर्यय (अदल-बदल)-से 'सिंह':' पद सिद्ध होता है। वर्णविकारसे 'गूढोत्मा' की सिद्धि होती है। वर्णनाशसे 'पृषोदर: ' सिद्ध होता है॥४॥ 'भ्रमर' आदि शब्दोंमें पाँचवाँ योग समझना चाहिये। वेदोंमें लौकिक नियमोंका विकल्प या विपर्यय कहा गया है। यहाँ 'पुनर्वसु' पदको उदाहरणके रूपमें रखना चाहिये ॥५॥ 'नभस्वत्'- में 'वत्' प्रत्यय परे रहते भसंज्ञा हो जानेसे 'स'का रूत्व नहीं हुआ। (वार्तिक भी है-'नभोऽङ्गिरोमनुषां वत्युपसंख्यानम्') 'वृषन् अश्वो यस्य सः' इस विग्रहमें बहुव्रीहि समास होनेपर 'वृषन्-अधः' इस अवस्थामें अन्तर्वर्तिनी विभक्तिका आश्रय लेकर पदसंज्ञा करके नकारका लोप प्राप्त था, किंतु 'वृषण् वस्वच्चयोः' इस वार्तिकके नियमानुसार भसंज्ञा हो जानेसे न लोप नहीं हुआ; अत: 'वृषणश्वः' यही वैदिक प्रयोग है। (लोकमें 'वृषाश्व:' होता है।) कहीं-कहीं आत्मनेपदके स्थानमें परस्मैपदका प्रयोग होता है। यथा-'प्रतीपमन्य ऊर्मियुध्यति' यहाँ 'युध्यते' होना चाहिये, किंतु परस्मैपदका प्रयोग किया गया है। 'प्र' आदि उपसर्ग यदि धातुके पहले हों तो उनकी उपसर्ग एवं गतिसंज्ञा होती है; किंतु वेदमें वे धातुके बादमें या व्यवधान देकर प्रयुक्त होनेपर भी 'उपसर्ग' एवं 'गति' कहलाते हैं यथा 'हरिभ्यां याह्योक आ। आ मन्तैरिन्द्र हरिभिर्याहि ।' यहाँ 'आयाहि' के अर्थमें 'याहि+आ' का व्यवहित तथा पर प्रयोग है। दूसरे उदाहरणमें आ+याहिके बीच में बहुत से पदोंका व्यवधान है॥६॥ वेदमें विभक्तियोंका विपर्यास देखा जाता है, जैसे-'दधा जुहोति'; यहाँ 'दुधि' शब्द 'हु' धातुका कर्म है, उसमें द्वितीया होनी चाहिये, किंतु 'तृतीया च होश्छन्दसि' इस नियमके अनुसार कर्ममें तृतीया हो गयी है। 'अभ्युत्सादयामक ' इसमें अभि उत्पूर्वक 'सद्' धातुसे लुङ् लकारमें 'आम्' और 'अक'- का अनुप्रयोग हुआ है (लोकमें 'अभ्युदधीषदत्' रूप बनता है)।' मा त्वाग्नियनयीत्' इसमें 'नोनयति ध्वनय० इत्यादि वैदिक सूत्र के द्वारा प्लिके अभावका निषेध होता है। माइके योगमें 'अट्

१. हन्तीति इंसः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार हन्-धातुके आगे ('वृत्वदिहनिः' इत्पादि उणादि सूत्रो) 'प्र'का आगम होनेसे 'हंस' शब्द बनता है। २. 'हिसि हिंसायाम्' इस धातुसे 'हिनस्तीति' इस व्युत्पत्रिके अनुसार कर्यय अच् प्रषष करनेपर पहले 'हिंसः' मनसा है, फिर "पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम् के आदेशानुसार 'ह' के म्यानमें 'स' और 'स' के स्थानमें 'ह' आ जानेसे 'सिंह पद सिद्ध होता है। ३. 'गूढ+आत्मा' इस अवस्या 'आ' विकृत हो 'उ' के रूपमें परिणत हुआ और गुण होनेसे धूढोत्मा' बना। (एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते) 1४. 'पृयोदरः' में 'पृषद् उदरः' यह पदच्छेद है। पृषोदरादीनि पयोपदिष्टम् के आदेशानुसार यहाँ तकारका लोप (नारा) हुआ तथा गुण होनेसे 'पृषोदरः सिद्ध हुआ है। ५. 'भ्रमतीति भ्रमर: ' यहाँ 'भ्रम अनवस्थाने से अर्तिकपिपिचपिदेविवासिचित् इस उणादि सूत्रके अनुसार 'अर' प्रत्यय होनेसे 'भ्रमर' शब्द सिद्ध होता है। किन्हीं विद्वानकि मतमें 'प्रमन् ति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'भ्रमर' शब्द बनता है। इसमें 'प्रम् अतृ++अच्' इस अवस्था 'तृ'का लोप' टका लोप करनेसे 'भ्रमर की सिद्धि होती है। ६. लौकिक प्रयोगमें 'पुनर्वसु' शब्द नित्य द्विवचनान्त है, किंतु वेदमें 'छन्दसि पुनर्वस्वोरेकवचनम् 'के नियमानुसार इसका एकवचनान्त प्रयोग भी होता है।

