नारद महा पुराण
श्रीनारदजीको भगवान् शङ्करसे प्राप्त हुए युगलशरणागति-मन्त्र तथा राधाकृष्ण- युगलसहस्त्रनामस्तोत्रका वर्णन
सनत्कुमारजी कहते हैं- नारद! क्या तुम जानते हो कि पूर्व-जन्ममें तुमने साक्षात् भगवान् शङ्करसे युगल-मन्त्रका उपदेश प्राप्त किया था। श्रीकृष्ण-मन्त्रका रहस्य, जिसे तुम भूल चुके हो, स्मरण तो करो।
सूतजी कहते हैं- ब्राह्मणो! परम बुद्धिमान् सनत्कुमारजीके द्वारा ऐसा कहनेपर देवर्षि नारदने ध्यानमें स्थित हो अपने पूर्व-जन्मके चिरन्तन चरित्रको शीघ्र जान लिया। तब उन्होंने मुखसे आन्तरिक प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा- 'भगवन्! पूर्व-कल्पका और वृत्तान्त तो मुझे स्मरण हो आया है; परंतु युगल-मन्त्रका लाभ किस प्रकार हुआ, यह याद नहीं आता।' महात्मा नारदका यह वचन सुनकर भगवान् सनत्कुमारने सब बातें यथावत्-रूपसे बतलाना आरम्भ किया।
सनत्कुमारजी बोले- ब्रह्मन्! सुनो, इस सारस्वत कल्पसे पच्चीसवें कल्प पूर्वकी बात : है, तुम कश्यपजीके पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे। उस समय भी तुम्हारा नाम नारद ही था। एक दिन तुम भगवान् श्रीकृष्णका परम तत्त्व पूछनेके लिये कैलास पर्वतपर भगवान् शिवके समीप गये। वहाँ तुम्हारे प्रश्न करनेपर, महादेवजीने स्वयं जिसका साक्षात्कार किया था, श्रीहरिकी नित्य-लीलासे सम्बन्ध रखनेवाले उस परम रहस्यका तुमसे यथार्थरूपमें वर्णन किया। तब तुमने श्रीहरिकी नित्य-लीलाका दर्शन करनेके लिये भगवान् शङ्करसे पुनः प्रार्थना की। तब भगवान् सदाशिव प्रकार बोले- 'गोपीजनवल्लभचरणाञ्छरणं* प्रपद्ये यह मन्त्र है। इस मन्त्रके सुरभि ऋषि, गायत्री छन्द और गोपीवल्लभ भगवान् श्रीकृष्ण देवता कहे गये हैं, 'प्रपन्नोऽस्मि' ऐसा कहकर भगवान् की शरणागतिरूप भक्ति प्राप्त करनेके लिये इसका विनियोग बताया गया है। विप्रवर! इसका सिद्धादि-शोधन नहीं होता है। इसके लिये न्यासकी कल्पना भी नहीं की गयी है। केवल इस मन्त्रका चिन्तन ही भगवान्की नित्य लीलाको तत्काल प्रकाशित कर देता है। गुरुसे मन्त्र ग्रहण करके उनमें भक्तिभाव रखते हुए अपने धर्मपालनमें संलग्र हो गुरुदेवकी अपने ऊपर पूर्ण कृपा समझे और सेवाओंसे गुरुको संतुष्ट करे। साधुपुरुषोंके धर्मोकी, जो शरणागोंके भयको दूर करनेवाले हैं, शिक्षा ले। इहलोक और परलोककी चिन्ता छोड़कर उन सिसिदायक धर्मोको अपनाये। 'इहलोकका सुख, भोग और आयु पूर्वकर्मोके अधीन हैं, कर्मानुसार उनकी व्यवस्था भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही करेंगे।' ऐसा दृढ़ विचार कर अपने मन और बुद्धिके द्वारा निरन्तर नित्यलीलापरायण श्रीकृष्णका चिन्तन करे। दिव्य अर्चाविग्रहोंके रूपमें भी भगवान् का अवतार होता है। अतः उन विग्रहोंकी सेवा-पूजा-द्वारा सदा श्रीकृष्णको आराधना करे। भगवान् की शरण चाहनेवाले प्रपत्र भक्तोंको अनन्यभावसे उनका चिन्तन करना चाहिये और विद्वानोंको भगवान्का आश्रय रखकर देह-गेह आदिकी ओरसे उदासीन रहना चाहिये। गुरुकी अवहेलना, साधु-महात्माओंकी निन्दा, भगवान् शिव और विष्णुमें भेद करना, वेदनिन्दा, भगवनामके बलपर पापाचार करना, भगवन्नामकी
*गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्णके चरणोंकी शरण लेता हूँ।
महिमाको अर्षवाद समझना, नाम लेनेमें पाखण्ड फैलाना, आलसी और नास्तिकको भगक्नामका उपदेश देना,भगवन्नामको भूलना अथवा नाममें आदरबुद्धि न होना-ये (दस) बड़े भयानक दोष है। वत्स। इन दोषोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये । मैं भगवान्की शरणमें हूँ, इस भावसे सदा हृदयस्थित श्रीहरिका चिन्तन करे और यह विश्वास रखे कि वे भगवान् ही सदा मेरा पालन करते हैं और करेंगे। भगवान्से यह प्रार्थना करे-'राधानाथ! मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा आपका हूँ। श्रीकृष्णवल्लभे! मैं तुम्हारा ही हूँ। आप ही दोनों मेरे आश्रय हैं।' मुनिश्रेष्ठ! श्रीहरिके दास, सखा, पिता- माता और प्रेयसियाँ-सब-के-सब नित्य हैं; ऐसा महात्मा पुरुषोंको चिन्तन करना चाहिये। भगवान् श्यामसुन्दर प्रतिदिन वृन्दावन तथा व्रजमें आते-जाते और सखाओंके साथ गौएँ चराते हैं। केवल असुर-विध्वंसकी लीला सदा नहीं होती। श्रीहरिके श्रीदामा आदि बारह सखा कहे गये हैं तथा श्रीराधा-रानीकी सुशीला आदि बत्तीस सखियाँ बतायी गयी हैं। वत्स! साधकको चाहिये वह अपनेको श्यामसुन्दरको व सेवाके सर्वथा अनुरूप समझे और श्रीकृष्णसेवाजनित सुख एवं आनन्दसे अपनेको अत्यन्त संतुष्ट अनुभव करे। प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्तसे लेकर आधी राततक समयानुरूप सेवाके द्वारा दोनों प्रिया-प्रियतमकी परिचर्या करे। प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर उन युगल सरकारके सहस्त्र नार्मोका पाठ भी करे। मुनीश्वर। यह प्रपन्न स्त भक्तोंके लिये साधन बताया गया है। यह मैंने तुम्हारे समक्ष गूढ तत्त्व प्रकाशित किया है।
सनत्कुमारजी कहते है- नारद! तब तुमने पुनः भगवान् सदाशिवसे पूछा-'प्रभो! युगलसहस्रनाम कौन-से हैं? महामुने। तुम्हारे पूछनेपर भगवान् शिवने युगलसहस्रनाम भी बतलाया। वह सब मुझसे सुनो। रमणीय वृन्दावनमें यमुनाजीके तटसे लगे हुए कल्पवृक्षका सहारा लेकर श्यामसुन्दर श्रीराधारानीके साथ खड़े हैं। महामुने! ऐसा ध्यान करके युगलसहस्रनामका पाठ करे।
१. देवकीनन्दनः देवकीको आनन्दित करनेवाले, २. शौरि:-शूरसेनके वंशज, ३. वासुदेवः वसुदेव- पुत्र अथवा सबके भीतर निवास करनेवाले देवता, ४. बलानुजः-बलरामजीके छोटे भाई, ५. गदाग्रजः- गदके बड़े भाई, ६. कंसमोहः अपनी अलौकिक शौर्यपूर्ण लीलाओंसे कंसको मोहित करनेवाले, ७. कंससेवकमोहन:-कंसकी सेवामें तत्पर असुर वीरोंको मोहित करनेवाले। ८. भिन्नार्गल:-जन्म लेनेके पश्चात् गोकुल- गमनको इच्छासे कंसके कारागारमें लगे हुए किंवाड़ोंकी अर्गला (सिटकिनी)-का भेदन करनेवाले, ९. भिनलोहः पिताके हाथों और पैरों में बँधी हुई लोहेकी हथकड़ी और बेडीको संकल्पमात्रसे तोड़ देनेवाले, १०. पितृवाह्यः पिता वसुदेवके द्वारा सिरपर वहन करने योग्य शिशुरूप श्रीकृष्ण, ११. पितृस्तुतः-अवतारकालमें पिताके द्वारा जिनकी स्तुति की गयी, वे श्रीकृष्ण, १२. मातृस्तुत:-माता देवकीके द्वारा जिनकी स्तुति की गयी वे, १३. शिवध्येयः भगवान् शङ्करके ध्यानके विषय, १४. यमुनाजलभेदनः-
*गुरोरज्ञां साधूनां निन्दा भेदं हरे हरौ।
वेदनिन्दा हरेनामबलात्पापसमीहनम्॥
अर्थवाद हरेर्नाम्रि पाखण्डं नामसंग्रहे।
अलसे नास्तिके चैव हरिनामोपदेशनम्॥
नामविस्मरण चापि नाम्न्यनादरमेव च।
संत्यजेद् दूरतो वत्स दोषानेतान्सुदारुणान् ॥
(ना० पूर्व०८२।२२-२४)
गोकुल जाते समय वसुदेवजीको मार्ग देनेके लिये यमुनाजीके जलका भेदन करनेवाले। १५. व्रजवासी- व्रजमें निवास करनेवाले, १६. व्रजानन्दी-अपने शुभागमनसे सम्पूर्ण व्रजका आनन्द बढ़ानेवाले, १७. नन्दबाल:- नन्दजीके पुत्र, १८. दयानिधिः-दयाके समुद्र, १९, लीलाबाल:-लीलाके लिये बालरूपमें प्रकट, २०. पद्मनेत्र:- कमलसदृश नेत्रवाले, २१. गोकुलोत्सवः-गोकुलके लिये उत्सवरूप अथवा अपने जन्मसे गोकुलमें आनन्दोत्सवको बढ़ानेवाले, २२. ईश्वर:- सब प्रकारसे समर्थ। २३. गोपिकानन्दनः अपनी शैशवसुलभ चेष्टाओंसे यशोदा आदि गोपियोंको आनन्दित करनेवाले, २४. कृष्णः सच्चिदानन्दस्वरूप अथवा सबको अपनी ओर खींचनेवाले, २५, गोपानन्दः- गोपोंके लिये मूर्तिमान् आनन्द, २६. सताङ्गतिः- साधु-महात्माओं तथा भक्तजनोंके आश्रय, २७, वकप्राणहर: वकासुरके प्राण लेनेवाले, २८. विष्णुः- सर्वत्र व्यापक, २९. वकमुक्तिप्रदः- वकासुरको मोक्ष देनेवाले, ३०. हरि:=पाप, दुःख और अज्ञानको हर लेनेवाले। ३१. बलदोलाशयशय:-शेषस्वरूप बलरामरूपी हिंडोलेपर शयन करनेवाले, ३२. श्यामल:- श्यामवर्ण, ३३. सर्वसुन्दरः-पूर्ण सौन्दर्यके आत्रय, ३४. पद्मनाभः-जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ वे भगवान् विष्णु, ३५. हृषीकेश: इन्द्रियोंके नियन्ता और प्रेरक, ३६. क्रीडामनुजबालक:- लीलाके लिये मनुष्य-बालकका रूप धारण
