नारद महा पुराण
मथुराके भिन्न-भिन्न तीर्थोंका माहात्म्य
मोहिनी बोली- पुरोहितजी ! मैंने अवन्तीका माहात्म्य सुना, जो मनुष्यों के पाप दूर करनेवाला है। अब मैं मथुराका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ।
पुरोहित वसुने कहा- मोहिनौ! सुनो, मैं मथुराके कल्याणकारी वैभवका वर्णन करता हूँ, जहाँ ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर साक्षात् भगवान् अवतीर्ण हुए हैं। वहाँ प्रकट होकर भगवान् नन्दके गोकुलमें गये और वहीं रहकर उन्होंने गोपोंके साथ सब लीलाएँ कीं। वनोंमें तथा मथुरामें जो तीर्थ हैं, उनका तुमसे इस समय वर्णन करता हूँ, सुनो। पहला मधुवन है, जहाँ स्नान करनेवाला श्रेष्ठ मानव देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करके विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। दूसरा उत्तम तालवन है, जहाँ भक्तिपूर्वक नान करनेवाला मानव कृतकृत्य होता है। तीसरा
कुमुदवन है, जहाँ स्नान करके मनुष्य मनोवाञ्छित भोगोंको पाता है और इहलोक तथा परलोकमें आनन्दित होता है। चौथेका नाम काम्यवन है; उसमें बहुत-से तीर्थ हैं; वहाँकी यात्रा करनेवाला पुरुष विष्णुलोकका भागी होता है। भद्रे! वहाँ जो विमलकुण्ड है, वह सब तीर्थोमें उत्तम -से- उत्तम है; वहाँ दान करनेवाला मनुष्य वैकुण्ठधाम पाता है। पाँचवाँ बहुलावन है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है, वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। छठा भद्रवन नामक वन है, जहाँ स्रान करनेवाला मानव भगवान् श्रीकृष्णके प्रसादसे सब कल्याण- ही-कल्याण देखता है। वहाँ सातवी खदिरवन है, जिरा, सात बररोभातसे मनुष्य भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है। आठवाँ महावन है, जो भगवान् श्रीहरिको सदैव प्रिय है। उसका भक्तिपूर्वक पर्शन करके मनुष्य इन्द्रलोकमें आवर पाता है। नवा लोहजनवन है, जहाँ स्नान करके मनुष्य भगवान् महाविष्णुके प्रसादसे भोग और मोक्ष पाता है। दसों बिल्ववन है, जहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य अपनी इच्छाके अनुसार शिवलोक अथवा विष्णुलोकमें जाता है। ग्यारहवाँ भाण्डीरवन है, जो योगियोंको अत्यन्त प्रिय है; वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। बारहवाँ वृन्दावन है, जो समस्त पापोका उच्छेद करनेवाला है। सती मोहिनी! इस पृथ्वीपर, उसके समान दूसरा कोई वन नहीं है। वहाँ स्नान करनेवाला मानव देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करके तीनों ऋणोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
मथुरा-मण्डलका विस्तार बीस योजन है; उसमें जहाँ-कहीं भी स्नान करनेवाला पुरुष भगवान् विष्णुकी भक्ति पाता है। उसके मध्यभागमें मथुरा नामकी पुरी है, जो सर्वोत्तम पुरियोंसे भी उत्तम है; जिसके दर्शनमात्रसे मनुष्य भगवान् माधवकी भक्ति प्राप्त कर लेता है। नरेश्वरि! वहाँ विश्रान्ति (विश्रामघाट) नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थरत्र है, जिसमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेवाला मानव विष्णुधाममें जाता है। विश्रामघाटसे दक्षिण उसके पास ही विमुक्त नामका उत्तम तीर्थ है, जहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करनेपर मनुष्य निश्चय ही मोक्ष पाता है। वहाँसे दक्षिण भागमें रामतीर्थ है, जहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य अज्ञानबन्धनसे अवश्य मुक्त हो जाता