नारद महा पुराण
वेदके द्वितीय अङ्ग कल्पका वर्णन-गणेशपूजन,ग्रहशान्ति तथा श्राद्धका निरुपण
सनन्दनजी कहते हैं-मुनीश्वर! अब मैं कल्पग्रन्थका वर्णन करता हूँ; जिसके विज्ञानमात्रसे मनुष्य कर्ममें कुशल हो जाता है। कल्प पाँच प्रकारके माने गये हैं-नक्षत्रकल्प, वेदकल्प, संहिताकल्प, आङ्गिरसकल्प और शान्तिकल्प। नक्षत्रकल्पमें नक्षत्रोंके स्वामीका विस्तारपूर्वक यथार्थ वर्णन किया गया है; वह यहाँ भी जानने योग्य है। मुनीश्वर ! वेदकल्पमें ऋगादि-विधानका विस्तारसे वर्णन है-जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिके लिये कहा गया है। संहिताकल्पमें तत्त्वदर्शी मुनियोंने मन्त्रोंके ऋषि, छन्द और देवताओंका निर्देश किया है। आङ्गिरसकल्पमें स्वयं ब्रह्माजीने रि-विधिसे विस्तारपूर्वक छ; कोका वर्णन किया है। मुनिश्रेष्ठ! शान्तिकल्पमें दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष सम्बन्धी उपातोंको पृथक्-पृथक् शान्ति बतायी गयी है। यह संक्षेपसे कल्पके स्वरूपका परिचय दिया गया है, अन्य शाखाओंमें इसका विशेष रूपसे पृथक्-पृथक निरूपण किया गया है। विजये। गृहकल्प
सबके लिये उपयोगी है, अत: इस समय उसीका वर्णन करूँगा। सावधान होकर सुनो। पूर्वकालमें 'ॐकार' और 'अथ' शब्द-ये दोनों ब्रह्माजीके कण्ठका भेदन करके निकले थे, अत: ये मङ्गल-सूचक हैं। जो शास्त्रोक्त कर्मोका अनुष्ठान करके उन्हें ऊँचे उठाना चाहता है, वह अथ' शब्दका प्रयोग करे। इससे वह कर्म अक्षय होता है। परिसमूहनके लिये परिगणित शाखावाले कुशं कहे गये हैं, न्यून या अधिक संख्यामें उन्हें ग्रहण करनेपर वे अभीष्ट कर्मको निष्फल कर देते हैं। पृथ्वीपर जो कृमि, कीट और पतंग आदि भ्रमण करते हैं, उनकी रक्षाके लिये परिसमूहन कहा गया है। ब्रह्मन् । वेदीपर जो तीन रेखाएँ कही गयी हैं, उनको बराबर बनाना चाहिये, उन्हें न्यूनाधिक नहीं करना चाहिये ऐसा ही शास्त्रका कथन है। नारद। यह पृथ्वा मधु और कैडर नामवाले देल्याकमेटसेयरसलिये इसे गोलो लीपना चाहिये। जो भाव चयापुर दोनाङ्गी और मृतवत्सा (जिसके बछ़ड़े मर जाते हों ऐसी) हो, उसका गोनर यज्ञके कार्य में नहीं लाना चाहिये, ऐसी शास्त्रकी आज्ञा है। विप्रवर! जो पता आदि भयंकर जीव सदा आकाशमें उड़ते रहते हैं, उनपर प्रहार करनेके लिये वेदीसे मिट्टी उठानेका विधान है। सुवाके मूलभागसे अथवा कुशसे वेदीपर रेखा करनी चाहिये। इसका उद्देश्य है अस्थि, कण्टक, तुष-केशादिसे शुद्धि। ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। द्विज श्रेष्ठ! सब देवता और पितर जलस्वरूप हैं, अतः विधिज्ञ ऋषि-मुनियोंने जलसे वेदीका प्रोक्षण करनेकी आज्ञा दी है। सौभाग्यवती स्त्रियोंके द्वारा ही अग्नि लानेका विधान है। शुभदायक मृण्मय पात्रको जलसे धोकर उसमें अग्नि रखकर लानी चाहिये। वेदीपर रखा हुआ अमृतकलश दैत्योंद्वारा हड़प लिया गया, यह देखकर ब्रह्मा आदि सब देवताओंने वेदीकी रक्षाके लिये उसपर समिधासहित अग्निकी स्थापना की। नारद! यज्ञसे दक्षिण दिशामें दानव आदि स्थित होते हैं; अत: उनसे यज्ञकी रक्षाके लिये ब्रह्माको यज्ञवेदीसे दक्षिण दिशामें स्थापित