पुरुषोत्तमक्षेत्रकी यात्राका समय, मार्कण्डेयेश्वर शिव, वटवृक्ष, श्रीकृष्ण, बलभद्र तथा सुभद्राके और भगवान् नृसिंह के दर्शन-पूजन आदिका माहात्म्य

मोहिनीने पूछा- द्विज श्रेष्ठ! पुरुषोत्तमक्षेत्रकी यात्रा किस समय करनी चाहिये? और मानद! पाँचों तीर्थों का सेवन भी किस विधिसे करना उचित है? एक-एक तीर्थके भीतर स्नान, दान और देव-दर्शन करनेका जो-जो फल है, वह सब पृथक्-पृथक् बताइये।

पुरोहित वसु बोले- श्रेष्ठ मनुष्यको उचित है कि ज्येष्ठ मासमें शुक्लपक्षको द्वादशीको विधिपूर्वक पञ्चतीर्थोंका सेवन करके श्रीपुरुषोत्तमका दर्शन करे। जो ज्येष्ठकी द्वादशीको अविनाशी देवता भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करते हैं, वे विष्णुलोकमें पहुँचकर वहाँसे कभी लौटकर कपस नहीं आते। मोहिनी! अत: ज्येष्ठ में प्रयत्नपूर्वक पुरुषोत्तमक्षेत्रको यात्रा करनी चाहिये और वहाँ पञ्चतीर्थसेवनपूर्वक श्रीपुरुषोत्तमका दर्शन करना चाहिये। जो अत्यन्त दूर होनेपर भी प्रतिदिन प्रसन्नचित्त हो भगवान् पुरुषोत्तमका चिन्तन करता है, अथवा जो श्रद्धापूर्वक एकाग्रचित्त हो पुरुषोत्तमधोत्रमें भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनार्थ यात्रा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो दूरसे भगवान् पुरुषोत्तमके प्रासादशिखरपर स्थित नील चक्रका दर्शन करके उसे भक्तिपूर्वक प्रणाम करता है, वह सहसा पापसे मुक्त हो जाता है।

मोहिनी ! अब गैं पसतीयोंकि रोवनकी विधि

बतलाता हूँ, सुनो! ठसके कर लेनेपर मनुष्य भगवान् विष्णुका अत्यन्त प्रिय होता है। पहले मार्कण्डेय-सरोवरमें जाकर मनुष्य उत्तराभिमुख हो, तीन बार डुबकी लगाये और निम्राङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे-

संसारसागरे मग्रं पापग्रस्तमचेतनम्।

त्राहि मां भगनेत्रघ्र त्रिपुरारे नमोऽस्तु ते ।।

नमः शिवाय शान्ताय सर्वपापहराय च।

स्नानं करोमि देवेश मम नश्यतु पातकम्।।

(ना० उत्तर०५५।१४-१५)

'भगके नेत्रोंका नाश करनेवाले त्रिपुरनाशक भगवान् शिव! मैं संसार-सागरमें निमग्र, पापग्रस्त की एवं अचेतन हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये, आपको नमस्कार है। समस्त पापोंको दूर करनेवाले शान्तस्वरूप शिवको नमस्कार है। देवेश्वर! मैं यहाँ स्नान करता हूँ, मेरा सारा पातक नष्ट हो जाय।'

यों कहकर बुद्धिमान् पुरुष नाभिके बराबर जलमें स्रान करनेके पश्चात् देवताओं और ऋषियोंका विधिपूर्वक तर्पण करे। फिर तिल और जल लेकर पितरोंकी भी तृप्ति करे। उसके बाद आचमन करके शिवमन्दिरमें जाय। उसके भीतर प्रवेश करके तीन बार देवताको परिक्रमा करे। तदनन्तर 'मार्कण्डेयेश्वराय नमः' इस मूल-

मन्त्रसे शङ्करजीकी पूजा करके उन्हें प्रणाम करे और निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर उन्हें प्रसन्न करे-

त्रिलोचन नमस्तेऽस्तु नमस्ते शशिभूषण।

त्राहि मा त्वं विरूपाक्ष महादेव नमोऽस्तु ते।।

(ना० उत्तर० ५५। १९)

'तीन नेत्रोंवाले शङ्कर। आपको नमस्कार है। चन्द्रमाको भूषणरूपमें धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। विकट नेत्रोंवाले शिवजी! आप मेरी रक्षा कीजिये। महादेव! आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार मार्कण्डेय-हदमें नान करके भगवान् शङ्करका दर्शन करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है तथा सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् शिवके लोकमें जाता है।

तत्पश्चात् कल्पान्तस्थायी वटवृक्षके पास जाकर उसकी तीन बार परिक्रमा करे; फिर निम्नाङ्कित मन्त्रद्वारा बड़े भक्तिभावके साथ उस वटकी पूजा करे-

ॐ नमोऽव्यक्तरूपाय महते नतपालिने।

महोदकोपविष्टाय न्यग्रोधाय नमोऽस्तु ते॥

अवसस्त्वं सदा कल्पे हरेश्चायतनं वट।

न्यग्रोध हर मे पापं कल्पवृक्ष नमोऽस्तु ते॥

(नाः उत्तर० ५५। २४-२५)

'जो अव्यक्तस्वरूप, महान् एवं प्रणतजनोंका पालक है, महान् एकार्णवके जलमें जिसकी स्थिति है, उस वटवृक्षको नमस्कार है। हे वट! आप प्रत्येक कल्पमें अक्षयरूपसे निवास करते हैं। आपकी शाखापर श्रीहरिका निवास है। न्यग्रोध! मेरे पाप हर लीजिये। कल्पवृक्ष ! आपको नमस्कार है।'

इसके बाद भक्तिपूर्वक परिक्रमा करके उस कल्पान्तस्थायी वटवृक्षको नमस्कार चाहिये। उस कल्पवृक्षकी छायामें पहुँच जानेपर मनुष्य ब्रह्महत्यासे भी मुक्त हो जाता है, फिर अन्य पापोंकी तो बात ही क्या है। ब्रह्मपुत्री भगवान् श्रीकृष्णके असे प्रकट हुए ब्रहातेजोमय वटवृक्षरूपी विष्णुको प्रणाम करके मानव राजसूप तथा अश्वमेषयज्ञसे भी अधिक फल पाता है और अपने कुलका उद्धार करके विष्णुलोकमें जाता है। भगवान् श्रीकृष्णके सामने खड़े हुए गरुड़को जो नमस्कार करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुके वैकुण्ठधाममें जाता है। जो वटवृक्ष और गरुड़जीका दर्शन करनेके पश्चात् पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रादेवीका दर्शन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। जगन्नाथ श्रीकृष्णके मन्दिरमें प्रवेश करके उनकी तीन बार परिक्रमा करे, फिर नाम-मन्त्रसे बलभद्र और सुभद्रादेवीका भक्तिपूर्वक पूजन करके निम्नाङ्कित रूपसे बलरामजीसे प्रार्थना करे-

नमस्ते हलधृग् राम नमस्ते मुसलायुध।

नमस्ते रेवतीकान्त नमस्ते भक्तवत्सल ।।

नमस्ते बलिना श्रेष्ठ नमस्ते धरणीधर।

प्रलम्बारे नमस्तेऽस्तु त्राहि मां कृष्णपूर्वज॥

(ना० उत्तर०५५। ३३-३४)

'हल धारण करनेवाले राम। आपको नमस्कार है। मुसलको आयुषरूपमें रखनेवाले। आपको नमस्कार है। रेवतीरमण! आपको नमस्कार है। भक्तवत्सल। आपको नमस्कार है। बलवानों में श्रेष्ठ। आपको नमस्कार है। पृथ्वीको मस्तकपर धारण करनेवाले शेषजी! आपको नमस्कार है। प्रलम्बशत्रो। आपको नमस्कार है। श्रीकृष्णके अग्रज ! मेरी रक्षा कीजिये।'