आट्' न होनेसे 'ध्वनयीत्' रूप हुआ है (लोकमें घटादि ध्वन धातुका रूप 'अदिध्वनत्' होता है और चुरादिका रूप'अदध्वनत्' होता है)। ध्वनयीत्' इत्यादि प्रमुख उदाहरण हैं। 'निष्टर्यः' इत्यादि प्रयोग वेदमें निपातनसे सिद्ध होते हैं। 'छन्दसि निष्टय' इत्यादि सूत्र इसमें प्रमाण हैं। यहाँ 'निस् पूर्वक कृत्' धातुसे 'ऋदुपधाच्च' सूत्रके अनुसार 'क्यप्' प्राप्त था; परंतु 'ण्यत्' प्रत्यय हुआ है। साथ ही 'कृत' में आदि-अन्तका विपर्यय होनेसे 'तृक' रूप बना। फिर गुण होनेसे तयं हुआ। 'निस् के 'स्' का षत्व हुआ और ष्टुत्व होकर 'निष्टळ' सिद्ध हुआ। 'गृभाय' इत्यादि प्रयोग वैकल्पिक 'शायच्' होनेसे बनते हैं। ह-धातुसे शायच् हुआ और 'हग्रहोर्भश्छन्दसि' के आदेशानुसार 'ह' के स्थानमें 'भ' हो गया तो 'गृभाय' बना- 'गृभाय जिह्वया मधु' ॥७॥ शास्त्रकार सुप, तिङ् उपग्रह (परस्मैपद-आत्मनेपद), लिङ्ग, पुरुष, काल, हल, अच्, स्वर, कर्तृ, (कारक) और यङ्-इन सबका व्यत्यय (विपर्यय) चाहते हैं, वह भी बाहुलकसे सिद्ध होता है ॥८॥ 'रात्री' शब्दमें 'रात्रेचाजसौ' (पा० सू०४।१।३१) इस नियमके अनुसार रात्रि-शब्दसे डीप् प्रत्यय हुआ है। (लोकमें 'कृदिकारादक्तिनः 'से डीष होकर अन्तोदात्त होता है।) 'विभ्वी' में भी विभु-शब्दसे 'भुवश्च' के नियमानुसार डी हुआ है। 'कडूः' पदमें 'कट्ठकगण्हल्चोश्छन्दसि' से ऊ प्रत्यय हुआ है। 'आविष्टयो वर्धते' इत्यादि स्थलोंमें 'अविष्टयस्योपसंआनन्दसि' के नियमानुसार 'आविस्' अव्यय से 'त्या' यह खित-पत्यय हुआ है। वाजसनेयिन: ' में वाजसनेयेन प्रोक्तमधीयते' इस ब्युत्पत्तिके अनुसार वाजसनेय शब्दसे 'शौनकादिश्वरचन्दास सूचके द्वारा मान प्रत्यय हुआ है॥९॥ 'कर्णाभि में पल छन्दसि के नियमानुसार भिम्' के स्थान ऐस् आदेश नहीं हुआ हैं। यशोभग्यः पद में वेशोयश आदेर्भगाद् यल्' इस सूत्रसे 'यल्' प्रत्यय हुआ है। इत्यादि उदाहरण जानने चाहिये। 'चतुरक्षरम्' पदसे चार अक्षरवाले 'आश्रावय''अस्तु श्रौषट्' आदि पदोंकी ओर संकेत किया गया है। अक्षर-समूह वाच्य हो तो 'छन्दस्' शब्दसे 'यत्' प्रत्यय होता है- 'छन्दस्य:' यह उदाहरण है। 'देवासः' में 'आज्जसेरसुक्' इस नियमके अनुसार 'असुक्' का आगम हुआ है। 'सर्वदेव' शब्दसे स्वार्थमें 'तातिल' प्रत्यय होता है। 'सविता नः सुवतु सर्वदेवतातिम्' इस उदाहरणमें 'सर्वदेव' शब्दसे 'तातिल' प्रत्यय होनेपर 'सर्वदेवताति' शब्दकी सिद्धि होती है। युष्मद्', 'अस्मद्' शब्दोंसे सादृश्य- अर्धमें 'वतुप्' प्रत्यय होता है। इस नियमसे 'त्वावत:' पदकी सिद्धि हुई है। 'त्वावत:' का पर्याय है 'त्वत्सदृशान्' (तुम्हारे सदृश) ॥ १० ॥'उभयाविनम्' इत्यादि पदोंमें 'बहुलं छन्दसि' के नियमसे मत्वर्थमें विनि प्रत्यय हुआ है। 'छन्दोविन्प्रकरणे० ' इत्यादि नियमसे उभय शब्दके अकारका दीर्घ होनेसे 'उभयाविनम्' रूप बना है। प्रल, पूर्व आदि शब्दोंसे इवार्थमें 'थाल्' प्रत्यय होता है, इस नियमसे 'प्रत्नथा' बनता है। इसी प्रकार 'पूर्वथा' आदि भी हैं। वेदमें 'ऋ' शब्द परे होनेपर त्रिका सम्प्रसारण होता है और उत्तरपदके आदिका लोप हो जाता है। 'तिस्त्र ऋचो यस्मिन् तत् तृचं सूक्तम्। जिसमें तीन चाएँ हों, उस सूक्तका नाम 'तूच', है।त्रि+ऋच् इस अवस्थामें 'त्रि का सम्प्रसारण होनेपर 'तृ' बना और ऋचुके ऋका लोप हो गया तो 'तृचम्' सिद्ध हो गया। 'इन्द्रश्च विष्णो यदपायुधेथाम्' यहाँ अप' उपसर्गके साथ 'स्पृध' भातुके लङ्लकारमें प्रथम पुरुषके द्विवचनका रुप है। अपस्पृधेथाम् में प्रथम पुरुषके द्विवचनका रुप है। अपस्पृधेथाम् यह निपातनसे सिद्ध होता है। रेफका सम्प्रसारण और अलोप निपातन से ही होता है। माङ्का योग न होनेपर भी अडागमका अभाव हुआ है(लोक में इसका रुप अपास्पर्धेथाम् होता है।)वसुभिर्नो अव्यात् इत्यादि में

