बदरिकाश्रमके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा

मोहिनी बोली- विप्रवर ! आपने गङ्गद्वारका माहात्म्य बताया, अब बदरीतीर्थक पापनाशक माहात्म्यका वर्णन कीजिये।

पुरोहित वसुने कहा- भद्रे ! सुनो, मैं बदरीतीर्थका माहात्म्य बतलाता हूँ; जिसे जीव जन्म-मृत्युरूप संसार बन्धनसे मुक्त हो जाता है। भगवान् विष्णुका 'बदरी' नामक क्षेत्र सब पातकोंका नाश करनेवाला है और संसारभयसे डरे हुए अनुष्योंके कलिसम्बन्धी दोषोंका अपहरण करके उन्हें मुक्ति देनेवाला है। जहाँ भगवान् नारायण तथा नर ऋषि, जिन्होंने धर्मसे उनकी पत्नी मूर्तिक गर्भसे अवतार ग्रहण किया है, गन्धमादन पर्वतपर तपस्याके लिये गये थे और जहाँ बहुत सुगन्धित फलसे युक्त बेरका वृक्ष है। महाभागे! वे दोनों महात्मा उस स्थानपर कल्यभरके लिये तपस्यामें स्थित हैं। कलापग्रामवासी नारद आदि मुनिवर तथा सिद्धोंके समुदाय उन्हें घेरे रहते हैं और वे दोनों लोकरक्षाके लिये. तपस्यामें संलग्न हैं। वहाँ सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला सुविख्यात अग्नितीर्थ है। उसमें स्रान करके महापातकी भी पातकसे शुद्ध हो जाते हैं। सहस्रों चान्द्रायण और करोड़ों कृच्छ्रव्रतसे मनुष्य जो फल पाता है, उसे अनितीर्थ में स्नान करनेमात्रसे पा लेता है। उसके तीर्थमें पाँच शिलाएँ हैं। जहाँ भगवान् नारदने अत्यन्त भयंकर तपस्या की, वह शिला 'नारदी' नामसे विख्यात है, जो दर्शनमात्रसे मुक्ति देनेवाली है। सुलोचने! वहाँ भगवान् विष्णुका नित्य निवास है। उस तीर्थमें नारदकुण्ड है, जहाँ नान करके पवित्र हुआ मनुष्य भोग, मोक्ष, भगवान्को भक्ति आदि जो जो चाहता है, वही वही प्राप्त कर लेता है। जो मानव भक्तिपूर्वक इस नारदी शिलाके समीप स्नान, दान, देवपूजन, होम, जप तथा अन्य शुभकर्म करता है, वह सब अक्षय होता है। इस क्षेत्रमें दूसरी शुभकारक शिला 'वैनतेय' शिलाके नामसे विख्यात है,जहाँ महात्मा गरुड़ने भगवान् विष्णुके दर्शनकी इच्छासे तीस हजार वर्षांतक कठोर तपस्या की थी। शुभे! इससे प्रसन्न होकर भगवान्ने उन्हें श्रेष्ठ वर दिया वत्स ! मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम दैत्यसमूहके लिये अजेय और नागोंको अत्यन्त भय देनेवाले मेरे वाहन होओ। यह शिला इस पृथ्वीपर तुम्हारे ही नामसे विख्यात होगी और दर्शनमात्रसे मनुष्योंके लिये पुण्यदायिनी होगी। महाभाग ! तुमने जहाँ तपस्या की है, उस मुख्यतम तीर्थमें मेरी प्रसन्नताके लिये स्नान करनेवालोंको पुण्य देनेवाली गङ्गा प्रकट होंगी। जो पशगङ्गामें स्नान करके देवता आदिका तर्पण करेगा, उसकी सनातन ब्रह्मलोकसे इस लोक में पुनरावृत्ति नहीं होगी।' ऐसा वरदान देकर भगवान् विष्णु उसी समय अन्तर्धान हो गये। गरुड़जी भी भगवान् विष्णुकी आज्ञासे उनके बाहन हो गये। तीसरी जो शुभकारक शिला है, वह 'वाराही' शिलाके नाम से विख्यात है, जहाँ पृथ्वीपर रसातलसे उद्धार करके भगवान् वाराहने हिरण्याक्षको मार गिराया और शिलारूपसे वे पापनाशक श्रीहरि उस दैत्यको दबाकर बैठ गये। जो मानव वहाँ जाकर गङ्गाके निर्मल जलमें स्नान करता और भक्तिभावसे उस शिलाकी पूजा करता है, वह कभी दुर्गतिमें नहीं पढ़ता। देवेश्वरि ! वहाँ चौथी 'नरसिह शिला है, जहाँ हिरण्यकशिपुको