नारद महा पुराण
समुद्र-स्नानकी महिमा और श्रीकृष्ण-बलराम आदिके दर्शन आदिकी महिमा तथा श्रीकृष्णसे जगत्-सृष्टिका कथन एवं श्रीराधाकृष्णके उत्कृष्ट स्वरुपका प्रतिपादन
पुरोहित वसु कहते हैं- मोहिनी! इस प्रकार भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी विधिवत् पूजा करके उनके चरणों में मस्तक झुकाये। फिर समुद्रसे प्रार्थना करे-
प्राणस्त्वं सर्वभूतानां योनिश्च सरितां पते।
तीर्थराज नमस्तेऽस्तु त्राहि मामच्युतप्रिय॥
(ना० उत्तर० ५८। २)
'सरिताओंके स्वामी तीर्थराज! आप सम्पूर्ण भूतोंके प्राण और योनि हैं। आपको नमस्कार है। अच्युतप्रिय! मेरी रक्षा कीजिये।'
इस प्रकार उस उत्तम क्षेत्र समुद्र में भलीभांति स्नान करके तटपर अविनाशी भगवान् नारायणकी विधिपूर्वक पूजा करे। तदनन्तर समुद्रको प्रणाम करके बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्राके चरणों में मस्तक झुकाना चाहिये। ऐसा करनेवाला मानव सौ अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है और सब पापोंसे मुक्त हो सब प्रकारके दुःखोंसे छुटकारा पा जाता है। अन्तमें सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर बैठकर श्रीविष्णुलोक में जाता है। ग्रहण, संक्रान्ति, अयनारम्भ, विषुवयोग, युगादि तिथि, मन्चादि तिथि, व्यतीपातयोग, तिथिक्षय, आषाढ़, कार्तिक और माधकी पूर्णिमा तथा अन्य शुभ तिथियोंगे जो उत्तम बुद्धिवाले पुरुष वहाँ ब्राहाणोंको दान देते हैं, वे अन्य तीचौकी अपेक्षा
हजार गुना फल पाते हैं, जो लोग वहाँ विधिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान देते हैं, उनके पितर अक्षय तृप्ति-लाभ करते हैं।
देवि! इस प्रकार मैंने समुद्र में स्नान, दान एवं पिण्डदान करनेका फल बतलाया। यह धर्म, अर्थ एवं मोक्षरूप फल देनेवाला, आयु, कीर्ति तथा यशको बढ़ानेवाला, मनुष्योंको भोग और मोक्ष देनेवाला तथा उनके बुरे स्वप्रोंका नाश करनेवाला धन्य साधन है। यह सब पापोंको दूर करनेवाला, पवित्र तथा इच्छानुसार सब फलोंको देनेवाला है। इस पृथ्वीपर जितने तीर्थ, नदियाँ और सरोवर हैं, वे सब समुद्रमें प्रवेश करते हैं, इसलिये वह सबसे श्रेष्ठ है। सरिताओंका स्वामी समुद्र सब तीर्थोंका राजा है, अतः वह सभी तीर्थोंसे श्रेष्ठ है। जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकारका नाश हो जाता है उसी प्रकार तीर्थराज समुद्र में स्रान करनेपर सब पापोंका क्षय हो जाता है। जहाँ निन्यानवे करोड़ तीर्थ रहते हैं उस तीर्थराजके गुणोंका वर्णन कौन कर सकता है। अत: वहाँ स्नान, दान, होम, जप तथा देवपूजन आदि जो कुछ सत्कर्म किया जाता है, वह अक्षय बताया गया है।
मोहिनीने पूछा-गुरुदेव । पुराणों में राधामाधवका वर्णन रहस्यरूप है। सुव्रत। आप सब कुछ यथार्थरूपसे जानते हैं, अत: उसे बताइये।
वसिष्ठजी कहते है-राजन् ! मोहिनीका यह वचन सुनकर महात्मा बसु जो भगवान् गोविन्दके अत्यन्त भक्त थे, उनके चिन्तनमें निमग्र हो गये। उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया। हृदयमें हर्षकी बाढ़-सी आ गयी; अतः वे द्विजश्रेष्ठ मुग्ध होकर मोहिनीसे प्रसन्नतापूर्वक बोले।
