नारद महा पुराण
मार्कण्डेयजी को पिता का उपदेश, समय-निरुपण, मार्कण्डेयद्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का मार्कण्डेय जी को भगवद्भक्तों के लक्षण बताकर वरदान देना
नारदजी ने पूछा- ब्रह्मन्! पुराणों मे यह सुना जाता है कि चिरञ्जीवी महामुनि मार्कण्डेयने इस जगत् के प्रलय काल में भगवान् विष्णु की मायाका दर्शन किया था, अतः इस विषय में कहिये।
श्रीसनकजी ने कहा- नारदजी! मैं उस सनातन कथाका वर्णन करुँगा, आप सावधान होकर सुनें। मार्कण्डेय मुनि से सम्बन्ध रखनेवाली यह कथा भगवान् विष्णु की भक्ति से परिपूर्ण है। साधुशिरोमणि मृकण्डु ने तपस्यासे निवृत्त होने के बाद विवाह करके प्रसन्नतापूर्वक गृहस्थधर्म का पालन आरम्भ किया। वे मन और इन्द्रियों का संयम करके सदा प्रसन्न रहते और कृतार्थताका अनुभव करते थे। उनकी पन्नी बड़ी पवित्र, कार्यकुशल तथा निरन्तर पतिकी सेवा में तत्पर रहने वाली थीं। वे मन, वाणी और शरीर से भी पातिव्रत-धर्मका पालन करती थीं। समय आनेपर उन्होंने भगवान् के तेजोमय अंश से युक्त गर्भ धारण किया और दस महीने के बाद एक परम तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया। महर्षि मृकण्डु उत्तम लक्षणों से सुशोभित पुत्रको देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने विधिपूर्वक मङ्गलमय जातकर्म-संस्कार सम्पन्न कराया। मुनिका वह पुत्र शुक्लपक्ष के चन्द्रमाकी भाँति दिन-दिन बढ़ने लगा। विप्रवर!तदनन्तर पाँचवें वर्ष में प्रसन्नतापूर्वक पुत्रका उपनयन-संस्कार करके मुनि ने उसे वैदिक धर्म-संहिताकी शिक्षा दी और कहा-‘बेटा! ब्राह्मणों का दर्शन होनेपर सदा विधिपूर्वक उन्हें नमस्कार करना चाहिये। तीनों समय सूर्यको जलाञ्जलि देकर उनकी पूजा करना और वेदों के स्वाध्यायपूर्वक वेदोत्क कर्मका पालन करते रहना चाहिये। ब्रह्मचर्य तथा परस्याके द्वारा सदा श्रीहरि की पूजा करनी चाहिये। दुष्ट पुरुषों से वार्तालाप आदि निषिद्ध कर्मको त्याग देना चाहिये। किसी से भी द्वेष रखना उचित नहीं है। सबके हितका साधन करना चाहिये। वत्स! यज्ञ, अध्ययन और दान-ये कर्म तुम्हें सदा करने चाहिये। इस प्रकार पिताका आदेश पाकर मुनीश्वर मार्कण्डेय नित्य-निरन्तर भगवान् विष्णु का चिन्तन करते हुए स्वधर्मका पालन करने लगे।महाभाग मार्कण्डेय बड़े धर्मानुरागी और दयालु थे। वे मनको वशमे रखने वाले और सत्यप्रतिज्ञ थे। वे जितेन्द्रिय, शान्त, महाज्ञानी और सम्पूर्ण तत्वों के मर्मज्ञ थे। उन्होंने भगवान् विष्णु की प्रसन्नताके लिये बड़ी भारी तपस्या की। बुद्धिमान् मार्कण्डेय के आराधना करने पर जगदीश्वर भगवान् विष्णु ने उन्हें पुराणसंहिता बनाने का वर दिया। चिरञ्जीवी मार्कण्डेयजी सुदर्शनचक्रधारी देवाधिदेव भगवान् विष्णु के महान् भक्त और उनके तेज के अंश(अ0 5 श्लोक 6) थे। ब्रह्मन्। यह संसार जब एकार्णवके जलमें विलीन हो गया, उस समय भी उन्हें अपना प्रभाव दिखाने के लिये भगवान् विष्णु ने उनका प्रभाव दिखाने के लिये भगवान् मार्कण्डेय बड़े बुद्धिमान् और विष्णुभक्त थे। भगवान् श्रीहरि स्वयं जब तक सोते रहे, तब तक मार्कण्डेयजी वहाँ खड़े रहे। उस समय का माप मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। पंद्रह निमेषकी एक काष्ठा बतायी गयी है। नारदजी! तीस काष्ठाकी एक कला समझनी चाहिये। तीस कला का एक क्षण होता है और छः क्षणों की एक घड़ी मानी गयी है। दो घड़ी का एक