भगवान् श्रीकृष्ण-सम्बन्धी मन्त्रोंकी अनुष्टनविधि तथा विविध प्रयोग

सनत्कुमारजीने कहा-नारद अब मैं भोग श्रीकृष्ण और मोक्षरूप फल देनेवाले श्रीकृष्ण-मन्त्रोंका धर्म,  वर्णन करूंगा; काम (क्ली) 'डे' विभक्त्यन्त सिद्धिके कृष्ण और गोविन्द पद (कृष्णाय गोविन्दाय) श्रेष्ठ साधक फिर 'गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' (क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) यह अठारह न्यास  अक्षरोंका मन्त्र है, जिसकी अधिष्ठात्री देवी दुर्गाजी हैं। इस मन्त्रके नारद ऋषि, गायत्री छन्द, परमात्मा  की अनुष्ठानविधि तथा विविध प्रयोग श्रीकृष्ण देवता, क्लों बीज और स्वाहा शक्ति है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पुरुषार्थोकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग किया जाता है। श्रेष्ठ साधक ऋषिका सिरमें, छन्दका मुखमें, देवताका हदयमें बीजका गुहामें और शक्तिका चरणों में न्यास करें। मन्त्रके चार, चार, चार, चार और दो अक्षरोंसे पञ्चाङ्ग-न्यास' करके फिर तत्त्व- न्यास करे। तत्पश्चात् हृदयकमलमें क्रमशः

१. नारदर्षये नमः शिरसि, गायत्रीछन्दसे नमः मुखे, श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः हृदि, क्ती बीजाय नमः गरे स्वाहा शकषे नमः पादयोः-यह ऋष्यादि न्यास है।

२. पाङ्ग-न्यास इस प्रकार है-क्ली कृष्णाय हृदयाय नमः । गोविन्दाय शिरसे स्वाहा। 'गोपीजन' शिवाय वषट् 'वल्लभाष' कषचाष ई. 'स्वाहा' अस्त्राय फट् ।

द्वादशकलाव्याप्त सूर्यमण्डल, षोडशकलाव्याप्त चन्द्रमण्डल तथा दशकलाव्याप्त अग्रिमण्डल न्यास करे। साथ ही मन्त्रके पदोंमें स्थित आठ, आठ और दो अक्षरोंका भी क्रमशः उन मण्डलोंकें साथ योग करके उन सबका हृदयमें न्यास करे (यथा-

क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय द्वादशकला- व्याप्तसूर्यमण्डलात्मने नमः, गोपीजनबल्लभाप  ॐ षोडशकलाव्याप्तचन्द्रमण्डलात्मने नमः स्वाहा, मं दशकलाव्याप्तवह्निमण्डलात्मने नमः

- हृत्पुण्डरीके)। तत्पश्चात् आकाशादिके स्थलों में अर्थात् मूर्द्धा, मुख, हृदय, गुह्य तथा चरणों में क्रमशः वासुदेव आदिका न्यास करे। वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा नारायण-ये वासुदेव आदि कहलाते हैं। ये क्रमशः परमेष्ठी आदिसे युक्त हैं। परमेष्ठि पुरुष, शौच, विश्व, निवृत्ति तथा सर्व-ये परमेष्ठ्यादि कहे गये हैं। परमेष्ठि पुरुष आदि  क्रमशः श्वेतवर्ण, अनिलवर्ण, अग्निवर्ण, अम्बुवर्ण  तथा भूमिवर्णके हैं। इन सबका पूर्ववत् न्यास करे  (यथा-

श्वेतवर्णपरमेष्ठिपुरुषात्मने वासुदेवाय नमः मूर्द्धनि। अनिलवर्णशौचात्मने सङ्कर्षणाय नमः मुखे। अग्निवर्णविश्वात्मने प्रद्युमाय नमः हृदये।  अम्बुवर्णनिवृत्त्यात्मनेऽनिरुद्धाय नमः गुह्ये।  भूमिवर्णसर्वात्मने नारायणाय नमः पादयोः। ॐ क्षौं कोपतत्वात्मने नृसिंहाय नमः इति सर्वाङ्गे।

इस प्रकार सम्पूर्ण अङ्गमें न्यास करे। यह तत्त्व- क्रम न्यास कहा गया है। इसी प्रकार श्रेष्ठ साधकोंको वण यह जानना चाहिये कि वासुदेव आदि नामोंका पूर्व 'हे विभक्त्यन्त रूप ही न्यासमें ग्राहा है। तदनन्तर छ: मन्त्रज्ञ पुरुष मूलमन्त्रको चार बार पढ़कर पूरक,  छ: बार पढ़कर कुम्भक और दो बार पड़कर साक्ष रेचक करते हुए प्राणायाम सम्पन्न करे। कुछ न्याय आचार्योंका यहाँ यह कथन है कि प्राणायामके कि पश्चात् पीठन्यास करके दूसरे न्यासोंका अनुष्ठान फिर करे। आगे बतायी जानेवाली विधिके अनुसार क्या दशतत्त्वादि न्यास करके विद्वान् पुरुष मूर्तिपञ्जर नामक न्यास करे। फिर किरीटमन्त्रद्वारा बुद्धिमान् साधक सर्वाङ्गमें व्यापक न्यास करके प्रणवसम्पुटित मन्त्रको तीन बार दोनों हाथोंकी पाँचों अंगुलियोंमें व्याप्त (विन्यस्त) करे। उसके बाद तीन बार पञ्चाङ्ग-न्यास करे। तदनन्तर मूलमन्त्रको पढ़कर सिरसे लेकर पैरतक व्यापक-न्यास करे। फिर केवल प्रणवद्वारा एक बार व्यापक-न्यास करके मन्त्र-न्यास करे। इसके बाद पुनः नेत्र, मुख, हृदय, गुह्य और चरणद्वय-इनमें क्रमश: मन्त्रके पाँच पदोंका अन्त में 'नमः' लगाकर न्यास करे (यथा-

क्लीं नमः नेत्रद्वये। कृष्णाय नमः मुखे। गोविन्दाय नमः हृदये। गोपीजनवल्लभाय नमः गुह्ये। स्वाहा नमः पादयोः।

पुनः ऋषि आदि न्यास करके पूर्वोक्त पञ्चाङ्ग-न्यास करे।

अब मैं सब न्यासोंमें उत्तमोत्तम परमगुह्य न्यासका वर्णन करता हूँ, जिसके विज्ञानमात्रसे मनुष्य जीवन्मुक्त तथा अणिमा आदि आठों सिद्धियोंका अधीश्वर हो जाता है, जिसकी आराधनासे मन्त्रोपासक श्रीकृष्णका सान्निध्य प्राप्त कर लेता है। प्रणवादि व्याहृतियोंसे सम्पुटित मन्त्रका और मन्त्रसे सम्पुटित प्रणवादिका तथा गायत्रीसे सम्पुटित मन्त्रका और मन्त्रसे सम्पुटित गायत्रीका मातृकास्थलमें न्यास करे। मातृका-सम्पुटित मूलका और मूलसे सम्मुटित मातृका वर्णों का श्रेष्ठ साधक क्रमश: न्यास करे। विद्वान् पुरुष पहले मातृका वर्णांका नियतस्थलमें न्यास कर ले। उसके बाद पूर्वोक्त न्यास करने चाहिये। इस तरह उपर्युक्त छः प्रकारके न्यास करे। यह षोढान्यास कहा गया है। इस श्रेष्ठ न्यासके अनुष्ठानसे साधक साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके समान हो जाता है। न्याससे सम्पुटित पुरुषको देखकर सिख, गन्धर्व, किन्नर और देवता भी उसे नमस्कार करते हैं। फिर इस भूतलपर मनुष्यों के लिये तो कहना ही क्या है? तत्पशात् 'ॐ नमः सुदर्शनाय भरवाय फट्' इस मन्त्रसे दिग्बन्ध करे।इसके बाद अपने

ह्रदयमें सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाले इष्टदेवका इस प्रकार ध्यान करे-

उत्फुल्लकुसुमवासनप्रशाखैर्वद्रुमैः।

सस्मेरमवारीवन्दबल्लीवेष्टितः शुभैः॥

गलत्परागधूलीभिः सुरभीकृतविचमुखैः ।

स्मरेच्छिशिरितं वृन्दावन मन्त्री समाहितः।

उन्मीलनायकस्यालि विगलन्मधुसञ्चयैः ।

लुब्धान्तःकरणैर्गुस्सद्विरेफपटलैः शुभम् ।।

मरालपरभृत्कीरकपोतनिकरर्मुहुः

मुखरीकृतमानृत्यन्मायूरकुलमब्जुलम्

कालिन्द्या लोलकल्लोलविपुषैर्मन्दवाहिभिः ।

उन्निद्राम्बुरुहवातरजोभिधूसरः शिवैः॥

प्रदीपितस्मरैर्गोष्ठसुन्दरीमृदुवाससाम्।

विलोलनपरैः संसेवितं वा तैर्निरन्तरम् ॥

स्मरेत्तदन्ते गीर्वाणभूरुह सुमनोहरम् ।

तदधः स्वर्णवेद्यां च रत्नपीठमनुत्तमम् ।।

रत्रकुट्टिमपीठेऽस्मिन्नरुणं कमलं स्मरेत्।

अष्टपत्रं च तन्मध्ये मुकुन्दं संस्मरेस्थितम्॥

फुल्लेन्दीवरकान्तं च केकिबहावतंसकम्।

पीतांशुकं चन्द्रमुखं सरसीरुहनेत्रकम्।

कौस्तुभोशासिताङ्गं च श्रीवत्साहू सुभूषितम् ।

व्रजस्त्रीनेत्रकमलाभ्यर्चितं गोगणावृतम्॥

गोपन्दयुतं वंशी वादयन्तं स्मरेत्सुधीः ।

(४०-५०)