किये हुए। ३७. लीलाविध्वस्तशकट: अनायास हो चरणोंके स्पर्शसे छकडेको उलटकर उसमें स्थित असुरका नाश करनेवाले. ३८. वेदमन्बाभिषेचिता-यशोदा भैयाकी प्रेरणासे बालारिष्टनिवारणके लिये ब्राह्मणोद्वारा वेद-मन्त्रसे अभिषिक्त, ३९. यशोदानन्दनः-यशोदा मैयाको आनन्द देनेवाले, ४०, कान्तः कमनीय स्वरूप, ४१. मुनिकोटिनिषेवितः-करोड़ों मुनियोंद्वारा सेवित। ४२. नित्यं मधुवनवासी-मधुवनमें नित्य निवास करनेवाले, ४३. वैकुण्ठ: वैकुण्ठधामके अधिपति विष्णु, ४४, सम्भव:-सबकी उत्पत्तिके स्थान, ४५. क्रतुः यज्ञस्वरूप, ४६. रमापतिः-लक्ष्मीपति, ४७. यदुपतिः-यदुवंशियोंके स्वामी, ४८. मुरारि:- मुर दैत्यके नाशक, ४९. मधुसूदनः-मधु नामक दैत्यको मारनेवाले। ५०. माधवः यदुवंशान्तर्गत मधुकुलमें प्रकट, ५१. मानहारी-अभिमान और अहंकारका नाश करनेवाले, ५२. श्रीपति: लक्ष्मीके स्वामी, ५३. भूधरः-शेषनागरूपसे पृथ्वीको धारण करनेवाले, ५४. प्रभुः सर्वसमर्थ, ५५. बृहद्वनमहालील:- महावनमें बड़ी-बड़ी लीलाएँ करनेवाले, ५६. नन्दसूनुः- नन्दजीके पुत्र, ५७. महासन:-अनन्त शेषरूपी महान् आसनपर विराजनेवाले। ५८. तृणावर्तप्राणहारी-तृणावर्त दैत्यको मारनेवाले, ५९. यशोदाविस्मयप्रदः-अपनी अद्भुत लीलाओंसे यशोदा मैयाको आश्चर्यमें डाल देनेवाले, ६०. त्रैलोक्यवक्त्र: अपने मुखमें तीनों लोकोंको दिखानेवाले, ६१. पद्माक्षः-विकसित कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले, ६२. पद्महस्त:-हाथमें कमल धारण करनेवाले, ६३. प्रियङ्कर:-सबका प्रिय कार्य करनेवाले। ६४. ब्रह्मण्यः ब्राह्मण-हितकारी, ६५, धर्मगोप्ता- धर्मकी रक्षा करनेवाले, ६६. भूपतिः-पृथ्वीके स्वामी, ६७. श्रीधरः वक्षःस्थलमें लक्ष्मीको धारण करनेवाले, ६८. स्वराट् स्वयंप्रकाश, ६९.अजाध्यक्षा:- ब्रह्माजीक स्वामी, ७०. शिवाध्यक्षः भगवान् शिवके स्वामी, ७१. धर्माध्यक्ष: धर्मके अधिपति, ७२. महेश्वरः- परमेश्वर। ७३. वेदान्तवेद्यः-उपनिषदोंद्वारा जानने योग्य परमात्मा, ७४. ब्राह्मस्थः वेदमें स्थित,७५, प्रजापतिः- सम्पूर्ण जीवोंकि पालक,७७. अमोघदक्- जिनकी दृष्टि कभी चूकती नहीं ऐसे सर्वसाक्षी, ७७.गोपीकरावलम्बी-गोपियोंके हाथको पकड़कर नाचनेवाले, ७८. गोपबालकसुप्रिया- गोपबालकोंक अत्यन्त प्रियतम। ७९. बलानुयायी बलरामजीका अनुकरण करनेवाले, ८०. बलवान्-बली, ८१. श्रीदामप्रियः- श्रीदामाके प्रिय सखा, ८२. आत्मवान्-मनको वशमें करनेवाले, ८३. गोपीगृहाङ्गणरति:-गोपियोंकि घर और आँगनमें खेलनेवाले, ८४. भद्र:= कल्याणस्वरूप, ८५. सुश्लोकमङ्गल:-अपने लोकपावन सुयशसे सबका मङ्गल करनेवाले। ८६. नवनीतहर:-माखनका हरण करनेवाले, ८७. बाल: बाल्यावस्थासे विभूषित, ८८. नवनीत- प्रियाशन: मक्खन जिनका प्यारा भोजन है, ८९. बालवृन्दी-गोप-बालकोंके समुदायको साथ रखनेवाले, ९०. मर्कवृन्दी-वानरोंके झुंडके साथ खेलनेवाले, ९१. चकिताक्ष:-आश्चर्ययुक्त चञ्चल नेत्रोंसे देखनेवाले, ९२. पलायित:-मैयाको साँटीके भयसे भाग जानेवाले। ९३. यशोदातर्जित: यशोदा मैयाको डॉट सहनेवाले, ९४. कम्पी-मैया मारेगी इस भयसे काँपनेवाले, ९५. मायारुदितशोभन: लीलाकृत रुदनसे सुशोभित, ९६. दामोदरः भैयाद्वारा रस्सीसे कमरमें बाँधे जानेवाले, ९७. अप्रमेयात्मा-जिसको कोई माप नहीं ऐसे स्वरूपसे युक्त, ९८. दयालुः- सबपर दया करनेवाले. २९. भक्तवत्सलः-भक्तोंसे प्यार करनेवाले। १००, उलूखले सुबद्धः ऊखलमें अच्छी तरह बंधे हुए, १०१. नाशिरा-शुके मस्तकवाले. १०२, गोपीकर्थितः-गोपियोंद्वारा यशोदा मैयाके पास जिनके बालचापल्यकी शिकायत की गयी है वे, १०३. वृक्षभङ्गी-यमलार्जुन नामक वृक्षोंको भङ्ग करनेवाले, १०४, शोकभङ्गी-स्वयं सुरक्षित रहकर स्वजनोंका शोक भङ्ग करनेवाले, १०५. धनदात्मजमोक्षण: कुबेरपुत्रोंका उद्धार करनेवाले। १०६. देवर्षिवचनश्लाघी-देवर्षि नारदके वचनका आदर करनेवाले, १०७, भक्तवात्सल्यसागरः- भक्तवत्सलताके समुद्र. १०८. व्रजकोलाहलकर:- अपनी बालोचित 'क्रीड़ाओंसे व्रजमें कोलाहल मचा देनेवाले, १०९. व्रजानन्दविवर्धन:- व्रजवासियोंके आनन्दकी वृद्धि करनेवाले। ११०. गोपात्मा-गोपस्वरूप, १११. प्रेरक:= इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिको प्रेरणा देनेवाले, ११२. साक्षी-अनन्त विश्वके सम्पूर्ण पदार्थों और भावोंके द्रष्टा, ११३. वृन्दावननिवासकृत्-वृन्दावनमें निवास करनेवाले, ११४. वत्सपाल:=बछड़ोंको पालनेवाले, ११५. वत्सपति:-बछड़ोंके स्वामी एवं रक्षक, ११६. गोपदारकमण्डन:-गोपबालकोंकी मण्डलीको सुशोभित करनेवाले। ११७. बालक्रीड;-बालोचित खेल खेलने- वाले, ११८. बालरतिः-गोपबालकोंसे प्रेम करनेवाले, ११९. बालक:-बालरूपधारी गोपाल, १२०, कनकाङ्गदी सोनेका बाजूबंद पहननेवाले, १२१. पीताम्बर:-पीताम्बर पहननेवाले, १२२. हेममाली-सुवर्णमालाधारी, १२३. मणिमुक्ताविभूषण:-मणियों और मोतियोंके आभूषण धारण करनेवाले। १२४. किङ्किणीकटकी-कटिमें क्षुद्र घण्टिका और हाथोंमें कड़े पहननेवाले, १२५, सूत्री- बाल्यावस्थामें सूतकी करधनी और बड़े होनेपर यज्ञोपवीत धारण करनेवाले १२६. नूपुरी- पैरोंमें नूपुर पहननेवाले, १२७. मुद्रिकान्वितः हाथकी अंगुलियों में अंगूठी धारण करनेवाले, ९२८. वत्सासुरप्रतिध्वंसी वत्सासुरका विनाश करनेवाले, १२९. बकासुरविनाशन:- बकासुरका विनाश करनेवाले। १२०. अघासुरविनाशी-अघासुर नामक सर्परूपधारी दैत्यका विनाश करनेवाले, १३१. विनिद्रीकृतबालक: सर्पके विषसे मूच्छित गोपमालकोंको अपनी अमृतमयी दृष्टिसे जीवित करके जगानेवाले, १३२. आद्य:-सबके आदिकारण; आत्मप्रदः-प्रेमी भक्तोंके लिये अपने आत्मातकको दे डालनेवाले, १३४. सनी-गोप- बालोंक सङ्ग रहनेवाले, १३५. यमुनातीरभोजन:- यमुनाजीके तटपर ग्वालबालोंके साथ भोजन करनेवाले। १३६.गोपालमण्डलीमध्यः-ग्वालबालोंकी मण्डलीके बीचमें बैठनेवाले, १३७. सर्वगोपाल- भूषणः सम्पूर्ण ग्वालबालोंको विभूषित करनेवाले, १३८. कृतहस्ततलग्रासः-हथेलीमें अन्नका ग्रास लेनेवाले, १३९. व्यञ्जनाश्रितशाखिकः-वृक्षोंपर भोजन-सामग्री एवं व्यञ्जन रखनेवाले। १४०. कृतबाहुशृङ्गयष्टिः-हाथों में सींग और छड़ी धारण करनेवाले, १४१. गुञ्जालंकृतकण्ठकः- गुञ्जाको मालासे अपने कण्ठको विभूषित करनेवाले, १४२, मयूरपिच्छमुकुट:=मोरपंखका मुकुट धारण करनेवाले, १४३, वनमालाविभूषितः-वनमालासे अलंकृत। १४४, गैरिकाचित्रितवपुः-गेरूसे अपने शरीरमें चित्रोंकी रचना करनेवाले, १४५, नवमेघवपुः-नवीन मेघ-घटाके समान श्याम शरीरवाले, स्मर:- कामदेवस्वरूप, १४७ कोटिकन्दर्पलावण्य:- करोड़ों कामदेवोंके समान सौन्दर्यशाली, १४८. लसन्मकरकुण्डलः सुन्दर मकराकृति कुण्डल धारण करनेवाले। १४९. आजानुबाहुः-घुटनेतक लंबी भुजाचाले. १५०. भगवान् ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री. ज्ञान और वैराग्य-इन छहों ऐश्चयोंसे पूर्णतया युक्त, १५१. निद्रारहितलोचन: निद्राशून्य नेत्रोंवाले, १५२. कोटिसागरगाम्भीर्य:-करोड़ों समुद्रोंके समान गम्भीर, १५३. कालकाल: कालके भी महाकाल, १५४. सदाशिव:-नित्य कल्याणस्वरूप। १५५. विरचिमोहनवपुः-अपने अद्भुतरूपसे ब्रह्माजीको भी मोहमें डालनेवाले, १५६. गोप- वत्सवपुर्धरः ग्वालबालों और बछड़ोंका रूप धारण करनेवाले, १५७. ब्रह्माण्डकोटिजनक: करोड़ों ब्रह्माण्डोंके उत्पादक, १५८. ब्रह्ममोहविनाशक:= ब्रह्माजीके मोहका नाश करनेवाले। १५९. ब्रह्मा-स्वयं ही ब्रह्माजीके रूपमें प्रकट, १६०. ब्रीडित:ब्रह्माजीके द्वारा स्तुत, १६१. स्वामी-सबके अधिपति, १६२. शक्रददिनाशन:-इन्द्रके घमंड आदिको नष्ट करनेवाले, १६३. गिरिपूजोपदेष्टा-गोवर्धन पर्वतकी पूजाका उपदेश १६४. धृतगोवर्धनाचल: गोवर्धन पर्वतको धारण करनेवाले। १६५. पुरन्दरेडितः-इन्द्रके द्वारा स्तुत, १६६. पूज्य- सबके लिये पूजनीय, १६७. कामधेनुप्रपूजितः-कामधेनुद्वारा पूजित, १६८. सर्वतीर्थाभिषिक्त:-सुरभिद्वारा सम्पूर्ण तीर्थोके जलसे