करना चाहिये। नारद! उत्तर दिशामें प्रणीता-प्रोक्षणी आदि सब यज्ञपात्र रखे। पश्चिममें यजमान रहे और पूर्वदिशामें सब ब्राह्मणोंको रहना चाहिये। जुएमें, व्यापारमें और यज्ञकर्ममें यदि कर्ता उदासीनचित्त हो जाय तो उसका वह कर्म नष्ट हो जाता है-यही वास्तविक स्थिति है। यज्ञकर्ममें अपनी ही शाखाके विद्वान् ब्राह्मणों को ब्रह्मा और आचार्य बनाना चाहिये। अन्य ऋत्विजोंके लिये कोई नियम नहीं है, यथालाभ उनका पूजन करना चाहिये। तीन-तीन अंगुलकी दो पवित्री होनी चाहिये। चार अंगुलकी एक पोक्षणी, तीन अंगुलकी एक आयस्थाली और छ: अंगुलकी चरुस्थाली होनी चाहिये। दो अंगुलका एक उपयमन कुश और एक अंगुलका सम्मार्जन कुश रखे। सब छ: अंगुलका और सुच् साढ़े तीन अंगुलका बताया गया है। समिधाएँ प्रादेशमात्र (अँगूठेसे लेकर तर्जनीके शिरोभागतकके नापकी) हों। पूर्णपात्र छ: अंगुलका हो। प्रोक्षणीके उत्तर भागमें प्रणीता-पात्र रहे और वह आठ अंगुलका हो। जो कोई भी तीर्थ (सरोवर), समुद्र और सरिताएँ हैं, वे सब प्रणीता-पात्रमें स्थित होते हैं; अत: उसे जलसे भर दे। द्विज श्रेष्ठ ! वस्त्रहीन वेदी नग्न कही जाती है; अत: विद्वान् पुरुष उसके चारों ओर कुश बिछाकर उसके ऊपर अग्निस्थापन करे। इन्द्रका वज्र, विष्णुका चक्र और महादेवजीका त्रिशूल-ये तीनों कुशरूपसे तीन 'पवित्रच्छेदन' बनते हैं। पवित्रीसे ही प्रोक्षणीको प्रणीताके जलसे संयुक्त करना चाहिये। अतः पवित्र-निर्माण अत्यन्त पुण्यदायक कर्म कहा गया है। आज्यस्थाली पलमात्रकी बनानी चाहिये। कुम्हारके चाकपर गढ़ा हुआ मिट्टीका पात्र 'आसुर' कहा गया है। वही हाथसे बनाया हुआ-स्थालीपात्र आदि हो तो उसे 'दैविक' माना गया है। स्त्रुवसे शुभ और अशुभ सभी कर्म होते हैं। अत: उसकी पवित्रताके लिये उसे अग्निमें तपानेका विधान है। स्रुवको यदि अग्रभागकी ओरसे थाम लिया जाय तो स्वामीकी मृत्यु होती है। मध्यमें पकड़ा जाय तो प्रजा एवं संततिका नाश होता है और मूलभागमें उसे पकड़नेसे होताकी मृत्यु होती है। अत: विचार कर उसे हाथमें धारण करना चाहिये। अग्नि, सूर्य, सोम, विरशि (ब्रह्माजी), वायु तथा यम-ये छ: देवता खुवके एक-एक अंगुलमें स्थित हैं। अनि भोग और धनका नाश करनेवाले हैं, सूर्ग रोगकारक होते हैं। नगमाका कोई फल नहीं है। ब्रह्माजी सब कामना देनेवाले हैं, वायुदेव वृद्धिदाता है और यमराज मृत्युदायक माने गये हैं(अतः स्रुवको मूलभाग की ओर तीन अंगुल छोड़कर चौथे-पाँचवें अंगुलपर पकड़ना चाहिये)। सम्मान और उपयमन नामक दो कुश बनाने चाहिये। इनमेंसे सम्मार्जन कुश सात शाखा (कुश)-का और उपयमन कुश पाँचका होता है। सुव तथा सुक् -निर्माण करनेके लिये श्रीपर्णी (गंभारी), शमी, खदिर, विकछूत (कैंटाई) और पलाश-ये पाँच प्रकारके काष्ठ शुभ जानने चाहिये। हाथभरका सुवा उत्तम माना गया है और तीस अंगुलका सुक् । यह ब्राह्मणों के स्रुव और सक्के विषयमें बताया गया है; अन्य वर्णवालोंके लिये एक अंगुल छोटा रखनेका विधान है। नारद! शूद्रों, पतितों तथा गर्दभ आदि जीवोंके दृष्टि-दोषका निवारण करनेके लिये सब पात्रों के प्रोक्षणकी विधि है। विप्रवर! पूर्णपात्र- दान किये बिना यज्ञमें छिद्र उत्पन्न हो जाता है और पूर्णपात्रकी विधि कर देनेपर यज्ञकी पूर्ति हो जाती है। आठ मुट्ठीका 'किञ्चित्' होता है, चार किञ्चित्का 'पुष्कल' होता है और चार पुष्कलका एक 'पूर्णपात्र' होता है, ऐसा विद्वानोंका मत है। होमकाल प्राप्त होनेपर अन्यत्र कहीं आसन नहीं देना चाहिये। दिया जाय तो अग्निदेव अतृप्त होते और दारुण शाप देते हैं। 