नारद महा पुराण
बर्षभरकी षष्ठी तिथियों में पालनीय व्रत एवं देवपूजन आदिकी विधि और महिमा
सनातनजी कहते हैं- विप्रवर! सुनो, अब मैं तुमसे षष्ठीके व्रतोंका वर्णन करता हूँ, जिनका यधार्थरूपसे अनुष्ठान करके मनुष्य यहाँ सम्पूर्ण मनोरथोंको पास कर लेता है। चैत्र शुक्ला षष्ठीको परग उत्तम 'कुमारवत'का विधान किया गया है। उसमें नाना प्रकार की पूजा विधिसे भगवान् षडाननको आराधना करके मनुष्य सर्वगुणसम्पन्न एवं चिरंजीवी पुत्र प्राप्त कर लेता है। वैशाख शुक्ला पष्ठीको कार्तिके यजौकी पूजा करके मनुष्य मातृसुखलाभ कस्ता है। ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी पारीको विधिपूर्वक सूर्यदेवकी पूजा करके उनकी कृपारो मनुष्य मनोवाञ्छित भोग पाता है। आषाढ़ शुक्ला पाठीको परम उत्तम 'स्कन्दवत' करना चाहिये। उस दिन उपवास करके शिव तथा पार्वतीके प्रिय पुरस्कन्दजीकी पूजा करनेसे मनुष्य पुत्र-पौत्रादि सन्तानों और मनोवाञ्छित भोगोंको प्राप्त कर लेता है। श्रावण शुक्ला बालीको उत्तम भक्तिभावसे युक्त हो षोडशोपचारद्वारा शरजन्मा भावान् स्कन्दकी आराधना करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष पडाननकी कृपासे अभी मनोरथ प्राप्त करना। भारपद मास के कृया पक्षको पष्ठीको 'ललिताव्रत' बताया गया है। उस दिन नारी विधिपूर्वक प्रात:काल स्नान करनेके पश्चात् श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत मालासे अलंकृत हो नदी संगमकी बालुका लेकर उसके पिण्ड बनाकर बाँसके पात्र में रखे। इस प्रकार पाँच पिण्ड रखकर उसमें वन विलासिनी ललितादेवीका ध्यान करे। फिर कमल, कनेर, नेवारी (वनमल्लिका), मालती, नील कमल, केतकी और तगरका संग्रह करके इनमेंसे एक एकके एक सौ आठ या अट्ठाईस फूल ग्रहण करे। उन फूलोंको अक्षत-कलिकाएँ ग्रहण करके उन्हींसे देवीकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके पश्चात् सामने खड़े होकर उन शिवप्रिया ललितादेवीकी इस प्रकार प्रार्थना करे-
गङ्गाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते।
स्नात्वा कनखले देवि हरं लब्धवती पतिम्॥
ललिते सुभगे देवि सुखसौभाग्यदायिनि ।
अनन्तं देहि सौभाग्यं मह्यं तुभ्यं नमो नमः ।।
(ना० पूर्व ११५।५-१५)
'देवि। आपने गङ्गाद्वार, कुशावर्त, बिल्वक, नीलपर्वत और कनखल तीर्थमें स्नान करके भगवान् शिवके पतिरुपमें प्राप्त किया है। सुख और सौभाग्य देनेवाली सुन्दरी ललितादेवी। आपको बारम्बार नमस्कार है, आप मुझे अक्षय सौभाग्य प्रदान कीजिये।'
इस मन्त्रसे चम्पाके सुन्दर फूलोंद्वारा ललितादेवीकी विधिपूर्वक पूजा करके उनके आगे नैवेद्य रखे। खीरा, ककड़ी, कुम्हड़ा, नारियल, अनार, बिजौरा नीबू, तुंडीर, कारवेल्ल और चिर्भट आदि सामयिक फलोंसे देवीके आगे शोभा करके बढ़े हुए धानके अङ्कुर, दीपोंकी पंक्ति, अगुरु, धूप, सौहालक, करञ्जक, गुड़, पुष्प, कर्णवेष्ट (कानके आभूषण), मोदक, उपमोदक तथा अपने वैभवके अनुसार अनेक प्रकारके नैवेद्य आदिद्वारा विधिवत् पूजा करके रातमें जागरणका उत्सव मनावे । इस प्रकार जागरण करके ससमीको सबेरे ललिताजीको नदीके तटपर ले जाय। द्विजोत्तम! वहाँ गन्ध, पुष्पसे गाजे बाजेके साथ पूजा करके वह नैवेद्य आदि सामग्री श्रेष्ठ ब्राह्मणको दे। फिर स्नान करके घर आकर अनिमें होम करे। देवताओं, पितरों और मनुष्यों का पूजन करके सुवासिनी स्त्रियों, कन्याओं तथा पन्द्रह ब्राह्मणोंको भोजन कराचे। भोजनके पश्चात् बहुत-सा दान देकर उन सबको विदा करे। अनेकानेक व्रत, तपस्या, दान और नियमसे जो फल प्राप्त होता है, वह इसी व्रतसे यहाँ उपलब्ध हो जाता है। तदनन्तर नारी गृत्युके पश्चात् सनातन शिवधाममें पहुंचकर ललितादेवीके साथ उनकी सखी होकर चिरकालतक आनन्द भोगती है और पुरुष भगवान् शितके समीप रहकर सुखी होता है।
भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षणे जो षष्ठी आती है, उसे 'चन्दाषाष्टी' कहते हैं। उस दिन देवीको पूजा करके मनुष्य देवीलोकको प्राप्त कर लेता है। यदि वह हल्ली रोहिणी नक्षत, पीपात योग और मङ्गलबारसे संयुक्त हो तो उसका नाम 'कपिलाषष्ठी' होता है। कपिलाषष्ठी के दिन व्रत एवं नियमों तत्पर होकर सूर्यदेवको पूजा करके मनुष्य भगवान् भास्करके प्रसादसे मनोवाञ्छित कामनाओंको पा लेता है। देवर्षिप्रवर! उस दिन किया हुआ अन्नदान, होम, जप तथा देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण आदि सब कुछ अक्षय जानना चाहिये। कपिलाषष्ठीको भगवान् सूर्यकी प्रसन्नताके लिये वस्त्र, माला और चन्दन आदिसे दूध देनेवाली कपिला गायकी पूजा करके उसे वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर देना चाहिये।ब्रह्मन् ! आश्विन शुक्ला पाहीको गन्ध आदि मातिमारताना प्रकार के नैवेद्योंसे कात्यानीमनीकी पूजा करनी चाहिये।पूजा के पश्चात् देवेश्वरी कात्यायनीदेवीसे क्षमा- प्रार्थना और उन्हें प्रणाम करके उनका विसर्जन करे। यहाँ बालूकी मूर्तिमें कात्यायनीकी प्रतिष्ठा करके उनकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करके कात्यायनीदेवीकी कृपासे कन्या मनके अनुरुप वर पाती है और विवाहिता नारी मनोवाञ्छित पुत्र प्राप्त करती है। कार्तिक शुक्ला षष्ठीको महात्मा षडाननने सम्पूर्ण देवताओंद्वारा दी हुई महाभागा देवसेनाको प्राप्त किया था। अतः इस तिथिको सम्पूर्ण मनोहर उपचारोंद्वारा सुरश्रेष्ठा देवसेना और षडानन कार्तिकेयकी भलीभांति पूजा करके मनुष्य अपने मनके अनुकूल अनुपम सिद्धि प्राप्त करता है। द्विजोत्तम। उसी तिथिको अग्रिपूजा बतायी गयी है। पहले अग्निदेवकी पूजा करके नाना प्रकारके द्रव्योंसे होम करना चाहिये।
मार्गशीर्ष शुक्ला षष्ठीको गन्ध, पुष्प, अक्षत, फल, वस्त्र, आभूषण तथा भाँप्ति-भाँतिके नैवेद्योंद्वारा स्कन्दका पूजन करना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ! यदि वह षष्ठी रविवार तथा शतभिषा नक्षत्रसे युक्त हो तो उसे 'चम्पाषष्ठी' कहते हैं। उस दिन सुख चाहनेवाले पुरुषको पापनाशक भगवान् विश्वेश्वरका दर्शन, पूजन, ज्ञान और स्मरण करना चाहिये। उस दिन किया हुआ स्नान-दान आदि सब शुभ कर्म अक्षय होता है। विप्रवर ! पौष मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठीको सनातन विष्णुरूपी जगत्पालक भगवान् दिनेश प्रकट हुए थे। अतः सब प्रकारका सुख चाहनेवाले पुरुषोंको उस दिन गन्ध आदि द्रव्यों, नैवेद्यों तथा वस्त्राभूषण आदिके द्वारा उनका पूजन करना चाहिये। माघ मासमें जो शुक्ल पक्षकी षष्ठी आती है, उसे 'वरुणषष्ठी' कहते हैं। उसमें रक्त चन्दन, रक्त वस्त्र, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्यद्वारा विष्णुस्वरूप सनातन वरुणदेवताकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक पूजन करके मनुष्य जो-जो चाहता है, वही-वही फल वरुणदेवकी कृपासे प्राप्त करके प्रसन्न होता है। नारद! फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठीको विधिपूर्वक भगवान् पशुपतिकी मृण्मयी मूर्ति बनाकर विविध उपचारोंसे उनकी पूजा करनी चाहिये। शतरुद्रीके मन्त्रोंसे पृथक्- पृथक् पञ्चामृत एवं जलद्वारा नहलाकर श्वेत चन्दन लगावे; फिर अक्षत, सफेद फूल, बिल्वपत्र, धतूरके फूल, अनेक प्रकारके फल और भौति- भौतिके नैवेद्योंसे भलीभाँति पूजा करके विधिवत् आरती उतारे। तदनन्तर क्षमा-प्रार्थना करके प्रणामपूर्वक उन्हें कैलासके लिये विसर्जन करे। मुने! जो स्त्री अथवा पुरुष इस प्रकार भगवान् शिवकी पूजा करते हैं, वे इहलोकमें श्रेष्ठ भोगोंका उपभोग करके अन्तमें भगवान् शिवके स्वरूपको प्राप्त होते हैं।