'अव्यादवद्या०' इत्यादि सूत्रके अनुसार व्यपर'अ' परे होनेपर एक (ओ)-का प्रकृतिभाव हुआ है। 'आपो अस्मान् मातरः' इत्यादि प्रयोग भी 'आपो जुषाणो०' आदि नियमके अनुसार प्रकृति-भायसे सिद्ध होते हैं। आकार परे रहनेपर 'आपो' आदिमें प्रकृतिभाव होता है ॥११॥'समानो गर्भः सगर्भस्तत्र भव: सगभर्यः।' यहाँ 'समानस्य सः' इत्यादि सूत्रसे समानका 'स' आदेश हुआ है। 'सगर्भसयूथसनुताद् यत्' से यत्-प्रत्यय हुआ है। 'अष्टापदी' यहाँ 'छन्दसि च'-के नियमानुसार उत्तरपद परे रहते अष्टन्के 'न'का 'आ' आदेश हो गया है। 'ऋतौ भवम् ऋत्व्यम्'-जो ऋतुमें हो, उसे 'ऋत्व्य' कहते हैं।'ऋत्व्यवास्त्व्यः' इत्यादि सूत्रसे निपातन करनेपर 'ऋत्व्यम्' पदकी सिद्धि होती है। अतिशयेन 'ऋजु' इति 'रजिष्ठम्'-जो अत्यन्त ऋजु (कोमल या सरल) हो, उसे 'रजिष्ट' कहा गया है। 'विभाष|श्छन्दसि' के नियमानुसार इष्ठ, इमन् और ईयस् परे रहनेपर ऋजुके 'ऋके स्थानमें 'र' होता है। 'ऋजु इष्ठ' इस अवस्था में ऋके स्थानमें 'र' तथा उकार लोप होनेसे 'रजिष्ठ' शब्द बना है। 'त्रिपञ्चकम्'-त्रीणि पञ्चकानि यत्र तत् 'त्रिपञ्चकम्' इस विग्रहके अनुसार बहुव्रीहि समास करनेपर 'त्रिपञ्चकम्' की सिद्धि होती है। 'हिरण्ययेन सविता रथेन' इस मन्त्र-वाक्यमें 'ऋत्व्यवास्त्व्य' आदि सूत्रके अनुसार हिरण्य- शब्दसे 'मयट्' प्रत्यय और उसके 'म'- लोप निपातन किया जाता है। इससे 'हिरण्यय' शब्दकी सिद्धि होती है। 'इतरम्'-वेदमें इतर शब्दसे 'अद्ड' का निषेध है। अत: 'सु को 'अम्' आदेश होनेसे 'इतरम्' पद सिद्ध होता है। यथा-'वाघ्नमितरम्'। 'परमे व्योमन् यहाँ 'व्योमनि' रूप प्राप्त था, किंतु 'सुपो सुलुक' इत्यादि नियमसे कि विभक्तिका लुक हो गया ॥१२॥ 'उर्विया' की जगह 'तरुणा' रूप प्राप्त था। 'टा' का 'इया' आदेश होनेसे 'उपिया' रूप बना

