गयामें प्रथम और द्वितीय दिनके कृत्यका वर्णन, प्रेतशिला आदि तीर्थों में पिण्डदान आदिकी विधि और उन तीर्थोंकी महिमा

पुरोहित वसु कहते हैं- मोहिनी ! सुनो, अब मैं प्रेतशिलाका पवित्र माहात्म्य बतलाता हूँ, जहाँ पिण्डदान करके मनुष्य अपने पितरोंका उद्धार करता है। प्रभासात्रिने शिलाके चरणप्रान्तको आच्छादित कर रखा है। मुनियोंसे संतुष्ट हुए प्रभास शिलाके अङ्गुष्ठभागसे प्रकट हुए। अङ्गुष्ठभागमें ही भगवान् शङ्कर स्थित हैं। इसलिये वे प्रभासेश कहे गये हैं। शिलाके अङ्गुष्ठका जो एक देश है, उसीमें प्रभासेशकी स्थिति है और वहीं प्रेतशिलाको स्थिति है। वहाँ पिण्डदान करनेसे मनुष्य प्रेतयोनिसे मुक्त हो जाता है, इसीलिये उसका नाम 'प्रेतशिला' है। महानदी तथा प्रभासात्रिके सङ्गममें स्नान करनेवाला पुरुष साक्षात् वामदेव (शिव)-स्वरूप हो जाता है। इसीलिये उक्त सङ्गमको 'वामतीर्थ' कहा गया है। देवताओंके प्रार्थना करनेपर भगवान्

श्रीरामने जब महानदीमें स्नान किया, तभीसे वहाँ सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाला 'रामतीर्थ' प्रकट हुआ। मनुष्य अपने सहस्रों जन्मोंमें जो पापराशि संग्रह करते हैं, वह सब रामतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाती है। जो मनुष्य-

राम राम महाबाहो देवानामभयंकर।।

त्वां नमस्ये तु देवेश मम नश्यतु पातकम्।

(ना० उत्तर०४५1८-९)

महाबाहु राम! देवताओंको अभय देनेवाले श्रीराम! आपको नमस्कार करता हूँ। देवेश । मेरा पातक नष्ट हो जाय।'

-इस मन्त्रद्वारा रामतीर्थम स्नान करके श्राद्ध एवं एवं पिपडदान करता है, वह विष्णुलोको प्रतिक्षित होता है। प्रभासेश्वरको नमस्कार करके भासमान शिवके समीप जाना चाहिये और उन भगवान् शिवको नमस्कार करके यमराजको बलि दे और इस प्रकार कहे-'देवेश| आप ही अलहै तथा आप ही ज्योतियोंके अधिपति है।आप मेरे मन, वचन, शरीर और क्रियाद्वारा उत्फा हुए सपरत पापोंका शीघ्र नाश कीजिये।' शिलाके जपन प्रदेशको यमराजने दबा रखा है। धर्मराजने पर्वतसे कहा- 'न गच्छ' (गमन न करो-हिलो-डुलो मत), इसलिये पर्वतको 'नग' कहते हैं। यमराजको बलि देनेके पश्चात् उनके दो कुत्तोंको भी अप्रकी बलि या पिण्ड देना चाहिये। उस समय इस प्रकार कहे-'वैवस्वतकुलमें उत्पत्र जो दो श्याम और सबल नामवाले कुत्ते हैं, उनके लिये मैं पिण्ड दूंगा। ये दोनों हिंसा न करें।' तत्पश्चात् प्रेतशिला आदि तीर्थमें घृतयुक्त चरुके द्वारा पिण्ड बनावे और पितरोंका आवाहन करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उनके लिये पिण्ड दे। प्रेतशिलापर पवित्रचित्त हो जनेऊको अपसव्य करके दक्षिण दिशाकी ओर मुँह किये हुए पितरोंका ध्यान एवं स्मरण करे- 'कव्यवाहक, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्रिष्वात, बर्हिषद् और सोमपा-ये सब पितृ-देवता हैं। हे महाभाग पितृदेवताओ! आप यहाँ पधारें और आपके द्वारा सुरक्षित मेरे पितर एवं मेरे कुलमें उत्पन्न हुए जो भाई-बन्धु हों, वे भी यहाँ आवें। मैं उन सबको पिण्ड देनेके लिये इस गयातीर्थमें आया हूँ। वे सब-के-सब इस श्राद्ध- दानसे अक्षय तृप्तिलाभ करें।'

तत्पश्चात् आचमन करके पश्चाङ्ग-न्यासपूर्वक यत्रत: प्राणायाम करे, फिर देश-काल आदिका उच्चारण करके 'अस्मत् पितृणां पुनरावृत्तिरहित- ब्रह्मलोकामिहेतवे गयाश्चाद्धमहं करिष्ये' (अपने पितरोंको पुनरावृत्तिरहित ब्रहालोकको प्राप्ति करानेके लिये मैं गया श्राद्ध करूँगा) ऐसा संकल्प करके शास्त्रोक कमसे विधिपूर्वक श्राद्ध करे। पहले नाशके स्थानको पृथक्-पृथक् प्रचणव्यासे सोचकर पितरोंका भाषाहन-पूजन करे। तत्पश्चात् मन्त्रीद्वारा पिण्डदान करे। पहले सपिण्ड पितरोंको श्राद्धका पिण्ड देकर उनके दक्षिण भागमें कुश विलकर उनके लिये एक बार तिल और जलकी अवलि दे। अनलिमें तिल और जल लेकर यनपूर्वक पितृतीर्थसे उनके लिये अजलि देनी चाहिये; फिर एक मुट्ठी सतूसे अक्षय्य पिण्ड दे। पिण्डद्रव्योंमें तिल, घी, दही और मधु आदि मिलाना चाहिये। सम्बन्धियोंका तिल आदिके द्वारा कुशोंपर आवाहन करना चाहिये। श्राद्धमें माता, पितामही और प्रपितामहीके लिये जो तीन मन्त्र-वाक्य बोले जाते हैं, उनमें यथास्थान स्त्रीलिङ्गका उच्चारण करना चाहिये। सम्बन्धियोंके लिये भी पूर्ववत् पितरोंका आवाहन करते हुए पहलेकी ही भाँति पिण्ड दे। अपने गोत्रमें या पराये गोत्रमें पति- पत्नीके लिये पिण्ड देते समय यदि पृथक्-पृथक् श्राद्ध, पिण्डदान और तर्पण नहीं किया गया तो वह व्यर्थ है। पिण्डपात्रमें तिल देकर उसे शुभ जलसे भर दे और मन्त्रपाठपूर्वक उस जलसे प्रदक्षिणक्रमसे उन सब पिण्डोंको तीन बार सींचे। तत्पश्चात् प्रणाम करके क्षमा-प्रार्थना करे। तदनन्तर पितरोंका विसर्जन करके आचमन करनेके पश्चात् साक्षी देवताओंको सुना दे। मोहिनी! सब स्थानों में इसी प्रकार पिण्डदान करना चाहिये।

गयामें पिण्डदानके लिये समय एवं मुहूर्तका विचार नहीं करना चाहिये। मलमास हो, जन्मदिन हो, गुरु और शुक्र अस्त हों, अथवा बृहस्पति सिंहराशिपर स्थित हों तो भी गयानाश नहीं छोड़ना चाहिये। संन्यासी गयामें जाकर दण्ड दिखावे, पिण्डदान न करे। वह विष्णुपदमें दण्ड रखकर पितरोंसहित मुक्त हो जाता है। गया खीर, सत्तू आटा, चरु अथवा चावल आदिसे भी पिण्डदान किया जाता है। सुभगे। गयाजीका दर्शन करके महापापी और पातकी भी पवित्र एवं श्राद्ध-कर्मका अधिकारी हो जाता है और श्राद्ध करनेपर वह ब्रह्मलोकका भागी होता है। फल्गुतीर्थमें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य जिस फलको पाता है, उसे जो एक लाख अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करता है, वह भी नहीं पाता। मनुष्यको गयामें जाकर अवश्य पिण्डदान करना चाहिये। वहाँकै पिण्ड पितरोंको अत्यन्त प्रिय हैं। इस कार्यमें न तो विलम्ब करना चाहिये और न विघ्न डालना चाहिये।

