नारद महा पुराण
शुकदेवजीको सनत्कुमारका उपदेश
सनत्कुमारजी कहते हैं-शुकदेव! शास्त्र शोकको दूर करनेवाला है। वह शान्तिकारक तथा कल्याणमय है। अपने शोकका नाश करनेके लिये शास्त्रका श्रवण करनेसे उत्तम बुद्धि प्राप्त होती है। उनके मिलनेपर मनुष्य सुखी एवं अभ्युदयशील होता है। शोकके हजारों और भयके सैकड़ों स्थान हैं। वे प्रतिदिन मूढ़ मनुष्यपर ही अपना प्रभाव डालते हैं। विद्वान् पुरुषपर उनका जोर नहीं चलता । अल्प बुद्धिवाले मनुष्य ही अप्रिय वस्तुके संयोग और प्रिय वस्तुके वियोगसे मन-ही-मन दुःखी होते हैं। जो वस्तु भूतकालके गर्भमें छिप गयी (नष्ट हो गयी), उसके गुणोंका स्मरण नहीं करना चाहिये; क्योंकि जो आदरपूर्वक उसके गुणोंका चिन्तन करता है, वह उसकी आसक्तिके बन्धनसे मुक्त नहीं हो पाता। जहाँ चित्तको आसक्ति बढ़ने लगे, वहीं दोषदृष्टि करनी चाहिये और उसे अनिष्टको बढ़ानेवाला समझना चाहिये। ऐसा करनेपर उससे शीघ्र ही वैराग्य हो जाता है। जो बीती बातके लिये शोक करता है, उसे धर्म, अर्थ और यशकी प्राप्ति नहीं होती। वह उसके अभावका दुःखमात्र उठाता है। उससे अभाव दूर नहीं होता। सभी प्राणियोंको उत्तम पदार्थोंभे संयोग और वियोग प्राप्त होते रहते हैं। किसी एकपर ही यह शोकका अवसर नहीं आता। जो मनुष्य भूतकालमें मरे हुए किसी व्यक्ति अथवा नष्ट हुई किसी वस्तुके लिये निरन्तर शोक करता है, वह एक दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता है। इस प्रकार उसे दो अनर्थ भोगने पड़ते हैं। यदि कोई शारीरिक और मानसिक दुःख उपस्थित हो जाय तथा उसे दूर करने में कोई उपाय काम न दे सके, तो उसके लिये चिन्ता न करनी चाहिये। दुःख दूर करनेकी सबसे अच्छी दवा यही है कि उसका बार-बार चिन्तन न किया जाय। चिन्तन करनेसे वह घटता नहीं, बल्कि और बढ़ता ही जाता है। इसलिये मानसिक दुःखको बुद्धिके विचारसे और शारीरिक कष्टको औषध-सेवनद्वारा नष्ट करना चाहिये। शास्त्रज्ञानके प्रभावसे ही ऐसा होना सम्भव है। दुःख पड़नेपर बालकोंकी तरह रोना उचित नहीं है। रूप, यौवन, जीवन, धन- संग्रह, आरोग्य तथा प्रियजनोंका सहवास-ये सब अनित्य हैं। विद्वान् पुरुषको इनमें आसक्त नहीं होना चाहिये। आये हुए संकटके लिये शोक करना उचित नहीं है। यदि उस संकटको टालनेका कोई उपाय दिखलायी देतो शोक छोड़कर उसे ही करना चाहिये। इसमें संदेह नहीं कि जीवन में सुखकी अपेक्षा दुःख ही अधिक होता है तथापि जरा और मृत्युके दुःख महान् अतः उनसे अपने प्रिय आत्माका
*शोकस्थानसहस्त्राणि भयस्थानशतानि च।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्।।
उद्धार करे। शारीरिक और मानसिक रोग सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले वीर पुरुषके छोड़े हुए तीखी धारवाले बाणोंकी तरह शरीरको पीड़ित करते हैं। तृष्णासे व्यथित, दुःखी एवं विवश होकर जीनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यका नाशवान् शरीर क्षण-क्षणमें विनाशको प्राप्त हो रहा है। जैसे नदियोंका प्रवाह आगेकी ओर ही बढ़ता जाता है, पीछेकी ओर नहीं लौटता, उसी प्रकार रात और दिन भी मनुष्योंकी आयुका अपहरण करते हुए एक-एक करके बीतते चले जा रहे हैं। यदि जीवके किये हुए कर्मोका फल पराधीन न होता तो वह जो चाहता, उसकी वही कामना पूरी हो जाती। बड़े-बड़े संयमी, चतुर और बुद्धिमान् मनुष्य भी अपने कर्मकि फलसे वञ्चित होते देखे जाते हैं तथा गुणहीन, मूर्ख और नीच पुरुष भी किसीके आशीर्वाद बिना ही समस्त कामनाओंसे सम्पन्न दिखायी देते हैं। कोई-कोई मनुष्य तो सदा प्राणियोंकी हिंसामें ही लगा रहता है और संसारको धोखा दिया करता है, किंतु कहीं-कहीं ऐसा पुरुष धी सुखी देखा जाता है। कितने ही ऐसे हैं, जो कोई काम न करके चुपचाप बैठे रहते हैं, फिर भी उनके पास लक्ष्मी अपने आप पहुँच जाती है और कुछ लोग बहुत से कार्य करते हैं, फिर भी मनचाही वस्तु नहीं पाते। इसमें पुरुषका प्रारब्ध ही प्रधान है। देखो, वीर्य अन्यत्र पैदा होता है और अन्यत्र जाकर संतान उत्पन्न करता कि है। कभी तो वह योनिमें पहुंचकर गर्भ धारण कराने में समर्थ होता है और कभी