इन्द्रपदपर अभिषिक्त, गोविन्दः गौओंके इन्द्र होनेपर गोविन्द नामसे प्रसिद्ध, १७०. गोपरक्षक:= गोपोंकी रक्षा करनेवाले। १७१. कालियार्तिकर:-कालिय नागका दमन करनेवाले, १७२. क्रूरः दुष्टोंको दण्ड देनेके लिये कठोर, १७३. नागपत्रीरित:-नागपनियोंद्वारा स्तुत, १७४. विराट्-विराट् पुरुष, १७५. धेनुकारि:- धेनुकासुरके शत्रु, १७६. प्रलम्बारि:-बलभद्ररूपसे प्रलम्ब असुरका नाश करनेवाले, १७७. वृषासुरविमर्दनः वृषभरूपधारी अरिष्टासुरका मर्दन करनेवाले। १७८. मयासुरात्पजध्वंसी-मयासुरके पुत्र व्योमासुरका नाश करनेवाले, केशिकण्ठविदारक: केशीका कण्ठ विदीर्ण करनेवाले, १८०. गोपगोसा-उवालोंके रक्षक, १८१. दावाग्रिपरिशोषक: दावानलका शोषण करनेवाले। १८२. गोपकन्यावस्त्रहारी-गोपकुमारियोंके चीर हरण करनेवाले, १८३, गोपकन्यावरप्रदः- गोपकन्याओंको वर देनेवाले, १८४, यज्ञपल्यत्रभोजी- यज्ञपजियोंके अन्न भोजन करनेवाले, १८५. मुनिमानापहारक:- अपनेको मुनि माननेवाले ब्राह्मणोंके अभिमानको दूर करनेवाले। १८६. जलेशमानमथन:-जलके स्वामी वरुणका मान मर्दन करनेवाले, १८७, नन्दगोपालजीवनः अजगरसे छुड़ाकर नन्दगोपको जीवन देनेवाले, १८८. गन्धर्वशापमोक्ता-अजगररूपमें आये हुए गन्धर्व (विद्याधर)-को शापसे छुड़ानेवाले, १८९. शङ्खचूडशिरोहर:-शङ्खचूड नामक गुह्यकका मस्तक काट लेनेवाले। १९०. वंशीवटी वंशीवटके समीप लीला करनेवाले, १९१. वेणुवादी-वंशी बजानेवाले, १९२. गोपीचिन्तापहारकः-गोपियोंकी चिन्ताको दूर करनेवाले, १९३. सर्वगोप्ता-सबके रक्षक, १९४, समाह्वानः-सबके द्वारा पुकारे जानेवाले, १९५. सर्वगोपीमनोरथः सम्पूर्ण गोपाङ्गनाओंके अभीष्ट। १९६, व्यङ्ग्यधर्मप्रवक्ता व्यङ्ग्योक्तिद्वारा धर्मका उपदेश देनेवाले, १९७. गोपीमण्डलमोहन:- गोपसुन्दरियोंके समुदायको भोहित करनेवाले १९८. रासक्रीडारसास्वादी-रासक्रीडाके रसका आस्वादन करनेवाले, १९९. रसिक-रसका अनुभव करनेवाले, २००, राधिकाधवः-श्रीराधाके प्राणनाथ। २०१, किशोरीपाणनाथा-श्रीकिशोरीजीके प्राणवल्लभ, २०२, वृषभानुसत्ताप्रिय-वृषभानु नन्दिनीके प्यारे १०३. सर्वगोपीजनानन्दी-सम्पर्ण गोपीजनोंको आनन्द देनेवाले, २०४. गोपीजन- विमोहन:-गोपाङ्गनाओंके मनको मोह लेनेवाले। २०५. गोपिकागीतचरित: गोपाङ्गनाओं द्वारा गाये हुए पावन चरित्रवाले, २०६. गोपीनर्तनलालस:- गोपियोंके रासनृत्यकी अभिलाषा रखनेवाले, २०७. गोपीस्कन्धाश्रितकर:-गोपीके कंधेपर हाथ रखकर चलनेवाले, २०८. गोपिकाचुम्बनप्रियः- यशोदा आदि मातृस्थानीया वात्सल्यवती गोपियोंके द्वारा किया जानेवाला मुखचुम्बन जिन्हें प्रिय है वे श्यामसुन्दर। २०९. गोपिकामार्जितमुख: गोपाङ्गनाएँ अपने अञ्चलसे जिनका मुख पोंछती हैं वे, २१०. गोपीव्यजनवीजित:-गोपियाँ जिन्हें पंखा डुलाकर आराम पहुँचाती हैं वे, २११. गोपिकाकेशसंस्कारी-गोपिकाके केशोंको सँवारनेवाले, २१२. गोपिकापुष्पसंस्तर:-गोपिकाका फूलोंसे शृङ्गार करनेवाले। २१३. गोपिकाहृदयालम्बी-गोपीके हृदयका आश्रय लेनेवाले, २१४. गोपीवहनतत्पर:= गोपी (श्रीराधा)-को कंधेपर बिठाकर ढोनेके लिये प्रस्तुत, २१५. गोपिकामदहारी- गोपाङ्गनाओंके अभिमानको चूर्ण करनेवाले, २१६. गोपिकापरमार्जितः-गोपाङ्गनाओंको परम फलके रूपमें प्राप्त। २१७. गोपिकाकृतसल्लील: रासलीलामें अन्तर्धान हो जानेपर गोपिकाओंने जिनकी पवित्र लीलाओंका अनुकरण किया था वे श्रीकृष्ण, २१८. गोपिकासंस्मृतप्रियः- गोपिकाओद्वारा निरन्तर चिन्तन किये जानेवाले प्रियतम, २१९, गोपिकावन्दितपदः-गोपाङ्गनाओंद्वारा वन्दित चरणोंवाले, २२०. गोपिकावशवर्तन:- गोपसुन्दरियोंके वशमें रहनेवाले। २२१, राधापराजित-श्रीराधारानीसे हार मान लेनेवाले, २२२ श्रीमान्- शोभाशाली,२२३- निकुझेसविहारवान्-वृन्दावनके कुञ्जमें सुन्दर लीला करनेवाले, २२४. कुखप्रियः- निकुञ्जके प्रेमी, २२५. कुछवासी-कुडामें निवास करनेवाले, २२६. वृन्दावनविकाशन:-वृन्दावनको प्रकाशित करनेवाले। २२७. यमुनाजलसिक्ताङ्गः- यमुनाजीके जलसे अभिषिक्त अङ्गोंवाले, २२८. यमुनासौख्यदायक:- यमुनाजीको सुख देनेवाले, २२९. शशिसस्तधन; रासलीलाकी रात्रिमें चन्द्रमाकी गतिको रोक देनेवाले, २३०. शूरः- अखण्ड शौर्यसम्पन्न, २३१. कामी-प्रेमी भक्तोंसे मिलनेकी कामनावाले, २३२. कामविमोहन:-अपनी दिव्य लीलाओंसे कामदेवको विमोहित कर देनेवाले। २३३. कामाद्यः कामदेवके आदिकारण, २३४. कामनाथ: कामके स्वामी, काममानसभेदनः कामदेवके भी हृदयका भेदन करनेवाले, २३६, कामदः-इच्छानुरूप भोग देनेवाले, २३७. कामरूपः= भक्तजनोंकी कामनाके अनुरूप रूप धारण करनेवाले, २३८. कामिनीकामसंचय:- गोपकामिनियोंके प्रेमका संग्रह करनेवाले। २३९. नित्यक्रीड:-नित्य खेल करनेवाले, २४०, महालील:=महती लीला करनेवाले, २४१. सर्वः सर्वस्वरूप, २४२. सर्वगतः सर्वत्र व्यापक, २४३. परमात्मा-परब्रह्मस्वरूप, २४४. पराधीश:-परमेश्वर २१४५, सर्वकारणकारण: समस्त कारणोंके भी कारण। २४६. गृहीतनारदवचा:-नारदजोके वचन माननेवाले, २४७. अक्रूरपरिचिन्तितः-वजमें जाते हुए अक्रूरजीके द्वारा मार्ग में जिनका विशेषरूपसे चिन्तन किया गया, वे श्रीकृष्ण, २४८, अकूरवन्दितपदा अरजीके द्वारा वन्दित चरणोंवाले, २४९, गोपिकातोषकारक भावी विरहसे व्याकुल हुई गोपागनाओको सान्त्वना २५०. अक्रूरवाक्यसंग्राही-अक्रूरजीके वचनोंको स्वीकार करनेवाले, २५१. मधुरावासकारण:-मथुरा, निवास करनेवाले, २५२. अक्रूरतापशमन:- अक्रूरजीका दुःख दूर करनेवाले, २५३. रजकायु:- प्रणाशन:-कसके धोबीकी आयुको नष्ट करनेवाले। २५४. मधुरानन्ददायीः-मथुरावासियोंको आनन्द देनेवाले, २५५. कंसवस्वविलुण्ठन:- कंसके कपड़ोंको लूट लेनेवाले, २५६. कंसवस्वपरीधान:-कसके वस्त्र पहननेवाले, २५७. गोपवस्त्रप्रदायकः- ग्वालबालोंको वस्त्र देनेवाले। २५८. सुदामगृहगामी-सुदामा मालीके घर जानेवाले, २५९. सुदामपरिपूजितः-सुदामा मालीके द्वारा पूजित, २६०. तन्तुवायकसम्प्रीतः-दर्जीके ऊपर प्रसन्न, २६१. कुब्जाचन्दनलेपन:-कुब्जाके घिसे हुए चन्दनको अपने श्रीअङ्गोंमें लगानेवाले। २६२. कुठजारूपप्रदः- कुजाको सुन्दर रूप देनेवाले, २६३. विज्ञः विशिष्ट ज्ञानवान्, २६४. मुकुन्दः= मोक्ष देनेवाले, २६५. विष्टरश्रवाः= विस्तृत सुयश एवं कानोंवाले, २६६. सर्वज्ञः-सब कुछ जाननेवाले, २६७. मथुरालोकी-मथुरानगरीका दर्शन करनेवाले, २६८. सर्वलोकाभिनन्दन: सब लोगोंसे अभिनन्दन (सम्मान) पानेवाले। २६९, कृपाकटाक्षदर्शी-कृपापूर्ण कटाक्षसे सबकी ओर देखनेवाले, २७०. दैत्यारिः- दैत्योंके शत्रु, २७१. देवपालक:-देवताओंके रक्षक, २७२, सर्वदुःखप्रशमनः- सबके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश करनेवाले, २७३. धनुर्भङ्गी- धनुष तोड़नेवाले, २७४, महोत्सव:- महान् उत्सवरूप। २७५, कुवलयापीहहन्ता- कुवलयापीड नामक हाथीका वध करनेवाले, २७६, दन्तस्कन्धा हाथी के तोड़े हुए दाँतोंको कंधेपर धारण करनेवाले, २७७, बलाग्रणीः बलरामजीको आगे करके चलनेवाले, २७८.कल्परूपधरः-विभिन लोगों के लिये उनकी भावनाके अनुसार रूप धारण करनेवाले, २७९. श्रीर:-अविचल धैर्यसे सम्पन्न, २८०. विव्यवस्वानुलेपन:-दिव्य वस्त्र तथा दिव्य अङ्गराग धारण करनेवाले। २८१. मानरूप:-कसके अखाड़ेमें पहलवानके रूपमें उपस्थित, २८२. महाकाल:-महान् कालरूप, २८३. कामरूपीः-इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, २८४, बलान्वितः अनन्त बलसम्पन्न, २८५. कसत्रासकर:-कसको भयभीत कर देनेवाले, २८६. भीमः-कंसके लिये भयंकर, २८७, मुष्टिकान्तः बलभद्ररूपसे मुष्टिकके जीवनका अन्त कर देनेवाले, २८८. कंसहा-कंसका वध करनेवाले। २८९. चाणूरघ्रः चाणूरका नाश करनेवाले, २९०. भयहर:= भय हर लेनेवाले, २९१. शलारि:- शलके शत्रु, २९२. तोशलान्तकः-तोशलका अन्त करनेवाले, २९३. वैकुण्ठवासीः-विष्णुरूपसे वैकुण्ठधाममें निवास करनेवाले, २९४. कंसारि:- कंसके शत्रु, २९५. सर्वदुष्टनिषूदन:- सब दुष्टोंका संहार करनेवाले। २९६. देवदुन्दुभिनिर्घोषी-देव-दुन्दुभिघोषके कारण, २९७. पितृशोकनिवारण:-पिता-माता (वसुदेव-देवकी)-का शोक दूर करनेवाले, २९८. यादवेन्द्रः यदुकुलके स्वामी, २९९, सता नाथ:-सत्पुरुषोंके रक्षक, ३००. यावारिप्रमर्दनः यादवोंके शत्रुओंका मर्दन करनेवाले। ३०१.