(श्राद्धकर्ताको गयामें इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-) पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, मातामहके पिता प्रमातामह आदि (अर्थात् वृद्धप्रमातामह, मातामही, प्रमातामही और वृद्धप्रमातामही)-इन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्डदान अक्षय होकर प्राप्त हो। मेरे कुलमें जो मरे हैं, जिनकी उत्तम गति नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। मेरे भाई-बन्धुओंके कुलमें जो लोग मरे है और जिनकी उत्तम गति नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। जो फाँसीपर लटककर मरे हैं, जहर खाने या शस्त्रोंक आघातसे जिनकी मृत्यु हुई है और जो आत्मघाती हैं, उनके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। जो यमदूतोंके अधीन होकर सब नरकोंमें यातनाएँ भोगते हैं, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्डदान करता हूँ। जो पशुयोनिमें पड़े हैं, पक्षी, कीट एवं सर्पका शरीर धारण कर चुके हैं अथवा जो वृोंकी योनिमें स्थित हैं, उन सबके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। धुलोक, अन्तरिक्ष और पृथ्वीपर स्थित जो पितर और भाई-बन्धु आदि हैं तथा संस्कारहीन अवस्थामें जिनकी मृत्यु हुई है, उनके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। जो मेरे भाई-बन्धु हों अथवा न हों या दूसरे जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे हों, उन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षय होकर मिले। जो मेरे पिताके कुलमें मरे हैं, जो माताके कुलमें मरे हैं, जो गुरु, श्वशुर तथा बन्धु-बान्धवोंके कुलमें मरे हैं एवं इनके सिवा जो दूसरे भाई- बन्धु मृत्युको प्राप्त हुए हैं, मेरे कुलमें जिनका पिण्डदान-कर्म नहीं हुआ है, जो स्त्री-पुत्रसे रहित हैं, जिनके श्राद्धकर्मका लोप हो गया है, जो जन्मसे अन्धे और पगु रहे हैं, जो विकृतरूपवाले या कच्चे गर्भकी दशामें मरे हैं, मेरे कुलमें मरे हुए जो लोग मेरे परिचित या अपरिचित हों, उन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षयभावसे प्राप्त हो। ब्रह्मा और शिव आदि सब देवता साक्षी रहें। मैंने गयामें आकर पितरोंका उद्धार किया है। देव गदाधर ! मैं पितृकार्य (श्राद्ध) के लिये गयामें आया हूँ। भगवन् ! आप ही इस बातके साक्षी हैं। मैं तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया*।

 साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मेशानादयस्तथा ।

मया गयां समासाद्य पितृणां निष्कृतिः कृता॥

आगतोऽस्मि गयां देव पितृकार्ये गदाधर ।

त्वमेव साक्षी भगवानृणोऽहमृणत्रयात् ॥

(ना० उत्तर0 १५८-१)

दूसरे दिन पवित्र होकर प्रैवपर्वतपर जाय और वहाँ ब्रह्मकुण्डमें मान करके विद्वान् पुरुष देवता आदिका तर्पण करे। फिर पवित्र होकर प्रेतपर्वतपर पितरोंका आवाहन करे और पूर्ववत् संकल्प करके पिण्ड दे। परम उत्तम पितृदेवताओंकी उनके नाम-मन्त्रोंद्वारा भलीभांति पूजा करके उनके लिये पिण्डदान करे। मनुष्य पितृ-कर्ममें जितने तिल ग्रहण करता है, उतने ही असुर भयभीत होकर इस प्रकार भागते हैं, जैसे गरुड़को देखकर सर्प भाग जाते हैं। मोहिनी ! उस प्रेतपर्वतपर पूर्ववत् सब कार्य करे। तत्पश्चात् वहाँ तिलमिश्रित सत्तू दे और इस प्रकार प्रार्थना करे-

