नवमी-सम्बन्धी व्रतोंकी विधि और महिमा

सनातनजी कहते हैं- विप्रेन्द्र ! अब मैं तुमसे नवमीके व्रतोंका वर्णन करता हूँ, लोकमें जिनका पालन करके मनुष्य मनोवाञ्छित फल पाते हैं। चैत्रके शुक्लपक्षमें नवमीको श्रीरामनवमी का व्रत होता है। उसमें भक्तियुक्त पुरुष यदि शक्ति हो तो विधिपूर्वक उपवास करे। जो अशक्त हो, वह मध्याकालीन जन्मोत्सव के बाद एक समय भोजन करके रहे। ब्राह्मणों को मिटान्न भोजन कराकर अपवान श्रीरामको प्रसन्न करे। गौ, भूमि, तिल सुवर्ण, वस्त्र और आभूषण आदिके दानसे भी श्रीरामप्रीतिका सम्पादन करे। जो मनुष्य इस प्रकार भक्तिपूर्वक 'श्रीरामनवमीव्रत का पालन करता है, वह सम्पूर्ण पापोंका नाश करके भगवान् विष्णुके परम धामको जाता है। वैशाखमें दोनों पक्षोंकी नवमीको जो विधिपूर्वक चण्डिका-पूजन करता है, वह विमानसे विचरण करता हुआ देवताओंके साथ आनन्द भोगता है। ज्येहर शुक्ला नवमीको श्रेष्ठ मनुष्य उपवासपूर्वक उमादेवीका विधिवत् पूजन करके कुमारी कन्याओं तथा ब्राह्मणों को भोजन करावे और उन्हें अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा देकर अगहनीके चावलका भात दूधके साथ खाय। जो मनुष्य इस 'उमाव्रत का विधिपूर्वक पालन करता है, वह इस लोक में श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर अन्तमें स्वर्गलोकमें स्थान पाता है। विप्रेन्द्र। जो आषाढ़ मासके दोनों पक्षों में नवमीको रातमें ऐरावतपर विराजमान शुक्लवर्णा इन्द्राणीका भलीभांति पूजन करता है, वह देवलोकमें दिव्य विमानपर विचरता हुआ दिव्य भोगोंका उपभोग करता है। विप्रवर! जो श्रावण मासके दोनों पक्षोंकी नवमीको उपवास अथवा केवल रातमें भोजन करता और 'कौमारी चण्डिका की आराधना करता है, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, भौति-भौतिके नैवेद्य अर्पण करके और कुमारी कन्याओंको भोजन कराकर जो उस पापहारिणी देवीकी परिचर्या में तत्पर रहता है तथा इस प्रकार भक्तिपूर्वक उस उत्तम 'कौमारीव्रत'का पालन करता है, वह विमानद्वारा सनातन देवीलोकमें जाता है।

भाद्रपद शुक्ला नवमीको 'नन्दानवमी' कहते हैं। उस दिन जो नाना प्रकारके उपचारों द्वारा दुगदिवीकी विधिवत् पूजा करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल पाकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें जो नवमी आती है, उसे 'अक्षयनवमी' कहते हैं। उस दिन पीपलवृक्षकी जड़के समीप देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करे और सूर्यदेवताको अर्घ्य दे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे और स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार जो भक्तिपूर्वक 'अक्षयनवमी 'को जप, दान, ब्राह्मणपूजन और होम करता है, उसका वह सब कुछ अक्षय होता है, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। मार्गशीर्ष शुक्ला नवमीको 'नन्दिनीनवमी' कहते हैं। जो उस दिन उपवास करके गन्ध आदिसे जगदम्बाका पूजन करता है, वह निशय ही अधमेष यज्ञके फलका भागी होता है। विप्रवर। पौष मासके शुक्लपक्षकी नवमीको एक समय भोजनके व्रतका पालन करते हुए महामायाका पूजन करे। इससे वाजपेय यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। माप शुक्ला नवधी लोकचित्त 'महानन्दा का नामसे विख्यात है, जो मान लिये सदा आनन्ददामिनी होती है। उस दिन किया हुआ खान, दान, जप, होम और उपवास सब अक्षय होता है। द्विजोत्तम ! फाल्गुन मासके शुक्लपक्षकी जो नवमी तिथि है, वह परम पुण्यमयी 'आनन्दा नवमी' कहलाती है। वह सब पापोंका नाश करनेवाली मानी गयी है। जो उस दिन उपवास करके 'आनन्दाका पूजन करता है, वह मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।