'आधार' नामको दो आहुतियाँ अग्निदेवकी नासिका कही गयी हैं। 'आज्यभाग' नामवाली दो आहुतियाँ उनके नेत्र हैं। 'प्राजापत्य' आहुतिको मुख कहा गया है और व्याहृति होमको कटिभाग बताया गया है। पशवारुण होमको दो हाथ, दो पैर और मस्तक कहते हैं। विप्रवर। 'स्विष्टकृत्' होम तथा पूर्णाहुति-ये दो आहुतियाँ दोनों कान हैं। अग्निदेवके दो मुख, एक हृदय, चार कान, दो नाक, दो मस्तक, छ: नेत्र, पिङ्गल वर्ण और सात जिताएँ हैं। उनके वाम-भागमें तीन और दक्षिण-भागमें चार हाथ हैं। सुरु, सुवा, अक्षमाला और शक्ति-ये सब उनके दाहिने हाथोंमें है। उनके तीन मेखला और तीन पैर हैं। वे घृतपात्र लिये हुए हैं। दो चक्र धारण करते हैं। भेड़पर चढ़े हुए हैं। उनके चार सींग हैं। बालसूर्यके समान उनकी अरुण कान्ति है। वे यज्ञोपवीत धारण करके जटा और कुण्डलोंसे सुशोभित हैं। इस प्रकार अग्निके स्वरूपका ध्यान करके होमकर्म प्रारम्भ करे। दूध, दही, घी और घृतपक्व या तैलपक्च पदार्थका जो हाथसे हवन करता है, वह ब्राह्मण ब्रह्महत्यारा होता है (इन सबका सुवासे होम करना चाहिये)। मनुष्य जो अन्न खाता है, उसके देवता भी वही अन्न खाते हैं। सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये हविष्यमें तिलका भाग अधिक रखना उत्तम माना गया है। होममें तीन प्रकारकी मुद्राएँ बतायी गयी हैं-मृगी, हंसी और सूकरी। अभिचार- कर्ममें सूकरी-मुद्राका उपयोग होता है और शुभकर्ममें तथा हंसी नामवाली मुद्राएँ उपयोगमें लायी जाती हैं। सब अंगुलियोंसे सुकरी-मुद्रा बनती है। हंसी-मुद्रामें कनिष्ठिका अंगुलि मुक्त रहती है और मृगी नामवाली मुद्रा केवल मध्यमा, अनामिका और अङ्गुष्ठद्वारा सम्पन्न होनेवाली कही गयी है। पूर्वोक्त प्रमाणवाली आहुतिको पाँचों अंगुलियोंसे लेकर उसके द्वारा अन्य ऋत्विजोंके साथ हवन करे। हवन सामग्रीमें दही, मधु और घी मिलाया हुआ तिल होना चाहिये। पुण्यकर्मोंमें संलग्न होनेपर अपनी अनामिका अंगुलिमें कुशोंकी पवित्री अवश्य धारण करनी चाहिये।
भगवान् रुद्र और ब्रह्माजीने गणेशजीको 'गणपति' पदपर बिठाया और कमि वित्र डालनेका कार्य उन्हें सौंप रखा है। वे विघ्नेश विनायक जिसपर सवार होते है, उस पुरुषके लक्षण सुनो। वह स्वप्रय बात अगाध जलमें प्रवेश कर जाता है, मूंड मुड़ाये मनुष्योंको तथा गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाले पुरुषोंको देखता है। कच्चा मांस खानेवाले गृध्र आदि पक्षियों तथा व्याघ्र आदि पशुओंपर चढ़ता है। एक स्थानपर चाण्डालों, गदहों और ऊँटोंके साथ उनसे घिरा हुआ बैठता है। चलते समय भी अपने-आपको शत्रुओंसे अनुगत मानता है-उसे ऐसा भान होता है कि शत्रु मेरा पीछा कर रहे हैं। (जाग्रत्- अवस्थामें भी) उसका चित्त विक्षिप्त रहता है। उसके द्वारा किये हुए प्रत्येक कार्यका आरम्भ निष्फल होता है। वह अकारण खिन्न रहता है। विघ्नराजका सताया हुआ मनुष्य राजाका पुत्र होकर भी राज्य नहीं पाता। कुमारी कन्या अनुकूल पति नहीं पाती, विवाहिता स्त्रीको अभीष्ट पुत्रकी प्राप्ति नहीं होती। श्रोत्रियको आचार्यपद नहीं मिलता, शिष्य स्वाध्याय नहीं कर पाता, वैश्यको व्यापारमें और किसानको खेतीमें लाभ नहीं हो पाता।