शौरिशोकविनाशी-वसुदेवजीके शोकका नाश करनेवाले, ३०२. देवकीतापनाशन:- देवकीका संताप करनेवाले, ३०३. उग्रसेनपरित्राताः-उग्रसेनके रक्षक, २०४. उग्रसेनाभिपूजितः-उग्रसेनद्वारा पूजित। ३०५, वासेनाभिषेकीः-उग्रसेनका राज्याभिषेक करनेवाले, ३०६, उनसेनदयापर:-उपसेनके प्रति दयाभाव बनाये रखनेवाले, ३०७. सर्वसात्वतसाक्षी- सम्पूर्ण यदुवंशियोंकी देख-भाल करनेवाले, ३०८. यदूनामभिनन्दनः यदुवंशियोंको आनन्दित करनेवाले। ३०९. सर्वमाथुरसंसेव्यः सम्पूर्ण मथुणवासियोद्वारा सेवन करने योग्य, ३१०. करुण:-दयाल, ३११. भक्तबान्धवः= भक्तोंके ३१२. सर्वगोपालधनदः- सम्पूर्ण ग्वालोंको धन देनेवाले, ३१३, गोपीगोपाललालस:- गोपियों और ग्वालोंसे मिलनेके लिये उत्सुक रहनेवाले। ३१४. शौरिदत्तोपवीतीः-वसुदेवजीके द्वारा उपनयन-संस्कारमें दिये हुए यज्ञोपवीतको धारण करनेवाले, ३१५. उग्रसेनदयाकर:-उग्रसेनपर दया करनेवाले, ३१६. गुरुभक्ता:- गुरु सान्दीपनिके प्रति भक्तिभावसे युक्त, ३१७. ब्रह्मचारीः-गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले, ३१८. निगमाध्ययने रत:- वेदाध्ययनपरायण। संकर्षणसहाध्यायी-बलरामजीके सहपाठी, ३२०. सुदामसुहृत्-सुदामा ब्राह्मणके ३२१. विद्यानिधिः-विद्याके भण्डार, ३२२. कलाकोषः = सम्पूर्ण कलाओंके कोषागार, ३२३. मृतपुत्रप्रदः= मरे हुए गुरुपुत्रोंको यमलोकसे जीवित लाकर गुरुको सेवामें अर्पित करनेवाले। ३२४. चक्रीः-सुदर्शन चक्रधारी, ३२५. पाजनीः-पाशजन्य धारण करनेवाले, ३२६. सर्वनारकिमोचन:- सम्पूर्ण नरकवासियोंका उद्धार करनेवाले, ३२७. यमार्चित:- यमराजद्वारा पूजित, ३२८, पर:- सर्वोत्कृष्ट ३२९. देव:-द्युतिमान, ३३०, नामोच्चारवशाः- अपने नामके उच्चारणमात्रसे वशमें हो जानेवाले, २२१. अच्युताः-अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले। ३३२. कुब्जाविलासी- कुब्जाके कुबड़ेपनको मिटानेकी लीला करनेवाले, २०३, सुभगः- पूर्ण सौभाग्यशाली, २३४, दीनबन्धु-दीन-दुखियों और असहायोंक बन्धु, ३३५. अनूपम:-जिनके समान दूसरा कोई नहीं, ३७. अकूरगृहगोमा:- अक्रूरके गृहकी रक्षा करनेवाले, ३७. प्रतिज्ञापालका प्रतिज्ञाका पालन करनेवाले, ३३८. शुभ:-शुभस्वरूप। ३३९. जरासन्धजयी-सत्रह बार जरासन्धको जीतनेवाले, ३४०. विद्वान-सर्वज्ञ, ३४१. यवनान्त:- कालयवनका अन्त करनेवाले, ३४२. द्विजाश्रयः- द्विजोंक आश्रय, ३४३. मुचुकुन्दप्रियका:-मुचुकुन्दका प्रिय करनेवाले, ३४४. जरासन्धपलायित: अठारहवीं बारके युद्ध में जरासन्धके सामनेसे युद्ध छोड़कर भाग जानेवाले। ३४५, द्वारकाजनक: द्वारकापुरीको प्रकट करनेवाले, ३४६. गूढः मानवरूपमें छिपे हुए परमात्मा, ३४७, ब्रह्मण्य:-ब्राह्मणभक्त, ३४८. सत्यसंगर:-सत्यप्रतिज्ञ, ३४९. लीलाधरः- लीलाधारी, ३५०. प्रियकर:- सबका प्रिय करनेवाले, ३५१. विश्वकर्मा-बहुत प्रकारके कर्म करनेवाले, ३५२. यशप्रदः दूसरोंको यश देनेवाले। ३५३. रुक्मिणीप्रियसंदेश:-रुक्मिणीको प्रिय संदेश देनेवाले, ३५४. रुक्मिशोकविवर्धन:-रुक्मीका शोक बढ़ानेवाले, ३५५. चैद्यशोकालय:-शिशुपालके लिये शोकके भण्डार, ३५६. श्रेष्ठः उत्तम गुणसम्पत्र ३५७, दुष्टराजन्यनाशन:-दुष्ट राजाओंका नाश करनेवाले। ३५८. रुक्मिवैरूप्यकरण:-रुक्मोके आधे बाल मुड़ाकर उसे कुरूप बना देनेवाले. ३५९, रुक्मिणीवचने रत:-रुक्मिणोके वचनका पालन करने में तत्पर, २६०, बलभद्रवचोग्राही- बलभद्रजीकी आज्ञा माननेवाले, ३६१. मुक्तरुक्मी- रुक्मीको जीवित छोड़ देनेवाले, ३६२, जनार्दनः- भक्तोंद्वारा याचित। रुक्मिणीप्राणनाथः-रुक्मिणोके प्राणवासभा ३५४ सत्यभामापतिः-सत्यभामाके स्वामी, ३६५. स्वयं भक्तपक्षी-स्वयं ही भक्तोंका पक्ष लेनेवाले, ३६६. भक्तिवश्य:-भक्तिसे वशमें हो जानेवाले, ३६७ अक्रूरमणिदायक:-अक्रूरजीको स्यमन्तकमणि देनेवाले। ३६८. शतधन्वप्राणहारी-शतधन्वाके प्राण लेनेवाले, ३६९. ऋक्षराजसुताप्रियः-रीछोंके राजा जाम्बवान्की पुत्रीके प्रियतम पति, ३७०. सत्राजित्तनयाकान्तः सत्राजित्की सुपुत्री सत्यभामाके प्राणवल्लभ, ३७१. मित्रविन्दापहारक: मित्रविन्दाका अपहरण करनेवाले। ३७२. सत्यापतिः नग्नजित्की पुत्री सत्याके स्वामी, ३७३. लक्ष्मणाजित्-स्वयंवरमें लक्ष्मणाको जीतनेवाले. ३७४. पूज्य:-पूजाके योग्य, ३७५. भद्राप्रियङ्करः भद्राका प्रिय करनेवाले, ३७६. नरकासुरघाती-नरकासुरका वध करनेवाले, ३७७. लीलाकन्याहरः लीलापूर्वक षोडश सहस्त्र कन्याओंको नरकासुरको कैदसे छुड़ाकर अपने साथ ले जानेवाले, ३७८. जयी-विजयशील। ३७९. मुरारि:-मुर दैत्यका नाश करनेवाले, ३८०. मदनेशः कामदेवपर भी शासन करनेवाले, ३८१. धरित्रीदुःखनाशनः-धरतीका दुःख दूर करनेवाले, ३८२. वैनतेयी-गरुड़के स्वामी, ३८३. स्वर्गगामी पारिजातके लिये स्वर्गलोककी यात्रा करनेवाले, ३८४. अदित्याः कुण्डलप्रदः- अदितिको कुण्डल देनेवाले। ३८५, इन्द्रार्चित: इन्द्रके द्वारा पूजित, ३८६. रमाकान्तः-लक्ष्मीके प्रियतम, ३८७, वज्रिभार्याप्रपूजितः इन्द्रपत्री शचीके द्वारा पूजित, ३८८. पारिजातापहारी-पारिजात वृक्षका अपहरण करनेवाले, ३८५, शक्रमानापहारका इन्द्रका अभिमान चूर्ण करनेवाले। प्रद्युम्नजनकः प्रधुम्नके पिता, ३९१. साम्बतात:-साम्बके पिता, ३९२, बहुसुतः- अधिक पुत्रोंवाले, ३९३, विधुः विष्णुस्वरूप, ३९०. प्रद्युमजनकः-प्रद्युम्रके पिता, साम्बतातः- साम्बके पिता बहुसुतः-अधिक पुत्रोंवाले विभुः-विष्णुस्वरुप, १९४. गर्गाचार्य:-गर्गमुनिको आचार्य बनानेवाले, ३१५. सत्यगति:-सत्यसे ही प्राप्त होनेवाले, २९६. धर्माधारः-धर्मके आश्रय, ३९७. धराबर:- पृथ्वीको धारण करनेवाले। ३९८. द्वारकामण्डन: द्वारकाको सुशोभित करनेवाले, ३९९. श्लोक्य: यशोगानके योग्य, ४००. सुश्लोकः-उत्तम यशवाले, ४०१. निगमालयः- वेदोंके आश्रय, ४०२. पौण्डूकप्राणहारी- मिथ्या वासुदेवनामधारी पौण्ड्रकके प्राण लेनेवाले, ४०३. काशिराजशिरोहर:= काशिराजका सिर काटनेवाले। ४०४. अवैष्णवविप्रदाही-अवैष्णव ब्राह्मणों को, जो यदुवंशियोंके प्रति मारणका प्रयोग कर रहे थे, दग्ध करनेवाले, ४०५. सुदक्षिणभयावहः- काशिराजके पुत्र सुदक्षिणको भय देनेवाले, ४०६. जरासन्धविदारी-भीमसेनके द्वारा जरासन्धको चीर डालनेवाले, ४०७. धर्मनन्दनयज्ञकृत्-धर्मपुत्र युधिष्ठिरका यज्ञ पूर्ण करनेवाले। ४०८. शिशुपालशिरश्छेदी-शिशुपालका सिर काटनेवाले, ४०९. दन्तवक्त्रविनाशन:-दन्तवकका नाश करनेवाले, ४१०. विदूरथान्तकः-विदूरथके काल, ४११. श्रीश:-लक्ष्मीके ४१२. श्रीदः सम्पत्ति देनेवाले, ४१३. द्विविदनाशन:- बलभद्ररूपसे द्विविद वानरका नाश करनेवाले। ४१४. रूक्मिणीमानहारी-रुक्मिणीका अभिमान दूर करनेवाले, ४१५. रुक्मिणीमानवर्धनः- रुक्मिणीका सम्मान बढ़ानेवाले, ४१६. देवर्षिशापहर्ता- देवर्षि नारदका शाप दूर करनेवाले, ४१७. द्रौपदीवाक्यपालकः द्रौपदीके वचनोंका पालन करनेवाले। ४१८, दुर्वासोभयहारी दुर्वासाका भय दूर करनेवाले, ४१९. पाशालीस्मरणागत: द्रौपदोके स्मरण करते ही आ पहुँचनेवाले, ४२०. पार्धदूत - कुन्तीपुत्रोंके दूत, ४२१, पार्थमन्त्री कुन्तीपुत्रोके स्वामी, मन्त्री (सलाहकार), ४२२. पार्थदुःखौघनाशन:- कुन्तीपुत्रोंके दुःखसमुदायका नाश करनेवाले। ४२३. पार्धमानापहारी-कुन्तीपुत्रोंका अभिमान दूर करनेवाले, ४२४. पार्थजीवनदायकः- कुन्तीपुत्रोंको जीवन देनेवाले, ४२५, पाञ्चालीवस्त्रदाता- कौरवोंकी सभामें द्रौपदीको वस्त्रराशि अर्पण करनेवाले, ४२६. विश्वपालकपालकः विश्वकी रक्षा करनेवाले देवताओंके भी रक्षक। ४२७. श्वेताश्वसारथिः श्वेत घोड़ोंवाले अर्जुनके सारथि, ४२८. सत्यः सत्यस्वरूप, ४२९. सत्यसाध्यः सत्यसे ही प्राप्त होने योग्य, ४३०. भयापहः-भक्तोंके भयका नाश करनेवाले, ४३१. सत्यसन्धः सत्यप्रतिज्ञ, ४३२. सत्यरति:- सत्यमें रत, ४३३.