नहीं होता। कितने ही लोग पुत्र-पौत्रको इच्छा रखकर उसकी सिद्धिके लिये यल करते रहते हैं, तो भी उनके संतान नहीं होती और कितने ही मनुष्य सत्तानको क्रोध भरा हुआ सांप समझकर सदा उससे डरते रहते है तो भी उनके यहाँदीर्घजीवी पुत्र उत्पन्न हो जाता है, मानो वह स्वयं किसी प्रकार परलोकसे आकर प्रकट हो गया हो। कितने ही गर्भ ऐसे हैं,जो पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाले दीन स्त्री-पुरुषोंद्वारा देवताओंकी पूजा और तपस्या करके प्राप्त किये जाते हैं और दस महीनेतक माताके उदरमें धारण किये जानेके बाद जन्म लेनेपर कुलाङ्गार निकल जाते हैं। उन्हीं माङ्गलिक कृत्योंसे प्राप्त हुए बहुत-से ऐसे पुत्र हैं, जो जन्म लेनेके साथ ही पिताके संचित, किये हुए अपार धन-धान्य और विपुल भोगोंके अधिकारी होते हैं। (इन सबमें प्रारब्यही प्रधान है।)
जो सुख और दुःख दोनोंकी चिन्ता छोड़ देता है, वह अविनाशी ब्रह्मको प्राप्त होता है और परमानन्दका अनुभव करता है। धनके उपार्जनमें बड़ा कष्ट होता है, उसकी रक्षामें भी सुख नहीं है तथा उसके खर्च करने में भी क्लेश ही होता है, अतः धनको प्रत्येक दशामें दुःखदायक समझकर उसके नष्ट होनेपर चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मनुष्य धनका संग्रह करते- करते पहलेकी अपेक्षा ऊँची स्थितिको प्राप्त करके भी कभी तृत नहीं होते, वे और अधिक धन कमानेको आशा लिये हुए ही मर जाते हैं। इसलिये विद्वान् पुरुष सदा संतुष्ट रहते हैं (वे धनको तृष्णामें नहीं पड़ते)। संग्रहका अन्त है विनाश, सांसारिक एभर्यकी उन्नतिका अन्त है उस ऐश्वर्यकी अवनति। संयोगका अन्त है वियोग और जीवनका अन्त है मरण। तृष्णाका कभी अन्त नहीं होता। संतोष ही परम सुख है। अतः पण्डितजन इस लोकमें संतोषको ही उत्तम धन कहते हैं। आयु निरन्तर बीती जा रही है। का पलभर भी विश्राम हालेती अब अपना शरीर ही अनित्य है, तब इस संसारकी दूसरी किस वस्तुको नित्य समझा जाग। जो मनुष्य सब पाणियोक मारमेरे परमात्माकी स्थिति जाकिरकोकान करते हैं, वे संसारयात्रा समाप्त होनेपर परमपदका साक्षात्कार करते हुए शोकके पार हो जाते हैं।
जैसे वनमें नयी-नयी घासकी खोज में विचरते हुए अतृप्त पशुको सहसा व्याघ्र आकर दबोच लेता है, उसी प्रकार भोगोंकी खोजमें लगे हुए अतृप्त मनुष्यको मृत्यु उठा ले जाती है। इसलिये इस दुःखसे छुटकारा पानेका उपाय अवश्य सोचना चाहिये। जो शोक छोड़कर साधन आरम्भ करता है और किसी व्यसनमें आसक्त नहीं होता, उसकी मुक्ति हो जाती है। धनी हो या निर्धन, सबको उपभोगकालमें ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और उत्तम गन्ध आदि विषयों में किञ्चित् सुखका अनुभव होता है। उपभोगके पश्चात् उनमें कुछ नहीं रहता। प्राणियोंको एक-दूसरेसे संयोग होनेके पहले कोई दुःख नहीं होता। जब संयोगके बाद प्रियका वियोग होता है तभी सबको दुःख हुआ करता है। अतः विवेकी पुरुषको अपने स्वरूपमें स्थित होकर कभी भी शोक नहीं करना चाहिये। धैर्य के द्वारा शिश्न और उदरकी, नेत्रद्वारा हाथ और पैरकी, मनके द्वारा आँख और कानकी तथा सद्विद्याके द्वारा मन और वाणीकी रक्षा करनी चाहिये। पूजनीय तथा अन्य मनुष्योंमें आसक्ति हटाकर शान्तभावसे विचरण करता है, वही सुखी और वही विद्वान् है। जो अध्यात्म-विद्या में अनुरक्त, निष्काम तथा भोगासक्तिसे दूर है और सदा अकेला ही विचरता रहता है, वह सुखी होता है। जब मनुष्य सुखको दुःख और दुःखको सुख समझने लगता है, उस अवस्थामें बुद्धि, सुनीति और पुरुषार्थ भी उसकी रक्षा नहीं कर पाते। अतः मनुष्यको ज्ञानप्राप्तिके लिये स्वभावतः यत्र करना चाहिये; क्योंकि यन करनेवाला पुरुष कभी दुःखमें नहीं पड़ता।
सनन्दनजी कहते हैं-व्यासपुत्र शुकदेवसे ऐसा कहकर उनकी अनुमति ले महामुनि सनत्कुमारजी उनसे सादर पूजित हो वहाँसे चले गये। योगियों में श्रेष्ठ शुकदेवजी भी अपनी स्वरूपस्थितिको भलीभांति जानकर ब्रह्मपदका अनुसंधान करनेके लिये उत्सुक हो पिताके पास गये। पितासे मिलकर महामुनि शुकने उन्हें प्रगाम किया और उनकी परिक्रमा करके वे कैलासपर्वतको चले गये।