इस प्रकार कैलासशिखरके समान गौर शरीर तथा चन्द्रमासे भी कमनीय श्रेष्ठ मुखवाले, नीलवस्त्रधारी, देवपूजित, अनन्त, अज्ञेय, एक कुण्डलसे विभूषित और फणों के द्वारा विकट मस्तकवाले रोहिणीनन्दन महाबली हलधरको भक्तिपूर्वक प्रसन्न करे। ऐसा करनेवाला पुरुष मनोवाञ्छित फल पाता है और समस्त पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। बलरामजीकी पूजाके पश्चात् विद्वान् पुरुष एकाग्रचित्त हो द्वादशाक्षर-मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) से भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। जो धीर पुरुष द्वादशाक्षर-मन्त्रसे भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी सदा पूजा करते हैं, वे मोक्षको प्राप्त होते हैं। मोहिनी! देवता. योगी तथा सोमपान करनेवाले याज्ञिक भी उस गतिको नहीं पाते. जिसे द्वादशाक्षर- मन्त्रका जप करनेवाले पुरुष प्राप्त करते हैं। अत: उसी मन्त्रसे भक्तिपूर्वक गन्ध-पुष्प आदि सामग्नियोंहारा जगद्गुरु श्रीकृष्णकी पूजा करके उन्हें प्रणाम करे। तत्पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे-

जय कृष्ण जगन्नाथ जय सर्वाघनाशन।

जय चाणूरकेशिन जय कंसनिषूदन ।

जय पद्मपलाशाक्ष जय चक्रगदाधर।

जय नीलाम्बुदश्याम जय सर्वसुखप्रद ॥

जय देव जगत्पूज्य जय संसारनाशन ।

जय लोकपते नाथ जय वाञ्छाफलप्रद ॥

संसारसागरे घोरे निःसारे दुःखफेनिले।

कोधग्राहाकुले रौद्रे विषयोदकसम्लवे॥

नागारोगोर्मिकलिले मोहावर्तसुस्तरे।

निमग्नोई सुरश्रेष्ठ त्राहि मां पुरुषोत्तम॥

(मा० उत्तर०५५/४-४८)

'जगन्नाथ श्रीकृष्ण ! आपकी जय हो। सब पापोंका नाश करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। चाणूर और केशीके नाशक! आपकी जय हो। केसनाशन! आपकी जय हो। कमललोचन। आपकी जय हो। चक्रगदाधर! आपकी जय हो। नील मेघके समान श्यामवर्ण! आपकी जय हो। सबको सुख देनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। जगत्पूज्य देव! आपकी जय हो। संसार संहारक आपकी जय हो। लोकपते! नाथ! आपकी जय हो। मनोवाञ्छित फल देनेवाले देवता! आपकी जय हो। यह भयंकर संसार-सागर सर्वथा नि:सार है। इसमें दुःखमय फेन भरा हुआ है। यह क्रोधरूपी ग्राहसे पूर्ण है। इसमें विषयरूपी जलराशि भरी हुई है। भाँति-भांतिके रोग ही इसमें उठती लहरें हैं। मोहरूपी भँवरोंके कारण यह अत्यन्त दुस्तर जान पड़ता है। सुरश्रेष्ठ ! मैं इस संसाररूपी घोर समुद्र में डूबा हुआ हूँ। पुरुषोत्तम! मेरी रक्षा कीजिये।'

मोहिनी ! इस प्रकार प्रार्थना करके जो देवेश्वर, वरदायक, भक्तवत्सल, सर्वपापहारी, द्युतिमान, सम्पूर्ण कमनीय फलोंके दाता, मोटे कंधे और दो भुजाओंवाले, श्यामवर्ण, कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले, चौड़ी छाती, विशाल भुजा, पीत वस्त्र और सुन्दर मुखवाले, शव-चक्र-गदाधर, मुकुटाङ्गद- भूषित, समस्त शुभलक्षणोस युक्त और वनमाला-विभूषित भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करके हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम करता है, वह हजारों अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है। सब तीर्थोमें नान और दान करनेका अथवा सम्पूर्ण वेदोंके स्वाध्याय तथा समस्त यज्ञोंके अनुष्ठानका जो फल है, उसीको मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन और प्रणाम करके पा लेता है। सब प्रकारके दान, व्रत और नियमोंका पालन करके मनुष्य जिस फलको पाता है, अथवा ब्रह्मचर्य-व्रतका विधिपूर्वक पालन करनेसे जो फल बताया गया है, उसी फलको मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन और प्रणाम करके प्राप्त कर लेता है। भामिनि ! भगवदर्शनके माहात्म्यके सम्बन्धमें अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता? भगवान् श्रीकृष्णका भक्तिपूर्वक दर्शन करके मनुष्य दुर्लभ मोक्षतक प्राप्त कर लेता है।