'मन्त्रोपासक एकाग्रचित्त होकर श्रीवृन्दावनका चिन्तन करे, जो शुभ एवं सुन्दर हरे-भरे वृक्षोंसे परिपूर्ण तथा शीतल है। उन वृक्षोंको शाखाएँ खिले हुए कुसुम-समूहों के भारसे झुकी हुई हैं। उनपर प्रफुल्ल मञ्जरियोंसे युक्त विकसित लतावल्लरियाँ फैली हुई हैं। वे वृक्ष झड़ते हुए पुष्पपणा धूलिकणोंसे सम्पूर्ण दिशाओको सुवासित करते रहते हैं, वहाँ खिलते हुए नूतन कमल बनौसे निकलती मधुधाराओंके संचयो लुभाये अन्नाकारणवाले अमरोका समुदाय मनोहर पुजार करा रहता है। स. कोकिल शुक और पारावत आदि पक्षियोंका समूह बारम्बार कलरव करते हुए वृन्दावनको कोलाहलपूर्ण किये रहता है। चारों ओर नृत्य करते मोरोंके झंडसे वह वन अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है। कालिन्दीकी चञ्चल लहरोंसे नीर-विन्दुओंको लेकर मन्द-मन्द गतिसे प्रवाहित होनेवाली शीतल सुखद वायु प्रफुल्ल पङ्कजोंके पराग-पुजसे धूसर हो रही है। व्रजसुन्दरियोंके मृदुल वसनाचलोंको वह चशल किये देती है और इस प्रकार मनमें प्रेमोन्मादका उद्दीपन करती हुई वह मन्द वायु वृन्दावनका निरन्तर सेवन करती रहती है। उस वनके भीतर एक अत्यन्त मनोहर कल्पवृक्षका चिन्तन करे, जिसके नीचे सुवर्णमवी वेदीपर परम उत्तम रत्नमय पीठ शोभा पाता है। वहाँको प्राङ्गण-भूमि भी रलोंसे आबद्ध है। उस रत्नमय पीठपर लाल रंगके अष्टदलकमलकी भावना करे, जिसके मध्यभागमें श्रीमुकुन्द विराजमान हैं। उनके स्वरूपक इस प्रकार ध्यान करे-उनकी अङ्ग-कान्ति विकसित नील कमलके समान श्याम है। वे मोर-पङ्घका मुकुट पहने हुए हैं, कटिभागमें पीताम्बर शोभा पा रहा है। उनका मुख चन्द्रमाको लज्जित कर रहा है, नेत्र खिले हुए कमलोंकी शोभा छीने लेते हैं, उनका सम्पूर्ण अङ्ग कौस्तुभमणिकी प्रभासे उद्भासित हो रहा है, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित है। वे परम सुन्दर दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं, ब्रजसुन्दरियाँ मानो अपने नेत्रकमलोंके उपहारसे उनकी पूजा करती हैं, गौएँ उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ी हैं। गोपवृन्द उनके साथ हैं और वे वंशी बजा रहे हैं। विद्वान् पुरुष भगवानका चिन्तन करे।'

बुद्धिमान् साधक इस तरह ध्यान करके पहले बीस हजार मन्त्र-जप करे। फिर एकाप्रचित्त हो अरुण कमल-कुसुमाकी दशांश आतुति दे। तत्पश्चात् समाहित होकर मन्त्र-सिद्धिके लिये पाँच लाख जप करे। साल कामालोची आहुति देकर साधक सम्पूर्ण सिद्धियोंका स्वामी हो जाता है। पूर्वाक वैष्णव पीठपर मूलमन्त्रसे मूर्ति-निर्माण करके उसमें गोपीजनमनोहर श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका अवाहन और पूजन करे। मुखमें वेणुकी पूजा करके, वक्षःस्थलमें वनमाला, कौस्तुभ तथा श्रीवत्सका पूजन करे। इसके बाद पुष्पाहालि चढ़ावे । तत्पश्चात् बुद्धिमान् उपासक देवेश्वर श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए उनके दक्षिणभागमें श्वेतचन्दनचर्चित श्वेत तुलसीको तथा वामभागमें रक्तचन्दनचर्चित लाल तुलसीको समर्पित करे। इसके बाद दो अपार (कनेर) पुष्पोंसे उनके हृदय और मस्तककी पूजा करे। तदनन्तर शीर्षभाग विधिपूर्वक दो कमलपुष्प समर्पित करे। तत्पश्चात् उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें दो तुलसीदल, दो कमलपुष्प और दो अश्वमार (श्वेत- रक्त कनेर) कुसुम चढ़ाकर फिर सब प्रकारके पुष्प अर्पण करे। गोपाल श्रीकृष्णके दक्षिणभागमें अविनाशी निर्मल चैतन्यस्वरूप भगवान् वासुदेवका तथा वामभागमें रजोगुणस्वरूपा नित्य अनुरका रुक्मिणी देवीका पूजन करे । इस प्रकार गोपालका भलीभाँति पूजन करके आवरण देवताओंको पूजा करे। दाम, सुदाम, वसुदाम और किंकिणी- इनका क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तरमें पूजन करे। दाम आदि शब्दोंके आदिमें प्रणव और अन्तमें 'ई' विभक्ति तथा 'नमः' पद जोड़ने चाहिये। (यथा- ॐ दामाय नमः इत्यादि, यदि दाम शब्द नान्त हो तो 'दाम्रे नमः' यह रूप होगा) अग्नि, नैर्ऋत्य, वायव्य तथा ईशान कोणों में क्रमशः हृदय, सिर, शिखा तथा कवचका पूजन करके सम्पूर्ण दिशाओंमें अस्त्रोंका पूजन करे। फिर आठों दलोंमें रुक्मिणी आदि पटरानियोंकी पूजा करे। रुक्मिणी, सत्यभामा, नाशिजिती, सुविन्दा मित्रविन्दा, लक्ष्मणा, जाम्बवती तथा सुशीला। ये सब-की-सब सुन्दर, सुरम्य एवं विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित है। तदनन्तर अहदलोंके अग्रभागमें वसुदेव-देवकी, नन्द-यशोदा, बलभद्र- सुभद्रा तथा गोप और गोपियोंका पूजन करे। इन सबके मन, बुद्धि तथा नेत्र गोविन्दमें ही लगे हुए हैं। दोनों पिता वसुदेव और नन्द क्रमशः पीत और पाण्डु वर्णक हैं। माताएँ (देवकी और यशोदा) दिव्य हार, दिव्य वस्त्र, दिव्याङ्गराग तथा दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। दोनोंने चरु तथा खीरसे भरे हुए पात्र ले रखे हैं। देवकीका रंग लाल है और यशोदाका श्याम। दोनोंने सुन्दर हार और मणिमय कुण्डलोंसे अपनेको विभूषित किया है। बलरामजी शङ्ख तथा चन्द्रमाके समान गौरवर्णके हैं। वे मूसल और हल धारण करते हैं। उनके श्रीअङ्गोंपर नीले रंगका वस्त्र सुशोभित होता है। हलधरके एक कानमें कुण्डल शोभा पाता है। भगवान् की जो श्यामला कला है, वही भद्रस्वरूपा सुभद्रा है। उसके आभूषण भी भद्र (मङ्गल)- हैं। सुभद्राजीके एक हाथमें वर और दूसरेमें अभय है। वे पीताम्बर धारण करती हैं। गोपगों के हाथमें वेणु, वीणा, सोनेकी छड़ी, शङ्ख और सींग आदि हैं। गोपियोंके करकमलोंमें नाना प्रकारके खाद्य पदार्थ हैं। इन सबके बाह्यभागमें मन्दार आदि कल्पवृक्षोंकी पूजा करे। मन्दार, सन्तान, पारिजात, कल्पवृक्ष और हरिचन्दन (ये ही उन वृक्षोंके नाम हैं)। उक्त पाँच वृक्षोंसे चारकी चारों दिशाओंमें और एककी मध्यभागमें पूजा करके उनके बाह्यभागमें इन्द्र आदि दिक्पालों और उनके वज्र आदि अस्त्रोंकी पूजा करे। तत्पश्चात् श्रीकृष्णके आठ नामोंद्वारा उनका यजन करना चाहिये। वे नाम इस प्रकार हैं-कृष्ण, वासुदेव, देवकीनन्दन, नारायण, यदुश्रेष्ठ, वार्ष्णेय, धर्मपालक तथा असुराक्रान्त-भूभारहारी। विद्वान् पुरुषोंको सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिके लिये तथा संसार-सागरसे पार होनेके लिये इन आवरणोंसहित असुरारि श्रीकृष्णकी आराधना करनी चाहिये।

