नारद महा पुराण
श्रीशुकदेवजीकी ऊर्ध्वगति, श्वेतद्वीप तथा वैकुण्ठधाममें जाकर शुकदेवजीके द्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति और भगवान् की आज्ञा से शुकदेवजीका व्यासजीके पास आकर भागवतशास्त्र पढ़ना
सनन्दनजीने कहा-देवर्षे ! कैलास-पर्वतपर जाकर सूर्यके उदय होने पर विद्वान् शुकदेव हाथ- पैरोंको यथोचित रीतिसे रखकर विनीतभावसे पूर्वकी ओर मुँह करके बैठे और योगमें लग गये। उस समय उन्होंने सब प्रकारके सङ्गोंसे रहित परमात्माका दर्शन किया। यों उस परमात्माका साक्षात्कार करके शुकदेवजी खूब खुलकर हँसे। फिर वे वायुके समाज आकाशमें विचरने लगे। उस समय उनका तेज उदयकालीन अरुणके समान प्रकाशित हो रहा था। वे मन और वायुके समान आगे बढ़ रहे थे। उस समय सबने अपनी शक्ति तथा रीति-नीतिके अनुसार उनका पूजन से किया। देवताओंने उनपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की। उन्हें इस प्रकार ऊपर उठते देख गन्धर्व, अपारा, महर्षि तथा सिद्धगण सब आवर्षसे का चकित हो उठे। तत्पश्चात् वे नित्य, निर्गुण एवं लिङ्गरहित ब्रह्मापदमें स्थित हो गये। उस समय उनका तेज भूमरहित अयिकी भौति जद्दोश हो रहा था। आगे बढ़नेपर शुकदेवजीने पर्वतके दो अनुपम शिखर देखे, जिनमें एको हिमालयके समान वत्त तथा दूसरा मरुक समान पीतवर्ण था। एक रजतमय था और दूसरा सुवर्णमय। दोनों एक-दूसरेसे सटे हुए और सुन्दर थे। नारद! इनका विस्तार ऊपरकी ओर तथा अगल-बगलमें सौ-सौ योजनका था। शुकदेवजी दोनों शिखरोंके बीचसे सहसा आगे निकल गये। वह श्रेष्ठ पर्वत उनकी गतिको रोक न सका। उस समय शुकदेवजी वायुलोकसे ऊपर अन्तरिक्षमें यात्रा करते हुए अपना प्रभाव दिखाकर सर्वस्वरूप हो सम्पूर्ण लोकोंमें विचरण करने लगे। परम योगवेत्ता शुकदेवजी श्वेतद्वीपमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने पहले भगवान् श्रीनारायणदेवका प्रभाव देखा।
तत्पश्चात् जिन्हें वेदकी ऋचाएँ भी ढूँढ़ती फिरती हैं, उन देवाधिदेव जनार्दनका साक्षात् दर्शन त किया। दर्शनके अनन्तर शुकदेवजीने भगवान् की स्तुति की। नारद! उनकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवान् बोले।
श्रीभगवान् ने कहा-योगीन्द्र! मैं सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अदृश्य होकर रहता फिर भी तुमने मेरा दर्शन कर लिया है। ब्रह्मचार शुक! तुम सनत्कुमारजीके बताये हुए योगके द्वारी सिद्ध हो चुके हो। अत: वायुके मार्गमें स्थित होकर इच्छानुसार सम्पूर्ण लोकोंको देखो। विप्रवर! भगवान् वासुदेवके ऐसा कहनेपर शुकदेवमुनि उन्हें प्रणाम करके अखिलविश्ववन्दित विष्णुधामको गये। नारद! वैकुण्ठलोक विमानपर विचरनेवाले देवताओंसे सेवित है। उसे विरजा नामवाली दिव्य नदीने चारों ओरसे घेर रखा है। ठस दिव्य धामके प्रकाशित होनेसे ही ये सम्पूर्ण लोक प्रकाशित हो रहे हैं। वहाँ सुन्दर-सुन्दर बावड़ियाँ बनी है, जो कमलोंसे आच्छादित रहती हैं। उनके घाट मूंगके बने हुए हैं, जिनमें