सत्यप्रियः-सत्य जिनको प्यारा है, ४३४. उदारधी:-उदार बुद्धिवाले। ४३५. महासेनजयी-शोणितपुरमें बाणासुरके पक्षमें युद्धके लिये आये हुए स्वामिकार्तिकेयको भी परास्त करनेवाले, ४३६. शिवसैन्यविनाशन:- भगवान् शिवकी सेनाको मार भगानेवाले, ४३७. बाणासुरभुजच्छेत्ता-बाणासुरकी भुजाओंको काटनेवाले, ४३८, बाणबाहुवरप्रदः बाणासुरको चार भुजाओंसे युक्त रहनेका वर देनेवाले। ४३९. तार्क्ष्यमानापहारी-गरुड़का अभिमान चूर्ण करनेवाले, ४४०. ता_तेजोविवर्धनः गरुड़के तेजको बढ़ानेवाले, ४४१. रामस्वरूपधारी-श्रीरामका स्वरूप धारण करनेवाले, ४४२. सत्यभामामुदावहः- सत्यभामाको आनन्द देनेवाले। ४४३. रत्नाकरजलक्रीड:-समुद्रके जलमें क्रीडा करनेवाले, ४४४. व्रजलीलाप्रदर्शक अधिकारी भक्तोंको व्रजलीलाका दर्शन करानेवाले, ४४५. स्वप्रतिज्ञापरिध्वंसी-भीष्मजीकी प्रतिज्ञा रखनेके लिये अपनी प्रतिज्ञा तोड़ देनेवाले, ४४६, भीष्माज्ञापरिपालका-भीष्मकी आज्ञाका पालन करनेवाले। ४७, बीरायुधहर: वीरोंके अस्त्र-शस्त्र हर लेनेवाले, ४४८. काल: कालस्वरूप, ४४९. कालि- केश: कालिकाके स्वामी, ४५०. महावल:- महाशक्तिसम्पन्न, ४५१. बर्बरीकशिरोहारी- बर्बरीकका सिर काटनेवाले. ४५२. बबरीकशिरप्रद बर्वरीकका सिर देनेवाले। ४५३, धर्मपुत्रजयी-धर्मपुत्र युधिष्ठिरको जय दिलानेवाले, ४५४.शूरदुर्योधनमदान्तक:- शूरवीर दुर्योधनके मदका नाश करनेवाले, ४५५.गोपिकाप्रीतिनिबन्धनित्यक्रीड-गोपाङ्गनाकि प्रेमपूर्ण आग्रहसे वृन्दावनमें नित्य लीला करनेवाले, ४५६. व्रजेश्वर:-व्रजके स्वामी। ४५७.. राधाकुण्डरति:- राधाकुण्डमें खेल करनेवाले, ४५८. धन्यः=धन्यवादके योग्य, ४५९. सदान्दोलसमाश्रितः सदा झूलेपर झूलनेवाले, ४६०, सदामधुवनानन्दी-सदा मधुवनमें आनन्द : लेनेवाले, ४६१. सदावृन्दावनप्रियः- वृन्दावनके शाश्वत प्रेमी। ४६२. अशोकवनसत्रद्धः अशोकवनमें लीलाके लिये सदा प्रस्तुत, ४६३. सदातिलकसङ्गतः सदैव तिलक लगानेवाले, ४६४. सदागोवर्धनरति:- गिरिराज गोवर्धनपर सदा क्रीडा करनेवाले, ४६५. सदागोकुलवल्लभः सदैव गोकुल ग्राम एवं गो-समुदायके प्रिय। भाण्डीरवटसंवासी-भाण्डीर वटके नीचे निवास करनेवाले, ४६७. नित्यं वंशीवटस्थितः= वंशीवटपर सदा स्थित रहनेवाले, कि नन्दग्रामकतावासः नन्दगाँवमें निवास गों करनेवाले, ४६९. वृषभानुगृहप्रियः-वृषभानुजोके के गृहको प्रिय माननेवाले। ४७०.गृहीतकामिनीरूपः-मोहिनीका धारण करनेवाले, ४७१. नित्यं रामविलासकृत्-नित्य या रासलीला करनेवाले, ४७२. वल्लवीजनसंगोप्ता- यह गोपाजनाओंके रक्षक, ४७३. वल्लवीजनवल्लभः- ४६६. ४६८. ४७४. देवशर्मकृपाकर्ता-देवशर्मापर कृपा करनेवाले, ४७५. कल्पपादपसंस्थित:-कल्पवृक्षके नीचे रहनेवाले, ४७६. शिलानुगन्धनिलयः- शिलामय सुगन्धित भवनमें निवास करनेवाले, ४७७. पादचारी-पैदल चलनेवाले, ४७८. घनच्छवि:-मेघके समान श्यामकान्तिवाले। ४७९. अतसीकुसुमप्रख्यः-तीसीके फूलके- से वर्णवाले, ४८०. सदा लक्ष्मीकृपाकर:- लक्ष्मीजीपर सदा कृपा करनेवाले, ४८१. त्रिपुरारिप्रियकर:- महादेवजीका प्रिय करनेवाले, ४८२. उग्रधन्वा भयङ्कर धनुषवाले, ४८३. अपराजित:-किसीसे भी परास्त न होनेवाले। ४८४षड्धुरध्वंसकर्ता-षड्धुरका नाश करनेवाले, ४८५. निकुम्भप्राणहारक:- निकुम्भके प्राणोंको हरनेवाले, ४८६. वज्रनाभपुरध्वंसी- वज्रनाभपुरका ध्वंस करनेवाले, ४८७, पौण्ड्कप्राणहारक:- पौण्ड्कके प्राणोंका अन्त करनेवाले। ४८८. बहुलाश्वप्रीतिकर्ता-मिथिलाके राजा बहुलाश्वपर प्रेम करनेवाले, ४८९.द्विजवर्यप्रियङ्करः- श्रेष्ठ ब्राह्मण भक्तशिरोमणि श्रुतदेवका प्रिय करनेवाले, ४९०. शिवसंकटहारी- भगवान् शिवका संकट टालनेवाले, ४९१. वृकासुरविनाशन:- वृकासुरका नाश करनेवाले। ४९२. भृगुसत्कारकारी-भृगुजीका सत्कार करनेवाले, ४९३. शिवसात्त्विकताप्रदः- भगवान् शिवको सात्त्विकता देनेवाले, ४९४.गोकर्णपूजक:- गोकर्णकी पूजा करनेवाले, ४९५, साम्बकुष्ठविध्वंस- कारण:-साम्बकी कोढ़का नाश करनेवाले। ४९६.वेदस्तुत:-वेदोंके स्तुत, ४९७. वेदवेत्ता:- वेदज्ञ, ४९८, यदुवंशाववर्धनः- यदुकुलको बढ़ानेवाले, ४९९. यदुवंशविनाशी- यदुकुलका संहार करनेवाले, ५००. उद्धवोद्धारकारक:- उद्धवका उद्धार करनेवाले। ५०१, राधा-श्रीकृष्णकी आराध्या देवी, उन्हींकी आहादिनी शक्ति, ५०२. राधिका- श्रीकृष्णकी आराधना करनेवाली वृषभानुपुत्री, ५०३. आनन्दा-आनन्दस्वरूपा, ५०४, वृषभानुजा- वृषभानुगोपकी कन्या, ५०५. वृन्दावनेश्वरी- वृन्दावनकी स्वामिनी, ५०६. पुण्या-पुण्यमयी, ५०७. कृष्णमानसहारिणी- श्रीकृष्णका चित्त चुरानेवाली। ५०८.प्रगल्भा-प्रतिभा, साहस, निर्भयता और उदार बुद्धिसे सम्पत्र, ५०९. चतुरा-चतुराईसे युक्त, ५१०. कामा= प्रेमस्वरूपा, ५११. कामिनी- एकमात्र श्रीकृष्णको चाहनेवाली, हरिमोहिनी-श्रीकृष्णको मोहित करनेवाली, ५१३.ललिता-मनोहर सौन्दर्यसे सुशोभित, ५१४.मधुरा-माधुर्यभावसे युक्त, ५१५.माध्वी- मधुमयी, ५१६. किशोरी- नित्यकिशोरावस्थासे युक्त, ५१७.कनकप्रभाः सुवर्णके समान कान्तिवाली। ५१८. जितचन्द्रा-मुखके सौन्दर्यसे चन्द्रमाको भी परास्त करनेवाली, ५१९. जितमृगा-चञ्चल चकित नेत्रोंकी शोभासे मृगको भी मात करनेवाली, ५२०. जितसिंहा-सूक्ष्म कटि-भागको कमनीयतासे मृगराज सिंहके भी मदको चूर्ण करनेवाली, ५२१, जितद्विपा-मन्द-मन्द गतिसे गजेन्द्रका भी गर्व खर्व करनेवाली, ५२२. जितरम्भा-ऊरुओंकी स्निग्धतासे कदलीको भी तिरस्कृत करनेवाली, ५२३. जितपिका-अपने मधुर कण्ठस्वरसे कोयलको भी तिरस्कृत करनेवाली, ५२४ गोविन्दहदयोद्भवा श्रीकृष्णके हृदयसे प्रकट हुई। ५२५, जितविम्बा-अपने अधरको अरुणिमासे विम्बफलको भी तिरस्कृत करनेवाली, ५२६. जितशुका- नुकीली नासिकाको शोभासे तोतेको भी लजा देनेवाली, ५२७ जितपथा-अपने अनिर्वचनीय रूप-लावण्यसे लक्ष्मीको भो लज्जित करनेवाली, ५२८. कुमारिका-नित्य कुमारी, ५२९. श्रीकृष्णाकर्षणा-श्रीकृष्णको अपनी ओर खींचनेवाली, ५३०, देवी-दिव्यस्वरूपा, ५३१. नित्ययुग्मस्वरूपिणी-नित्य युगलरूपा। ५३२. नित्यं विहारिणी-श्यामसुन्दरके साथ नित्य लीला करनेवाली, ५३३. कान्ता-नन्दनन्दनकी प्रियतमा, ५३४. रसिका-प्रेमरसका आस्वादन करनेवाली, ५३५. कृष्णवल्लभा-श्रीकृष्णप्रिया, ५३६. आमोदिनी-श्रीकृष्णको आमोद प्रदान करनेवाली, ५३७. मोदवती मोदमयी, ५३८. नन्दनन्दनभूषिता-नन्दनन्दन श्रीकृष्णके द्वारा जिनका शृङ्गार किया गया है। ५३९. दिव्याम्बरा-दिव्य वस्त्र धारण करनेवाली, ५४०. दिव्यहारा-दिव्य हार धारण करनेवाली, ५४१. मुक्तामणिविभूषिता-दिव्य मुक्तामणियोंसे विभूषित, ५४२. कुञ्जप्रिया- वृन्दावनके कुओंसे करनेवाली, ५४३. कुञ्जवासा-कुञ्जमें निवास करनेवाली, ५४४. कुञ्जनायकनायिका- कुञ्जनायक श्रीकृष्णको नायिका। ५४५.चारुरूपा-मनोहर रूपवाली सुन्दर मुखवाली, ५४७. चारुहेमाङ्गदा- सुन्दर सुवर्णके भुजबंद धारण करनेवाली, ५४८. शुभा-शुभस्वरूपा, ५४९. श्रीकृष्णवेणुसङ्गीता- श्रीकृष्णद्वारा मुरलीमें जिनके नाम और यशका गान किया जाता है, ५५०, मुरलीहारिणी-विनोदके लिये श्रीकृष्णकी मुरलीका हरण करनेवाली, ५५१. शिवा- कल्याणस्वरूप। ५५२. भद्रा-मङ्गलमयी, ५५३. भगवती- षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न, ५५४. शान्ता-शान्तिमयी, ५५५. कुमुदा-पृथ्वीपर आनन्दोल्लास वितीर्ण करनेवाली, ५५६. सुन्दरी-अनन्त सौन्दर्यकी निधि, ५५७. प्रिया-सखियों तथा श्यामसुन्दरको अत्यन्त प्रिय, ५५८.