नारद महा पुराण
ब्रह्माजीके द्वारा यमराजको भगवान् तथा उनके भक्तोंकी श्रेष्ठता बताना
ब्रह्माणी बोले-धर्मराज! तुमने क्या आश्चर्यकी बात देखी है? क्यों इतने खिन्न हो रहे हो? किसीके उत्तम गुणोंको देखकर जो मनमें संताप होता है, वह मृत्युके तुल्य माना गया है। सूर्यनन्दन! जिनके नामका उच्चारण करनेमात्रसे परम पद प्राप्त हो जाता है, उन्हींकी प्रीतिके लिये उपवास करके मनुष्य वैकुण्ठधामको क्यों न जाय? भगवान् श्रीकृष्णके लिये किया हुआ एक बारका प्रणाम दस अश्वमेध-यज्ञोंके अवभृथ-सानके समान है। फिर भी इतना अन्तर है कि दस अश्वमेध-यज्ञ करनेवाला मनुष्य पुण्यभोगके पश्चात् पुनः इस संसारमें जन्म लेता है; परंतु श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला पुरुष फिर संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता। जिसकी जिहाके अग्रभागपर 'हरि' यह दो अक्षर विराजमान है, उसे कुरुक्षेत्र, काशी और विरजतीर्थक सेवनकी क्या आवश्यकता है? क्योंकि जो खिलवाड़में भी भगवान् विष्णुके नामका उच्चारण और श्रवण कर लेता है, वह मनुष्य गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेसे प्राप्त हुई पवित्रताके तुल्य पवित्रता प्राप्त कर लेता है। त्रिभुवननाथ पुरुषोत्तम हमारे जन्मदाता हैं, उनके दिन (एकादशी)-का सेवन करनेवाले पुरुषपर शासन कैसे चल सकता है? जो राजकर्मचारी इस पृथ्वीपर राजाके श्रेष्ठ भक्तोंको नहीं जानता, वह उनके विरुद्ध सम्पूर्ण आयास करके भी फिर उन्हींके द्वारा दण्डनीय होता है। अत: राजकार्यमें नियुक्त हुए पुरुषको चाहिये कि वे अपराधी होनेपर भी राजाके प्रिय जनोंपर शासन न करें, क्योंकि वे स्वामीके प्रसादसे सिद्ध (कृतकार्य) होते हैं और शासकपर भी शासन कर सकते हैं। सूर्यनन्दन! इसी प्रकार जो पापी होनेपर भी भगवान् जनार्दनके चरणोंकी शरणमें जा चुके हैं, उनपर तुम्हारा शासन कैसे चल सकता है? उनपर शासन करना तो मूर्खताका ही सूचक है। धर्मराज! यदि भगवान् शिवके, सूर्यके अथवा मेरे भक्तोंसे तुम्हारा विवाद हो तो मैं तुम्हारी कुछ सहायता कर सकता हूँ; किंतु भास्करनन्दन ! विष्णुभक्तोंके साथ सामना होनेपर मैं कोई सहायता नहीं कर सकूँगा; क्योंकि भगवान् पुरुषोत्तम सभी देवताओंके आदि हैं। भगवान मधुसूदनके भक्तोंको दण्ड देना सम्भव नहीं है। जिन्होंने किसी बहानेसे भी दोनों पक्षोंकी (एकादशीसंयुक्त) द्वादशीका सेवन किया है, उनके द्वारा यदि तुम्हारा अपमान हुआ है तो उसमें मैं तुम्हारा सहायक नहीं हो सकता।