सुवर्ण और रन जड़े हुए हैं। वे सब बावड़ियाँ निर्मल जलसे भरी रहती हैं। वहाँके द्वारपाल चार साक्षी भुजाधारी होते हैं। नाना प्रकारके आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे सभी विष्वक्सेनजीके अनुयायी एवं सिद्ध हैं। उनकी कुमुद आदि नामोंसे प्रसिद्धि है। शुकदेवजीको उनमें से किसीने नहीं रोका। वे बिना बाधा भीतर प्रवेश कर गये। वहाँ उन्होंने सिद्ध-समुदायके द्वारा निरन्तर सेवित देवाधिदेव भगवान् विष्णुका दर्शन किया। उनके चार भुजाएँ थीं। वे शान्त एवं प्रसन्नमुख दिखायी देते थे। उनके श्रीअङ्गोंपर रेशमी पीताम्बर शोभा पा रहा था। शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म मूर्तिमान् होकर भगवान् की सेवामें उपस्थित थे। उनके वक्षःस्थलमें भगवती लक्ष्मी विराज रही थी और कौस्तुभमणिसे प्रकाशित हो रहे थे। उनके कटिभागमें करधनी, बायें कंधेपर यज्ञोपवीत, हाथोंमें कड़े तथा भुजाओंमें अङ्गद सुशोभित थे। माथेपर मण्डलाकार किरीट और चरणों में नूपुर शोभा दे रहे थे। भगवान् मधुसूदनका दर्शन करके शुकदेवने भक्तिभावसे उनकी स्तुति की।
शुकदेवजी बोले- सम्पूर्ण लोकोक एकमात्र माजीआवाजागदेवको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत् के बीजस्वरुप, सर्वत्र परिपूर्ण एवं निश्चल आत्मरूप आपको नमस्कार है। वासुकि नागकी शय्यापर शयन करनेवाले श्वेतद्वीपनिवासी श्रीहरिको नमस्कार है। आप हंस, मत्स्य, वाराह तथा नरसिंहरूप धारण करनेवाले हैं। ध्रुवके आराध्यदेव भी आप ही हैं। आप सांख्य और योग दोनोंके स्वामी हैं। आपको नमस्कार है। चारों सनकादि आपके ही अवतार हैं। आपने ही कच्छप और पृथुरूप धारण किया है। आत्मानन्द ही आपका स्वरूप है। आप ही नाभिपुत्र ऋषभदेवजीके रूपमें प्रकट हुए हैं। जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले आप ही हैं। आपको नमस्कार है। भृगुनन्दन परशुराम, रघुनन्दन श्रीराम, परात्पर श्रीकृष्ण, वेदव्यास, बुद्ध तथा कल्कि भी आपके ही स्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। कृष्ण, बलभद्र, प्रद्युम्र और अनिरुद्ध इन चार व्यूहोंके रूपमें आप ही विराज रहे हैं। जानने और चिन्तन करने योग्य परमात्मा भी आप ही हैं। नर-नारायण, शिपिविष्ट तथा विष्णु नामसे प्रसिद्ध आपको नमस्कार है। सत्य ही आपका धाम है। आप धामरहित हैं। गरुड़ आपके ही स्वरूप हैं। आप स्वयंप्रकाश, ऋभु (देवता), उत्तम व्रतका पालन करने के लिये विख्यात, उत्कृष्ट धामवाले यह और अजित हैं। आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्व आपका स्वरूप है। आप ही विश्वरूपमें प्रकट हैं। सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले भी आप ही हैं। यज्ञ और उसके भोक्ता, स्थूल और सूक्ष्म तथा याचना करनेवाले वामनरूप आपको नमस्कार है। सूर्य और चन्द्रमा आपके नेत्र हैं। साहस, ओज और बल आपसे भिन्न नहीं हैं। आप यज्ञोंद्वारा यजन करने योग्य, साक्षी, अजन्मा तथा अनेक हाथ, पैर