कृष्णक्रीडा-श्रीकृष्णके साथ लीला करनेवाली, ५५९. कृष्णरति:-श्रीकृष्णके प्रति प्रगाढ़ प्रेमवाली, ५६०. श्रीकृष्णसहचारिणी- वृन्दावनमें श्रीकृष्णके साथ विचरनेवाली। ५६१. वंशीवटप्रियस्थाना-वंशीवट जिनका प्रिय स्थान है, ५६२. युग्मायुग्मस्वरूपिणी- युगलरूपा और एक रूपा, ५६३. भाण्डीरवासिनी- भाण्डीर वनमें निवास करनेवाली, ५६४. शुभा गौरवर्णा, ५६५. गोपीनाथप्रिया-गोपीवल्लभ श्रीकृष्णकी प्रियतमा, सखी- श्रीकृष्णकी सखी। ५६७, श्रुतिनिःश्वसित:- श्रुतियाँ जिनके नि:श्वाससे प्रकट होती हैं, ५६८. दिव्या दिव्यस्वरूपा, ५६९. गोविन्दरसदायिनी- गोविन्दको माधुर्यरस प्रदान करनेवाली, ५७०. श्रीकृष्णप्रार्थिनी-केवल श्रीकृष्णको चाहनेवाली, ५७१. ईशाना-ईवरी, ५७२. महानन्दप्रदायिनी-परमानन्द प्रदान करनेवाली। ५७३. वैकुण्ठजनसंसेव्या-वैकुण्ठवासियोंद्वारा सेवन करने योग्य, ५७४. कोटिलक्ष्मीसुखावहा- कोटि-कोटि लक्ष्मीसे भी अधिक सुख देनेवाली, ५७५. कोटिकन्दर्पलावण्या-करोड़ों कामदेवोंसे अधिक रूपलावण्यसे सम्पन्न, ५७६. रतिकोटिरतिप्रदा- करोड़ों रतियोंसे भी अधिक प्रगाढ़ प्रीतिरस प्रदान करनेवाली। ५७७. भक्तिग्राह्या-भक्तिसे होने योग्य, ५७८. भक्तिरूपा-भक्तिस्वरूपा, ५७९. लावण्यसरसी- सौन्दर्यको पुष्करिणी, ५८०, उमा योगमाया एवं ब्रह्मविद्यास्वरूपा, ५८१, ब्रह्मरुद्रादिसंराध्या-ब्रह्मा तथा रुद्रादिके आराधना करने योग्य, ५८२. नित्य कौतृतलाविता- नित्य कौतुकयुक्त। ५८३. नित्यलीला-नित्य लोलापरायणा, ५८४. नित्यकामा-नित्य श्रीकृया मिलनको प्राप्त चाहनेवाली, ५८५. नित्यशृङ्गारभूषिता-नित्य नूतन शृङ्गारसे विभूषित, ५८६. नित्यकृन्दावनरसा- वृन्दावनके माधुर्यरसका सदा आस्वादन करनेवाली, ५८७. नन्दनन्दनसंयुता-नन्दनन्दन श्रीकृष्णके साथ रहनेवाली। ५८८. गोपिकामण्डलीयुक्ता-गोपियोंकी मण्डलीसे घिरी हुई, ५८९. नित्यं गोपालसङ्गता- सदा गोपाल श्रीकृष्णसे मिलनेवाली, ५९०, गोरसक्षेपिणी गोरस फेंकने या लुटानेवाली, ५९१. शूरा-शौर्यसम्पत्र, ५९२. सानन्दा-आनन्दयुक्त, ५९३. आनन्ददायिनी-आनन्द देनेवाली। ५९४. महालीलाप्रकृष्टा-श्रीकृष्णकी महालीलाकी सर्वश्रेष्ठ पात्र, ५९५. नागरी-परम चतुरा, ५९६. नगचारिणी-गिरिराज गोवर्धनपर विचरनेवाली, नित्यमाघूर्णिता- श्रीकृष्णकी खोजमें नित्य घूमनेवाली, ५९८.पूर्णा-समस्त सद्गुणोंसे परिपूर्ण, ५९९, कस्तूरीतिलकान्विता-कस्तूरीकी बेंदीसे सुशोभित। ६००.पद्मा-लक्ष्मीस्वरूपा, ६०१. श्यामा- सौन्दर्यसे सम्पन्न, ६०२.. मृगाक्षी-मृगके समान विशाल एवं चञ्चल नेत्रोंवाली, ६०३. सिद्धिरूपा- सिद्धिस्वरूपा, रसावहा- श्रीकृष्णको माधुर्यरसका आस्वादन करानेवाली, ६०५. कोटिचन्द्रानना-करोड़ों चन्द्रमाओंके सुन्दर मुखवाली, ६०६. गौरी-गौरवर्णा, ६०७, कोटिकोकिलसुस्वरा-करोड़ों कोकिलोंके समान मधुर स्वरवाली। ६०८. शीलसौन्दर्यनिलया-उत्तम शील तथा अनन्त सौन्दर्यको आधारभूता, ६०९. नन्दनन्दन- लालिता- नन्दनन्दन श्रीकृष्णसे दुलार पानेवाली, ६१०, अशोकवनसंवासा-अशोकवनमें निवास करनेवाली, ६.११. भाण्डीरवनसत्ता भाण्डीरवनमें मिलनेवाली। ५९७. ६१२. कल्पगुमतलाविष्टा कल्पवृक्षके नीचे बैठी हुई, ६१३. कृष्णा-कृष्णस्वरूपा, ११४ विश्वा-विश्वस्वरूपा, ११५. हरिप्रिया-श्रीकृष्णकी प्रेयसी, ६१६.अजागम्या-ब्रह्माजीके लिये अगम्य, ६१७. भवागम्या-महादेवजीके लिये अगम्य, ११८. गोवर्धनकृतालया-गोवर्धन पर्वतपर निवास करनेवाली। ६१९. यमुनातीरनिलया-यमुनातटपर रहनेवाली, ६२०. शश्वद्गोविन्दजल्पिनी-सदा श्रीकृष्ण गोविन्दकी रट लगानेवाली, ६२१. शश्वन्यानवती- नित्य मानिनी, ६२२. स्निग्धा-नेहमयी, ६२३. श्रीकृष्णपरिवन्दिता- श्रीकृष्णके द्वारा नित्य वन्दित। ६२४.कृष्णस्तुता-श्रीकृष्णके द्वारा जिनका गुणगान किया गया है, ६२५.कृष्णव्रता- श्रीकृष्णपरायणा, ६२६. श्रीकृष्णहृदयालया- श्रीकृष्णके हृदयमें निवास करनेवाली, ६२७. देवद्रुमफला- कल्पवृक्षके समान मनोवाञ्छित फल देनेवाली, ६२८.सेव्या सेवन करने योग्य, ६२९. वृन्दावनरसालया-वृन्दावनके रसमें निमग्न रहनेवालो। ६३०.कोटितीर्थमयी-कोटितीर्थस्वरूपा, ६३१. सत्या- सत्यस्वरूपा, ६३२. कोटितीर्थफलप्रदा- करोड़ों तीर्थोका फल देनेवाली, ६३३. कोटियोग- सुदुष्प्राप्या-करोड़ों योगसाधनोंसे भी दुर्लभ, ६३४, कोटियजदुराश्रया-कोटि यज्ञोंसे भी जिनकी शरणागति प्राप्त होनी कठिन है। मनसा-मनसा नामसे प्रसिद्ध ६३६, शशिलेखा-श्रीकृष्णरूपी चन्द्रमाको कला, ६३७.श्रीकोटिसुभगा-कोटि लक्ष्मीके समान सौभाग्यवती, ६२८. ६३९. कोटिमुक्तसुखा करोड़ों मुक्तात्माओके समान सुखी, ५४०. सौम्या सौम्यस्वरूपा, ६४१. लक्ष्मीकोटिविलासिनी-करोड़ों लक्ष्मियों के समान चिलारावती। ५४२. तिलोतमा-ठोड़ीमें तिलके आकारको बेंदी या चिह्न होनेके कारण अतिशय उत्तम सौन्दर्ययुक्त, ६४३. त्रिकालस्था-भूत, भविष्ण, वर्तमान-तीनों कार्लोमें विद्यमान, ६४४ त्रिकालगा- तीनों कालोंको घटनाओंको जाननेवाली, ६४५. अधीश्वरी-स्वामिनी, ६४६. त्रिवेदना-तीनों वेदोंको जाननेवाली, ६४७.त्रिलोकज्ञा-तीनों लोकोंको जाननेवाली, ६४८. तुरीयान्तनिवासिनी- जाग्रत्से लेकर तुरीयापर्यन्त सब अवस्थाओंमें निवास करनेवाली। ६४९. दुर्गाराध्या-उमाके द्वारा आराध्य, ६५०. रमाराध्या लक्ष्मीकी आराध्य देवी, ६५१. विश्वाराध्या-सम्पूर्ण जगत्के लिये आराधनीया, ६५२. चिदात्मिका-चेतनस्वरूपा, ६५३. देवाराध्या-देवताओंकी आराध्य देवी, ६५४, पराराध्या-परम आराध्य देवी, ६५५. ब्रह्माराध्या-ब्रह्माजीके द्वारा उपास्य, ६५६. परात्मिका-परमात्मस्वरूपा ६५७. शिवाराध्या भगवान् शिवके लिये आराध्य, ६५८. प्रेमसाध्या-प्रेमसे प्राप्त होने योग्य, ६५९.भक्ताराध्या-भक्तोंकी उपास्य देवी, ६६०.रसात्मिका-रसस्वरूपा, ६६१. कृष्णप्राणार्षिणी- श्रीकृष्णको जीवन देनेवाली, ६६२. भामा-मानिनी, ६६३. शुद्धप्रेमविलासिनी-विशुद्ध प्रेमसे सुशोभित होनेवाली। ६६४. कृष्णाराध्या-श्रीकृष्णकी आराध्य देवी, ६६५. भक्तिसाध्या-अनन्य भक्तिसे प्राप्त होनेवाली, ६६६. भक्तवन्दनिषेविता-भक्त-समुदायसे सेविता, ६६७. विश्वाधारा-सम्पूर्ण जगत्को आश्रय देनेवाली, ६६८. कृपाधारा-कृपाकी आधारभूमि, ६६९, जीवाधारा- सम्पूर्ण जीवोंको आश्रय देनेवाली, ६७०, अतिनायिका- सम्पूर्ण नायिकाओंसे उत्कृष्ट ६७१. शुद्धप्रेममयी-चिशुद्ध अनुरागस्वरूपा, ६७२. लज्जा- मूर्तिमती लज्जा, ५७३. नित्यसिद्धान सदा, बिना किसी साधनके, स्वत:सिद्ध, ६७४, शिरोमणिः गोपाङ्गनाओंकी शिरोमणि, ६७५. दिव्यरूपा-दिव्य रूपवाली, ६७६. दिव्यभोगा- दिष्यभोगोंसे सम्पन्न, ६७७. दिव्यवेषा-अलौकिक वेशभूषाओंसे सुशोभित, ६७८. मुदान्विता-सदा आनन्दमग्न रहनेवाली। १७९. दिव्याङ्गनावृन्दसारा-दिव्य युवतियोंके समुदायकी सार-सर्वस्वरूपा, ६८०. नित्यनूतनयौवना- नित्य नवीन यौवनसे युक्त, ६८१. परब्रह्मावृता- परब्रह्म परमात्मासे आवृत, ६८२.ध्येया-ध्यान करने योग्य, ६८३. महारूपा-परम सुन्दर रूपवाली, ६८४. महोज्वला-परमोज्ज्वल प्रकाशमयी। ६८५. कोटिसूर्यप्रभा-करोड़ों सूर्योंकी प्रभासे उद्भासित, ६८६.कोटिचन्द्रविम्बाधिकच्छवि:- कोटि चन्द्रमण्डलसे अधिक छविवाली, ६८७. कोमलामृतवाक्-कोमल एवं अमृतके समान मधुर वचनवाली, ६८८.आद्या-आदिदेवी, ६८९. वेदाद्या- वेदोंकी आदिकारणस्वरूपा, ६९०. वेददुर्लभा-वेदोंकी भी पहुँचसे परे। कृष्णासक्ता-श्रीकृष्णमें अनुरक्त, ६९२. कृष्णभक्ता-श्रीकृष्णके प्रति भक्तिभावसे परिपूर्ण, ६९३. चन्द्रावलिनिषेविता-चन्द्रावली नामकी सखीसे सेवित, ६९४. कलाषोडशसम्पूर्णा- सोलह कलाओंसे पूर्ण, ६९५. कृष्णदेहार्धधारिणी अपने आधे शरीरमें श्रीकृष्मके स्वरूपको धारण करनेवाली। ६९६. कृष्णबुद्धिः श्रीकृष्णमें बुद्धिको अर्पित कर देनेवाली, ६९७. कृष्णसारा-श्रीकृष्णको हो जीवनका सारसर्वस्व माननेवाली, ६९८. कृष्ण- रूपविहारिणी-श्रीकृष्णरूपसे विचरनेवाली, ६९१, कृष्णकान्ता श्रीकृष्णप्रिया, ७०० कृष्णधना- श्रीकृष्णको ही अपना परम धन माननेवाली, ७०१. कृष्णमोहनकारिणी-अपने अनुपम ऐगसे श्रीकृष्णको मोहित करनेवाली। ७०२.कृष्णदृष्टिः एकमात्र श्रीकृष्णपर ही दृष्टि रखनेवाली, ७०३. कृष्णगोत्रा-श्रीकृष्णके गोत्रवाली, कृष्णदेवी-श्रीकृष्णको आराध्यदेवी, ७०५, कुलोदहा- कुलमें सर्वश्रेष्ठ, ७०६.सर्वभूत- स्थितात्मा सम्पूर्ण भूतोंमें विद्यमान आत्मस्वरूपा, ७०७.