"हयाडियाजीकाराणामुपसंख्यानम्' इस वार्तिकसे यहाँ इयाज्' हुआ है। स्वप्रया के स्थानमें 'स्वप्रेन' यह रूप प्राप्त था, किंतु 'सुपा सुलुक्०' इत्यादि नियमके अनुसार 'टा' का 'अयाच्' हो गया; अतः 'स्वप्रया' रूप बना। वारयध्वम्' रूप प्राप्त था, किंतु 'ध्वमो ध्वात्' सूत्रसे 'ध्वम्' के स्थानमें ध्वात्' आदेश होनेसे 'वारयध्वात्' हो गया। 'अदुहत' के स्थानमें 'अदुह' यह वैदिक प्रयोग है। लोपस्त आत्मनेपदेषु' इस सूत्रसे तलोप और 'बहुलं छन्दसि' से रुट्का आगम हुआ है। 'वै' पादपूर्तिके लिये है। 'अवधिषम्' यह रूप प्राप्त था, इसके स्थानमें 'वधीं' रूप हुआ है। यहाँ अम्'का 'म्' आदेश और अडागमका अभाव तथा 'ईट्' का आगम हुआ है-वर्धी वृत्रम्। 'यजध्वनं'–यहाँ ' यजध्वम् एनम्' इस दशामें 'ध्वम्' के 'म्' का लोप होकर वृद्धि होनेसे उक्त रूपकी सिद्धि हुई है। 'तमो भरन्त एमसि'–यहाँ 'इम: के स्थानमें 'इदन्तो मसि' इस सूत्रके अनुसार 'एमसि' रूप हुआ है। 'स्विन्नः स्नात्वी मलादिव'- इस मन्त्रमें 'नात्वा' रूप प्राप्त था; किंतु 'स्रात्व्यादयश्च'- इस सूत्रके अनुसार उसके स्थानमें 'स्नात्वी' निपातन हुआ। 'गत्वाय'-गत्वाके स्थानमें 'क्त्वो यक्' सूत्रके अनुसार 'या'का आगम होनेसे उक्त पद सिद्ध होता है। 'अस्थभिः' में अस्थि-शब्दके 'इ'को 'अन आदेश होकर नलोप हो गया है। 'छन्दस्यपि दृश्यते' इस नियमसे हलादि विभक्ति परे रहनेपर भी 'अनङ् आदेश होता है ।।१३ ॥ 'गोनाम्' यहाँ आम्-विभक्ति परे रहते नुट्का आगम हुआ है। किसी छन्दके पादान्तमें गों-शब्द हो तो प्रायः षष्ठी बहुवचनमें वहाँ नुट्का आगम हो जाता है। अपरिहताः' यहाँ 'हु वरेश्छन्दसि 'से प्राप्त हुए "हु' आदेशका अभाव निपातित हुआ है। 'ततुरिः', 'जगुरिः' इत्यादि पद भी 'बहुलं छन्दसि' के नियमसे निपातनद्वारा सिद्ध होते हैं। 'ग्रसिताम्' 'ग्रसु' अदनेका निष्ठान्त रूप है। यहाँ इट्का निषेध प्राप्त था, किंतु निपातनसे इट् हो गया है। इसी प्रकार 'स्कभित' आदिको भी समझना चाहिये। पश्वे' यहाँ 'जसादिषु छन्दसि वा वचनं०' इत्यादिसे वैकल्पिक घि-संज्ञा होनेके कारण घि-संज्ञाके अभावमें यण होनेसे 'पश्वे' रूप बना है। इसी तरह 'दधद्' यह दधातिके स्थानमें निपातित हुआ है; लेट्का रूप है। दधद्रत्र्तानि दाशुषे' यह मन्त्र है। 'बभूथ' यह लिट् लकारके मध्यम पुरुषका एकवचन है। वेदमें इसके 'इट्' का अभाव निपातित हुआ है। 'प्रमिणन्ति'- यहाँ 'प्रमीणन्ति' रूप प्राप्त था। 'मीनातेनिंगमे' सूत्रसे हस्व हो गया। 'अवीवृधत्'-'नित्यं छन्दसि' से चङ् परे रहते उपधा ऋवर्णका 'ऋ'-भाव नित्य होता है ॥ १४ ॥ "मित्रयुः' यहाँ दीर्घका निषेध होता है। 'दुष्ट इवाचरति' इस अर्थमें क्यच् परे रहते दुष्ट शब्दका 'दुरस्' आदेश होता है। 'दुरस्युः . यह निपातनात् सिद्ध रूप है। इसी प्रकार 'द्रविणस्यु: इत्यादि भी है । वेदमें 'क्त्वा' परे रहते हा धातुका 'हि' आदेश विकल्पसे होता है। 'हि' आदेश न होनेपर घुमास्था०' इत्यादि सूत्रसे 'आ' के स्थानमें 'ई' हो जाता है; अत: 'हित्वा' और 'होत्वा' दोनों रूप होते हैं। 'सु' पूर्वक धा-धातुसे 'क्त'प्रत्यय परे होनेपर 'इत्व' निपातन किया जाता है; इससे 'सुधितम्' रूप बनता है-यथा 'गर्भ माता सुधित वक्षणासु।' 'दाधर्ति', 'दधर्ति' और 'दर्षि' आदि रूप निपातनसे सिद्ध हैं। ये 'धू' धातुके यलगन्त रूप हैं। 'स्ववद्भिः' अव-धातुसे असुन् करनेपर 'अवस्' रूप होता है। शोभनमवो येषां रे स्ववसः, तैः स्ववद्भिः यह उसकी व्युवति है। 'स्वव स्वतवसोरुषसचेष्यते' इस वार्तिकसे भकारादि प्रत्यय परे रहते 'स्ववस्' आदि शब्दों के 'म' का 'त्' हो जाता है। प्रसवार्थक 'सू' धातुके लिटमें 'ससूवति निगमे सूत्रसे ससूच' यह निपातसिस रूप है। पथा-'गृष्टिः ससूब स्थविरम्। 'सुधित इत्यादि से 'क्व'के स्थान विश्व निपातित होता है-'धिस्व व दक्षिण इन्द्रहस्ते' ॥१५॥ 'प्रप्रायमग्निः' यहाँ प्रसमुपोदः पादपूरणे' से पादपूर्तिक लिये 'प्र' उपसर्गका द्वित्व हो गया है। 'हरिवते हर्यश्वाय' यहाँ 'छन्दसीरः' से 'मतुप्' के 'म' का 'व' हुआ है। अक्षण्वन्तः' में अक्षि-शब्दसे मतुप, 'छन्दस्यपि दृश्यते' से अनङ्-आदेश तथा 'अनो नुट्' से 'नुट्' का आगम हुआ है। 'सुपथिन्तरः' में 'नाद्घस्य' से 'नुट्' का आगम विशेष कार्य है। 'रथीतरः' में 'ईद्रथिनः' से 'ई' हुआ है। 