ब्रह्मकुमारी मोहिनी! तदनन्तर भक्तोंपर नेह रखनेवाली सुभद्रादेवीका भी नाम-मन्त्रसे पूजन करके उन्हें प्रणाम करे और हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करे-

नमस्ते सर्वगे देवि नमस्ते शुभसौख्यदे।

त्राहि मां पद्मपत्राक्षि कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥

(ना० उत्तरः ५५। ६५)

'देवि! तुम सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली और शुभ सौख्य प्रदान करनेवाली हो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। पद्मपत्रों के समान विशाल नेत्रोंवाली कात्यायनी-स्वरूपा सुभद्रे! मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है।

इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाली लोकहितकारिणी, वरदायिनी एवं कल्याणभयी बलभद्रभगिनी सुभद्रादेवीको प्रसन्न करके मनुष्य इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा श्रीविष्णुलोकमें जाता है।

इस प्रकार बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्रादेवीको प्रणाम करके भगवान्के मन्दिरसे बाहर निकले। उस समय मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। तत्पश्चात् जगन्नाथजीके मन्दिरको प्रणाम करके एकाग्रचित्त हो उस स्थानपर जाय जता भगवान विष्णुको इन्द्रनीलमयी प्रतिमा बालूके भीतर छिपी है। वहाँ अदृश्यरूपसे स्थित भगवान् पुरुषोत्तमको प्रणाम करके मनुष्य श्रीविष्णुके धाममें जाता है। देवि । जो भगवान् सर्वदेवमय हैं, जिन्होंने भाषा शरीर सिंहका बनाकर हिरण्यकशिपुका उद्धार किया था, वे भगवान् नृसिंह भी पुरुषोत्तमतीर्थमें नित्य निवास करते हैं। शुभे! जो भक्तिपूर्वक उन भगवान् नृसिंहदेवका दर्शन करके उन्हें प्रणाम करता है, वह मनुष्य समस्त पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो मानव इस पृथ्वीपर भगवान् नृसिंहके भक्त होते हैं, उन्हें कोई पाप छू नहीं सकता और मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। अतः सब प्रकारसे यज्ञ करके भगवान् नृसिंहकी शरण ले; क्योंकि वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षसम्बन्धी फल प्रदान करते हैं। ब्रह्मपुत्री! अतः सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंके देनेवाले महापराक्रमी श्रीनृसिंहदेवकी सदा भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र और अन्त्यज आदि सभी मनुष्य भक्तिभावसे सुर श्रेष्ठ भगवान् नृसिंहकी आराधना करके करोड़ों जन्मोंके अशुभ एवं दुःखसे छुटकारा पा जाते हैं। विधिनन्दिनी! मैं अजित, अप्रमेय तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् नृसिंहका प्रभाव बतलाता हूँ, सुनो! सुव्रते ! उनके समस्त गुणों का वर्णन कौन कर सकता है? अतः मै भी श्रीनृसिंहदेवके गुणोंका संक्षेपसे ही वर्णन करूँगा। इस लोकमें जो कोई दैवी अथवा मानुषी सिद्धियाँ सुनी जाती हैं, वे सब भगवान् नृसिंहके प्रसादसे ही सिद्ध होती हैं। भगवान् नृसिंहदेवके कृपाप्रसादसे स्वर्ग, मर्त्यलोक, पाताल, अन्तरिक्ष, जल, असुरलोक तथा पर्वत-इन सब स्थानों में मनुष्यकी अबाध गति होती है। सुभगे। इस सम्पूर्ण चराचर जगत में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो भारत पर निरन्तर कृपा करनेवाले भगवान् नृसिंहके लिये असाध्य हो।