*अन्यन्न सुशीला और सुविन्दाके स्थानमें भद्रा और कालिन्दी-ये दो नाम उपलब्ध होते हैं।

अब मैं भगवान् श्रीकृष्णके त्रिकाल पूजनका वर्णन करता है, जो समस्त मनोरथोंकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है।

             प्रात:कालिक ध्यान

श्रीमदुधानसंवीतहेमभूरनपपडपे।

लसत्कल्पगुमाध:स्थरबाजपीठसंस्थितम् ।

सुत्रापरबसंकाशं गुडस्निग्धालक शिशुम्॥

चलत्कनककुण्डलोल्लसितचारुगण्डस्थल

सुघोणधरमद्धतस्मितपुखाम्बुजं सुन्दरम्।

स्फुरद्विपलरनयुक्कनकसूत्रनद्धं दधत्-

सुवर्णपरिमण्डितं सुभगपौण्डरीकं नखम् ॥

समुथूसरोर:स्थले धेनुधूल्या

सुपुष्टाङ्गमष्टापदाकल्पदीप्तम्।

कटीरस्थले चारुजङ्घान्तयुग्मं

पिनद्धं क्वणत्किङ्किणीजालदाम्ना ॥

हसन्तं हसन्धुजीवप्रसून-

प्रभापाणिपादाम्बुजोदारकान्त्या

दधानं करे दक्षिणे पायसान्न

सुहैयंगवीनं तथा वामहस्ते।

लसद्गोपगोपीगवां वृन्दमध्ये

स्थितं वासवाद्यैः सुरैरर्चिताधिम्।

महीभारभूतामरारातियूथां-

स्ततः पूतनादीन् निइन्तुं प्रवृत्तम् ।

(ना० पूर्व० ८०। ७५-८०)

'एक सुन्दर उद्यानसे घिरी हुई सुवर्णमयी भूमिपर स्नमय मण्डप बना हुआ है। वहाँ शोभायमान कल्पवृक्षके नीचे स्थित रजनिर्मित कमलयुक्त पीठपर एक सुन्दर शिशु विराजमान है; जिसकी अङ्गकान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम है। उसके काले-काले केश चिकने और धुंघराले हैं। उसके मनोहर कपोल हिलते हुए स्वर्णमय कुण्डलोंसे अत्यन्त सुन्दर लगते हैं, उसकी नासिका बड़ी सुघड़ है। उस सुन्दर बालकके मुखारविन्दपर मन्द मुसकानकी अद्भुत छटा छा रही है। वह सोनेके तारमें गुँथा और सोनेसे ही मँढ़ा हुआ सुन्दर बघनखा धारण करता है, जिसमें परम उज्ज्वल चमकीले रत्न जड़े हुए हैं। गोधूलिसे धूसर वक्षःस्थलपर धारण किये हुए स्वर्णमय आभूषणोंसे उसकी दीप्ति बहुत बढ़ी हुई है। उसका एक-एक अङ्ग अत्यन्त पुष्ट है। उसकी दोनों पिण्डलियोंका अन्तिम भाग अत्यन्त मनोहर है। उसने अपने कटिभागमें धुंघरूदार करधनीकी लड़ बाँध रखी है, जिससे मधुर झनकार होती रहती है। खिले हुए बन्धुजीच (दुपहरिया)-के फूलकी अरुण प्रभासे युक्त करारविन्द और चरणारविन्दोंकी उदार कान्तिसे सुशोभित वह शिशु मन्द मन्द हँस रहा है। उसने दाहिने हाथमें खीर और बायें हाथमें तुरन्तका निकाला हुआ माखन ले रखा है। ग्वालों, गोपसुन्दरियों और गौओंकी मण्डलीमें स्थित होकर वह बड़ी शोभा पा रहा है। इन्द्र आदि देवता उसके चरणोंकी समाराधना करते हैं। वह पृथ्वीके भारभूत दैत्यसमुदाय पूतना आदिका संहार करने में लगा है।'

इस प्रकार ध्यान करके पूर्ववत् एकाग्रचित्त हो भगवान् का  पूजन करे। दही और गुड़का नैवेद्य लमाकर एक हजार मन्त्र जप करे। इसी प्रकार मध्याह्नकालमें नारदादि मुनिगणों और देवताओंसे पूजित विशिष्ट रूपधारी भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करे।

             मध्याहूकालिक ध्यान

लसद्गोपगोपीगा वृन्दमध्य-

स्थितं सान्द्रमेघप्रभ सुन्दराङ्गम्।

शिखण्डिच्छदाडपीडमब्जायताक्षं

लसच्चिल्लिकं पूर्णचन्द्राननं च॥

चलत्कुण्डलोल्लासिगण्डस्थल श्री-

भरं सुन्दरं मन्दहासं सुनासम्।

सुकार्तस्वराभाम्बरं दिव्यभूवं

क्वणत्किङ्किणीजालमात्तानुलेपम् ॥

वेणुं धमन्तं स्वकरे दधानं

सव्ये दरं यष्टिमुदारवेषम्।

दक्षे तथैवेप्सितदानदक्षं

ध्यात्वार्चयेनन्दजमिन्दिराप्त्यै।।

(ना० पूर्व० ८०। ८३-८५)

'जो सुन्दर गोप, गोपाङ्गनाओं तथा गौओंके मध्य विराजमान हैं. खिम्भ मेषके समान जिनकी श्याम बिहै, जिनका एक एक अन्ज बहुत सुन्दर है, जो मयूरपिच्छका मुकुट धारण करते हैं, जिनके नेत्र कमलदलके समान विशाल हैं, भाँहोंका मध्यभाग शोभासम्पन है और मुख पूर्ण चन्द्रमाको भी लज्जित कर रहा है, हिलते और झलमलाते हुए कमनीय कुण्डलोंसे उल्लसित कपोलोंपर जो शोभाकी राशि धारण करते हैं, जिनकी नासिका मनोहर है, जो मन्द-मन्द हँसते हुए बड़े सुन्दर जान पड़ते हैं, जिनका वस्त्र तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् और आभूषण दिव्य हैं, कटिभागमें धारण की हुई जिनकी क्षुद्र घण्टिकाओंसे मधुर झनकार हो रहा है, जिन्होंने दिव्य अङ्गराग धारण किया है, जो अपने हाथमें लेकर मुरली बजा रहे हैं, जिनके बायें हाथमें शङ्ख और दाहिने हाथमें छड़ी है, जिनकी वेश-भूषासे उदारता टपक रही है, जो मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करनेमें दक्ष हैं, उन नन्दनन्दन श्रीकृष्णका ध्यान करके लक्ष्मीप्राप्तिके लिये उनका पूजन करे।

इस प्रकार ध्यान करके श्रेष्ठ वैष्णव पुरुष पूर्ववत् भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। पूआ, खीर तथा अन्य भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका नैवेद्य अर्पण करे। घृतयुक्त खीरको एक सौ आठ आहुति देकर प्रत्येक दिशामें उसीसे बलि अर्पण करे। तत्पश्चात् आचमन करे। इसके बाद एक हजार आठ बार उत्तम मन्त्र-जप करे। जो उत्तम वैष्णव मध्याह्नकालमें इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करता है, उसे सब देवता प्रणाम करते हैं और वह मनुष्य सब लोगोंका प्रिय होता है। वह मेधा, आयु, लक्ष्मी तथा सुन्दर कान्तिसे सुशोभित होकर पुत्र-पौत्रोंके साथ अभ्युदयको प्राप्त होता है। तीसरे समयकी पूजामें कौन-सा काल है, के इस विषयमें मतभेद है। कुछ विद्वान् इस पूजाको की सायंकालमें करने योग्य बताते हैं और कुछ रात्रिमें। दशाक्षर-मन्त्रसे पूजा करनी हो तो रातमें करे। अष्टादशाक्षरसे करनी हो तो सार्यकाल में करे। कुछ दूसरे विद्वान् ऐसा भी कहते हैं कि दोनों प्रकारके मन्त्रोंसे दोनों ही समय पूजा करनी चाहिये।

              सायंकालिक ध्यान

सायंकालमें भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरीमें एक सुन्दर भवनके भीतर विराजमान हैं, जो विचित्र उद्यानसे सुशोभित है। वह श्रेष्ठ भवन आठ हजार गृहोंसे अलंकृत है। उसके चारों ओर निर्मल जलवाले सरोवर सुशोभित हैं। हंस, सारस आदि पक्षियोंसे व्याप्त कमल और उत्पल आदि पुष्प उन सरोवरोंकी शोभा बढ़ाते हैं। उक्त भवनमें एक शोभासम्पन्न मणिमय मण्डप है, जो उदयकालीन सूर्यदेवके समान अरुण प्रकाशसे प्रकाशित हो रहा है। उस मण्डपके भीतर सुवर्णमय कमलको आकृतिका सुन्दर सिंहासन है, जिसपर त्रिभुवनमोहन श्रीकृष्ण बैठे हैं। उनसे आत्मतत्त्वका निर्णय करानेके लिये मुनियों के समुदायने उन्हें सब ओरसे घेर रखा है। भगवान् श्यामसुन्दर उन मुनिर्योको अपने अविनाशी परम धामका उपदेश दे रहे हैं। उनकी अङ्गकान्ति विकसित नीलकमलके समान श्याम है। दोनों नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल हैं। सिरपर स्निग्ध अलकावलियोंसे संयुक्त सुन्दर किरीट सुशोभित है। गले में वनमाला शोभा पा रही है। प्रसन्न मुखारविन्द मनको मोहे लेता है। कपोलोंपर मकराकृति कुण्डल झलमला रहे हैं। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है। वहीं कौस्तुभमणि अपनी प्रभा बिखेर रही है। उनका स्वरूप अत्यन्त मनोहर है। उनका वक्षःस्थल केसरके अनुलेपसे सुनहली प्रभा धारण करता है। वे रेशमी पीताम्बर पहने हुए हैं, विभिन्न अङ्गोंमें हार, बाजूबंद, कड़े और करधनी आदि आभूषण उन्हें अलंकृत कर रहे हैं। उन्होंने पृथ्वीका भारी भार उतार दिया। उनका हृदय परमानन्दसे परिपूर्ण है तथा उनके चारों हाथ शङ्ख, चक्र, गदा और पद्यसे सुशोभित हैं*।

इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक भगवान्की पूजा करे। हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र-इनके द्वारा प्रथम आवरण बनता है। रुक्मिणी आदि पटरानियों द्वारा द्वितीय आवरण सम्पन्न होता है। तृतीय आवरणमें नारद, पर्वत, विष्णु, निशल, उद्धवदारुक, विश्वकोन तथा सात्यकि हैं, इनका आठ दिशाओम और विनतानन्दन गरड़का भगवान के सम्मुख पूजन करें। चौथे

*सायाहे द्वारवत्यां तु चित्रोद्यानोपशोभिते । अष्टसाहनसंख्यातेर्भवनैरुपमण्डिते।।

हंससारससंकीर्णकमलोत्पलशालिभिः ।

सरोभिर्निर्मलाम्भोभिः परीते भवनोत्तमे॥

उत्प्रद्योतनोद्योतद्युती श्रीमणिमण्डपे ।

हेमाम्भोजासनासीनं कृष्णं त्रैलोक्यमोहनम् ॥

मुनिवृन्दैः परिवृतमात्मतत्त्वविनिर्णये ।

तेभ्यो मुनिभ्यः स्वं धाम दिशन्तं परमशरम् ॥

आवरणमें लोकपालोंके साथ और पाँचवें आवरणमें वज्र आदि आयुधोंके साथ उत्तम वैष्णव भगवत्पूजनका कार्य सम्पन्न करे। इस प्रकार विधिपूर्वक पूजा करके खीरका नैवेद्य अर्पण करे। फिर जलमें खाँडमिश्रित दूधकी भावना करके उस जलद्वारा तर्पण करे। उसके बाद मन्त्रोपासक पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए मूलमन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। तीनों कालकी पूजाओंमें अथवा केवल मध्याह्नकालमें ही होम करे। आसनसे लेकर विशेषाऱ्यापर्यन्त सम्पूर्ण पूजा पूरी करके विद्वान् पुरुष भगवान्की स्तुति और नमस्कार करे। फिर भगवान्को आत्मसमर्पण करके उनका विसर्जन करनेके पश्चात् अपने हृदयकमलमें उनकी स्थापना करे और तन्मय होकर पुनः आत्मस्वरूप भगवान्की पूजा करे। जो प्रतिदिन इस प्रकार सायंकालमें भगवान् वासुदेवको पूजा करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाकर अन्तमें परम गतिको प्राप्त होता है।

              रात्रिकालिक ध्यान

रात्रौ चेन्मदनाकान्तचेतसं नन्दनन्दनम्।

यजेद्रासपरिश्रान्तं गोषीमण्डलमध्यगम्॥

विकसत्कुन्दकलारमल्लिकाकुसुमोद्गतैः।

रजोभिधूसरैर्मन्दमारुतैः शिशिरीकृते॥

उन्मीलनवकै स्वालिविगलन्माध्वीकलब्धान्तर-

भाम्यन्मत्तमिलिन्दगीतललिते सम्मल्लिकोम्भिते।

पीयूषांशुकरैर्विशालितहरित्यान्ते स्मरोद्दीपने

कालिन्दीपुलिनाङ्गणे स्मितमुखं खेणु रणन्त मुहुः ॥

अन्तस्तोयलमत्रवाम्बदघटासंघकारत्विषं

चञ्चचिल्लिकमम्बुजायतदृशं बिम्बाधरं सुन्दरम्।

मायूरच्छदबद्धमौलिविलसद्धम्मिल्लमाले चलद्-

दीप्यत्कुण्डलरत्नरश्मिविलसद्गण्डद्वयोद्भासितम् ॥

काञ्चीनूपुरहारकङ्कणलसत्केयूरभूषान्वित

गोपीनां द्वितयान्तरे सुललितं वन्यप्रसूनस्रजम्।

अन्योन्यं विनिबद्धगोपदयितादोर्वल्लिवीतं लस-

द्रासक्रीडनलोलुपं मनसिजाक्रान्तं मुकुन्दं भजेत् ।।

विविधश्रुतिभिन्नमनोज्ञतरस्वरसप्तकमूर्छनतानगणैः ।

भ्रममाणममूभिरुदारमणिस्फुटमण्डनशिञ्जितचारुतनुम्॥

इतरेतरबद्धकरप्रमदागणकल्पितरासविहारविधौ ।

मणिशङ्कुगमप्यमुना वपुषाबहुधा विहितस्यकदिव्यतनुम्॥

(ना० पूर्व० ८०। १०७-११३)

'रात्रिमें पूजन करना हो तो भगवान् का ध्यान इस प्रकार करे-भगवान् नन्दनन्दनने अपने हृदयमें प्रेमको आश्रय दे रखा है। वे रासक्रीड़ामें संलग्न हो मानो थक गये हैं और गोपाङ्गनाओंकी मण्डलीके मध्यभागमें विराज रहे हैं। उस समय यमुनाजीका पुलिन-प्राङ्गण अमृतमय किरणोंवाले चन्द्रदेवकी धवल ज्योत्स्नासे उद्भासित हो रहा है। वहाँका प्रान्त अत्यन्त हरा-भरा एवं भगवत्प्रेमका उद्दीपक हो रहा है। खिले हुए कुन्द, कहार और मल्लिका आदि कुसुमोके परागपुञ्जसे धूसरित मन्द-मन्द वायु प्रवाहित होकर उस पुलिन प्राङ्गणको शीतल बना रही है। खिले हुए नूतन कुमुदोंके मादक मकरन्दका पान करके उन्मत्त हृदयवाले भ्रमर इधर-उधर भ्रमण करते हुए मधुर गुआरव फैला रहे हैं, जिससे वह वनप्रान्त अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता है। वहाँ सब ओर सुन्दर चमेलीकी

उन्निन्द्रेन्दीवरश्याम पद्मपजायतेक्षणम् । स्निग्धकुन्तलसम्भिनकिरीटवनमालिनम्।।

चारुप्रसन्नवदनं स्फुरन्मकरकुण्डलम्।

श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं सुमनोहरम्॥

काश्मीरकपिशोरस्कं पीतकौशेयवाससम् । हारकेयूरकटककटिसूत्रैरलङ्कृतम्

हतविश्वम्भराभूरिभारं मुदितमानसम् ।शङ्खचक्रगदापद्यराजद्धजचतुष्टयम्

(ना० पूर्व०८०।९२-९९)

सुगन्ध फैला रही है। ऐसे मनोहर कालिन्दीतरपर श्यामसुन्दर मुखसे मन्द-मन्द मुसकानकी प्रभा बिखेरते हुए बारम्बार मुरली बजा रहे हैं। उनकी अङ्गकान्ति भीतर जलसे भरे हुए नूतन मेघोंकी श्याम घटासे टक्कर ले रही है। भौहोंका मध्यभाग कुछ चञ्चल हो उठा है। दोनों नेत्र विकसित कमलदलके समान विशाल हैं। लाल-लाल अधर बिम्बफलको लजा रहे हैं। भगवान् की  वह झाँकी बड़ी ही सुन्दर है। माथेपर मोरपंखका मुकुट है, जिससे उनके बँधे हुए केशोंकी चोटी बड़ी सुहावनी लग रही है। उनके दोनों कपोल हिलते हुए चमकीले कुण्डलोंमें जटित रनोंकी किरणोंसे उद्भासित हो रहे हैं और उन कपोलोंसे श्यामसुन्दरका सौन्दर्य और भी बढ़ गया है। वे करधनी, नूपुर, हार, कंगन और सुन्दर भुजबंद आदि आभूषणोंसे विभूषित हो प्रत्येक दो गोपीके बीचमें खड़े होकर अपनी मनमोहिनी झाँकी दिखा रहे हैं। गलेमें वन्यपुष्पोंका हार सुशोभित है। एक-दूसरीसे अपनी बाँहोंको मिलाये हुए नृत्य करनेवाली गोपानाओंको बाहु वल्लरियोंसे वे घिरे हुए हैं हैं। इस प्रकार परम सुन्दर शोभामयी दिव्य रासलीलाके लिये सदा उत्सुक रहनेवाले प्रेमके मात्रयभूत भगवान् मुकुन्दका भजन करे। वे नाना प्रकारकी श्रुतियोंके' भेदसे युक्त परम मनोहर सात स्वरोंकी मूर्छना और तीनोंके साथ-साथ गोपाङ्गनाओंसहित थिरक रहे हैं। सुन्दर मणिमय स्वच्छ आभूषणोंके मधुर शिञ्जनसे भगवान्का सम्पूर्ण मनोहर अङ्ग हो झनकारमय हो उठा है। एक-दूसरीसे हाथ बाँधकर मण्डलाकार खड़ी हुई गोपाङ्गनाओंके समूहसे कल्पित रासलीलामण्डलकी रचनामें यद्यपि भगवान् श्यामसुन्दर बीचमें मणिमय मेखकी भाँति स्थित हैं तथापि इसी शरीरसे उन्होंने अपने बहुत-से दिव्य स्वरूप प्रकट कर लिये हैं (और उन स्वरूपोंसे प्रत्येक दो गोपीके बीचमें स्थित हैं)।

इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक भगवान् की  पूजा करे। हृदयादि अङ्गोंद्वारा प्रथम आवरणकी पूजा होती है। धन सम्पत्तिको इच्छा रखनेवाला श्रेष्ठ वैष्णव पूर्वोक्त केशव कीर्ति आदि सोलह जोड़ोंकी कमलपुष्पोंद्वारा पूजा करे। उन सबके नापके आदिमें क्रमश: सोलह स्वरोंको संयुक्त करे। तदनन्तर इन्द्र आदि दिक्पालों और वज्र आदि आयुधोंकी पूजा करे। एक मोटा, गोल

१. संगीतमें किसी सप्तकके बाईस भागोंमेंसे एक भाग अथवा किसी स्वरके एक अंशको श्रुति कहते हैं। स्वरका आरम्भ और अन्त इसीसे होता है। षड्जमें चार, ऋषभमें तीन, गान्धारमें दो, मध्यम और पञ्चममें चार-चार, धैवतमें तीन और निषादमें दो श्रुतियाँ होती हैं।

२. संगीतमें एक ग्रामसे दूसरे ग्रामतक जानेमें सातों स्वरोंका जो आरोहावरोह होता है, उसीका नाम मूर्च्छना है। ग्रामके सातवें भागको ही मूर्चना कहते हैं। भरत मुनिके मतसे गाते समय गलेकी कंपकंपीसे ही मूर्च्छना होती है। किसी-किसीके मतसे स्वरके सूक्ष्म विरामका नाम पूच्छंना है। तीन ग्राम होनेके कारण इक्कीस मुर्छनाएं होती हैं।

३. मूर्छना आदिद्वारा राग या स्वरके विस्तारको तान कहते हैं। संगीत दामोदरके मतसे स्वरोंसे उत्पन्न तान ४९ हैं। इन ४९ तानोंसे भी ८,३०० कूट तान निकलते हैं। किसी-किसीके मतसे कूट तीनोंकी संख्या ५०४० भी मानी गयी है।

१. केशव-कीर्ति, नारायण-कान्ति, माधव-तुष्टि, गोविन्द-पुष्टि, विष्णु-धृति, मधुसूदन-शान्ति, त्रिविक्रम- क्रिया, वामन दया, श्रीधर-मेधा, हषीकेश-हर्षा, पद्मनाभ-श्रद्धा, दामोदर-लज्जा, वासुदेव-लक्ष्मी, संकर्षण- सरस्वती, प्रहम्न-प्रीति और अनिरुद्ध गति-ये सोलह जोड़े हैं। इनके आदिमें क्रमशः 'अ आ इ ई उ ऊ इ ३ ल ल ए ऐ ओ औ अं अः' इन सोलह स्वरोंको अनुस्वार युक्त करके जोड़ना चाहिये। यथा-'अ केशवकातिभ्यां नमः, आं नारायाणकान्तिभ्यां कात्यै नमः' इत्यादि। इन्हीं मन्त्रोंसे इनकी पूजा करनी चाहिये।

और चिकना छूटा जिसकी ऊँचाई एक बिचेकी हो, पृथ्वीमें गाड़ दे और उसे पैरोंसे दबाकर एक-दूसरेसे हाथ मिलाकर उसके चारों ओर चक्कर देना रासगोष्ठी कही गयी है। इस प्रकार पूजा करके दूध, घी और मिश्री मिलाकर भगवान् को नैवेद्य अर्पण करे और सोलह प्याले लेकर उनमें मिश्री मिलायी हुई खीर परोसे और पूर्वोक्त जोड़ोंको क्रमशः अर्पण करे। फिर शेष कार्य पूर्ववत् करके मन्त्रोपासक एक हजार मन्त्र-जप करे। तत्पश्चात् स्तुति, नमस्कार और प्रार्थना करके पूजनका शेष कार्य भी समाप्त करे। इस प्रकार जो उपासक भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करता है, वह समृद्धिका आश्रय होता है तथा अणिमा आदि आठ सिद्धियोंका स्वामी हो जाता है। इसमें संशय नहीं है। इहलोकमें वह विविध भोगोंका उपभोग करके अन्तमें भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। इस तरह पूजा आदिके द्वारा मन्त्रके सिद्ध होनेपर अभीष्ट मनोरथोंकी सिद्धि करे। अथवा विद्वान् पुरुष अट्ठाईस बार मन्त्र-जपपूर्वक तीनों समय भगवान्की पूजा करे। उस-उस कालमें कथित परिवारों (आवरण देवताओं) का भी तर्पण करे। प्रात:काल गुड़मिन्त्रित दहीसे, मध्याह्नकालमें मक्खनयुक्त दूधसे और सायंकालमें मिश्री मिलाये हुए दूधसे श्रेष्ठ वैष्णव तर्पण करे। मन्त्रके अन्तमें तर्पणीय देवताओंके नामोंमें द्वितीया विभक्ति जोड़कर अन्तमें 'तर्पयामि पदका प्रयोग करे। तत्पश्चात् शेष पूजा पूरी करे। भगवत्प्रसादस्वरूप जलसे अपने आपको सींचकर उस जलको पीये। उससे तृस होकर देवताका विसर्जन करके तन्मय हो मन्त्र-जप करे। अब सकामभावसे किये जानेवाले तर्पणोंमें आवश्यक द्रव्य बताये जाते हैं। शास्त्रोक्त  विभानसम्बन्धी उन वस्तुओका आश्रय लेकर उनसे किसी एकका भी सेवा करे। खीर दही बड़ा, घी, गुड़ मिला हुआ अन्न, खिचड़ी, दूध, दही, केला, मोचा, चिंचा (इमली), चीनी, पूआ, मोदक, खील (लाजा), चावल, मक्खन- ये सोलह द्रव्य ब्रह्मा आदिके द्वारा तर्पणोपयोगी बताये गये हैं। जो प्रात:काल अन्तमें लाजा और पहले चावल तथा मिश्री अर्पित करके चौहत्तर बार तर्पण करता है, साथ ही भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंका ध्यान करता रहता है, वह मन्त्रोपासक अभीष्ट वस्तुको प्राप्त कर लेता है। धारोष्ण तथा पके हुए दूधसे-मक्खन, दही, दूध और आमके रस, घी, मोटी चीनी, मधु और कीलल (शर्बत)- इन नौ द्रव्योंमेंसे प्रत्येकके द्वारा बारह बार तर्पण करे। इस प्रकार जो श्रेष्ठ वैष्णव एक सौ आठ बार तर्पण करता है, वह पूर्वोक्त फलका भागी होता है। बहुत कहनेसे क्या लाभ? वह तर्पण सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। मिश्री मिलाये हुए धारोष्ण दुग्धकी भावनासे जलद्वारा श्रीकृष्णका तर्पण करके गाँवको जानेवाला साधक वहाँ अपने पारिवारिक लोगोंके साथ धन, वस्त्र एवं भोज्य पदार्थ प्राप्त कर लेता है। मन्त्रोपासक जितनी बार तर्पण करे, उतनी ही संख्यामें जप करे। वह तर्पणसे ही सम्पूर्ण कार्य सिद्ध कर लेता है।

अब मैं साधकोंके हितके लिये सकाम होमका वर्णन करता हूँ। उत्तम श्रीकी अभिलाषा रखनेवाला मन्त्रोपासक बेलके फूलोंसे होम करे। घृत और अत्रकी वृद्धिके लिये घृतयुक्त अन्नकी आहुति दे।

अब मैं एक उत्तम रहस्यका वर्णन करता हूँ, जो मनुष्योंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है। साधक अपने हृदयकमलमें भगवान् देवकीनन्दनका इस प्रकार ध्यान करे-

श्रीमकुन्देन्दुगौरं सरसिजनयन शकुचले गदाब्जे

बिभाणं हस्तपशैर्नवनलिनलसन्यालया दीयमानम् ॥

वन्दे वेचं मुनीन्द्रः कणिकमणिलसदिव्यभूषाभिग्रम

दिव्याङ्गालेपभासं सकलभयहरं पीतवस्त्र मुरारिम्॥

(ना० पूर्व०८०। १५०)