'नसत्तम्' में नपूर्वक सद्-धातुसे निष्ठामें नत्वका - अभाव निपातित हुआ है। इसी प्रकार सूत्रोक्त - 'निषत्त' आदि शब्दोंको जानना चाहिये।' अमरेव'- - इसमें 'अमस्' शब्द ईषत् अर्थमें है। वेदमें सकारका - वैकल्पिक रेफ निपातित हुआ है। 'भुवरथो इति' यहाँ ‘भुवश्च महाव्याहतेः' से भुवस्के 'स्'का 'र्' हुआ है॥१६॥ 'ब्रूहि' यहाँ 'ब्रूहि प्रेष्य०' इत्यादि सूत्रसे उकार प्लुत हुआ है। यथा- अग्रयेऽनुबूदहि। 'अद्यामावास्येत्या३त्थ' यहाँ न 'निगृह्यानुयोगे च' इस सूत्रसे वाक्यके 'टि'का प्लुतभाव होता है। 'अग्नीत्प्रेषणे परस्य च' इस सूत्रसे आदि और परका भी प्लुत होता है। य उदाहरणके लिये 'ओ३श्रा ३ वय' इत्यादि पद के है। इन सबमें प्लुत हुआ है। 'दाश्वान्' आदि पद नं क्वसु-प्रत्ययान्त निपातित होते हैं। 'स्वतवान्' २ शब्दके नकारका विकल्पसे 'रु' होता है, पायु न्त शब्द परे रहनेपर-स्वतवाँ. पायुरने।' 'त्रिभिष्ट पर देव सवितः।' यहाँ 'त्रिभिस्। त्वम्' इस दशामें 'युष्मत्तत्ततक्षुष्वन्त:पादम्' इस सूत्रमें 'स्' के स्थानमें'' होकर ष्टत्व होनेसे 'त्रिभिष्टम् ' बनता है। द' नृभिष्टतः' यहाँ 'स्तुतस्तोमयोश्छन्दसि' इस सूत्रसे 'नृभिस्' के 'स्' का 'ए' होकर प्रत्व हुआ में है॥१७॥ अभीषण ' यहाँ 'गुना' सूत्रसे 'र' द्व का हुआ है। तापाहम्' म 'सह) पृतनाभ्या न'च' इस सूत्रसे स्'का सूर्धन्य आदेश हुआ है। न्यपी यहाँ भी निभायोऽव्यवाये वा छन्दसि' इस सूत्रसे 'स' का मूर्धन्य हुआ है। 'नृमणाः' इस पदमें 'छन्दस्यूदवग्रहात्' सूत्रसे 'न' का 'ण' हुआ है। बाहुलक चार प्रकारके होते हैं-कहीं प्रवृत्ति होती है, कहीं अप्रवृत्ति होती है, कहीं वैकल्पिक विधि है और कहीं अन्यथाभाव होता है। इस प्रकार सम्पूर्ण वैदिक पद-समुदाय सिद्ध है। क्रियावाची 'भू' 'वा' आदि शब्दोंकी 'धातु' संज्ञा जाननी चाहिये। 'भू' आदि धातु परस्मैपदी माने गये हैं ॥१८-१९॥ 'एध' आदि छत्तीस धातु उदात्त एवं आत्मनेपदी हैं (इन्हें 'अनुदात्तेत्' माना गया है)। मुने! 'अत' आदि सैंतीस धातु परस्मैपदी हैं ॥ २० ॥ शी-कृ आदि बयालीस धातु आत्मनेपदमें परिगणित हुए हैं। फक्क आदि पचास धातु उदात्तेत् (परस्मैपदी) कहे गये हैं॥२१॥ वर्च आदि इक्कीस धातु अनुदात्तेत् (आत्मनेपदी) बताये गये हैं। 'गुप्' आदि बयालीस धातु 'उदात्तेत्' (परस्मैपदी) कहे गये हैं ॥ २२ ॥ 'घिणि' आदि दस धातु शाब्दिकोंदारा 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। 'अण्' आदि सत्ताईस धातु 'उदात्तेत्' बताये गये हैं ॥ २३॥'अय' आदि चौतीस धातु वैयाकरणोंद्वारा अनुदात्तेत् (आत्मनेपदी) माने गये हैं। मव्य' आदि बहत्तर धातु उदात्तानुबन्धी कहे गये हैं॥२४॥ धावु' धातु अकेला ही 'स्वरितेत्' कहा गया है। क्षुध्' आदि बावन धातु 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं ॥२५॥ 'घुषिर' आदि अठासी धातु 'उदात्तेत्' माने गये हैं। 'झुत' आदि बाईस धातु 'अनुदात्तेत्' स्वीकार किये गये हैं॥२६॥ घटादिमें तेरह धातु 'पित्' और 'अनुदात्तेत्' कहे गये हैं। तदनन्तर 'ज्वर' आदि बावन धातु उदात्त गये हैं ॥२७॥ 'राज' धातु 'स्वरितेत्' है। उसके बाद 'आज' प्रा और लाभू-ये तीन धातु 'अनुदा' कहे गये है। तनार स्यम्' धातुले लेकर आगे सभी आधुदास एवं उदासेत् (परस्मैपदी) है. फिर एकमात्र 'वह' धातु अनुदात्तेत् तथा अकेला 'रम' भा'आत्मनेपदी' है। उसके बाद 'सद' आदि तीन धातु 'उदात्तेत्' हैं। फिर 'कुच' आदि चार धातु भी उदात्तेत्' (परस्मैपदी) ही हैं ॥ २९॥ इसके बाद 'हिक्क' आदि पैंतीस धातु 'स्वरितेत्' हैं। "श्रिञ्' धातु स्वरितेत् है। 'भू' आदि चार धातु भी स्वरितेत् ही हैं ॥३०॥ 'घेट्' आदि छियालीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'स्मिङ्' आदि अठारह धातु आत्मनेपदी माने गये हैं। ३१ ॥ फिर 'पू' आदि तीन धातु अनुदात्तेत् कहे गये हैं। 'ह्व' धातु परस्मैपदी है। फिर 'गुप'से लेकर तीन धातु आत्मनेपदी हैं ॥ ३२ ॥ 'रम' आदि धातु अनुदात्तेत् हैं और 'विश्विदा' उदात्तेत् है। स्कम्भु आदि पंद्रह धातु परस्मैपदी हैं ॥३३॥ 'कित' धातु 'उदात्तेत्' है। 'दान' 'शान'-ये दो धातु उभयपदी हैं। 'पच' आदि नौ धातु स्वरितेत् (उभयपदी) हैं। वे परस्मैपदी (और आत्मनेपदी दोनों) माने गये हैं ॥ ३४॥ फिर तीन स्वरितेत् धातु हैं। परिभाषणार्थक 'वद' और 'वच' धातु परस्मैपदी हैं। ये एक हजार छ: धातु भ्वादि कहे गये हैं ।। ३५ ॥

