धर्माङ्गदका माताओंसे पिता और मोहिनीके प्रति उदार होनेका अनुरोध तथा पुत्रद्वारा माताओंका धन-वस्त्र आदिसे समादर

राजाने कहा- भीरु! मैंने राजलक्ष्मी तथा राजकीय वस्तुओंपर पुनः अधिकार नहीं स्थापित किया है। मैंने धर्माङ्गदको पुकारकर यह आदेश दिया था कि 'कमलनयन ! तुम मोहिनीको सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित अपने महलमें ले जाओ और इसकी सेवा करो; क्योंकि यह मेरी सबसे प्यारी पत्नी है। तुम्हारा महल हवादार भी है और उसमें हवासे बचनेका भी उपाय है। वह सभी ऋतुओंमें सुख देनेवाला है, अत: वहीं ले जाओ।' पुत्रको इस प्रकार आदेश देकर मैं कष्टसे बचनेके लिये बिछौनेपर गया। शय्यापर पहुँचते ही मुझे नींद आ गयी और अभी-अभी ज्यों ही जगा है, सहसा तुम्हारे पास चला आया हूँ। देवि! जो कुछ भी कहोगी, उसे निस्संदेह पूर्ण करूंगा।

मोहिनी बोली-राजेन्द्र! मेरे विवाहसे अत्यन्त

दुःखित हुई इन अपनी पनियोंको धीरज बँधाओ। इन पतिव्रताओंके आँसुओंसे दग्ध होनेपर मेरे मनमें क्या शान्ति होगी? भूपाल ! ये पतिव्रता देवियाँ तो मेरे पिता ब्रह्माजीको भी भस्म कर सकती हैं। फिर आप जैसे प्राकृत नरेशको और मेरी जैसी स्त्रीको जला देता इनके लिये कौन बड़ी बात है? भूमिपाल! महारानी संध्यावलीके समान नारी तीनों लोकों में कहीं नहीं है। इनका एक-एक अङ्ग आपके स्नेहपाशसे बंधा हुआ है; इसीलिये ये मुझे बड़े प्यारसे षड्रस भोजन कराती हैं और आपके ही गौरवसे मुझे प्रिय लगनेवाली मीठी-मीठी बातें सुनाती हैं। इन्हीं के स्वभावकी सैकड़ों देवियाँ आपके घरकी शोभा बढ़ा रही हैं। महीपते। मैं कभी इन सबके चरणोंको भूलके बराबर भी नहीं हो सकती।

पुत्रके साथ खड़ी हुई जेठी रानीके समीप मोहिनीका यह वचन सुनकर राजा रुक्माङ्गद बहुत लज्जित हुए। तब धर्माङ्गदने कहा-'मावाओ! मेरे पिताको मोहिनीदेवी तुम सबसे अधिक प्रिय है। वे मन्दराचलके शिखरसे उस बालाको अपने साथ क्रीडाके लिये ले आये हैं। (अतः ईर्ष्या छोड़कर तुम सब लोग पिताके सुख में योग दो।')

पुत्रकी यह बात सुनकर सब माताएँ बोली- 'बेटा! तुम्हारे न्याययुक्त वचनका पालन हम अवश्य करेंगी।'

माताओंकी यह बात सुनकर राजकुमार धर्माङ्गदने प्रसन्नचित्तसे एक-एकके लिये एक-एक करोड़से अधिक स्वर्णमुद्राएँ, हजार-हजार नगर और गाँव तथा आठ-आठ सुवर्णमण्डित रथ प्रदान किये। एक एक रानीको उन्होंने दस-दस हजार बहुमूल्य वस्त्र दिये, जिनमें से प्रत्येकका मूल्य सौ स्वर्णमुद्रासे अधिक था। मेरुपर्वतकी खानसे निकले हुए शुद्ध एवं अक्षय सुवर्णकी डाली हुई एक-एक लाख मुद्राएं उन्होंने प्रत्येक माताको अर्पित की। साथ ही एक-एकके लिये सौसे अधिक दासियाँ भी दी। घड़े के समान धनवाली दस-दस हजार दुधारू गायें और एक-एक हजार बैल भी दिये। तदनन्तर भक्तिभावसे राजकुमारने सभी माताओंको एक-एक हजार सोनेके आभूषण दिये, जिनमें हीरे जड़े हुए थे। आँवले बराबर मोतीके बने हुए प्रकाशमान हारोंकी कई ढेरियाँ लगाकर उन माताओंको दे दी। सभीकी पाँच-पाँच या सात-सात वलय (कड़े) भी दिये। महीपते! महारानी संध्यावलीके पास चन्द्रमाके समान चमकीले ढाई सौ मोतीके हार थे। धर्माङ्गदने एक-एक माताको दो-दो मनोहर हार दिये। प्रत्येकको चौबीस सौ सोनेकी थालियाँ और इतने ही घड़े प्रदान किये। राजन्! हर एक माताके लिये सौ-सौ सुन्दर पालकियों और उनके ढोनेवाले मोटे-ताजे शीघ्रगामी कहार दिये। इस प्रकार कुबेरके समान शोभा पानेवाले उस धन्य राजकुमारने बहुत-सी माताओंको बहुत-सा धन देकर उन सबकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर यह वचन कहा-'माताओ ! मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करता हूँ। आप सब लोग मेरे अनुरोधसे पतिके सुखकी इच्छा रखकर मेरे पितासे आज ही चलकर कहें कि-'नरेश्वर! ब्रह्मकुमारी मोहिनी बड़ी सुशीला हैं। आप इनके साथ सैकड़ों वर्षोंतक सुखसे एकान्तमें निवास करें।'

पुत्रका यह वचन सुनकर सबके शरीरमें हर्षतिरेकसे रोमाञ्च हो आया। उन सबने महाराजसे जाकर कहा-'आर्यपुत्र! आप ब्रह्मकुमारी मोहिनीके साथ दीर्घकालतक निवास करें। आपके पुत्रके तेजसे हमारी हार्दिक भावना दु:खरहित हो गयी है, इसलिये हमने आपसे यह बात कही है। आप इसपर विश्वास कीजिये।