'जो कुन्द और चन्द्रमाके समान सुन्दर गौरवर्णके हैं, जिनके नेत्र कमलको शोभाको लज्जित कर रहे हैं, जो अपने करारविन्दोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं, नूतन कमलोंकी सुन्दर मालासे सुशोभित हैं, छोटी-छोटी मणियोंसे जटित सुन्दर दिव्य आभूषण जिनके अनुपम सौन्दर्य-माधुर्यको और बढ़ा रहे हैं तथा जिनके श्रीअङ्गोंमें दिव्य अङ्गराग शोभा पा रहा है, उन मुनीन्द्रवेद्य, सकल भयहारी, पीताम्बरधारी मुरारिकी मैं वन्दना करता हूँ।'

इस प्रकार ध्यान करके आदिपुरुष श्रीकृष्णको अपने विकसित सदयकमलके आसनपर विराजमान देखे और यह भावना करे कि वे घनीभूत मेघोंकी श्याम घटा तथा अद्धत सुवर्णकी-सी नील एवं पीत प्रभा धारण करते हैं। इस चिन्तनके साथ साधक बारह लाख मन्त्रका जप करे। दो प्रकारके मन्त्रोंमेंसे एकका, जो प्रणवसम्पुटित है, जप करना चाहिये। फिर दूधवाले वृक्षोंकी समिधाओंसे बारह हजार आहुति दे अथवा मधु-घृत एवं मिश्रीमिश्रित खीरसे होम करे। इस प्रकार मन्त्रोपासक अपने हृदयकमलमें लोकेश्वरोंके भी आराध्यदेव भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए प्रतिदिन तीन हजार मन्त्रका जप करे। फिर सायंकालके लिये बतायी हुई विधिसे भलीभाँति पूजा करके साधक भगवत्-

चिन्तनमें संलग्न हो पुन: पूर्वोक्त रीतिसे हवन करे। जो विद्वान् इस तरह गोपालनन्दन श्रीकृष्णका नित्य भजन करता है, वह भवसागरसे पार हो परमपदको प्रास होता है।

पहले दो त्रिभुज अङ्कित करे; जिसमें एक ऊर्ध्वमुख और दूसरा अधोमुख हो। एकके ऊपर दूसरा त्रिकोण होना चाहिये। इस प्रकार छ: कोण हो जायँगे। कोण बाह्य भागमें होंगे। उनके बीचमें जो षट्कोण चक्र होगा, उसे अग्निपुर कहते हैं। उस अग्निपुरकी कर्णिका (मध्यभाग)- में 'वी' यह बीजमन्त्र अङ्कित करे। उसके साथ साध्य पुरुष एवं कार्यका भी उल्लेख करे । बहिर्गत कोणोंके विवरमें षडक्षर-मन्त्र लिखे। छ: कोणोंके ऊपर एक गोलाकार रेखा खींचकर उसके बाह्यभागमें दस-दल कमल अङ्कित करे। उन दस दलोंके केसरोंमें एक-एकमें दो-दो अक्षरके क्रमसे 'ही' और 'श्री' पूर्वक अष्टादशाक्षार- मन्त्रके अक्षरोंका उल्लेख करे। तदनन्तर दलोंके मध्यभागमें दशाक्षर मन्त्रके एक-एक अक्षरोंको लिखे। इस प्रकार लिखे हुए दस दल चक्रको भूपुरसे (चौकोर रेखासे) आवृत करे। भूपुरमें अस्त्रोंके स्थानमें कामबीज (वली) का उल्लेख करे। इस यन्त्रको सोनेके पत्रपर सोनेकी ही शलाकासे गोरोचनद्वारा लिखकर उसकी गुटिका बना ले। यही गोपाल यच है। यह सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला कहा गया है। जो रक्षा, यश, पुत्र, पृथ्वी, धन-धान्य, लक्ष्मी और सौभाग्यकी इच्छा रखनेवाले हों उन श्रेष्ठ पुरुषोंको निरन्तर यह यन्त्र धारण करना चाहिये। इसका अभिषेक करके मन्त्र-जपपूर्वक इसे धारण करना उचित है। यह तीनों लोकोंको वशमें करनेके लिये एकमात्र कुशल (अमोघ) उपाय है। इसकी महती शक्ति अवर्णनीय है।

स्मर (क्ली), त्रिविक्रम (ऋ) युक्त चक्री (क्) अर्थात् कृ, इसके पश्चात् ष्णाय तथा हत् (नमः)- यह (क्लीं कृष्णाय नमः) षडक्षर- मन्त्र कहा गया है, जो सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। वाराह (ह), अशि (र), शान्ति (ई) और इन्दु ( अनुस्वार)-ये सब मिलकर मायाबीज 'हीं' कहे गये हैं। मृत्यु (श), वाहि (र), गोविन्द (ई) और चन्द्र (-अनुस्वार)- से युक्त हो तो श्रीबीज-'श्रीं' कहा गया है। इन दोनों बीजोंसे युक्त होनेपर अष्टादशाक्षर-मन्त्र (हीं श्रीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) बीस अक्षरोंका हो जाता है। शालग्राममें, मणिमें, यन्त्रमें, मण्डलमें तथा प्रतिमाओंमें ही सदा श्रीहरिको पूजा करनी चाहिये, केवल भूमिपर नहीं। जो इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। बीस अक्षरवाले मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि हैं। छन्दका नाम गायत्री है। श्रीकृष्ण देवता हैं; क्लीं बीज है और विद्वान् पुरुषोंने स्वाहाको शक्ति कहा है। तीन, तीन, चार, चार, चार तथा दो मन्त्राक्षरोंद्वारा षडङ्ग-न्यास व्यापक न्यास करके मन्त्रसे सम्पुटित मातृका वर्णोका उनके नियत स्थानोंमें एकाग्रतापूर्वक न्यास करे। फिर दस तत्वोंका न्यास करके मूलमन्त्रद्वारा व्यापक करे। तदनन्तर देवभावकी सिद्धि (इष्टदेवके साथ तन्मयता) प्राप्त करनेके लिये मन्त्र-न्यास को। मूर्तिपनर नामक न्यास पूर्ववत् करे। फिर षडङ्ग-न्यास करके हदयकमलमें भगवान् श्रीकृष्णका इस प्रकार ध्यान करे।

द्वारकापुरीमें सहस्रों सूकि समान प्रकाशमान सुन्दर महलों और बहुतेरे कल्पवृक्षोंसे घिरा हुआ एक मणिमय मण्डप है, जिसके खंभे अनिके समान जाज्वल्यमान रनोंके बने हुए हैं। उसके द्वार, तोरण और दीवारें सभी प्रकाशमान मणियोंद्वारा निर्मित हैं। वहाँ खिले हुए सुन्दर पुष्पोंके चित्रोंसे सुशोभित चैदोर्यों में मोतियोंकी झालरें लटक रही हैं। मण्डपका मध्यभाग अनेक प्रकारके रत्नोंसे निर्मित हुआ है, जो पद्मराग मणिमयी भूमिसे सुशोभित है। वहाँ एक कल्पवृक्ष है, जिससे निरन्तर दिव्य रत्रोंकी धारावाहिक वृष्टि होती रहती है। उस वृक्षके नीचे प्रज्वलित रत्नमय प्रदीपोंकी पङ्क्तियोंसे चारों ओर दिव्य प्रकाश छाया रहता है। वहीं मणिमय सिंहासनपर दिव्य कमलका आसन है, जो उदयकालीन सूर्यके समान अरुण प्रभासे उद्भासित हो रहा है। उस आसनपर विराजमान भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे, जो तपाये हुए सुवर्णके समान तेजस्वी हैं। उनका प्रकाश समानरूपसे सदा उदित रहनेवाले कोटि-कोटि चन्द्रमा, सूर्य और विद्युत्के समान है। वे सर्वाङ्गसुन्दर, सौम्य तथा समस्त आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पाता है। उनके चार हाथ क्रमशः शङ्ख, चक्र, गदा और पासे सुशोभित हैं। वे पल्लवको छविको छीन लेनेवाले अपने बायें चरणारविन्दके अग्रभागसे कलशका स्पर्श कर रहे हैं, जिससे बिना किसी आघातके रत्नमयी धाराएँ उछलकर गिर रही हैं। उनके दाहिने भागमें रुक्मिणी और वामभागमें सत्यभामा खड़ी होकर अपने हाथों में दिव्य कलश ले उनसे निकलती हुई रजराशिमयो जलधाराओंसे उन (भगवान् श्रीकृष्ण) के मस्तकपर अभिषेक कर रही हैं। नाजिती (सत्या) और सुनन्दा ये वक्त देवियोंके समीप खड़ी हो उन्हें एकके बाद दूसरा कलश अर्पण कर रही हैं। इन दोनोंको क्रमशः दायें और वामभागमें खड़ी हुई मित्रविन्दा और लक्ष्मणा कलश दे रही हैं और इनके भी दक्षिण वामभागमें खड़ी जाम्बवती और सुशीला रत्नमयी नदीसे रत्नपूर्ण कलश भरकर उनके हार्थों में दे रही हैं। इनके बाह्यभागमें चारों ओर खड़ी हुई सोलह सहस्र श्रीकृष्णवल्लभाओंका ध्यान करे, जो सुवर्ण एवं रखमयी धाराओंसे युक्त कलशोंसे सुशोभित हो रही हैं। उनके बाह्यभागमें आठ निधियाँ हैं, जो धनसे वहाँ वसुधाको भरपूर किये देती हैं। उनके बाह्यभागमें सब वृष्णिवंशी विद्यमान हैं और पहलेकी भाँति स्वर आदि भी हैं।