और मस्तकवाले हैं। आपको नमस्कार है। आप लक्ष्मीके स्वामी, उनके निवासस्थान तथा भक्तोंके अधीन रहनेवाले हैं। आप शाङ्ग नामक धनुष धारण करते हैं। आठ प्रकृतियोंके अधिपति, ब्रह्मा तथा अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न आप परमेश्वरको नमस्कार है। बृहदारण्यक उपनिषद्के द्वारा आपके तत्त्वका बोध होता है। आप इन्द्रियोंके प्रेरक तथा जगत्स्रष्टा ब्रह्मा हैं। आपके नेत्र विकसित कमलके समान हैं। क्षेत्रज्ञके रूपमें आप ही प्रकाशित हो रहे हैं। आपको नमस्कार है। गोविन्द, जगत्कर्ता, जगत्राथ, योगी, सत्य, सत्यप्रतिज्ञ, वैकुण्ठ और अच्युतरूप आपको नमस्कार है। अधोक्षज, धर्म, वामन, त्रिधातु, तेज:पुञ्ज धारण करनेवाले, विष्णु, अनन्त एवं कपिलरूप आपको नमस्कार है। आप ही विरिश्चि नामसे प्रसिद्ध ब्रह्माजी हैं। तीन शिखरोंवाला त्रिकूट पर्वत आपका ही स्वरूप है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद आपके अभिन्न विग्रह हैं। एक सींगवाले शृङ्गी ऋषि भी आपकी ही विभूति हैं। आपका यश परम पवित्र है तथा सम्पूर्ण वेद-शास्त्र आपसे ही प्रकट हुए हैं। आपको नमस्कार है।आप वृषाकपि (धर्मको अविचल रूपसे स्थापित का चाले विष्णु, शिव और इन्द्र) हैं। सम्पूर्ण समृद्धियोंसे सम्पन्न तथा प्रभु सर्वशक्तिमान् हैं यह सम्पूर्ण विश्व आपकी ही रचना है। भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक आपके ही स्वरूप हैं। आप दैत्योंका नाश करनेवाले तथा निर्गुण रूप हैं। आपको नमस्कार है। आप निरञ्जन, नित्य, अव्यय और अक्षररूप हैं। शरणागतवत्सल ईश्वर! आपको नमस्कार है। आप मेरी रक्षा कीजिये।
इस प्रकार स्तुति करनेपर प्रणतजनोंपर दया करनेवाले शङ्ख, चक्र और गदाधारी भगवान् विष्णु शुकदेवजीसे इस प्रकार बोले।
श्रीभगवान् ने कहा- उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महाभाग व्यासपुत्र! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें विद्या और भक्ति दोनों प्राप्त हों।
गीताके अनुसार आठ प्रकृतियोंके नाम इस प्रकार हैं- भूमि, जल, अग्रि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहङ्कार।
तुम ज्ञानी और साक्षात् मेरे स्वरूप हो। ब्रह्मन्! तुमने पहले खेतद्वीपमें जो मेरा स्वरूप देखा है, वह मैं ही हूँ। सम्पूर्ण विश्वकी रक्षाके लिये मैं वहाँ स्थित हूँ। मेरा वही स्वरूप भिन्न-भिन्न अवतार धारण करनेके लिये जाता है। महाभाग। मोक्षधर्मका निरन्तर चिन्तन करनेसे तुम सिद्ध हो गये हो। जैसे वायु तथा सूर्य आकाशमें विचरण करते हैं, उसी प्रकार तुम भी समस्त श्रेष्ठ लोकों में भ्रमण कर सकते हो। तुम नित्य मुक्तस्वरूप हो। मैं ही सबको शरण देनेवाला हूँ। संसारमें मेरे प्रति भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है। उस भक्तिको प्राप्त कर लेनेपर और कुछ पाना शेष नहीं रहता।