'अद' और 'हन्' धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'द्विष' आदि चार धातु स्वरितेत् माने गये हैं ॥३६॥ यहाँ केवल 'चक्षिङ् धातु आत्मनेपदी कहा गया है। फिर 'ईर' आदि तेरह धातु अनुदात्तेत् हैं ॥ ३७॥ मुने! वैयाकरणोंने 'पू' और 'शीङ्-इन दो धातुओंको आत्मनेपदी कहा है। फिर 'घु आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं ॥ ३८॥ मुनीश्वर ! यहाँ एक 'ऊर्गुञ्' धातु स्वरितेत कहा गया है। 'धु' आदि तीन धातु परस्मैपदी बताये गये हैं।। ३९ ॥ नारद! केवल 'एन्' धातुको शाब्दिकोंने उभयपदी कहा है।॥ ४० ॥ 'रा' आदि अठारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं। नारद! फिर केवल 'इङ्' धातु आत्मनेपदी कहा गया है।। ४१ ।। उसके बाद 'विद' आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये है। 'जिवा शये' यह धातु परस्मैपदी कहा गया है।॥ ४२ ॥ मुने। ' श्वस'

आदि धातु मैंने तुम्हें परस्मैपदी कहे है।'दीधीह और 'वेवी-ये दो धातु आत्मनेपदी माने गये हैं ॥४३॥ 'षस' आदि तीन धातु 'उदात्तेत्' हैं। मुनिश्रेष्ठ । 'चकरीतं च' यह यङ्लुगन्तका प्रतीक है। यह अदादि माना गया है। 'हद धातु अनुदात्तेत् कहा गया है ॥४४॥ इस प्रकार अदादि गणमें तिहत्तर धातु बताये गये हैं।

'हु' आदि चार धातु (हु, भी, ही और पृ) परस्मैपदी माने गये हैं ॥ ४५ ॥' भृब्' धातु स्वरितेत् और 'ओहाक्' धातु उदात्तेत् है। 'माई और 'ओहाङ्-ये दोनों धातु अनुदात्तेत् हैं। दानार्थक 'दा' और धारणार्थक 'धा'-इनमें स्वरितकी इत्संज्ञा हुई है ॥४६॥ 'णिजिर्' आदि तीन धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। 'घृ' आदि बारह धातु परस्मैपदी माने गये हैं ॥४७॥ इस प्रकार हादि (जुहोत्यादि) गणमें बाईस धातु कहे गये हैं।