मारकर भगवान नरसिंह विराजमान हुए थे। जो मनुष्य वहाँ स्नान और नरसिंह शिलाका पूजन करता है, वह पुनरावृत्तिरहित वैष्णवधामको प्रास कर लेता है। देवि! वहीं पाँचवीं 'नर-नारायण' शिला है। सत्ययुगमें भोग और मोक्ष देनेवाले भगवान् नर-नारायणावतार श्रीहरि सबके सामने प्रत्यक्ष निवास करते थे। शुभे! त्रेता आनेपर वे केवल मुनियों, देवताओं और योगियोंको दिखायी देते थे। द्वापर आनेपर केवल ज्ञानयोगसे उनका दर्शन होने लगा। तब ब्रह्मा आदि देवताओं तथा तपस्वी ऋषियोंने अपनी विचित्र वाणीद्वारा स्तुति करके भगवान् श्रीहरिको प्रसन्न किया। तदनन्तर उन ब्रह्मा आदि देवताओंसे आकाशवाणीने कहा-'देवेश्वरो! यदि तुम्हें स्वरूपके दर्शनकी श्रद्धा है तो नारदकुण्डमें जो मेरी शिलामयी मूर्ति पड़ी हुई है, उसे ले लो।' तब उस आकाशवाणीको सुनकर ब्रह्मा आदि देवताओंका चित्त प्रसन्न हो गया। उन्होंने नारदकुण्डमें पड़ी हुई उस शिलामयी दिव्य प्रतिमाको निकालकर वहाँ स्थापित कर दिया और उसकी पूजा करके अपने-अपने धामको चले गये। वे देवगण प्रतिवर्ष वैशाखमासमें अपने धामको जाते हैं और कार्तिक में आकर फिर पूजा प्रारम्भ करते हैं। इसलिये शाखसे बर्फके कष्टका निवारण हो जानेसे पापकर्मरहित पुण्यात्मा मनुष्य वहाँ श्रीहरिके विग्रहका दर्शन पाते हैं। छ: महीने देवताओं और छ: महीने मनुष्यों के द्वारा उस भगवद्विग्रहकी पूजा की जाती है। इस व्यवस्थाके साथ तत्वसे भगवान्की प्रतिमा प्रकट हुई। जो भगवान् विष्णुको उस शिलामयी प्रतिमाका भक्तिभावसे पूजन करता है और उसका नैवेद्य (प्रसाद) भक्षण करता है, वह निश्चय ही मोक्ष पाता है। इस प्रकार वहाँ ये पाँच पुण्य शिलाएँ स्थित हैं। श्रीहरिका नैवेद्य देवाओं के लिये भी दुर्लभ है, फिर मनुष्य आदिके लिये तो कहना हो क्या है। उस नैवेद्यका भक्षण कर लेनेपर वह मोक्षका साधक होता है। बदरीतीर्थमें भगवान् विष्णुका सिक्यमात्र (थोड़ा) भी प्रसाद यदि खा लिया जाय तो वह पापका नाश करता है।

मोहिनी! वहीं एक दूसरा महान् तीर्थ है, उसका वर्णन सुनो; उसमें भक्तिपूर्वक सान करनेवाला पुरुष वेदोंका पारङ्गत विद्वान् होता है। एक समय सोते हुए ब्रह्माजीके मुखसे निकले हुए मूर्तिमान् वेदोंको हयग्रीव नामक असुरने हर लिया। वह देवता आदिके लिये बड़ा भयंकर था। तब ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुसे प्रार्थना की। अतः वे मत्स्यरूपसे प्रकट हुए। उस असुरको मारकर उन्होंने सब वेद ब्रह्माजीको लौटा दिये। तबसे वह स्थान महान् पुण्यतीर्थ हो गया। वह सब विद्याओंका प्रकाशक है। महाभागे। तैमिनिलतीर्थ दर्शनमात्रसे सब पापोंका नाश करनेवाला है। तदनन्तर किसी समय अविनाशी भगवान् विष्णुने पुनः वेदोंका अपहरण करनेवाले दो मतवाले असुर मधु और कैटभको हयग्रोवरूपसे मारकर फिर ब्रह्माजीको वेद लौटाये। अत: ब्रह्मकुमारी! वह तीर्थ स्नानमात्रसे सब पापोंका नाश करनेवाला है। भद्रे! मत्स्य और हयग्रीवतीर्थमें द्रवरूपधारी वेद सदा विद्यमान रहते हैं। अत: वहाँका उल सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहीं एक दूसरा मनोरम तीर्थ है, जो मानसोद्धेदक नामसे विख्यात है। वह हृदयकी गाँठे खोल देता है, मनके समस्त संशयोंका नाश करता है और सारे पापॉको भी हर लेता है। इसलिये वह मानसोद्रेदक कहलाता है। वरानने ! वहीं कामाकाम नामक दूसरा तीर्थ है, जो सकाम पुरुषोंकी कामना पूर्ण करनेवाला और निष्कामभाववाले पुरुषोंको मोक्ष देनेवाला है। भद्रे। वहाँसे पथिम वसुधारातीर्थ है। वहीं भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल पाता है। इस वसुधारातीर्थमें पुण्यात्मा पुरुषोंको जलके भीतरसे ज्योति निकलती दिखायी देती है, जिसे देखकर मनुष्य फिर गर्भवासमें नहीं आता।