ये केचित्प्रेतरूपेण वर्तन्ते पितरो मम ॥

ते सर्वे तृप्तिमायान्तु सक्तुभिस्तिलमिश्रितैः ।

आबास्तम्बपर्यन्तं यत्किञ्चित् सचराचरम्।

मया दत्तेन पिण्डेन तृप्तिमायान्तु सर्वशः।

(ना० उत्तर० ४५। ६४-६६)

'जो कोई मेरे पितर प्रेतरूपमें विद्यमान हैं, वे सब इन तिलमिश्रित सत्तुओंके दानसे तृप्ति-लाभ करें। ब्रह्माजीसे लेकर कोटपर्यन्त जो कुछ भी चराचर जगत् है, वह मेरे दिये हुए पिण्डसे पूर्णतः तृप्त हो जाय।'

सबसे पहले पाँच तीर्थोंमें तथा उत्तरमानसमें श्राद्ध करनेकी विधि है। हाथमें कुश लेकर आचमन करके कुशयुक्त जलसे अपना मस्तक सौंचे और उत्तरमानसमें जाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नान करे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-

उत्तरे मानसे स्त्रानं करोम्यात्मविशुद्धये।

सूर्यलोकादिसम्प्राप्तिसिद्धये पितृमुक्तये॥६८॥

'मैं उत्तरमानसमें आत्मशुद्धि, सूर्योदे लोकोंको प्राप्ति तथा पितरोंकी मुक्तिके लिये स्नान करता हूँ

इस प्रकार स्नान करके विधिपूर्वक देवता आदिका तर्पण करे और अन्त में इस प्रकार कहे-

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः ।

तृप्यन्तु पितरः सर्व मातृमातामहादः ॥१९-७०॥

'ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त समस्त जगत, देवता, ऋषि, दिव्य पितर, मनुष्य, पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह और प्रमातामह आदि सब लोग तृत हो जायें।' अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार पिण्डदानसहित श्राद्ध करना चाहिये। अष्टकाश्राद्ध, आभ्युदयिकश्राद्ध, गयाश्राद्ध तथा क्षयाह तिथिको किये जानेवाले एकोद्दिष्ट श्राद्धमें माताके लिये पृथक् श्राद्ध करना चाहिये और अन्यत्र पतिके साथ ही संयुक्तरूपसे उसके लिये श्राद्ध करना उचित है। तदनन्तर-

ॐ नमोऽस्तु भानवे भत्रे सोमभौमज्ञरूपिणे।

जीवभार्गवशनैश्चरराहुकेतुस्वरूपिणे ॥७२॥

'सोम, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु तथा केतु-ये सब जिनके स्वरूप हैं, सबका भरण-पोषण करनेवाले उन भगवान् सूर्यको नमस्कार है।

-इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यको नमस्कार करके उनकी पूजा करे। ऐसा करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको सूर्यलोकमें पहुंचा देता है। मानसरोवर पूर्वोक्त प्रेतपर्वत आदिसे यहाँ उत्तरमें स्थित है, इसलिये इसे उत्तरमानस कहते हैं। उत्तरमानससे मौन होकर दक्षिणमानसकी यात्रा करनी चाहिये। उत्तरमानससे उत्तर दिशामें उदीची नामक तीर्थ है, जो पितरोंको मोक्ष देनेवाला है। उदीची और मुण्डपृष्टके मध्यभागमें देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंको तृप्त करनेवाला कनखलतीर्थ है, जो पितरोंको उत्तम गति देनेवाला है। वहाँ स्नान करके मनुष्य बुकनककी भाँति प्रकाशित होता है और अत्यन्त पवित्र हो जाता है। इसीलिये वह परम उत्तम तीर्थ लोकमें कनखल नामसे विख्यात है। कनखलसे दक्षिण भागमें दक्षिणमानसतीर्थ है। दक्षिणमानसमें तीन तीर्थ बताये गये है। उन सब विधिपूर्वक जान करके पृथक्-पृथक् श्राद्ध करना चाहिये। मानके समय निमाहित मन्त्रका उच्चारण करे-