सर्वलोकनमस्कृता-सम्पूर्ण लोकोंद्वारा अभिवन्दित। ७०८, कृष्णदात्री-उपासकोंको श्रीकृष्णकी प्राप्ति करानेवाली, ७०९. प्रेमधात्री-भावुकोंके हृदयमें श्रीकृष्णप्रेमको प्रकट करनेवाली, ७१०. स्वर्णगात्री= सुवर्णके समान गौर शरीरवाली, ७११. मनोरमा-श्रीकृष्णके मनको रमानेवाली, ७१२. नगधात्री-पर्वतोंके अधिष्ठातृ देवताको उत्पन्न करनेवाली, ७१३. यशोदात्री-यश देनेवाली, ७१४. महादेवी-सर्वश्रेष्ठ देवी, ७१५. शुभङ्करी-कल्याण करनेवाली। ७१६. श्रीशेषदेवजननी-लक्ष्मीजी, शेषजी और देवताओंको करनेवाली, ७१७. अवतारगणप्रसू:-अवतारगणोंको उत्पन्न करनेवाली, ७१८. उत्पलाङ्का-हाथ- य-पैरोंमें नील कमलके चिह्न धारण करनेवाली, ७१९. अरविन्दाङ्का-कमलके चिह्रसे युक्त, ७२०. प्रासादाङ्का-मन्दिरके चिहसे युक्त, ७२१. अद्वितीयका-जिसके समान दूसरी कोई नहीं है ऐसी। चिह्नसे युक्त, चिह्नसे युक्त, ७२४. कुण्डलाङ्कपदस्थिता-चरणोंमें कुण्डलके चिह्नसे युक्त, ७२५. छत्राङ्का-छत्रके चिहसे युक्त, ७२६. विधुदका-वनके चिह्नसे युक्त, ७२७. पुष्पमालाङ्किता- पुष्पमालाके चिह्नसे युक्त। ७२८. दण्डाका दण्डके चिह्नसे युक्त, ७२९. मुकुटाङ्का-मुकुटके चिह्नसे युक्त, ७२०. पूर्णचन्द्रा-पूर्णचन्द्रके सदृश शोभासम्पन्न, ७३१. शुकाविता-शुकके चिह्नसे युक्त, ७३२. कृष्णानाहारपाका-श्रीकृष्णको भोजन करानेके लिये भाँति-भौतिकी रसोई तैयार करनेवाली, ७३३.वन्दाकुचविहारिणी-वृन्दावनके कुञ्जमें विचरनेवाली। ७४.कृष्णप्रबोधनकरी-कृष्णको शयनसे जगानेवाली, ७३५. कृष्णशेषात्रभोजिनी-श्रीकृष्णके आरोगनेसे बचे हुए प्रसादरूप अन्नको ग्रहण करनेवाली, ७३६. पाकेसरमध्यस्था कमलकेसरोकि मध्यमें विराजमान, ७३७. सङ्गीतागमवेदिनी- सङ्गीतशास्त्रको जाननेवाली। ७३८. कोटिकल्पान्तभूभङ्गा-अपने भ्रूभङ्गमात्रसे करोड़ों कल्पोंका अन्त करनेवाली, ७३९. अप्राप्तप्रलया-कभी प्रलयको प्राप्त न होनेवाली, ७४०. अच्युता अपनी महिमासे कभी विचलित न होनेवाली, ७४१. सर्वसत्त्वनिधिः पूर्ण सत्त्वगुणकी निधि, ७४२. पाशङ्खादिनिधिसेविता-पा-शङ्क आदि निधियोंसे सेवित । ७४३.अणिमादिगुणैश्वर्या-अणिमा आदि अष्टविध गुणोंके ऐश्वर्योसे युक्त, देववृन्दविमोहिनी- देवसमुदायको मोहित करनेवाली, ७४५. सर्वानन्दप्रदा-सबको आनन्द देनेवाली, ७४६. सर्वा-सर्वस्वरूपा, ७४७ सुवर्णलतिकाकृतिः- स्वर्णमयी लताके समान आकृतिवाली। ७४८. कृष्णाभिसारसंकेता-श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये संकेतस्थानमें स्थित, ७४९. मालिनी-मालासे अलंकृत, ७५०. नृत्यपण्डिता-नृत्यकलाको विदुषी, ७५१. गोपीसिन्धुसकाशाप्या गोपीसमुदायरूपी सिन्धुमें प्राप्त होनेवाली, ७५२. गोपमण्डपशोभिनी- वृषभानुगोपके मण्डपमें शोभा पानेवालो। ७५३. श्रीकृष्णप्रीतिदा- श्रीकृष्णके प्रेमको प्रदान करनेवाली, ७५४. भीता-श्रीकृष्णके वियोगके भयसे भीत, ७५५. प्रत्यङ्गपुलकाशिता प्रत्येक अङ्गमें श्रीकृष्ण-प्रेमजनित रोमाशसे युक्त, ७५६. श्रीकृष्णालिनरता-श्रीकृष्णका स्पर्श करने में तत्पर, ७५७. गोविन्दविरहाक्षमा-श्रीकृष्णका वियोग सहन करनेमें असमर्थ। ७५८. अनन्तगुणसम्पन्ना-अनन्त गुणों से युक्त, ७५९. कृष्णकीर्तनलालसा-श्रीकृष्णके नाम और गुणोंके कीर्तन करनेकी रुचिवाली, ७६०. बीजप्रयमयीमूर्तिः= श्री, ह्री, क्लीं-इन तीन बीजोंसे संयुक्तरूपवाली, ७६१. कृष्णानुग्रहवाञ्छिनी- श्रीकृष्णके अनुग्रहको चाहनेवाली। ७६२. विमलादिनिषेव्या-विमला, उत्कर्षिणी आदि सखियोंद्वारा सेव्य, ७६३. ललिताद्यचिंता- ललिता आदि सखियोंसे पूजित, ७६४. सती- उत्तम शील और सदाचारसे सम्पन्न, ७६५. पद्मवन्दस्थिता= कमलवनमें निवास करनेवाली, ७६६. इष्टा-हर्षसे युक्त, ७६७. त्रिपुरापरिसेविता- त्रिपुरसुन्दरीके द्वारा सेवित । ७६८. वृन्दावत्यर्चिता-वृन्दावती देवीके द्वारा पूजित, ७६९. श्रद्धा-श्रद्धास्वरूपा, ७७०. दुर्जेया- बुद्धिकी पहुँचसे परे, ७७१. भक्तवल्लभा-भक्तप्रिया, ७७२. दुर्लभा-दुष्प्राप्य, ७७३. सान्द्रसौख्यात्मा- घनीभूत सुखस्वरूपा, ७७४. श्रेयोहेतु:-कल्याणको प्राप्तिमें हेतु, ७७५.सुभोगदा-मुक्तिप्रद भोग देनेवाली। ७७६. सारङ्गा-श्रीकृष्णप्रेमकी प्यासी चातकी, ७७७. शारदा-सरस्वतीस्वरूपा, ७७८. बोधा- ज्ञानमी, ७७९, सद्वन्दावनचारिणी- सुन्दर वृन्दावनमें विचरनेवाली, ७८०, ब्रह्मानन्दा- ब्रह्मानन्दस्वरूपा, ७८१. चिदानन्दा-चिदानन्दमयी, ७८२, ध्यानानन्दा- श्रीकृष्ण-ध्यानजनित आनन्दमें भग्र, ७८.३. अर्धमात्रिका- अर्धमात्रास्वरूपा। ७८.४.गन्धर्वा-गानविद्या प्रवीण, ७८५. सुरतजा- सुरतकलाको जाननेवाली, ७८६, गोविन्दप्रासनमा - गोविन्द के साथ एक प्राण होकर रहनेवाली, ७८७. कृष्णाषणा- श्रीकृष्णवे अशोको विभूषित करनेवाली, ७८८ रत्रभूषणा-रत्रमय आभूषण
धारण करनेवाली, १ वालि सोने आभूषण विभूषित।
४९०श्रीकृष्णह्रयावासा श्रीकृष्ण के ह्रदय- मन्दिर में निवास करनेवाला ४९९ समान कहानी सदर रसमलित केगन पहननेवाली, पीलीलगिरिमिता शोभाशाली नीलाचलपर विराजमान सशोभित ४९५ सवर्षकी किङ्किणी (करमनी) से अलंकार ७९५, अशेषराकासासके लिये उत्कलित रहनेवाली, ४१ लेके सपाल धावाली, ७९० तमाशीम विषाली। ४९९ पराकति शोक आनतिजाली, ७६ पसा- पहचालल्याव, विहारिणी स्वार्थ भी परे गोलोक भाको विहार करनेवाली, ०.०९. पशुपक नही देखीय फूलोके हार चिनेवाली, 4०५. चित्र विचित्र सोपवी,पहातिरसची उतम सिन्दूरको अति सुन्दर प्रतीत होनेवाली। ०५, कैरोलमा किशोरावस्थाको गुप्त ०६, भाला-पुरधा कपोता स्पयोकुलशिरोमणि, प्रोफानामरूपी सुधाका अभोक मा वित्य आश्वान करनेवाली, ५०१ यायचकिचोदिनी पोकलाम हो मनोरमच करनेवाली। शि शिस्तिपित्यम्यूमागपूर पलस सुशोपिल के शोचालो, रसिक भूचिता स्वचपाके आभूषणोणे विभूचित १९ काल्पककस्तूरीचालोली, पावर और भलारसे शुशोभित अपराजिता कभी भक्त होनेवाली। ८१४. हे महारान्धिता-सुवर्णक हारसे अलंकृत, ८१५. पुष्पहारालया-पुष्पमालासे मण्डित, ८१६. रसवती-प्रेमरसमयी, ८१७, पायमधुरा- माधुर्य भावके कारण मधुर, ८१८. पन्ना-पन्यानामसे प्रसिद्ध, ८१९. पाचहस्ता-हाथमे कमल धारण करनेवाली, ८२०, सुविभुता-अति विख्यात ८२१. भूभाभङ्गकोबण्डकटाक्षसरसधिनी- श्रीकृष्णके प्रति तिरछी भौंहरूपी मुद्रा धनुषपर कटाक्षरूपी बाणोका संधान करनेवाली, ८२२. शेषदेवशिरःस्था-शेषजीके मस्तकपर पृथ्वीके रूपमें स्थित, ८२३. नित्यस्थलविहारिणी-नित्य लीला स्थलियोंमें विचरनेवाली। ८२४. कारुण जलमध्यस्था करुणारूपी जलराशिके मध्य विराजमा ८२५. नित्यमत्ता-सदा प्रेममें मतवाली, ८२६. अधिरोहिणी-उन्नतिकी साधनरूपा, ८२७. अष्टभाषावती-आठ भाषाओंको जाननेवाली, ८२८. अष्टनायिका-ललिता आदि आठ सखियोकी स्वामिनी, ८२९. लक्षणान्विता- उत्तम लक्षणोंसे युक्त। ८३०. सुनीतिजा-अच्छी नीतिको जाननेवाली, ८३१. श्रुतिजा-श्रुतिको जाननेवाली, ८३२. सर्वत्रा- सब कुछ जाननेवाली, ८३३. दुःखहारिणी- दुःखोंको हरण करनेवाली, ८३४. रजोगुणेश्वरी- रजोगुणकी स्वामिनी, ८३५. शरच्चन्द्रनिभानना- शरदऋतुके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर मुखवाली। ८३६, केतकीकुसुमाभासा-केतकीके पुष्पकी- सी आभावाली, ८३७. सदासिन्युवनस्थिता-सदा सिन्धु-वनमें रहनेवाली, ८३८. हेमपुष्पाधिककरा- सुवर्ण-पुष्पसे अधिक कमनीय हाथवाली, ८०९, पाशक्तिमयी-पश्चविधशक्तिसे सम्पन्न, ८४०, हिता-हितकारिणी।८४२. स्तनकुम्भी-कुम्भके समान स्तनवाली, ८४१. नराळया-पुरुषोत्तम श्रीकृष्णसे संयुक्त, ८४३. क्षीणापुण्या- पापरहित, ८४४. यशस्विनी-कीर्तिमती, वैराजसूर्यजननी-विराट ब्रह्माण्डके प्रकाशक सूर्यको जन्म देनेवाली, ८४६. श्रीशा-लक्ष्मीकी भी स्वामिनी, ८४७. भुवनमोहिनी सम्पूर्ण भुवनोंको मोहित करनेवाली। ८४८. महाशोभा परम शोभाशालिनी, ८४९. महामाया-महामायास्वरूपा, ८५०. महाकान्तिः। अनन्त कान्तिसे सुशोभित, ८५१. महास्मृतिः- महती स्मरणशक्तिस्वरूपा, ८५२. महामोहा- महामोहमयी, ८५३. महाविद्या=भगवत्प्राप्ति करानेवाली श्रेष्ठ विद्या, ८५४. महाकीर्तिः विशाल कीर्तिवाली, ८५५. महारति:-अत्यन्तानुरागस्वरूपा। ८५६. महाधैर्या-अत्यन्त धीर स्वभाववाली, ८५७. महावीर्या-महान् पराक्रमसे सम्पन्न, ८५७. महाशक्ति:-महाशक्ति, ८५९, महाद्युतिः- परम-प्रकाशवती, ८६०. महागौरी अत्यन्त गौर वर्णवाली, ८६१. महासम्पत्-परम सम्पत्तिरूपा, ८६२. महाभोगविलासिनी-महान् भोग- विलाससे युक्त। ८६३. समया-अत्यन्त निकटवर्तिनी, ८६४. भक्तिदा-भक्ति देनेवाली, ८६५. अशोका- शोकरहित, ८६६. वात्सल्यरसदायिनी-वात्सल्यरस देनेवाली, ८६७. सुहद्भक्तिप्रदा-सुहद् जनोंको भक्ति देनेवाली, ८६८. स्वच्छा-निर्मल, ८६९. माधुर्यरसवर्षिणी- माधुर्यरसकी वर्षा : करनेवाली।
