सनकादि और नारदजीका प्रस्थान, नारदपुराणके माहात्म्यका वर्णन और पूर्वभागकी समाप्ति

श्रीसूतजी कहते हैं- महर्षियो! देवर्षि नारदजीके प्रश्न करनेपर उन्हें इस प्रकार उपदेश देकर वे सनकादि चारों कुमार, जो शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं, नारदजीसे पूजित हो, संध्या आदि नित्यकर्म करके भगवान् शङ्करके लोकमें चले गये। वहाँ देवताओं और दानवेकि अधीश्वर जिनके चरणारविन्दों में मस्तक झुकाते हैं, उन महेश्वरको प्रणाम करके उनकी आज्ञासे वे भूमिपर बैठे। तदनन्तर सम्पूर्ण शास्त्रोंके सारको, जो अज्ञानी जीवोंके अज्ञानमय बन्धनको खोलनेवाला है, सुनकर वे ज्ञानघनस्वरूप कुमार भगवान् शिवको नमस्कार करके अपने पिताके समीप चले गये। पिताके चरणकमलोंमें प्रणाम करके और उनका आशीर्वाद लेकर वे आज भी सम्पूर्ण लोकोंके तीर्थोमें सदा विचरते रहते हैं। वास्तवमें वे स्वयं ही तीर्थस्वरूप हैं। ब्रह्मलोकसे वे बदरिकाश्रम-तीर्थ में गये और देवेश्वरसमुदायसे सेवित भगवान् विष्णुके उन अविनाशी चरणारविन्दोंका चिरकालतक चिन्तन करते रहे, जिनका वीतराग संन्यासी मान करते हैं। ब्राहाणो। तत्पश्चात् नारदजी भी सनकादि कुमारोंसे मनोवाञ्छित ज्ञान विज्ञान पाकर उस गजातटसे उठकर पिताके निकट गये और प्रणाम करके खहे रहे। फिर पिता ब्रह्माजीके द्वारा आज्ञा मिलनेपर वे बैठे। उन्होंने कुमारोंसे जो ज्ञान- विज्ञान श्रवण किया था, उसका ब्रह्माजीके समीप यथार्थरूपसे वर्णन किया। उसे सुनकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए। इसके बाद ब्रह्माजीके चरणोंमें में मस्तक झुकाकर आशीर्वाद ले मुनिवर नारद मुनिसिद्ध सेवित कैलास पर्वतपर आये। वह पर्वत नाना प्रकारके आश्चर्यजनक दृश्योंसे भरा हुआ था। सिद्ध और किन्नरोंने उस पर्वतको व्याप् कर रखा था। जहाँ सुन्दर स्वर्णमय कमल लिखे हुए हैं, ऐसे स्वच्छ जलसे भरे हुए सरोवर उस शैलशिखरकी शोभा बढ़ाते हैं। गङ्गाजीके प्रपातकी में कलकल ध्वनि वहाँ सन्न ओर गूंजती रहती है कैलासका एक-एक शिखर सफेद बादलोंके समान जान पड़ता है। उसी शिखरपर काले मेघके समान श्यामवर्णका एक वटवृक्ष है, जो सौ योजन विस्तृत है। उसके नीचे योगियों को मण्डलीके मध्यभागमें जटाजूटधारी भगवान् त्रिलोचन बाधाम्ब आहे हुए बैठे थे। उनका सारा अङ्ग भस्माङ्गरागसे ने विभूषित हो रहा था। नागौके आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते थे। ब्राहाणो । रुद्राक्षकी मालासे सदा शोभायमान भगवान् चन्द्रशेखरको देखकर नारदजीने भक्तिभावसे नतमस्तक हो उन जगदीश्वरके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया और प्रसन्न मनसे नश्रीवृषध्वज शिवका स्तवन किया, तदनन्तर भगवान् शिवकी आज्ञासे वे आसनपर बैठे। उस समय योगियोंने उनका बड़ा सत्कार किया। जगद्गुरु सदाशिवने नारदजीकी कुशल पूछी। नारदजीने कहा-भगवन् । आपके प्रसादसे सब कुशल है। ब्राह्मणो। फिर सब योगियोंके सुनते हुए नारदजीने पशुओं (जीवों) के अज्ञानमय पाशको छुड़ानेवाले पाशुपत (शाम्भव) ज्ञानके विषयमें प्रश्न किया। तब शरणागतवत्सल भगवान् शिवने उनकी भक्तिसे संतुष्ट हो उनसे आदरपूर्वक अष्टाङ्ग शिव-योगका वर्णन किया। लोककल्याणकारी भगवान् शङ्करसे शाम्भव ज्ञान प्राप्त करके प्रसन्नचित्त हो नारदजी बदरिकाश्रममें भगवान् नारायणके निकट गये। सदा आने-जानेवाले देवर्षि नारदने वहाँ भी सिद्धों और योगियोंसे सेवित भगवान् नारायणको बारम्बार संतुष्ट किया।