दिवाकर करोमीह स्त्राने दक्षिणमानसे।

ब्राह्महत्यादिपापौषघातनाय विमुक्तये॥७८-७९ ॥

'भगवन् दिवाकर मैं ब्रह्महत्या आदि पाकि समुदायका नाश करने और मोक्ष पानेके लिये यहाँ दक्षिणमानसतीर्थ में स्नान करता हूँ।'

यहाँ स्नान-पूजन आदि करके पिण्डसहित श्राद्ध करे और अन्तमें पुनः भगवान् सूर्यको प्रणाम करते हुए निम्राङ्कित वाक्य कहे-

नमामि सूर्यं तृप्त्यर्थं पितृणां तारणाय च।

पुत्रपौत्रधनैश्वर्याधायुरारोग्यवृद्धये ॥८०॥

'मैं पितरोंकी तृप्ति तथा उद्धारके लिये और पुत्र, पौत्र, धन, ऐश्वर्य आदि आयु तथा आरोग्यकी वृद्धिके लिये भगवान् सूर्यको प्रणाम करता हूँ।' इस प्रकार मौनभावसे सूर्यका दर्शन और पूजन करके नीचे लिखे मन्त्रका उच्चारण करे-

कव्यवाडादयो ये च पितॄणां देवतास्तथा।

मदीयैः पितृभिः सार्द्ध तर्पिता: स्थ स्वधाभुजः ॥८१-८२॥

'कव्यवाड्, अनल आदि जो पितरोंके देवता हैं, वे मेरे पितरोंके साथ तृप्त होकर स्वधाका उपभोग करें।

वहाँसे सब तीर्थों में परम उत्तम फल्गुतीर्थको जाय। वहाँ श्राद्ध करनेसे सदा पितरोंको तथा श्राद्धकर्ताकी भी मुक्ति होती है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीको प्रार्थनासे भगवान् विष्णु स्वयं फल्गुरूपसे प्रकट हुए थे। दक्षिणाग्रिमें ब्रह्माजीके द्वारा जो होम किया गया, निश्चय ही उसीसे फल्गुतीर्थका प्रादुर्भाव हुआ, जिसमें स्नान आदि करनेसे घरकी लक्ष्मी फलती-फूलती है, गौ कामधेनु होकर मनोवाञ्छित फल देती है तथा वहाँका जल और भूतल भी मनोवाञ्छित फल देता है। सृष्टिके अन्तर्गत फाल्गुतीर्थ कभी निष्फल नहीं होता। समस्त लोकाम जो सम्पूर्ण तीर्थ है, वे सब फल्गुतीर्थमें मान करनेके लिये आते हैं। गङ्गाजी भगवान् विष्णुका चरणोदक है और फल्गुरूपमें साक्षात् भगवान् आदिगदाधर प्रकट हुए हैं। वे स्वयं ही द्रव (जल)- रूपमें विराजमान हैं, अत: फल्गुतीर्थको गङ्गासे अधिक माना गया है। फल्गुके जलमें स्नान करनेसे सहस्र अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्रास होता है। (उसमें स्नान करते समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये-)

फल्गुतीर्थे विष्णुजले करोमि स्नानमद्य वै।

पितृणां विष्णुलोकाय भुक्तिमुक्तिप्रसिद्धये॥४८॥

'भगवान् विष्णु ही जिसके जल हैं, उस फल्गुतीर्थमें आज मैं स्नान करता हूँ। इसका उद्देश्य यह है कि पितरोंको विष्णुलोककी और मुझे भोग एवं मोक्षकी प्राप्ति हो।'

फल्गुतीर्थमें स्रान करके मनुष्य अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार तर्पण एवं पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करे। तत्पश्चात् शिवलिङ्गरूपमें स्थित ब्रह्माजीको नमस्कार करे-