(वह तुमको प्राप्त हो गयी) बदरिकाश्रममें नर-नारायण ऋषि कल्पान्त कालतकके लिये तपस्या स्थित हैं। उनकी आज्ञासे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तुम्हारे पिता व्यास भागवत शास्त्रका सम्पादन करेंगे। अतः तुम पृथ्वीपर जाओ और उस शास्त्रका अध्ययन करो। इस समय वे गन्धमादन पर्वतपर तपस्या करते हैं।
नारदजी! भगवान्के ऐसा कहनेपर शुकदेवीने उन चार भुजाधारी श्रीहरिको नमस्कार किया और वे पिताके समीप लौट गये। तदनन्तर शुकदेवको अपने निकट देख परम प्रतापी पराशरनन्दन भगवान् व्यासका मन प्रसन्न हो गया। वे पुत्रको पाकर तपस्यासे निवृत्त हो गये। फिर भगवान् नारायण और नर श्रेष्ठ नरको नमस्कार, करके शुकदेवजीके साथ अपने आश्रमपर आये। मुनीश्वर नारद! तुम्हारे मुखसे भगवान् नारायणका आदेश पाकर उन्होंने अनेक प्रकारके शुभ उपाख्यानेसे युक्त दिव्य भागवतसंहिता बनायी, जो वेदके तुल्य माननीय तथा भगवद्भक्तिको बढ़ानेवाली है। व्यासजीने वह संहिता अपने निवृत्तिपरायण पुतं शुकदेवको पढ़ायी। व्यासनन्दन भगवान् शुक यद्यपि आत्माराम हैं तथापि उन्होंने भक्तों को सदा प्रिय लगनेवाली उस संहिताका बड़े उत्साह से अध्ययन किया। अनघ! इस प्रकार ये मोक्षधर्म बतलाये गये, जो पाठकों और श्रोताओंके हृदय में भगवान्की भक्ति बढ़ानेवाले हैं।
शान्तं प्रसन्नवदनं पीतकौशेयवाससम्। शङ्खचक्रगदापद्मैर्मूर्तिमद्धिरुपासितम्।
वक्षःस्थलस्थया लक्ष्म्या कौस्तुभेन विराजितम्।
धाजत्किरीटवलयं मणिनूपुरशोभितम्।
तं दृष्टा भक्तिभावेन तुष्टाव मधुसूदनम्।
नमस्ते वासुदेवाय सर्वलोकैकसाक्षिणे।।
जगद्वीजस्वरुपाय पूर्णाय निभृतात्सने।
हरये वासुकिस्थाय श्वेतद्वीपनिवासने।।
हंसाय मत्स्यरुपाय वाराहतनुधारिणे।
नृसिंहाय ध्रुवेज्याय सांख्ययोगेश्वराय च।।
चतुःसनाय कूर्माय पृथवे स्वसुखात्मने।
नाभोयाय जगद्धान्ने विधान्नेन्तकराय च।।
भार्गवेन्द्राय रामाय राघवाय पराय च।
कृष्णाय वेदकर्न्ने च बुद्धकल्किस्वरुपिणे।।
चतुव्यूहाय वेद्याय ध्येयाय परमात्मने।
नरनारायणाख्यात शिपिविष्टाय विष्णवे।।
ऋतधाम्ने विधाम्ने च सुपर्णाय स्वरोचिषे।
ऋभवे सुव्रताख्यान सुधाम्ने चाजिताय च।।
विश्वरुपाय विश्वाय सृष्टिस्थित्यन्तकारिणे।
यज्ञाय यज्ञभोवन्ने च स्थविष्ठायाणवेर्थिने।।
आदित्यसोमनेन्नाय सहओजोबलाय च।
ईज्याय साक्षिणेजाय बहुशीर्षाङ्घ्रिबाहवे।।
श्रीशाय श्रीनिवासाय भक्तश्याय शाङ्गिणे।
अष्टप्रकृत्यधीशाय ब्रह्मणेनन्तशत्कये।।
बृहदारण्यवेद्याय ह्रषीकेशाय वेधसे।
पुण्डरीकनिभाक्षाय क्षेन्नज्ञाय विभासिने।।
गोविन्दाय जगत्कर्न्नें जगन्नाथाय योगिने।
स्त्याय सत्यसंधाय वैकुण्ठायाच्युताय च।।
अधोक्षजाय धर्माय वामनाथ न्निधातवे।
स्तयाय सत्यसंधाय वैकुण्ठायाच्युताय च।।
अधोक्षजाय धर्माय वामनाय न्निधातवे।
धृतार्चिषे विष्णवे तेनन्ताय कपिलाय च।।
विरिञ्चये न्निककुदे ऋग्यजुःसामरुपिणे।
एकश्रृङ्गय च शुचिश्रवसे शास्नयोनये।।
वृषाकपय ऋद्धाय प्रभवे विश्वकर्मणे।
भूर्भुवःस्वःस्वरुपाय दैत्यघ्रे निर्गुणाय च।।
निरञ्जनाय नित्याय ह्मव्ययाक्षराय च।
नमस्ते पाहि मामीश शरणागतवत्सल।।