ब्राह्मणो! यह नारदमहापुराण है, जिसका मैंने तुम्हारे समक्ष वर्णन किया है। सम्पूर्ण शास्त्रोंका दिग्दर्शन करानेवाला यह उपाख्यान वेदके समान मान्य है। यह श्रोताओंके ज्ञानको वृद्धि करनेवाला है। विप्रगण! जो इस नारदीय महापुराणका शिवालयमें, श्रेष्ठ द्विजोंके समाजमें, भगवान् विष्णुके मन्दिरमें, मथुरा और प्रयागमें, पुरुषोत्तम जगन्नाथजीके समीप, सेतुबन्ध रामेश्वरमें, काशी, द्वारका, हरद्वार और कुशस्थलमें, त्रिपुष्कर तीर्थ में, किसी नदीके तटपर अथवा जहाँ-कहीं भी भक्तिभावसे कीर्तन करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञों और तीर्थोंका महान् फल पाता है। सम्पूर्ण दानों और समस्त तपस्याओंका भी पूरा-पूरा फल प्राप्त कर लेता है। जो उपवास करके या हविष्य भोजन करके इन्द्रियोंको काबूमें रखते हुए भगवान् नारायण या शिवकी भक्ति में तत्पर हो इस पुराणका श्रवण अथवा प्रवचन करता है, वह सिद्धि पाता है। इस पुराणमें सब प्रकारके पुण्यों और सिद्धियोंके उपका वर्णन किया गया है, जो सदा पढ़ने और सुननेवाले पुरुषोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। यह मनुष्यों के कलिसम्बन्धी दोषको हर लेता है और सब सम्पत्तियोंकी वृद्धि करता है। यह सभीको अभीष्ट है। यह तपस्या, व्रत और उनके फलोंका प्रकाशक है। मन्त्र, यन्त्र, पृथक्-पृथक् वेदाङ्ग, आगम, सांख्य और वेद-सबका इसमें संक्षेपसे संग्रह किया गया है। इस वेदसम्मित नारदीय महापुराणका श्रवण करके धन, रत्न और वस्त्र आदिके द्वारा भक्तिभावसे पुराणवाचक आचार्यकी पूजा करनी चाहिये। भूमिदान, गोदान, रत्नदान तथा हाथी, घोड़े और रथके दानसे आचार्यको सदैव संतुष्ट करना चाहिये। ब्राह्मणो! यह पुराण धर्मका संग्रह करनेवाला तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-चारों पुरुषार्थीको देनेवाला है। जो इसकी व्याख्या करता है, उसके समान मनुष्योंका गुरु दूसरा कौन हो सकता है। शरीर, मन, वाणी और धन आदिके द्वारा सदा धर्मोपदेशक गुरुका प्रिय करना चाहिये। इस पुराणको विधिपूर्वक सुनकर देवपूजन और हवन करके सौ ब्राह्मणोंको मिठाई और खीरका भोजन कराना चाहिये तथा भक्तिभावसे उन्हें दक्षिणा देनी चाहिये; क्योंकि भगवान् माधव भक्तिसे ही संतुष्ट होते हैं। जैसे नदियोंमें गङ्गा, सरोवरोंमें पुष्कर, पुरियोंमें काशीपुरी, पर्वतोंमें मेरु, तीनों देवताओंमें सबका पाप हरनेवाले भगवान् नारायण, युगोंमें सत्ययुग, वेदोंमें सामवेद, पशुओंमें धेनु, वर्णीमें ब्राह्मण, देने योग्य तथा पोषक वस्तुओंमें अन्न और जल, मासोंमें मार्गशीर्ष, मृगोंमें सिंह, देहधारियों में पुरुष, वृक्षोंमें पीपल, दैत्यों में प्रवाद, अगोंमें मुख, अङ्गों में उच्च विवा, ऋतुओंमें वसन्त, यज्ञोंगे जपयज्ञ, नागोमें शेष, पितराम अर्यमा, अस्त्रोम धनुष, वसुओं में पावक, आदित्योंमें विष्णु, देवताओगे इन्द्र, सिद्धोंमें कपिल, पुरोहितोंमें बृहस्पति, कवियोंमें शुक्राचार्य, पाण्डवोंमें अर्जुन, दास्य-भक्कोंमें हनुमान्, तृणोंमें कुश, इन्द्रियोंमें मन (चित्त), गन्धों में चित्ररथ, पुष्पों में कमल, अप्सराओंमें उर्वशी तथा धातुओंमें सुवर्ण श्रेष्ठ है। जिस प्रकार ये सब वस्तुएँ अपने सजातीय पदार्थों में श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पुराणों में श्रीनारदमहापुराण श्रेष्ठ कहा गया है। द्विजवरो! आप सब लोगोंको शान्ति प्राप्त हो, आपका कल्याण हो। अब मैं अमित तेजस्वी व्यासजीके समीप जाऊँगा। ऐसा कहकर सूतजी शौनक मादि महात्माओंसे पूजित हो उन सबकी आज्ञा लेकर चले गये वे शौनक आदि द्विज श्रेष्ठ महात्मा भी जो यज्ञानुष्ठानमें लगे हुए थे, एकाग्रचित्त हो सुने हुए समस्त धर्मों के अनुष्ठानमें तत्पर हो, वहीं रहने लगे। जो कलिके पाप-विषका नाश करनेवाले श्रीहरिके जप और पूजन विधिरूप औषधका सेवन करता है,वह निर्मल चित्तसे भगवान् के ध्यानमें लगकर सदा मनोवाञ्छित लोक प्राप्त करता है।

।।पूर्वभाग समाप्त॥

   श्रीपरमात्मने नमः

    श्रीगणेशाय नमः

   नमो भगवते वासुदेवाय

    नारदपुराण