नमः शिवाय देवाय ईशानपुरुषाय च।

अघोरवामदेवाय सद्योजाताय शम्भवे ।। ९० ॥

'ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात-इन पाँच नामोंसे प्रसिद्ध कल्याणमय भगवान् शिवको नमस्कार है।'

इस मन्त्रसे पितामहको नमस्कार करके उनकी पूजा करनी चाहिये। फल्गुतीर्थ में स्नान करके यदि मनुष्य भगवान् गदाधरका दर्शन और उनको नमस्कार करे तो वह पितरोंसहित अपने-आपको वैकुष्ठधाममें ले जाता है। (भगवान् गदाधरकी नमस्कार करते समय निग्राङ्कित पत्र पढ़ना चाहिये-)

ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च ।

प्रद्युपायानिरुद्धाय श्रीधराय च विष्णवे ॥९२-९३॥

'वासुदेव, संकर्षण, प्रधुम्र तथा अनिरुद्ध- इन चार व्यहोवाले सर्वव्यापी भगवान् श्री नमस्कार है।

पाँच तीचोंमें स्नान करके मनुष्य अपने पितरोंको ग्राह्यलोकमें पहुँचाता है। जो भगवान् गदाधरको पाँच तीर्थोके जलसे स्नान कराकर उन्हें पुष्प और वस्त्र आदिसे सुशोभित नहीं करता, उसका किया हुआ श्राद्ध व्यर्थ होता है। नागकूट, गृध्रकूट, भगवान् विष्णु तथा उत्तरमानस-इन चारोंक मध्यका भाग 'गयाशिर' कहलाता है। इसीको फल्गुतीर्थ कहते हैं। मुण्डपृष्ठ पर्वतके नीचे परम उत्तम फल्गुतीर्थ हैं। उसमें श्राद्ध आदि करनेसे सब पितर मोक्षको प्राप्त होते हैं। यदि मनुष्य गयाशिरतीर्थमें शमीपत्रके बराबर भी पिण्डदान करता है तो वह जिसके नामसे पिण्ड देता है. उसे सनातन ब्रह्मपदको पहुँचा देता है। जो भगवान् विष्णु अव्यक्त रूप होते हुए भी मुण्डपृष्ठ पर्वत तथा फला आदि तीर्थोके रूपमें सबके सामने अभिव्यक्त हैं, उन भगवान् गदाधरको मैं नमस्कार करता हूँ। शिला पर्वत तथा फल्गु आदि रूपमें अव्यक्तभावसे स्थित हुए भगवान् श्रीहरि आदिगदाधररूपसे सबके समक्ष प्रकट हुए है।

तदनन्तर धर्मारण्यतीर्थको जाय, जहाँ साक्षात् धर्म विराजमान है। वहाँ मतणावापीमें खान करके तर्पण और श्राद्ध करे। फिर मवङ्गेश्वरके समीप जाकर उन्हें नमस्कार करते हुए निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे-

प्रमाण देवताः शम्भुलाकपालाश साक्षिणः।

मवायत्व मत अस्मिन् पितृणां निष्कृतिः कृता॥१०१-१०२॥

'सब देवता और भगवान् शङ्कर प्रमाणभूत हैं तथा समस्त लोकपाल भी साक्षी हैं। मैंने इस मतङ्गतीर्थमें आकर पितरोंका उद्धार किया है- उनका ऋण चुकाया है।'

पहले ब्रह्मतीर्थमें, फिर ब्रह्मकूपमें श्राद्ध आदि करे। कूप और यूपके मध्यभागमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष पितरोंका उद्धार कर देता है। धर्मेश्वर धर्मको नमस्कार करके महाबोधि वृक्षको प्रणाम करे। मोहिनी! यह दूसरे दिनका कृत्य मैंने तुम्हें बताया है। स्नान, तर्पण, पिण्डदान, पूजन और नमस्कार आदिके साथ किया हुआ श्राद्धकर्म पितरोंको सुख देनेवाला होता है।