राजाका अपने पुत्रको राज्य सौंपकर नीतिका उपदेश देना और धर्माङ्गदके सुराज्यकी स्थिति

वसिष्ठजी कहते हैं-राजन् ! अपनी पनियोंकि इस प्रकार अनुमति देनेपर महाराज रुक्माङ्गदके हर्षकी सीमा न रही। वे अपने पुत्र धर्मादसे इस प्रकार बोले-'बेटा। इस सात द्वीपौवाली पृथ्वीका पालन करो। सदा उद्यमशील और सावधान रहना। किस अवसरपर क्या करना उचित है, इसका सदा ध्यान रखना। सदाचारका पालन हो रहा है या नहीं, इसकी ओर दृष्टि रखना। सदा सचेत रहना और वाणिज्य-व्यवसायको सदा प्रिय कार्य समझकर उसे बढ़ाना। राज्यमें सदा भ्रमण करते रहना, निरन्तर दानमें अनुरक्त रहना, कुटिलतासे सदा दूर ही रहना और नित्य-निरन्तर सदाचारके पालनमें संलग्न रहना। बेटा! राजाओंके लिये सर्वत्र अविश्वास रखना ही उत्तम बताया जाता है। खजानेकी जानकारी रखना आवश्यक है।'

पिताकी यह बात सुनकर उत्तम बुद्धिवाले धर्माङ्गदने भक्तिभावसे मातासहित उन्हें प्रणाम किया। फिर उस राजकुमारने उन नृपश्रेष्ठ स्क्माङ्गदको असंख्य धन दिया। उनकी आज्ञाका पालन करलेके लिये बहुत-से सेवकों और कण्ठमें सुवर्णका हार धारण करनेवाली बहुत-सी दासियोंको नियुक्त किया। इस प्रकार पिताको सुख पहुँचानेके लिये पुत्रने सारी व्यवस्था की। फिर उसने पृथ्वीको रक्षाका कार्य संभाला। तदनन्तर अनेक राजाओंसे घिरे हुए राजा धर्माङ्गद सातों द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण पृथ्वीपर भ्रमण करने लगे। उनके भ्रमण करनेसे परिणाम यह होता था कि जनताके मनमें पापबुद्धि नहीं आती थी। उनके राज्यमें कोई भी वृक्ष फल और फूलसे हीन नहीं था। कोई भी खेत ऐसा नहीं था जिसमें जी या धान आदिको खेती लहलहाती न हो। उस राज्यकी सभी गौएँ पड़ाभर पूष देती थी। उस दूध धोका अंश अधिक होता था और उसमें शक्करके समान मिठास उपदेश देना और धर्माङ्गदके सुराज्यकी स्थिति रहती थी। वह दूष उत्तम पेय, सब रोगोंका नाशक, पापनिवारक तथा पुष्टिवर्धक होता था। कोई भी मनुष्य अपने धनको छिपाकर नहीं रखता था। पत्नी अपने पतिसे कटुवचन नहीं बोलती थी। पुत्र विनयशील तथा पिताकी आज्ञाके पालनमें तत्पर होता था। पुत्रवधू सासके हाथमें रहती थी। साधारण लोग ब्राह्मणों के उपदेशके अनुसार चलते थे। श्रेष्ठ द्विज वेदोक्त धोका पालन करते थे। मनुष्य एकादशीके दिन भोजन नहीं करते थे। पृथ्वीपर नदियाँ कभी सूखती नहीं थीं। धर्माङ्गदके राज्यपालनमें प्रवृत्त होनेपर सम्पूर्ण जगत् पुण्यात्मा हो गया था। भगवान्के दिन एकादशी व्रतका सेवन करनेसे सब लोग इस जगत् में सुख भोगकर अन्तमें भगवान् विष्णुके वैकुण्ठधाममें जाते थे। भूपाल! चोर और लुटेरोंका भय नहीं था। अतः अँधेरी रातमें भी कोई अपने घरके दरवाजे नहीं बंद करते थे। इच्छानुसार विचरनेवाले अतिथि घरपर आकर ठहरते थे। (किसीके लिये कहीं रोक-टोक नहीं थी।) हल चलाये बिना ही सब ओर अन्नकी अच्छी उपज होती थी। केवल माताके दूधसे बच्चे खूब हष्ट- पुष्ट रहते थे और पतिके संयोगसे युवतियाँ भी पुष्ट और संतुष्ट रहती थी। राजाओंसे सुरक्षित होकर समस्त जनता हृष्ट-पुष्ट रहती थी तथा शक्तिसहित धर्मका भी भलीभाँति पोषण होता था। इस प्रकार सब लोगोंमें धर्म प्रेमकी प्रधानता थी। सभी भगवान् विष्णुकी भक्तिमें लगे रहते थे। राजकुमार धर्माङ्गदके द्वारा सारी जनता सुरक्षित थी और सबका समय बड़े सुखसे बीत रहा था।

उधर राजा रुक्माङ्गद नीरोग रहकर सब प्रकारके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो प्रचुर दानकी वर्षा करते और उत्सव मनाते थे। वे मोहिनीकी चेष्टाकि सुखसे अत्यन्त मुग्ध थे।