'दिव्' आदि पचीस धातु परस्मैपदी कहे गये हैं॥४८॥ भारद! 'पूडू आदि 'दूई-ये आत्मनेपदी हैं। 'धूङ् आदि सात धातु ओदित् और आत्मनेपदी माने गये हैं। ४९॥ विप्रवर! 'लीङ् आदि धातु यहाँ आत्मनेपदी बताये गये हैं। श्यति (शो) आदि चार धातु परस्मैपदी हैं ॥५०॥ मुने! 'जनी' आदि पंद्रह धातु आत्मनेपदी हैं। 'मृष' आदि पाँच धातु 'स्वरितेत्' कहे गये हैं ॥५१॥ 'पद' आदि ग्यारह धातु आत्मनेपदी हैं। यहाँ वृद्धि-अर्थमें ही अकर्मक 'राध' धातुका ग्रहण है। यह स्वादि और चुरादिगणमें भी पड़ा गया है॥५२॥ राध आदि तेरह धातु उदात्तेत् कहे गये हैं। तत्पश्चात् रध आदि आठ धातु परस्मैपदी बताये गये हैं ॥५३॥ शम आदि छिया से धातु उदात्तेत् कहे गये हैं। इस प्रकार दिवादिमें एक सौ चालीस धातु माने गये हैं ॥५४॥

'सु' आदि नौ भातु स्वरिलेत् कहे गये हैं। मुने। 'दु' आदि सात धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥५५॥ 'अश' और 'हिय' ये दो भाषु अनुदात्तेत् कहे गये हैं। यहाँ 'तिक' आदि चौदह

धातुओंको परस्मैपदी माना गया है ।।५६ ॥ विप्रवर! स्वादिगणमें कुल बत्तीस धातु बताये गये हैं।

मुनिश्रेष्ठ ! 'तुद' आदि छः स्वरितेत् हैं ।। ५७ ।। 'ऋषी' धातु उदात्तेत् है और 'जुषी' आदि चार धातु आत्मनेपदी हैं। 'प्रश्च' आदि एक सौ पाँच धातु उदात्तेत् कहे गये हैं।५८॥ मुनीश्वर! यहाँ केवल 'गुरी' धातु अनुदात्तेत् बताया गया है। 'णू' आदि चार धातु परस्मैपदी माने गये हैं ।। ५९ ॥ 'कुङ् धातुको 'अनुदात्तेत्' कहा गया है। यहीं कुटादिगणकी पूर्ति हुई है। 'पृङ्' और 'मृङ्-ये आत्मनेपदी धातु हैं। 'रि' और 'पि' से छ: धातुतक परस्मैपदमें गिने गये हैं। ६० ॥ 'दृड्, 'धृ-ये दो धातु आत्मनेपदी कहे गये हैं। मुने! 'प्रच्छ' आदि सोलह धातु परस्मैपदी बताये गये हैं॥६१॥ मुने! फिर 'मिल' आदि छ: धातु स्वरितेत् कहे गये हैं। इसके बाद 'कृती' आदि तीन धातु परस्मैपदी हैं ।। ६२ ।। इस प्रकार तुदादिमें एक सौ सत्तावन धातु है।

'रुध' आदि नौ धातु स्वरितेत् हैं। 'कृती' धातु परस्मैपदी है। 'जिइन्धी 'से तीन धातुतक अनुदात्तेत् कहे गये हैं। तत्पश्चात् 'शिष पिध' आदि बारह धातु उदात्तेत् हैं। इस प्रकार रुधादि- गणमें कुल पचीस धातु हैं ।। ६३-६४ ।।

'तनु' धातुसे लेकर सात धातु 'स्वरितेत्' कहे गये हैं। 'मनु' और 'वनु'-ये दोनों आत्मनेपदी हैं। 'कृञ्' धातु स्वरितेत् कहा गया है॥६५॥ विप्रवर! इस प्रकार वैयाकरणोंने तनादिगण,

दस धातुओंकी गणना की है। 'क्री' आदि सात धातु उभयपदी हैं । मुनीश्वर। 'स्तम्भु' आदि चार सौत्र (सूत्रोक्त) धातु परस्मैपदी कहे गये हैं। 'क्रू' आदि बाईस धातु उदात्तेत् कहे गये हैं ॥६६-६७॥ वृ धातु आत्मनेपदी है। 'श्रण' आदि इक्कीरा भातु परस्मैपदी हैं और 'ग्रह' धातु स्वरितेत है।॥ ६८॥ इस प्रकार विद्वानोंने प्रयादिगण, बाचन धातु गिनाये हैं।

चुर आदि एक सौ छत्तीस धातु जित्

 (उभयपदी) माने गये हैं ॥ ६९ ॥ मुने। चित आदि अठारह (या अड़तीस?) आत्मनेपदी माने गये हैं। चर्च से लेकर 'धृष' धातुतक वित्' (उभयपदी) कहे गये हैं॥७०॥ इसके बाद अड़तालीस अदन्त धातु भी उभयपदी ही हैं। 'पद' आदि दस धातु आत्मनेपदमें परिगणित हुए हैं॥७१ ॥ यहाँ सूत्र आदि आठ धातुओंको भी मनीषी पुरुषोंने उभयपदी कहा है। प्रातिपदिकसे धात्वर्थ में णिच् और प्रायः सब बातें इष्ठ प्रत्ययकी भाँति होती हैं। तात्पर्य यह कि 'इष्ठ' प्रत्यय परे रहते जैसे प्रातिपदिक, पुंवद्भाव, रभाव, टिलोप, विन्मतुब्लोप, यणादिलोप, प्र, स्थ, स्फ आदि आदेश और भसंज्ञा आदि कार्य होते हैं, उसी प्रकार 'णि' परे रहते भी सब कार्य होंगे ॥ ७२ ।। 'उसे करता है, अथवा उसे कहता है' इस अर्थ में भी प्रातिपदिकसे णिच् प्रत्यय होता है। प्रयोजक व्यापारमें प्रेषण आदि वाच्य हों तो धातुसे णिच होता है। कर्तृ-व्यापारके लिये जो करण है, उससे धात्वर्थ में णिच् होता है। चित्र आदि आठ धातु उदात्तेत् हैं। किंतु 'संग्राम' धातुको शब्दशास्त्रके विद्वानोंने अनुदात्तेत् माना है। स्तोभ आदि सोलह धातु अदन्त धातुओंके निदर्शन हैं।।७३-७४ ।।