पुरोहित वसुने कहा- देवि! भगवान् श्रीकृष्णका चरित्र परम गोपनीय तथा रहस्योंमें भी अत्यन्त रहस्यभूत है। मैं बताता हूँ सुनो। जो प्रकृति और पुरुषके भी नियन्ता, विधाताके भी विधाता और संहारकारी कालके भी संहारक हैं उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ। देवि! ब्रह्म श्रीकृष्णस्वरूप है। सब अवतार उसीके हैं। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही अवतारी हैं। वे स्वयं ही सगुण भी हैं और निर्गुण भी। वस्तुतः वे ही श्रीराम हैं और वे ही श्रीकृष्ण । सम्पूर्ण लोक प्राकृत गुणोंसे उत्पन्न हुए हैं। स्वयं गोलोकधाम निर्गुण है। भद्रे । गोलोकमैं जो 'गो' शब्द है, उसका अर्थ है तेज अथवा किरण। वेदवेत्ता पुरुषोंने ऐसा ही निरूपण किया है। देवि ! वह तेजोमय ब्रह्म सदा निर्गुण है। गुणोंका उत्पादक भी वही माना गया है। प्रकृति उस परमात्माकी शक्ति मानी गयी है। प्रधान प्रकृतिको कार्षकारणरूप बताया गया है। पुरुषको साक्षी, सनातन एवं निर्गुण कहते हैं। पुरुषने प्रकृति, तेजका आधान किया। इससे सत्त्व आदि गुण उत्पन्न हुए। उन गुणोंसे महत्तत्त्वका प्रादुर्भाव हुआ। पुरुषके संकल्पसे वह महत्तत्त्व अहंकाररूपमें प्रकट हुआ। भद्रे! वह अहंकार द्रव्य, ज्ञान और क्रियारूपसे तथा वैकारिक, तैजस और तामसरूपसे तीन प्रकारका है। वैकारिक अहंकारसे मन तथा दस वैकारिक देवता प्रकट हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं-दिशा, वायु, सूर्य, वरुण, अश्विनीकुमार, ब्रह्मा, इन्द्र, उपेन्द्र, मित्र और मृत्यु। तैजस अहंकारसे इन्द्रियोंकी उत्पत्ति बतायी गयी है। उनके दो भेद हैं-ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियाँ । श्रोत्र, त्वचा, घ्राण, नेत्र तथा जिह्या-ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा सुभगे! वाणी, हाथ, पैर, शिश्न तथा गुदा-ये कर्मेन्द्रियाँ हैं। साध्वी मोहिनी! तामस अहंकारसे शब्दकी उत्पत्ति हुई। उस शब्दसे आकाश प्रकट हुआ। आकाशसे स्पर्श हुआ और स्पर्शसे वायुतत्त्वका प्रादुर्भाव हुआ। वायुसे रूप प्रकट हुआ तथा रूपसे तेजकी उत्पत्ति हुई। सती! तेजसे रस हुआ तथा रससे जलकी उत्पत्ति हुई। जलसे गन्धकी उत्पत्ति हुई और गन्धसे पृथ्वी उत्पन्न हुई। इस पृथ्वीपर ही चराचर प्राणियोंकी स्थिति देखी जाती है। आकाश आदि तत्त्वोंमें क्रमश: एक, दो, तीन और चार गुण हैं। भूमिमें पाँच गुण बताये गये हैं। अतः ये पाँचों भूत विशेष कहे गये हैं। काल और मायाके अंशसे प्रेरित हुए इन पाँच भूतोंसे अचेतन अण्डकी उत्पत्ति हुई। सती मोहिनी ! उसमें पुरुषके प्रवेश करनेसे वह सचेतन हो उठा। उस अण्डसे विराट पुरुष उत्पन्न हुआ और वह जलके भीतर शयन करने लगा। भामिनि। बलमें सोये हुए विराट पुरुषके बोलने आदि व्यवहारकी सिद्धिके लिये मुख आदि अङ्ग तथा भित्र-भिन्न अवयव प्रकट हुए। उस पुरुषकी नाभिसे एक कमल उत्पन्न हुआ जो सहस्रों सूर्योसे भी अधिक प्रकाशमान था। उस कमलसे सम्पूर्ण जगत्के प्रपितामह स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। उन्होंने तीव्र तपस्या करके परम पुरुष परमात्माकी आज्ञा ले लोकों और लोकपालोंकी रचना की। ब्रह्माजीने कटि आदि नीचेके अङ्गोंसे सात पातालोंकी और ऊपरके अङ्गोंसे भूः आदि सात लोकोंकी सृष्टि की। इन चौदह भुवनोंसे युक्त ब्रह्माण्ड बताया गया है। ब्रह्माजीने इस चतुर्दशभुवनात्मक ब्रह्माण्डमें समस्त चराचर भूतोंकी सृष्टि की है। ब्रह्माजीके मनसे चार सनकादि महात्मा उत्पन्न हुए हैं। देवि! ब्रह्माजीके शरीरसे भृगु आदि पुत्र उत्पन्न हुए हैं, जिन्होंने इस जगत्को बढ़ाया है।
पुरोहित वसु कहते हैं- महाभागे! वे जो निरञ्जन, सच्चिदानन्दस्वरूप, ज्योतिर्मय, जनार्दन भगवान् श्रीकृष्ण हैं, उनका लक्षण सुनो। वे सर्वव्यापी हैं और ज्योतिर्मय गोलोकके भीतर नित्य निवास करते हैं। एकमात्र श्रीकृष्ण ही दृश्य तथा अदृश्यरूपधारी परब्रह्म हैं। मोहिनी! गोलोकमें गौएँ, गोप और गोपियाँ हैं। वहाँ वृन्दावन,