ऐसे पुरुषको किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्तमें विधिपूर्वक स्नान कराना चाहिये। पीली सरसों पीसकर उसे घीसे ढीला करे और उस मनुष्यके शरीरमें उसीका उबटन लगाये। प्रियङ्गु, नागकेसर आदि सब प्रकारकी ओषधियों और चन्दन, अगुरु, कस्तूरी आदि सब प्रकारको सुगन्धित वस्तुओंको उसके मस्तकमें लगाये। फिर उसे भद्रासनपर बिठाकर उसके लिये बाहाणामे शुभ स्वस्तिवाचन (पुण्याहवाचन) कराये। अश्वशाला, गजशाला, वल्मीक (बॉबी), नदीसङ्गम तथा जलाशयसे लायी हुई पाँच प्रकारकी मिट्टी, गोरोचन, गन्ध (चन्दन, कुंकुम, अगुरु आदि) और गुग्गुल-ये सब वस्तुएँ जलमें छोड़े और उसी जलमें छोड़े, जो गहरे और कभी न सूखनेवाले जलाशयसे एक रंगके चार नये कलशोंद्वारा लाया गया हो। तदनन्तर लाल रंगके वृषभचर्मपर भद्रासन* स्थापित करे। (इसी भद्रासनपर यजमानको बैठाकर ब्राह्मणोंसे पूर्वोक्त स्वस्तिवाचन कराना चाहिये। इसके सिवा स्वस्तिवाचनके अनन्तर जिनके पति और पुत्र जीवित हों, ऐसी सुवेशधारिणी स्त्रियोंद्वारा मङ्गल-गान कराते हुए पूर्वदिशावर्ती कलशको लेकर आचार्य निम्राङ्कित मन्त्रसे यजमानका अभिषेक करे-)
सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम्।
तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते॥
'जो सहस्रों नेत्रों (अनेक प्रकारकी शक्तियों) से युक्त हैं, जिसकी सैकड़ों धाराएँ (बहुत-से प्रवाह) हैं। और जिसे महर्षियोंने पावन बनाया है, उस पवित्र जलसे मैं तुम्हारा अभिषेक करता हूँ। पावमानी ऋचाएँ तथा यह पवित्र जल तुम्हें पवित्र करें (और विनायकजनित विघ्रकी शान्ति हो)।'
(तदनन्तर दक्षिण दिशामें स्थित द्वितीय कलश लेकर नीचे लिखे मचको पढ़ते हुए अभिषेक करे-)
भगं ते वरुणो राजा भर्ग सूर्यो बृहस्पतिः ।
भगमिन्द्र श्रायुध भर्ग सार्थचो बतु ।।
*'पूर्वोक्त गन्ध-औषधादिसहित चार कलशोंमें आम्र आदिके पल्लव रखकर उनके कण्ठमें माला पहनाये, उन्हें चन्दनसे चर्चित करे और नूतन वस्त्रसे विभूषित करके उन कलशोंको पूर्वादि चारों दिशाओंमें स्थापित कर दे। फिर पवित्र एवं लिपी-पुती वेदीपर पाँच रंगोंसे स्वस्तिक बनाकर लाल रंगका वृषभचर्म, जिसका लोम उत्तरकी ओर तथा ग्रीवा पूर्वकी ओर हो, बिछाये और उसके ऊपर श्वेत वस्त्रसे आच्छादित काष्ठनिर्मित आसन रखे। यही भद्रासन है।
सप्तर्षिगण तुम्ह कल्याण प्रदान करें।' (फिर तीसरा पश्चिम कलश लेकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिषेक करे-)
यत्ते केशेषु दौर्भाग्य सीमन्ते यच्च पूर्धनि ।
ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद् जन्तु सर्वदा॥