वहाँसे नैऋत्य कोणमें पाँच धाराएँ नीचे गिरती हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं-प्रभास, पुष्कर, गया, नैमिषारण्य और कुरुक्षेत्र। उनमें पृथक्-पृथक् स्नान करके मनुष्य उन-उन तीर्थोका फल पाता है। उसके बाद एक दूसरा विमलतीर्थ है, जो सोमकुण्डके नामसे भी विख्यात है, जहाँ तीन तपस्या करके सोम ग्रह आदिके अधीश्वर हुए हैं। भद्रे ! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य दोषरहित हो जाता है। वहाँ एक दूसरा द्वादशादित्य नामक तीर्थ है, जो सब पापीको हर लेनेवाला और उत्तम है। वहाँ स्नान करके मनुष्य सूर्यके समान तेजस्वी होता है। वहीं 'चतुःस्रोत' नामका एक दूसरा तीर्थ है, जिसमें डुबकी लगानेवाला मानव धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारोंमेंसे जिसको चाहता है, उसीको पा लेता है। सती  मोहिनी! तदनन्तर वहीं सप्तपद नामक मनोहर तीर्थ है, जिसके दर्शनमात्रसे बड़े-बड़े पातक भी अवश्य नष्ट हो जाते हैं। फिर उसमें स्नान करनेकी तो बात ही क्या ! उस कुण्डके तीनों कोणोंपर ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्थित रहते हैं। वहाँ मृत्यु होनेसे मनुष्य सत्यपद-स्वरूप भगवान् विष्णुको प्राप्त करता है। शुभे। वहाँसे दक्षिणभागमें परम उत्तम अस्त्रातीर्थ है, जहाँ भगवान् नर और नारायण अपने अस्त्र-शस्त्र रखकर तपस्या में संलग्न हुए थे। महाभागे। वहाँ पुण्यात्मा पुरुषोंको शङ्ख, चक्र आदि दिव्य आयुध मूर्तिमान् दिखायी देते हैं। वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्यको शत्रुका भय नहीं प्राप्त होता। शुभे। वहीं मेरुतीर्थ है, जहाँ स्नान और धनुर्धर श्रीहरिका दर्शन करके मनुष्य सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है। जहाँ भागीरथी और अलकनन्दा मिली है, वह पुण्यमय (देवप्रयाग) बदरिकाश्रममें सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है। वहाँ स्नान, देवताओं और पितरोंका तर्पण तथा भक्तिभावसे भगवत्पूजन करके मनुष्य सम्पूर्ण देवताओंद्वारा वन्दित हो विष्णुधामको प्राप्त कर लेता है। शुभानने! संगमसे दक्षिणभागमें धर्मक्षेत्र है। मैं उसे सब तीर्थोमें परम उत्तम और पावन क्षेत्र मानता हूँ। भद्रे! वहीं 'कर्मोद्धार' नामक दूसरा तीर्थ है, जो भगवान्की भक्तिका एकमात्र साधन है। 'ब्रह्मावत' नामक तीर्थ ब्रहालोककी प्राप्तिका प्रमुख साधन है। मोहिनी! ये गङ्गाके आश्रित तीर्थ तुम्हें बताये गये हैं। बदरिकाश्रमके तीर्थोका पूरा-पूरा वर्णन करने में ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं। जो मनुष्य भक्तिभावसे ब्रह्मचर्य आदि व्रतका पालन करते हुए एक मासतक यहाँ निवास करता है, वह नर नारायण श्रीहरिका साक्षात् दर्शन, पाता है।