है। वहाँसे दक्षिण संसारमोक्षण नामक उत्तम तीर्थ है, उसमें स्नान करके मनुष्य विष्णुलोकमें सम्मानित होता है। उससे दक्षिण भागमें देवदुर्लभ प्रयागतीर्थ है, जहाँ स्नान करनेवाला मानव अग्निष्टोम-यज्ञका फल पाता है। उससे दक्षिण तिन्दुक-तीर्थ है, जिसमें स्नान करनेवाला श्रेष्ठ मानव राजसूय यज्ञका फल पाकर देवलोकमें देवताकी भाँति प्रसन्न रहता है। उससे दक्षिण पटुस्वामितीर्थ है, जो सूर्यदेवको अत्यन्त प्रिय है। वहाँ स्नान करनेके पश्चात् सूर्यदेवको दर्शन करनेसे मनुष्य भोग भोगनेके पश्चात् देवलोकमें जाता है। भद्रे ! उससे दक्षिण परम उत्तम ध्रुव-तीर्थ है, जहाँ स्नान करके ध्रुवका दर्शन करनेसे मनुष्य विष्णुधामको प्राप्त कर लेता है। ध्रुव-तीर्थसे दक्षिण भागमें सप्तर्षिसेविततीर्थ है, जहाँ स्नान करके मुनियोंका दर्शन करनेसे मनुष्य ऋषिलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। ऋषितीर्थसे दक्षिण परम उत्तम मोक्ष-तीर्थ है, जहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उससे दक्षिण बोधिनी-तीर्थ है, जहाँ सान करके पितरोंको पिण्डदान देनेवाला पुरुष उन्हें स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। उससे दक्षिण कोटि-तीर्थ है, जहाँ स्नान करनेसे मानव सब पापोंसे छूटकर विष्णुलोक पाता है। विश्रामघाटके उत्तर भागमें असिकुण्ड-तीर्थ है, जहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य वैष्णवपद प्राप्त कर लेता है। उससे उत्तर संयमन- तीर्थ है, जहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्यको यमलोकका दर्शन नहीं होता। उससे उत्तर घण्टाभरण नामक ब्रह्मलोक है, जो स्नान करनेमात्रसे समस्त पापोंका नाश करनेवाला और ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाला तीर्थ है। उससे उत्तर परम उत्तम सोम-तीर्थ है, जहाँ गोता लगानेवाला श्रेष्ठ मानव पापरहित हो चन्द्रलोकमें जाता है। उससे उत्तर प्राचीसरस्वती-तीर्थ है, जिसमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य वाणीका अधीश्वर होता है। उससे उत्तर दशाश्वमेध-तीर्थ हैं, जहाँ स्नान करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जो मनुष्य वहाँ गोपर्ण नामक शिवकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाकर अन्तमें शिवलोकमें सम्मानित होता है। उससे उत्तर अनन्त-तीर्थ है, जहाँ स्नान करनेवाला मानव मपुराके चौबीस तीयोका फल पाता है। महाभागे। मधुरामें साक्षात विष्णु चतुर्दूहरूपसे विराजमान है जो मथुरावासियाँको मोक्ष प्रदान करते है। उन चार व्यूहोंमें पहली वाराह-मूर्ति है, दूसरी नारायणमूर्ति है, तीसरी वामन-मूर्ति है और चौथी हलधर-मूर्ति है। जो मनुष्य चतुर्दूहरूपधारी भगवान्का दर्शन करके उनकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। रङ्गेश्वर, भूतेश्वर, महाविद्या तथा भैरवका विधिपूर्वक दर्शन और पूजन करके मनुष्य तीर्थयात्राका फल पाता है। चतुःसामुद्रिक-कूप, कुब्जा-कूप, गणेश-कूप तथा श्रीकृष्णगङ्गामें स्नान करके मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। शुभानने! समस्त मथुरा-मण्डलके अधिपति हैं भगवान् केशव, जो सम्पूर्ण क्लेशोंका नाश करनेवाले हैं। पवित्र मथुरा-मण्डलमें जिसने भगवान् केशवका दर्शन नहीं किया, उसका जन्म व्यर्थ है। मथुरामें और भी असंख्य तीर्थ हैं, उनमें स्नान करके वहाँ रहनेवाले ब्राह्मण पुरोहितको कुछ दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता।