गङ्गाद्वार (हरिद्वार) और वहाँके विभिन्न तीर्थोंका माहात्म्य

मोहिनी बोली- द्विजश्रेष्ठ ! मैंने आपके मुखसे कुरुक्षेत्रका उत्तम माहात्म्य सुना है। गुरुदेव! अब गङ्गाद्वार नामसे विख्यात जो पुण्यदायक तीर्थ है, उसका वर्णन कीजिये।

पुरोहित वसुने कहा- भद्रे ! राजा भगीरथके रथके पीछे चलनेवाली अलकनन्दा गङ्गा सहस्रों पर्वतोंको विदीर्ण करती हुई जहाँ भूमिपर उतरी हैं, जहाँ पूर्वकालमें दक्ष प्रजापतिने यज्ञेश्वर भगवान् विष्णुका यजन किया है, वह पुण्यदायक क्षेत्र (हरिद्वार) ही गङ्गाद्वार है, जो मनुष्योंके समस्त पातकोंका नाश करनेवाला है। प्रजापति दक्षके उस यज्ञमें इन्द्रादि सब देवता बुलाये गये थे और वे सब अपने-अपने गणोंके साथ यज्ञमें भाग लेनेकी इच्छासे वहाँ आये थे। शुभे! उसमें देवर्षि, शिष्य-प्रशिष्योंसहित शुद्ध अन्त:करणवाले ब्रह्मर्षि तथा राजर्षि भी पधारे थे। पिनाकपाणि भगवान् शङ्करको छोड़कर अन्य सब देवताओंको निमन्त्रित किया गया था। वे सब देवता विमानों पर बैठकर अपनी प्रिय पत्रियोंके साथ दक्ष प्रजापतिके यज्ञोत्सवमें जा रहे थे और प्रसन्नतापूर्वक आपसमें उस उत्सवका वर्णन भी करते थे। कैलासपर रहनेवाली देवी सतीने उनकी बातें सुनीं। सुनकर वे पिताका यज्ञोत्सव देखनेके लिये उत्सुक हुई। उस समय सतीने महादेवजीसे उस उत्सबमें चलनेकी प्रार्थना की। उनकी बात सुनकर भगवान् शिवने कहा-'देवि! वहाँ जाना कल्याणकर नहीं होगा।' किंतु सतीजी अपने पिताका यज्ञोत्सव देखनेके लिये चल दी। भरे । सतीदेवो वहाँ पहुँच तो गयौं, किंतु किसीने उनका स्वागत-सत्कार नहीं किया। तब तन्वङ्गो सतीने वहाँ अपने प्राण त्याग दिये। अतः वह स्थान एक उत्तम क्षेत्र बन गया है। जो उस तीर्थ में स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करते हैं, वे देवोके अत्यन्त प्रिय होते हैं। वे भोग और मोक्षके प्रधान अधिकारी हो जाते हैं।

तदनन्तर देवर्षि नारदसे अपनी प्रिया सतीजीके प्राणत्यागका समाचार सुनकर भगवान् शङ्करने वीरभद्रको उत्पन्न किया। वीरभद्ने सम्पूर्ण प्रमथगणेकि साथ जाकर उस यज्ञका नाश कर दिया। फिर ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे तुरंत प्रसन्न होकर भगवान् शङ्करने उस विकृत/यज्ञको पुनः सम्पन्न किया। तबसे वह अनुपम तीर्थ सम्पूर्ण पातकोंका नाश करनेवाला हुआ। मोहिनी ! उस तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके मनुष्य जिस-जिस कामनाका चिन्तन करता है, उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है। जहाँ दक्ष तथा देवताओंने यज्ञोंके स्वामी साक्षात् अविनाशी भगवान् विष्णुका स्तवन किया था, वह स्थान 'हरितीर्थ के नामसे प्रसिद्ध है। सती मोहिनी! जो मानव उस हरिपदतीर्थ (हरिकी पैंडी) में विधिपूर्वक स्नान करता है, वह भगवान् विष्णुका प्रिय तथा भोग और मोक्षका प्रधान अधिकारी होता है। उससे पूर्व दिशामें त्रिगङ्ग नामसे विख्यात क्षेत्र है, जहाँ सब लोग त्रिपथगा गङ्गाका साक्षात् दर्शन करते हैं। वहाँ स्नान करके देवताओं, ऋषियों, पितरों और मनुष्यों का प्रद्धापूर्वक तर्पण करनेवाले पुरुष स्वर्गलोकमें देवताकी भौति आनन्दित होते हैं। वहाँसे दक्षिण दिशामें कनखलतीर्थमें जाय। वहाँ दिन-रात उपवास और स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। देवि ! जो वहाँ वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राहाणको गोदान देता है, वह कभी वैतरणी नदी और यमराजको नहीं देखता है। वहीं किये गये जप, होम, तप और दान अक्षय होते हैं।