भावभक्तिप्रदा-भावभक्ति प्रदान करनेवाली, ८७१. शुद्धप्रेमभक्तिविधायिनी- शुभ प्रेमलक्षणा भक्तिका विधान करनेवाली, गोपरामा-गोपकुलकी ८७३. अभिरामा सर्व-सुन्दरी, ८७४. क्रीडारामा== श्यामसुन्दरके साथ लोलामें रत रहनेवाली, ८७६, नित्यरामा-नित्य यस्तुमें रमण करनेवाली, ८७०. रमणो,
८७२. ८७५, पोश्चरी परमेश्वरी। ८७७. आत्परामा-आत्मामें रमण करनेवाली, ८७८. कृष्णरामा-श्रीकृष्णके चिन्तनमें रमण करनेवाली, ८७९. रमेश्वरी-लक्ष्मीको अधोसरी ८८०. एकानेकजगद्व्याप्ता-एक होकर भी अनेक रूपसे जगत्में व्याप्त, ८८१. विश्लीलाप्रकाशिनी- सम्पूर्ण विश्वके रूपमें बाह्यलीलाको प्रकाशित करनेवालो। ८८२. सरस्वतीशा-सरस्वतीको स्वामिनी, ८८३. दुर्गेशा-दुर्गाको स्वामिनी, ८८४ जगदीशा- जगत् को स्वामिनी, ८८५. जगद्विधिः-संसारको रचनेवाली, ८८६. विष्णुवंशनिवासा-वैष्णववंशनें निवास करनेवाली, ८८७ विष्णुवंशसमुद्धवा- वैष्णववंशमें प्रकट हुई। ८८८. विष्णुवंशस्तुता-वैष्णवकुलके द्वारा स्तुत ८८९. की-स्वतन्त्र कर्तृत्वशठिसे समर, ८९०, सदाविष्णुवंशावनी-सदा वैष्णवकुलको रक्षा करनेवाली, ८९१. आरामस्था-उपवन रहनेवाली, ८९२. वनस्था-वृन्दावनमें निवास करनेवाली, ८९३. सूर्यपुत्र्यवाहिनी-यमुना रुन करनेवालो। ८९४ प्रीतिस्था-प्रेममें निवास करनेवाले, ८९५. नित्यवस्था-नित्य-पत्र में स्थित रहनेवाले गोलोकस्था-गोलोकधाममें ८९७ विभूतिदा-ऐवयं देनेवाली, ८१८ स्वानुभूतिस्थिता- केवल अपनो अनुभूति होनेवाली. ८९९ अव्यक्ता-अपलस्वरूप २००.सर्वलोकनिवासिनी-सम्पूर्ण निवास करनेवालो। १०१. अमृता-अमृतस्वरूपा ९०२. अह और भावसे ओमनारायणासमोरिला-समोसहित ८२६. १०५. कूटस्था एकरस परमामस्वरूप महापुरुषम्भवा महास्यों को पकर करनेवाली। औदार्यभावसाध्या-औदार्यपूर्ण भक्तिभावसे प्रास होनेवाली, ९०८. स्थूलसूक्ष्मातिरूपिणी- स्थूल- सूक्ष्मसे विलक्षण चिदानन्दमय स्वरूपवाली, ९०९. शिरीषपुष्पमृदुला-सिरसके फूलोंसे भी अधिक कोमल, ९१०. गाङ्गेयमुकुरप्रभा-गङ्गाजल एवं दर्पणके समान निर्मल कान्तिवाली। ९११, नीलोत्पलजितानी-कजरारे नेत्रोंकी शोभासे नीलकमलको परास्त करनेवाली, ९१२. सालकबरान्विता- सुन्दर रत्नोंसे अलंकृत चोरीवाली, ९१३. प्रेमपर्य निलया-प्रेमरूपी पर्यडूपर शयन करनेवाली, ९१४. तेजोमण्डलमध्यगा- तेजपुरके भीतर विराजमान। ९१५. कृष्णाङ्गगोपनाभेदा-श्रीकृष्णके अङ्गोंको छिपानेके लिये उनसे अभिन्नरूपमें स्थित, ९१६. लीलावरणनायिका विभिन्न लीलाओंको स्वीकार करनेवाली प्रधान नायिका, ९१७. सुधासिन्धुसमुल्लासा-प्रेमसुधाके समुद्रको समुल्लसित करनेवाली, ९१८. अमृतस्यन्दविधायिनी अमृतरसका स्त्रोत बहानेवाली रास ९१९. कृष्णचित्ता अपना चित्त श्रीकृष्णको समर्पित कर देनेवाली, ९२०. रासचित्ता-श्रीकृष्णकी पह प्रसन्नताके लिये रासमें मन लगानेवाली, कर ९२१. प्रेमचित्ता-श्रीकृष्णप्रेममें मनको निमग्न रखनेवालो, ९२२. हरिप्रिया-श्रीकृष्णको प्रेयसी, गान ९२३. अचिन्तनगुणग्रामा-अचिन्त्य समुदायवाली, ९२४. कृष्णलीला-श्रीकृष्णलोलास्वरूपा, ९२५. पलापहा-गनकी मलिनता एवं पाप कृष्ण तापको धो बहानेवाली। ९२६, राससिन्धुशशाङ्का-रासरूपी समुद्रको उल्लसित करनेके लिये पूर्ण चन्द्रमाकी भांति इच्छ प्रकाशित ९२७. रासमण्डलमणिनी-अपनी श्रीक उपस्थितिसे रासमण्डलकी शोभा २५६- बढ़ानेवाली, ५२८. नतवता विनप्रस्वभाववाली, वचन ९२९, श्रीहरीपछासुमूर्तिः श्रीकृष्णदच्छकी सुन्दर प्रकट मूर्ति, १३०. सुरवन्दिता-देवताओंद्वारा वन्दित। १३१. गोरोचूडामणिः गोपाङ्गमासिोनगि २३२. गोरीगणेझा-गोरियोंके समुददा स्तुत, १३३ विरजाधिका-गोलोक शिजाने अधिक सम्मानित पदर स्थित, १४ पोखेट-गोपाल स्पामसुन्दरको उचठमा, १३५. गोरकया- वृषभानुचोको पुजी, ९३६ गोरनारी-गोपको व १३६ सुपोरिका-मोठ गोपी। २३८ गोरधाना-गोलोक इनमें विराजमान २३९ सुदामाच्या-सुदामालगोर्क दि. माद-नेह रखनेवालो. ९४० रोगाली-गोगी, गोरमोहिनी- गोरल औकृष्णको मोहनेवाली, हरगोशा- सोशल स्पन्दर ही जिसके करनेवालो. गोदावरको जॉइनो रालोसक विकास करनेजालो. २१४ कृपाचेक- कोकणाके जनता से कलेवालो. १६ अयोजाता- वह अमेवले. ११ ऑटेक्ट्रमोदिन-कोकमागुपयावाड्या-अंकमाके गुणोंक -गान करनेमें रुल ५६ देखमुन्टाबाहेन- रेक्तुन्दरियोको मोहनेवालो २२ कृपालक- प्रोकमारके सोभानको जाल्लेशालो. २५३- कृपारेककोदो-योगल्याच्या रूपाने गोदके
९६०. प्रकृतिः-श्रीकृष्णको स्वरूपभूता हादिनी शक्ति, ९६१. परमानन्दा-परमानन्दस्वरूपा, ९६२. नोपद्रुमतलस्थिता-कदम्बवृक्षके नीचे खड़ी होनेवाली, ९६३. कृपाकटाक्षा-कृपापूर्ण कटाक्षवाली, ९६४. विम्बोष्ठी-विम्बफलके समान लाल ओठवाली, ९६५. रम्भा सर्वाधिक –सुन्दरी होनेके कारण नामसे प्रसिद्ध ९६६. चारुनितम्बिनी-मनोहर नितम्बवाली। ९६७. स्मरकेलिनिधाना-प्रेमलीलाकी निधि, ९६८. गण्डताटङ्कपण्डिता-कपोलोंपर कर्णभूषणोंसे अलंकृत, ९६९. हेमाद्रिकान्तिरुचिरा-सुवर्णगिरि मेरुकी कान्तिके समान सुनहरी कान्तिसे सुशोभित परम सुन्दरी, ९७०, प्रेमाया-प्रेमसे परिपूर्ण, ९७१. मदमन्धरा-प्रेममदसे मन्द गतिवाली। ९७२. कृष्णचिन्ता-श्रीकृष्णका चिन्तन ९ करनेवाली, ९७३. प्रेमचिन्ता-श्रीकृष्ण-प्रेमका चिन्तन करनेवाली, ९७४. रतिचिन्ता-श्रीकृष्णरतिका चिन्तन करनेवाली, ९७५. कृष्णदा-श्रीकृष्णकी प्राप्ति करानेवाली. ९७६. रासत्चिन्ता-वृन श्रीकृष्णके साथ रासका चिन्तन करनेवाली, बर्ड ९७७ भावचिन्ता-प्रेम भावका चिन्तन करनेवालो, भो ९७८. शुद्धचिन्ता-विशुद्ध चिन्तनवाली, मान ९७९. महारसा-अतिशय प्रेमस्वरूपा। ९८०. कृष्णादृष्टित्रुटियुगा-श्रीकृष्णको देखे प्रेम बिना क्षणभरके विलम्बको भी एक युगके कर समान माननेवाली, ९८१. दृष्टिपक्ष्यविनिन्दिनी- ओर श्रीकृष्णका दर्शन करते समय बाधा देनेवाली जगत आँखकी पलकोंकी निन्दा करनेवाली. अन्न ९८२, कन्दर्पजननी कामदेवको जन्म देनेवालो, सब २८३. मुख्या-सर्वप्रधाना, ९८४. वैकुण्ठगतिदायिनी- यह बैकुण्ठ धामकी प्राप्ति करानेवाली। रासभावा-रासमण्डलमें आविर्भूत होनेवाली, ९८६. प्रियाश्लिष्टा-प्रियतम श्यामसुन्दरके द्वारा आश्लिष्ट, ९८७. प्रेष्ठा-श्रीकृष्णकी प्रेयसी, ९८८. प्रथमनायिका-श्रीकृष्णको प्रधान नायिका, ९८९. शुद्धा-शुद्धस्वरूपा, ९९०. सुधादेहिनी- प्रेमामृतमय शरीरवाली, ९९१. श्रीरामा-लक्ष्मीके समान सुन्दर, ९९२. रसमञ्जरी- श्रीकृष्णप्रेम-रसको प्रकट करनेके लिये मञ्जरीके समान। ९९३ -सुप्रभावा-उत्तम प्रभावसे युक्त, ९९४. शुभायारा-शुभ आचरणवाली, ९९५. स्वर्नदीनर्मदाम्बिका गङ्गा तथा नर्मदाकी जननी, ९९६. गोमतीचन्द्रभागेड्या-गोमती और चन्द्रभागाके द्वारा स्तवनीय, ९९७. सरयूताम्रपर्णिसू:- सरयू तथा ताम्रपर्णी नदीको प्रकट करनेवाली। ९९८. निष्कलङ्कचरित्रा-कलङ्कशून्य चरित्रवाली, ९९९. निर्गुणा-गुणातीत, १०००. निरञ्जना- निर्मलस्वरूपा। नारद! यह राधाकृष्णयुगलरूप भगवानका सहस्त्रनाम स्तोत्र है। इसका प्रयवपूर्वक पाठ करना चाहिये। यह वृन्दावनके रसकी प्राति करानेवाला है। बड़े-से-बडे पापोंको शान्त कर देता है। अभिलषित भोगोंको देनेवाला महान् साधन है। यह राधा- माधवकी भक्ति देनेवाला है। जिनकी मेधाशा कभी कुण्ठित नहीं होती तथा जो श्रीराधा प्रेमरूपी सुधासिन्युमें नित्य विहार-सतत अवगाहन करते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। श्रीराधादेवी संसारको सृष्टि करती हैं। ये हो जगतके पालनमें तत्पर रहती हैं और वे ही अन्तकालमें जगत्का संहार करनेवाली हैं। वे सबकी अधीश्वरी तथा सबकी जननी हैं । मुनीश्वर! यह उन्हीं श्रीराधाकृष्णका सहस्रनाम मैंने तुम्हें बताया है। यह दिव्य सहरूलनामभोग और मोक्ष देनेवाला है।
( नारदपुराण पूर्वभाग अध्याय ८२)
।।तृतीय पाद सम्पूर्ण।।