मुहूर्त और तीस मुहूर्तका एक दिन होता है। तीस दिनका एक मास होता है और एक मास में दो पक्ष होते हैं। दो मासका एक ऋतु और तीन ऋतुओंका एक अयन माना गया है। दो अयन से एक वर्ष बनता है, जो देवताओं का एक दिन है। उत्तरायण देवताओं का दिन हैऔर दक्षिणायन उनकी रात्रि है। मनुष्योंके एक मास के बराबर पितरों का एक दिन कहा जाता है। इसलिये सूर्य और चन्द्रमा के संयोग में अर्थात् अमावस्याके दिन उत्तम पितृकल्प जानना चाहिये। बारह हजार दिव्य वर्षोंका एक दैवत युग होता है। दो हजार दैवत युग के बराबर ब्रह्मा के एक दिन-रात्रिका मान है। वह मनुष्यों के लिये सृष्टि और प्रलय दोनों मिलकर ब्रह्माका दिन-रात-रुप एक कल्प है। इकहत्तर दिव्य चतुर्युग एक मन्वन्तर होता है और चौदह मन्वन्तरों से ब्रह्माजी का एक दिन पूरा होता है। मुने! जितना बड़ा ब्रह्माजी का दिन होता है, उतनी ही बड़ी उनकी रात्रि भी बतायी गयी है। विप्रवर! ब्रह्माजी की रात्रि के समय तीनों लोकों का नाश हो जाता है। मानव वर्ष-गणनाके अनुसार उसका जो प्रमाण है, वह सुनो। मुने! एक हजार चतुर्युग(चार हजार युग)- का ब्रह्माजी का एक दिन होता है। ऐसे ही तीस दिनों का एक मास और बारह महीनों का उनका एक वर्ष समझना चाहिये। ऐसे सौ वर्षों में उनकी आयु पूरी होती है। उनके काल-मान के अनुसार उनकी सम्पूर्ण आयु का समय दो परार्धका होता है। ब्रह्माजी का दो परार्ध भगवान् विष्णु के लिये एक दिन समझना चाहिये। इतनी ही बड़ी उनकी रात्रि भी बतायी गयी है। मृकण्डुनन्दन मार्कण्डेयजी उतने ही समयतक उस भयंकर एकार्णव के जलमें भगवान् विष्णु की शक्ति से बलवान् होकर सूखे पत्ते की भाँति खड़े रहे। उस समय वे श्रीहरिके समीप परमात्मतत्त्वका ध्यान करते हुए स्थित थे। तदनन्तर प्रलयकाल का अन्त समय आनेपर योगनिद्रा से मुक्त हो श्री हरि ने ब्रह्मा जी के रुप से इस चराचर जगत् की रचना की। जलका उपसंहार और जगत् की नूतन सृष्टि देखकर मार्कण्डेय जी चकित हो गये। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर श्रीहरि के चरणों में प्रणाम किया। महामुनि मार्कण्डेयने सिर पर अञ्जलि बाँधे नित्यानन्दस्वरुप श्रीहरि का प्रिय वचनों द्वारा इस प्रकार स्तवन किया।
मार्कण्डेयजी बोले- जिनके सहस्त्रों मस्तक हैं, रोग-शोक आदि विकारसे जो सर्वथा रहित हैं, जिनका कोई आधार नहीं है(स्वयं ही सबके आधार हैं) तथा जो सर्वत्र व्यापक हैं, मनुष्यों से सदा प्रार्थित होने वाले उन भगवान् नारायणदेव को मैं सदा प्रणाम करता हूँ। जो प्रमाण से परे तथा जरावस्था से रहित हैं, नित्य एवं सच्चिदानन्दस्वरुप हैं तथा जहाँ कोई तर्क या संकेत काम नहीं देता, उन भगवान् जनार्दन को मैं प्रणाम करता हूँ। जो परम अक्षर, नित्य, विश्व के आदिकारण तथा जगत् के उत्पत्तिस्थान हैं, उन सर्वतत्त्वमय शान्तस्वरुप भगवान् जनार्दन को मैं नमस्कार करता हूँ। जो पुरातन पुरुष सब प्रकार की सिद्धियों से सम्पन्न और सम्पूर्ण ज्ञान के एकमात्र आश्रय हैं, जिनका स्वरुप पर से भी अति परे है, उन भगवान् जनार्दन को मैं नमस्कार करता हूँ। जो परम ज्योति, परम धाम तथा परम पवित्र पद हैं, जिनकी सबके साथ एकरुपता है, उन परमात्मा जनार्दन को मैं प्रणाम करता हूँ। सत्, चित् और आनन्द ही जिनका स्वरुप है, जो सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मादि देवतओं के लिये भी परम पद हैं, उन सर्वस्वरुप श्रेष्ठ सनातन भगवान् जनार्दन