सुमध्यमे। वहाँसे पश्चिम दिशाम कोटितीर्थ है, जहाँ भगवान कोटीश्वरका दर्शन करनेसे कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है और एक रात वहाँ निवास करनेसे पुण्डरीक यज्ञका फल मिलता है। इसी प्रकार वहाँसे उत्तर दिशामें समगज (सम सरोवर) नामसे विख्यात उत्तम तीर्थ है। देवि। वह सम्पूर्ण पातकोंका नाश करनेवाला है। परम बुद्धिमती मोहिनी! वहाँ सप्तर्षियोंके पवित्र आश्रम है, उन सबमें पृथक्-पृथक् नान और देवताओं एवं पितरोंका तर्पण करके मनुष्य ऋषिलोकको प्राप्त होता है। राजा भगीरथ जब देवनदी गङ्गाको ले आये, उस समय उन सप्तर्षियोंकी प्रसनताके लिये वे सात धाराओंमें विभक्त हो गयीं। तबसे पृथ्वीपर वह 'सप्तगङ्ग' नामक तीर्थ विख्यात हो गया। भद्रे ! वहाँसे परम उत्तम कृपिलाइद नामक तीर्थमें जाकर जो श्रेष्ठ ब्राह्मणको धेनु दान करता है, उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। तदनन्तर शन्तनुके ललित नामक उत्तम तीर्थमें जाकर विधिवत् स्रान और देवता आदिका तर्पण करके मनुष्य उत्तम गति पाता है, जहाँ राजा शन्तनुने मनुष्यरूपमें आयी हुई गङ्गाको प्राप्त किया और जहाँ गङ्गाने प्रतिवर्ष एक-एक वसुको जन्म देकर अपनी धारामें उनके शरीरको डलवा दिया था, उन वसुओंका शरीर जहाँ गिरा वहाँ वृक्ष पैदा हो गया। जो मनुष्य वहाँ स्नान करता और उस ओषधिको खाता है, वह गङ्गादेवीके प्रसादसे कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। वहाँसे भीमस्थल (भीमगोड़ा)-में जाकर जो पुण्यात्मा पुरुष स्नान करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोग भोगकर शरीरका अन्त होनेपर स्वर्गलोकमें जाता है। यह संक्षेपसे तुम्हें थोड़ेसे तीर्थोंका परिचय दिया गया है। जो इस क्षेत्रमें बृहस्पतिके कुम्भ राशिपर और सूर्यके मेषराशिपर रहत्ते समय स्नान करता है, वह साक्षात् बृहस्पति और दूसरे सूर्यके समान तेजस्वी होता है। प्रयाग आदि पुण्यतीर्थमें एवं पृथोदकतीर्थमें जानेपर जो वारुण, महावारुण तथा महामहावारुण योगमें वहाँ विधिपूर्वक स्नान करता है और भक्तिभावसे ब्राह्मणोंका पूजन करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। संक्रान्ति, अमावास्या, व्यतीपात, युगादि तिथि तथा और किसी पुण्य दिनको जो वहाँ थोड़ा भी दान करता है, वह कोटिगुना हो जाता है। यह मैंने तुमसे सच्ची बात बतायी है। जो मानव दूर रहकर भी गङ्गाद्वारका स्मरण करता है, वह उसी प्रकार सदति पाता है, जैसे अन्तकालमें श्रीहरिको स्मरण करनेवाला पुरुष। मनुष्य शुद्धचित्त होकर हरिद्वारमें जिस-जिस देवताका पूजन करता है, बह-बह परम प्रसत्र होकर उसके मनोरथोंको पूर्ण करता है। जहाँ गङ्गा भूतलपर आयी हैं, वही तपस्याका स्थान है। यही जयका स्थल है और यही होमका स्थान है। जो मनुष्य नियमपूर्वक रहकर तीनों समय स्नान करके वहाँ  'गङ्गासहस्रनाम'का पाठ करता है, वह अक्षय संतति पाता है। महाभागे! जो नियमपूर्वक भक्तिभावसे गङ्गाद्वारमें पुराण सुनता है, वह अविनाशी पदको प्राप्त होता है। जो श्रेष्ठ मानव हरिद्वारका माहात्म्य सुनता है अथवा भक्तिभावसे उसका पाठ करता है, वह भी मानका फल पाता है।