इस प्रकार ध्यान करके पाँच लाख जप करे और लाल कमलोंद्वारा दशांश होम करके पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर भगवान्का पूजन करे।

पूर्ववत् पीठकी पूजा करनेके पश्चात् मूलमन्त्रसे मूर्तिकी कल्पना करके उसमें भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णका आवाहन करे और उसमें पूर्णताकी भावनासे पूजा करे। आसनसे लेकर आभूषणतक भगवान्को अर्पण करके फिर न्यासक्रमसे आराधना करे। स्ष्टि, स्थिति, षडङ्ग, किरीट, कुण्डलद्वय, शङ्ख, चक्र, गदा, पन्न, वनमाला, श्रीवत्स तथा कौस्तुभ-इन सबका गन्ध-पुष्पसे पूजन करके मूलमन्त्रद्वारा छ: कोणोंमें छ: अङ्गोंका और पूर्वादि दलोंमें क्रमशः वासुदेव आदि तथा कोणों में शान्ति आदिका क्रमश: पूजन करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ साधक दलोंके अग्रभागमें आठों पटरानियोंका पूजन करे। तदनन्तर सोलह हजार श्रीकृष्णपलियोंको एक ही साथ पूजा करे। इसके बाद इन्द्र, नील, मुकुन्द, कराल, कच्छय, शङ्ख और पा-इन आठ निधियोंका क्रमशः पूजन करे। उनके बाह्यभागमें इन्द्र आदि लोकपालों तथा वज्र आदि आयुधोंकी पूजा करे। इस प्रकार सात आवरणोंसे घिरे हुए श्रीकृष्णका आदरपूर्वक पूजन करके दही, खाँड़ और घी मिले हुए दुग्धमिश्रित अनका नैवेद्य लगाकर उन्हें तृप्त करे। तदनन्तर दिव्योपचार समर्पित करके स्तुति और नमस्कारके पश्चात् परिवारगणों (आवरण देवताओं) के साथ भगवान् केशवका अपने हृदयमें विसर्जन करे। भगवान् को अपनेमें बिठाकर भगवत्स्वरूप आत्माका पूजन करके विद्वान् पुरुष तन्मय होकर विचरे। रत्राभिषेकयुक्त ध्यानमें वर्णित भगवत्स्वरूपकी पूजा बीस अक्षरवाले मन्त्रके आश्रित है। इस प्रकार जो मन्त्रकी आराधना करता है, वह समृद्धिका आश्रय होता है। जो जप, होम, पूजन और ध्यान करते हुए उक्त मन्त्रका जप करर है, उसका घर रत्रों, सुवर्णों तथा धन-धान्यो निरन्तर परिपूर्ण होता रहता है। यह विशाल पृथ्वी उसके हाथमें आ जाती है और वह सब प्रकारके शस्योंसे सम्पन्न होती है। साधक पुत्रों और मित्रोंसे भरा-पूरा रहता है और अन्त में परमगतिको प्राप्त होता है। उक्त मन्त्रसे साधक इस प्रकारके अनेक प्रयोगोंका साधन कर सकता है। अब मैं सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाले मन्त्रराज दशाक्षरका वर्णन करता हूँ।

स्मृति (ग) यह सद्य (ओ)-से युक्त हो और लोहित (प्) वामनेत्र (ई)-से संलग हो। इसके बाद 'जनवल्लभा' ये अक्षरसमुदाय हों। तत्पश्चात् पवन (य) हो और अन्तमें अग्रिप्रिया (स्वाहा) हो तो यह (गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) दशाक्षर मन्त्र कहा गया है। इसके नारद ऋषि, विराट् छन्द, श्रीकृष्ण देवता, क्ली बीज और स्वाहा शक्ति है। यह बात मनीषी पुरुषोंने बतायी है। आचक्र, विचक्र, सुचक्र, त्रैलोक्यरक्षणचक्र तथा असुरान्तकचक्र-इन शब्दोंके अन्तमें "हे विभक्ति और स्वाहा पद जोड़कर इन पञ्चविध चक्रोंद्वारा पश्चाङ्ग-न्यास करे। तदनन्तर प्रणव-सम्पुटित मन्त्र पढ़कर तीन बार दोनों हाथों में व्यापक-न्यास करे। तत्पश्चात् मन्त्रके प्रत्येक अक्षरको अनुस्वारयुक्त करके उनके आदिमें प्रणव और अन्तमें नमः जोड़कर उनका दाहिने अंगूठेसे लेकर बायें अंगूठेतक अंगुलि-पोंमें न्यास करे । यह सृष्टिन्यास बताया गया है। अब स्थितिन्यास कहा जाता है। विद्वान् पुरुष स्थितिन्यासमें बायीं कनिष्ठासे लेकर दाहिनी कनिष्ठातक पूर्वोक्तरूपसे मन्त्राक्षरोंका न्यास करे। संहारन्यासमें बायें अंगूठेसे दाहिने अंगूठेतक उक्त मन्त्राक्षरोंका न्यास करना चाहिये। यह संहारन्यास दोषसमुदायका नाश करनेवाला कहा गया है। शुद्धचेता ब्रह्मचारियोंको चाहिये कि वे स्थिति और संहारन्यास पहले करके अन्तमें सृष्टिन्यास करें; क्योंकि वह विद्या प्रदान करनेवाला है। गृहस्थोंके लिये अन्तमें स्थितिन्यास करना उचित है। (उन्हें सृष्टि और संहारन्यास पहले कर लेना चाहिये।) क्योंकि स्थितिन्यास

न्यास-वाक्यका प्रयोग इस प्रकार है-

ॐ आचक्राय स्वाहा ह्रदयाय नमः।

ॐ विचक्राय स्वाहा शिरसे स्वाहा।

यथा-

ॐ गों नमः, दक्षिणाङ्गुष्ठपर्वसु। ॐ पीं नमः, दक्षिणतर्जनीपर्वसु। ॐ जं नमः, दक्षिणमध्यमापर्वसु। ॐ नं नमः, दक्षिणानामिकापर्वसु। ॐ वं नमः, दक्षिणकनिष्ठिकापर्वसु। ॐ ल्लं नमः, वामकनिष्ठिकापर्वसु। ॐ भां नमः, वामनामिकापर्वसु। ॐ यं नमः वाममध्यवमापर्वसु। ॐ स्वां नमः, वामतर्जनीपर्वसु। ॐ हां नमः, वामाङ्गुष्ठयर्वसु।

काम्पादिस्वरूप (कामनापूरक) है। विरक्त मुनीश्वरोंको सर्वदा अन्तमें संहारन्यास करना चाहिये। तदनन्तर साधक पुनः स्थितिक्रमसे मन्त्राक्षरोंका अंगुलियोंमें न्यास करे। तत्पश्चात् पुनः पूर्वोक्त चक्रोंद्वारा हाधोंमें पञ्चाङ्ग-न्यास करे। (यथा-

ॐ आचक्राय स्वाहा अङ्गुष्ठाभ्या नमः। ॐ विचक्राय स्वाहा तर्जनीभ्यां नमः । ॐ सुषक्राय स्वाहा मध्यमाभ्यां नमः । त्रैलोक्यरक्षणचक्राय स्वाहा अनामिकाभ्यां नमः । ॐ असुरान्तकचक्राय स्वाहा कनिष्ठिकाभ्यां नमः)

तदनन्तर विद्वान् पुरुष मूलमन्त्रसे सम्मुटित अनुस्वारयुक्त मातृका वर्णोंका मातृकान्यासके स्थलोंमें विनीतभावसे न्यास करे। उसके बाद प्रणवसम्पुटित मूलमन्त्रका उच्चारण करके व्यापक न्यास करे। तत्पश्चात् पूर्वोक्त मूर्तिपञ्जर नामक न्यास करे। उसके बाद क्रमशः दशाङ्ग-न्यास और पञ्चाङ्ग-न्यास करे । दशाङ्ग-न्यासको विधि इस प्रकार है-हृदय, मस्तक, शिखा, सर्वाङ्ग, सम्पूर्ण दिशा, दक्षिणापार्थ, वामपाई, कटि, पृष्ठ तथा मूर्धा-इन अङ्गों में श्रेष्ठ वैष्णवमन्त्रके एक एक अक्षरका न्यास करे। फिर एकाग्रचित्त हो पूर्वोक्त चक्रोंद्वारा पुनः पूर्ववत् पञ्चाङ्ग-न्यास करे। इसके सिवा अष्टादशाक्षरमन्त्रके लिये बताये हुए अन्य प्रकारके न्यासोंका भी यहाँ संग्रह कर लेना चाहिये। तदनन्तर विद्वान् पुरुष किरीट