'तुम्हारे केशोंमें, सीमन्तमें, मस्तकपर, ललाटमें, कानोंमें और नेत्रोंमें भी जो दुर्भाग्य (या अकल्याण) है, वह सब सदाके लिये जल शान्त कर दे।'
(तत्पश्चात् चौथा कलश लेकर पूर्वोक्त तीनों मन्त्र पढ़कर अभिषेक करे। इस प्रकार स्नान करनेवाले यजमानके मस्तकपर बायें हाथमें लिये हुए कुशोंको रखकर उसपर गूलरकी सुवासे सरसोंका तेल उठाकर डाले, उस समय निम्राङ्कित मन्त्र पढ़े-) 'ॐ मिताय स्वाहा। ॐ संमिताय स्वाहा। ॐ शालाय स्वाहा । ॐ कटंकटाय स्वाहा। ॐ कूष्माण्डाय स्वाहा। ॐ राजपुत्राय स्वाहा।' मस्तकपर होमके पश्चात् लौकिक अग्निमें भी स्थालीपाककी विधिसे चरु तैयार करके उत्तर छ: मन्त्रोंसे ही उसी अग्निमें हवन करे। फिर होमशेष चरुद्वारा बलिमन्त्रोंको पढ़कर इन्द्रादि दिक्पालोंको बलि भी अर्पित करे। तत्पश्चात् कृताकृत आदि उपहार-द्रव्य भगवान् विनायकको अर्पित करके उनके समीप रहनेवाली माता पार्वतीको भी उपहार भेंट करे। फिर पृथ्वीपर मस्तक रखकर 'तत्पुरुषाय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।' इरा मजसे गणेशजीको और 'सुभगायै विचाहे। काममालिन्यै धीमहि। तनो गौरी प्रचोदयात्।' इस मन्त्रसे अम्बिकादेवीको नमस्कार करे। फिर गणेशजननी अम्बिकाका उपस्थान करे। उपस्थानसे पूर्व फूल और जलसे अर्धा देकर दूर्वा, सरसों और पुष्पसे पूर्ण अलि अणि करे। (उपस्थानका मन्त्र इस प्रकार है-
रूपं देहि यशो देहि भर्ग भगवति देहि मे।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे।।
'भगवति। मुझे रूप दो, यश दो, कल्याण प्रदान करो, पुत्र दो, धन दो और सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करो।'
पार्वतीजीका उपस्थान करके धूप, दीप, गन्ध, माल्य, अनुलेप और नैवेद्य आदिके द्वारा उमापति श्रीभगवान् शङ्करकी पूजा करे। तदनन्तर श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दन और मालासे अलंकृत हो ब्राह्मणोंको भोजन कराये और गुरुको भी दक्षिणासहित दो वस्त्र अर्पित करे।
इस प्रकार विनायककी पूजा करके लक्ष्मी, शान्ति, पुष्टि, वृद्धि तथा आयुकी इच्छा रखनेवाले वीर्यवान् पुरुषको ग्रहोंकी भी पूजा करनी चाहिये। सूर्य, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु-इन नवों ग्रहोंकी क्रमशः स्थापना करनी चाहिये। सूर्यकी प्रतिमा ताँबेसे, चन्द्रमाकी रजत (या स्फटिक)-से, मङ्गलकी लाल चन्दनसे, बुधको सुवर्णसे, गुरुकी सुवर्णसे, शुक्रकी रजतसे, शनिकी लोहेसे तथा राहु-केतुकी सीसेसे बनाये, इससे शुभकी प्राप्ति होती है। अथवा वस्त्रपर उनके-उनके रंगके अनुसार वर्णकसे उनका चित्र अङ्कित कर लेना चाहिये। अथवा मण्डल बनाकर उनमें गन्ध (चन्दन-कुंकुम आदि)-से ग्रहोंकी कृति बना ले। ग्रहोंके रंगके अनुसार ही उन्हें फूल और वस्त्र भी देने चाहिये। सबके लिये गन्ध, बलि, धूप और गुग्गुल देना चाहिये। प्रत्येक ग्रह के लिये (अग्निस्थापनपूर्वक) समन्त्रक चरुका होम करना चाहिये। 'आ कृष्णेन रजसा०' - इत्यादि सूर्य देवताके, 'इमं देवाः०' इत्यादि चन्द्रमाके, 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुतू०' इत्यादि न मङ्गलके, 'उबुध्यस्व०' इत्यादि मन्त्र बुधके, 'वृहरपते अति यदर्थ 'इत्यादि मन्च बहस्पतिके.