को मैं नमस्कार करता हूँ। जो सगुण, निर्गुण, शान्त, मायातीत और विशुद्ध माया के अधिपति हैं तथा जो रुपरहित होते हुए भी अनेक रुपवाले हैं, उन भगवान् जनार्दन को मैं प्रणाम करता हूँ। जो भगवान् इस जगत् की सृष्टि पालन और संहार करते हैं, उन आदिदेव भगवान् जनार्दन को मैं नमस्कार करता हूँ। परेश! परमानन्द! शरणागतवत्सल! दयासागर! मेरी रक्षा कीजिये। मन-वाणीसे अतीत परमेश्वर! आपको नमस्कार है। विप्रवर नारदजी! शङ्क, चक्र और गदा धारण करने वाले जगद्गुरु भगवान् विष्णु इस प्रकार स्तुति करने वाले मार्कण्डेयजी से अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक बोले।
श्रीभगवान् ने कहा- द्विजश्रेष्ठ! संसार में जो भक्त पुरुष मुझ भगवान् की भक्ति में चित्त लगाये रहने वाले हैं, उन पर संतुष्ट हो मैं सदा उनकी रक्षा करता हूँ, इसमें संदेह नहीं है। भगवद्भत्त्करुप से अपने को छिपाकर मैं ही सदा सब लोकों की रक्षा करता हूँ।
मार्कण्डेयजी ने पूछा- भगवन्! भगवद्भत्त्क के क्या लक्षण हैं? किस कर्म से मनुष्य भगवद्भत्त्क होते हैं, यह मैं सुनना चाहता हूँ; क्योंकि इस बात को जानने के लिये मेरे मन में बड़ी उत्कण्ठा है।
श्रीभगवान् न कहा- मुनिश्रेष्ठ! भगवद्भत्त्कों के लक्षण बतलाता हूँ, सुनो। उनके प्रभाव अथवा महिमा का वर्णन करोड़ो वर्षों में भी नहीं किया जा सकता। जो सम्पूर्ण जीवों के हितैषी हैं, जिनमें दूसरों के दोष देखने की आदत नहीं है, जो ईषर्यारिहत, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखने वाले, निष्काम एवं शान्त हैं, वे ही भगवद्भत्त्कों में श्रेष्ठ माने गये हैं। जो मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा दूसरों को कभी पीड़ा नहीं देते तथा जिनमें संग्रह अथवा कुछ ग्रहण करने का स्वभाव नहीं है, वे भगवद्भत्तक माने गये हैं। जिनकी सात्विक बुद्धि उत्तम भगवत्सम्बन्धी कथा-वर्ता सुनने में स्वभावतः लगी रहती है तथा जो भगवान् और उनके भक्तों के भी भक्त होते हैं, वे श्रेष्ठ भक्त समझे जाते हैं। जो श्रेष्ठ मानव माता और पिता के प्रति गङ्गा और विश्वनाथ का भाव रखकर उनकी सेवा करते हैं, वे भी श्रेष्ठ भगवद्भत्त्क हैं। जो भगवान् के पूजन में रत हैं, जो इसमें सहायक होते हैं तथा जो भगवान् की पूजा देखकर उसका अनुमोदन करते हैं, वे उत्तम भगवद्भत्त्क हैं। जो व्रतियों तथा यतियोंकी सेवामें संलग्र तथा परायी निन्दासे दूर रहते हैं, वे श्रेष्ठ भागवत हैं। जो श्रेष्ठ मनुष्य सबके लिये हितकारक वचन बोलते हैं और सबके गुणोंको ही ग्रहण करने वाले हैं, वे इस लोक में भगवद्भत्त्क माने गये हैं। जो श्रेष्ठ मानव सब जीवोंको अपने ही समान देखते तथा शत्रु और मित्र में भी समान भाव रखते हैं, वे उत्तम भगवद्भत्त्क हैं। जो धर्मशास्त्र के वक्ता, सत्यवादी तथा साधुपुरुषोंके सेवक हैं, वे भगवद्भत्त्कों में श्रेष्ठ कहे गये हैं। जो पुराणों की व्याख्या करते, जो पुराण सुनते और पुराण-वत्त्क में श्रद्धाभक्ति रखते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भत्त्क हैं। जो मनुष्य सदा गौओं तथा ब्राह्मणों की सेवा करते और तीर्थयात्रा में लगे रहते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भत्त्क हैं। जो मनुष्य दूसरों का अभ्युदय देखकर प्रसन्न होते और भगवन्नामका जप करते रहते हैं, वे उत्तम भागवत हैं। जो बगीचे लगाते, तालाब और पोखरों की रक्षा करते तथा बावड़ी और कुएँ बनवाते हैं, वे उत्तम भक्त हैं। जो तालाब और देवमन्दिर बनवाते तथा गायत्री-मन्त्र के जप में संलग्र रहते हैं, वे श्रेष्ठ भक्त हैं। जो हरिनामका आदर करते, उन्हें सुनकर अत्यन्त हर्ष में भर जाते और पुलकित हो उठते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भत्त्क हैं। जो मनुष्य तुलसी का बगीचा देखकर उसको नमस्कार करते और कानों में तुलसी काष्ठ धारण करते हैं, वे उत्तम भगवद्भत्त्क हैं। जो तुलसी की गन्ध सूँघकर प्रसन्न होते हैं, वे भी श्रेष्ठ भक्त हैं। जो वर्णाश्रम-धर्म के पालन में तत्पर, अतिथियों का सत्कार करने वाले तथा वेदार्थ के वक्त होते हैं, वे श्रेष्ठ भागवत माने गये है। जो भगवान् शिव से प्रेम रखने वाले, शिव के चिन्तन में ही आसक्त रहने वाले तथा शिव के चरणों की पूजा में तत्पर एवं त्रिपुण्ड्र धारण करने वाले हैं, वे भी श्रेष्ठ भक्त हैं। जो भगवान् विष्णु तथा परमात्मा शिवके नाम लेते तथा रुद्राक्षकी माला से विभूषित होते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भत्त्क हैं। जो बहुत दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा महादेवजी अथवा भगवान् विष्णु का उत्तम भक्ति से यजन करते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भत्त्क हैं। जो पढ़े हुए शास्त्रों का दूसरों के हित के लिये उपदेश करते और सर्वत्र गुण ही ग्रहण करते हैं, वे उत्तम भक्त माने गये हैं। परमेश्वर शिव तथा परमात्मा विष्णु में जो समबुद्धि से प्रवृत्त होते हैं, वे श्रेष्ठ भक्त माने गये हैं। जो शिवकी प्रसन्नता के लिये अग्रिहोत्र में तत्पर पश्चाक्षर मन्त्र के जप में संलग्र तथा शिव के ध्यान में अनुरक्त रहते हैं, वे उत्तम भागवत हैं। जो जलदान में तत्पर, अत्रदान में संलग्र तथा एकादशीव्रत के पालन में लगे रहने वाले हैं, वे श्रेष्ठ भक्त हैं। जो गोदान करते, कन्यादान में तत्पर रहते और मेरी प्रसन्नता के लिये सत्कर्म करते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भत्त्क हैं। विप्रवर मार्कण्डेय! यहाँ पर कुछ ही भगवद्भत्त्कों का वर्णन किया है। मैं भी सौ करोड़ वर्षों में भी उन सबका पूरा-पूरा वर्णन नहीं कर सकता। अतः विप्रवर! तुम भी सदा उत्तम शील से युक्त होकर रहो। समस्त प्राणियों को आश्रय दो। मन और इन्द्रियों को वश में रखो। सबके प्रति मैत्रीभाव रखते हुए धर्माचरण में लगे रहो। पुनः महाप्रलय-कालतक सब धर्मों का पालन करते हुए मेरे स्वरुप के ध्यान में तत्पर रहकर तुम परम मोक्ष प्राप्त कर लोगे।
देवताओं के स्वामी दयासिन्धु भगवान् विष्णु अपने भक्त मार्कण्डेयको इस प्रकार वरदान देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। महाभाग मार्कण्डेयजी सदा भगवान् के भजन में लगे रहकर उत्तम धर्मका पालन करने लगे। उन्होंने अनेक प्रकार के यज्ञोंद्वारा विधिपूर्वक भगवान् का पूजन किया। फिर महाक्षेत्र शालग्रामतीर्थ में उत्तम तपस्या की और भगवान् के ध्यान द्वारा कर्मबन्ध का नाश करके परम मोक्ष प्राप्त कर लिया। इसलिये भगवान् की आराधना करने वाला भक्त पुरुष समस्त प्राणियों का हितकारी होता है। वह मन से जो-जो वस्तुएँ पाना चाहता है, वह सब निस्संदेह प्राप्त कर लेता है।
सनकजी कहते हैं- विप्रवर नारद! तुमने जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार यह सब भगवद्भत्त्किका माहात्म्य मैंने तुम्हें बताया है। अब और क्या सुनना चाहते हो?