मन्त्रसे व्यापक-न्यास करे। फिर श्रेष्ठ साधक वेणु और बिल्व आदिकी मुद्रा दिखाये। फिर सुदर्शन मन्त्रसे दिग्बन्ध करे। अङ्गुष्ठको छोड़कर शेष अंगुलियाँ यदि सीधी रहें तो यह हृदयमुद्रा कही गयी है। शिरोमुद्रा भी ऐसी ही होती है। अङ्गुष्ठको नीचे करके जो मुट्ठी बाँधी जाती है, उसका नाम शिखामुद्रा है। हाथकी अंगुलियोंको फैलाना यह वरुणमुद्रा कही गयी है। बाणकी मुट्ठीकी तरह उठी हुई दोनों भुजाओंके अङ्गुष्ठ और तर्जनीसे चुटकी बजाकर उसकी ध्वनिको  सब ओर फैलाना, इसे अस्त्रमुद्रा कहा गया है। तर्जनी और मध्यमा-ये दो अंगुलियाँ नेत्रमुद्रा हैं। (जहाँ तीन नेत्रका न्यास करना हो, वहाँ तर्जनी, मध्यमाके साथ अनामिका अंगुलिको भी लेकर नेत्रत्रयका प्रदर्शन कराया जाता है।) बायें हाथका अंगूठा ओष्ठमें लगा हो। उसकी कनिष्ठिका अंगुली दाहिने हाथके अंगूठेसे सटी हो, दाहिने हाथकी कनिष्ठिका फैली हुई हो और उसकी तर्जनी, मध्यमा और अनामिका अंगुलियाँ कुछ सिकोड़कर हिलायी जाती हों तो यह वेणुमुद्रा कही गयी है। यह अत्यन्त गुप्त होनेके साथ ही भगवान् श्रीकृष्णको बहुत प्रिय है। वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभ नामक मुद्राएँ प्रसिद्ध हैं; अतः उनका वर्णन नहीं किया जाता है*। बायें अंगूठेको ऊर्ध्वमुख खड़ा करके उसे दाहिने

*वनमाला आदि मुद्राओंका लक्षण - कार है-

स्पृशेत्कण्ठादिनानं उर्जन्यमानिया बददर दर उनमालक ।

दोनों हार्थोकी तर्जनी और अगलेको सटाकर उनक हुन कळ लेकर चाणका के में बनमाला नामक मुद्रा कहा गया है।

अन्योन्यस्मटकरयोर्मध्यमानामिकाइली कनयात् जनशनसकि।

तर्जन्यौ कारयदेव मृद नीयतहका

आपसमें सटे पर दोनों हाथोंक मध्यमा और अनामिक अगुलियोका अपहल गधि और वन अंगुलियोंको कनिष्ठा अंगुलियति मूल-भाग मल्छ करे इसका नाम क्या है।

दक्षिणायानामिकाममलग्रां कनिष्ठिकाम्। कनिष्ठयान्यया वट्ध्वा तर्जन्या दक्षया तथा।।

वामानामां च बध्नीयाछक्षाङ्गुष्ठस्य मूलके। अङ्गुष्ठमध्यमें वामे संयोज्य सरलाः पराः।।

हाथके अंगूठेसे बाँध ले और उसके अग्रभागको दाहिने हाथकी अंगुलियोंसे दवाकर फिर उन अंगुलियोंको बायें हाथकी अंगुलियोंसे खूब कसकर बाँध ले और उसे अपने हृदयकमलमें स्थापित करे। साथ ही कामबीज (क्लीं)-का उच्चारण करता रहे। मुनीश्वरोंने उसे परम गोपनीय बिल्वमुद्रा कहा है। यह सम्पूर्ण सुखोंकी प्राप्ति करानेवाली है। मन, वाणी और शरीरसे जो पाप किया गया हो, वह सब इस मुद्राके ज्ञानमात्रसे नष्ट हो जायगा। मन्त्रका ध्यान, जप और पूर्वोक्तरूपसे त्रिकाल पूजन करना चाहिये। दशाक्षर तथा अष्टादशाक्षर आदि सब मन्त्रोंमें एक ही क्रम बताया गया है। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध होनेपर मन्त्रोपासक उससे नाना प्रकारके लौकिक अथवा पारलौकिक प्रयोग कर सकता है।

चेचक, फोड़े या ज्वर आदिसे जब जलन और मूर्छा हो रही हो तो उक्तरूपसे ही श्रीकृष्णका ध्यान करके रोगीके मस्तकके समीप मन्त्र-जप करे। इससे ज्वरग्रस्त मनुष्य निश्चय ही उस ज्वरसे मुक्त हो जाता है। इसी प्रकार पूर्वोक्त ध्यान करके अग्रिमें भगवान्की पूजा करे और  गुरुचिके चार-चार अंगुलके टुकड़ोंद्वारा दस हजार आहुति दे तो ज्वरकी शान्ति हो जाती है। चरसे पीड़ित मनुष्यके चरसे शान्तिके लिये बाणोंसे छिदे हुए भीष्मपितामहका तथा संताप दूर करनेवाले श्रीहरिका ध्यान करके रोगीका स्पर्श करते हुए मन्त्रजप करे। सान्दीपनि मुनिको पुत्र देते हुए श्रीकृष्णका ध्यान करके पूर्वोक्त रूपसे गुरुचिके टुकड़ेसे दस हजार आहुति दे। इससे अपमृत्युका निवारण होता है। जिसके पुत्र मर गये थे ऐसे ब्राह्मणको उसके पुत्र अर्पण करते हुए अर्जुनसाहिट श्रीकृष्णका ध्यान करके एक लाख मछ-उप करे। इससे पुत्र-पौत्र आदिकी वृद्धि होती है।पी, चीनी और मधुमें मिलाये हुए पुज्जीवके फलोसे उसीकी सपियर प्रज्वलित हुई अग्निमें दस हजार आहूति देवेपर मनुष्य दीर्घायु पुत्र पाला है। दुषैते वृक्षके काढ़ेसे भरे हर कलशको रातमें पूजा करके प्रात:काल दस हजार मन जये और उसके रसके जलसे स्त्रीका अभिषेक को। बारह दिनोटक ऐसा करनेपर उम्म्या स्त्री भी दीपायु पुत्र प्रार कर लेती है। पुस्की का रखनेवाली भी मात काल और होकर पीपल के पत्तेके दोने रखे हुए जलको एक सौ आठ बार मलके जपये अभिमन्त्रिा कराकर पीये। एक लक्षणों के समक्ष पुत्र प्राप्त कर लेती है। मेरो नक्षी भी दुर शुभ एवं दिम आश्रमों रियत हो अपने करकमलो भयकाकि शरीरका समर्श करते हुए श्रीकृमाको ध्यान करके भी, चीनी और मधु मिलाये हुए तिलौथे एक लाख आहुति है। ऐसा करनेसे महान् पापी भी तत्काल पवित्र हो जाता है। पारिजात-हरण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करके एक लाख मन्त्र जपे जो ऐसा करता है, उसकी सर्वत्र विजय होती है। पराजय कभी नहीं होती है। मनुष्यको चाहिये कि वह पार्थको गीताका उपदेश करते हुए हाथमें व्याख्यानकी मुद्रासे युक्त रथारुढ़ं

चतस्त्रोप्यग्रसंलग्र मुद्रा कौस्तुभसंज्ञिका

दाहिने हाथकी अनामिका और अङ्गुठसे सटी हुई कनिष्ठिका अंगुलिको बायें हाथकी कनिष्ठिकासे बाँध ले। दाहिनी तर्जनीसे बायीं अनामिकाके बाँधे, दाहिने अंगुठेके मूलभागमें बायें अङ्गुठ और मध्यमाको संयुक्त करे। शेष अंगुलियोंको सीधी रखे। चारों अंगुलियोंके अग्रभाग परस्पर मिले हों, यह कौस्तुभमुद्रा है।

श्रीकृष्णका ध्यान करे। उस ध्यानके साथ मन्त्र जपे। इससे धर्मकी वृद्धि होती है। मधुमें सने हुए पलाशके फूलोंसे एक लाख आहुति दे। इससे विद्याकी प्राप्ति होती है। राष्ट्र, पुर, ग्राम, वस्तु तथा शरीरकी रक्षाके लिये विश्वरूपधारी श्रीकृष्णका ध्यान करे-ठनकी कान्ति उदयकालीन करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान है। वे अग्रि एवं सोमस्वरूप है, सच्चिदानन्दमय हैं, उनका तेज तपाये हुए स्वर्णके समान है, उनके मुख और चरणारविन्द सूर्य और अग्रिके सदृश प्रकाशित हो रहे हैं, वे दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं। उन्होंने नाना प्रकारके आयुध धारण कर रखे हैं। सम्पूर्ण आकाशको वे ही अवकाश दे रहे हैं। इस प्रकार ध्यान करके एकाग्रचित्त हो एक लाख मन्त्र-जप करे। इससे पूर्वोक्त सब वस्तुओंकी रक्षा होती है। जो श्रेष्ठ वैष्णव सद्गुरुसे दीक्षा लेकर उक्त विधिसे श्रीकृष्णका पूजन करता है, वह अणिमा आदि आठ सिद्धियोंका स्वामी होता है। उसके दर्शनमात्रसे वादी हस्तप्रतिभ हो जाते हैं। वह घरमें हो या सभामें उसके मुख में सदा सरस्वती निवास करती हैं। वह इस लोकमें नाना प्रकारके भोगोंका उपभोग करके अन्तमें श्रीकृष्णधामको जाता है। (ना० पूर्व अध्याय ८०)