अब श्रीनृसिंहदेव पूजनकी विधि बतलाता हूँ, जो भक्तोंके लिये उपकारक है, जिससे वे भगवान् नृसिंह प्रसन्न होते है। भगवान् नृसिंहका यथार्थ तत्त्व देवताओं और असुरोंको भी ज्ञात नहीं है। उत्तम साधकको चाहिये कि साग, जौकी लपसी, मूल, फल, खली अथवा सत्तूसे भोजनकी आवश्यकता पूरी करे अथवा भद्रे। दूध पीकर रहे। घास-फूस या कौपीनमात्र वस्त्रसे अपने शरीरको ढक ले। इन्द्रियोंको वशमें करके (भगवान् नृसिंहके) ध्यानमें तत्पर रहे। वनामें, एकान्त प्रदेशमें, नदीके सङ्गम या पर्वतपर, सिद्धिक्षेत्रमें, ऊसरमें तथा भगवान् नृसिंहके आश्रममें जाकर अथवा जहाँ-कहीं भी स्वयं भगवान् नृसिंहकी स्थापना करके जो विधिपूर्वक उनकी पूजा करता है, देवि! वह उपपातकी हो या महापातकी, उन समस्त पातकोंसे वह साधक मुक्त हो जाता है। वहाँ नृसिंहजीकी परिक्रमा करके उनकी गन्ध, पुष्प और धूप आदि सामग्रियोंद्वारा पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् धरतीपर मस्तक टेककर भगवान् को प्रणाम करे और कर्पूर एवं चन्दन लगे हुए चमेलीके फूल भगवान् नृसिंहके मस्तकपर चढ़ावे । इससे सिद्धि प्राप्त होती है। भगवान् नृसिंह किसी भी कार्यमें कभी प्रतिहत नहीं होते। नृसिंह-कवचका एक बार जप करनेसे मनुष्य आगको लपटद्वारा सम्पूर्ण उपद्रवोंका नाश कर सकता है। तीन बार जप करने पर वह दिव्य कवच दैत्यों और दानवोंसे रक्षा करता है। तीन बार जप करके सिद्ध किया हुआ कवच भूत, पिशाच, राक्षस, अन्यान्य लुटेरे तथा देवताओं और असुरोंके लिये भी अभेध होता है। ब्रह्मपुत्री मोहिनी ! सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंके दाता महापराक्रमी नृसिंहजीकी सदा भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। शुभे! भगवान् नृसिंहका दर्शन, स्तवन, नमस्कार और पूजन करके मनुष्य राज्य, स्वर्ग तथा दुर्लभ मोक्ष भी प्राप्त कर लेते हैं। भगवान् नृसिंहका दर्शन करके मनुष्यको मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है तथा वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो भक्तिपूर्वक नृसिंहरूपधारी भगवान्का एक बार भी दर्शन कर लेता है, वह मन, वाणी और शरीरद्धारा होनेवाले सम्पूर्ण पातकोंसे मुक्त हो जाता है। दुर्गम संकटमें, चोर और व्याघ्र आदिकी पीड़ा उपस्थित होनेपर, दुर्गम प्रदेशमें, प्राणसंकटके समय, विष,अग्नि और जलसे भय होनेपर, राजा आदिसे भय प्राप्त होनेपर, घोर संग्राममें और ग्रह तथा रोग आदिकी पीड़ा प्राप्त होनेपर जो पुरुष भगवान् नृसिंहका स्मरण करता है, वह संकटोंसे छूट जाता है। जैसे सूर्योदय होनेपर भारी अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् नृसिंहका दर्शन होनेपर सब प्रकारके उपद्रव मिट जाते हैं। भगवान् नृसिंहके प्रसन्न होनेपर गुटिका, अञ्जन, पातालप्रवेश, पैरों में लगाने योग्य दिव्यलेप, दिव्य रसायन तथा अन्य मनोवाञ्छित पदार्थ भी मनुष्य प्राप्त कर लेता है मानव जिन-जिन कामनाओंका चिन्तन करते हुए भगवान् नृसिंहका भजन करता है, अवश्य प्राप्त कर लेता है।