'बहुलमेतन्निदर्शनम्-इसमें जो बहुल शब्द आया है, उससे अन्य जो सूत्रोक्त लौकिक और वैदिक धातु हैं, उन सबका ग्रहण होता है। सभी धातु सब गणोंमें हैं और सबके अनेक अर्थ हैं।७५॥

इन धातुओंके अतिरिक्त सनादि* प्रत्यय जिनके अन्तमें हों, उनकी भी धातु-संज्ञा होती है। नामधातु भी धातु ही हैं। नारद! इस प्रार अनन्त धातुओंकी उद्धावना हो सकती है। यहाँ संक्षेपसे सब कुछ बताया गया है। इसका विस्तार तत्सम्बन्धी रान्थोंमें है ॥ ७६ ॥

(उपदेशावस्था एकाच अनुदात्त धातुसे परे

वलादि आर्धधातुकको इट्का आगम नहीं होता। जिनमें यह निषेध लागू होता है, उन धातुओंको 'अनिट्' कहते हैं। उन्हीं अनिट् या एकाच् अनुदात्त धातुओंका यहाँ संग्रह किया जाता है-) अजन्त धातुओंमें-ऊकारान्त, अकारान्त, यु, रु, क्ष्णु, शीङ स्नु नु, क्षु, श्वि, डीक, श्रिज्, वृद्ध वृञ्-इन सबको छोड़कर शेष सभी अनुदात्त (अर्थात् अनिट्) माने गये हैं ।। ७७ ॥ शक्ल, पच्, मुच्, रिच, वच, विच, सिच्, प्रच्छ, त्यज, निजिर्, भज्, भङ्ग्, भुज, भ्रस्ज, मस्ज, यज्, युज, रुज्, रज, विजिर, स्वञ्, सञ्ज, सृञ् ।। ७८ ॥ अद्, क्षुद्, खिद्, छिद्, तुद्, नुद, पद्, भिद्, विद् (सत्ता), विद् (विचारणे), शद्, सद्, स्विद्, स्कन्द, हद्, क्रुध, क्षुध, बुध् ।। ७९ ॥ बन्ध, युध, रु, राध, व्यध, शुध, साधू, सिधू, मन् (दिवादि), हन्, आप, क्षिप्, क्षुप्, तप्, लिए, स्तृप, दृप्॥८०॥ लिप्, लुप्, वप्, शप्, स्वप, सृप, यभ, रभ लभ, गम्, नम्, यम्, रम्, कुश, दंश, दिश्, दृश्, मृश्, रिश्, रुश्, लिश, विश्, स्पृश, कृष् ॥ ८१॥ त्विष्, तुष, द्विष्, दुष्, पुष्, पिष, विष्, शिष्, शुष, श्लिष्, घस्, वस्, दह, दिह, दुह, नह, मिह, रुह, लिह तथा वह ।। ८२ ॥ ये हलन्तोंमें एक सौ दो धातु अनुदात्त माने गये हैं। 'च' आदिकी निपात संज्ञा होती है। 'प्र' आदि उपसर्ग'गति' कहलाते हैं। भिन्न-भिन्न दिशा, देश और कालमें प्रकट हुए शब्द अनेक अर्थोके बोधक होते हैं। विप्रवर। वे देश-कालके भेदसे सभी लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। यहाँ गणपाठ, सूत्रपाठ, धातुपाठ तथा अनुनासिकपाठ-

'पारायण' कहा गया है। नारद!वैदिक और लौकिक सभी शब्द नित्यसिद्ध है।। ८३-८५।। फिर वैयाकरणोंद्वारा जो शब्दोंका संग्रह किया जाता है, उसमें उन शब्दोंका पारायण हो मुख्य

*सन् क्यच्, काम्यच्, क्यहू, क्यषू, आचारक्विप्, णिच् यङ्, यक् आय, डयड् णिड् ये बारह प्रत्यय सनादि कहलाते हैं।

हेतु है (पारायण-जनित पुण्यलाभके लिये ही उनका संकलन होता है)। सिद्ध शब्दोंका ही प्रकृति, प्रत्यय, आदेश और आगम आदिके द्वारा लघुमार्गसे सम्यक् निरूपण किया जाता है। इस प्रकार तुमसे निरुक्तका यत्किंचित् ही वर्णन किया गया है। नारद ! इसका पूर्णरूपसे वर्णन तो कोई भी कर ही नहीं सकता ।। ८६-८८॥ (पूर्वभाग द्वितीयपाद अध्याय ५३)