अन्नात् परिसुतो०' इत्यादि मन्त्र शुक्रके, 'शत्रो देवी०' इत्यादि मन्त्र शनैश्चरके, 'काण्डात् काण्डात्० इत्यादि मन्त्र राहुके और 'केतुं कृण्वन्नकेतवे० इत्यादि मन्त्र केतुके हैं। आक, पलाश, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशा- ये क्रमश: सूर्य आदि ग्रहोंकी समिधा हैं। सूर्यादि ग्रहोंमेंसे प्रत्येकके लिये एक सौ आठ या अट्ठाईस बार मधु, घी, दही अथवा खीरकी आहुति देनी चाहिये। गुड़ मिलाया हुआ भात, खीर, हविष्य (मुनि-अन्न), दूध मिलाया हुआ साठीके चावलका भात, दही-भात, घी-भात, तिलचूर्णमिश्रित भात, माष (उड़द) मिलाया हुआ भात और खिचड़ी- इनको ग्रहके क्रमानुसार विद्वान् पुरुष ब्राह्मणके लिये भोजन दे। अपनी शक्ति के अनुसार यथाप्राप्त वस्तुओंसे ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक सत्कार करके उनके लिये क्रमशः धेनु, शङ्ख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, काली गौ, लोहा और बकरा-ये वस्तुएँ दक्षिणामें दे। ये ग्रहोंको दक्षिणाएँ बतायो गयी हैं। जिस-जिस पुरुषके लिये जो ग्रह जब अष्टम आदि दुष्ट स्थानोंमें स्थित हो, वह पुरुष उस ग्रहकी उस समय विशेष यलपूर्वक पूजा करे। ब्रह्माजीने इन ग्रहोंको वर दिया है कि 'जो तुम्हारी पूजा करें, उनकी तुम भी पूजा (मनोरथपूर्तिपूर्वक सम्मान) करना। राजाओंके धन और जातिका उत्कर्ष तथा जगत्को जन्म मृत्यु भी ग्रहोंके ही अधीन है। अतः ग्रह सभीके लिये पूजनीय है। जो सदा सूर्यदेवको पूजा एवं कमलामीको तथा महागणपतिको तिलक करता है, वह सिद्धिको पास होता है। इतना ही नहीं, उसे प्रत्येक कर्ममें सफलता एवं उत्तम लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। जो मातृयाग किये बिना ग्रहपूजन करता है, उसपर मातृकाएँ कुपित होती हैं और उसके प्रत्येक कार्यमें विघ्न डालती हैं। शुभकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंको वसोः पवित्रम्' इस मन्त्रसे वसुधारा समर्पित करके प्रत्येक माङ्गलिक कर्ममें गौरी आदि मातृकाओंकी पूजा करनी चाहिये। उनके नाम ये हैं-गौरी, पद्या, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातृकाएँ, वैधृति, धृति, पुष्टि, हृष्टि और तुष्टि। इनके साथ अपनी कुलदेवी और गणेशजी अधिक हैं। वृद्धिके अवसरोंपर इन सोलह मातृकाओंकी अवश्य पूजा करनी चाहिये। इन सबकी प्रसन्नताके लिये क्रमश: आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, (आचमनीय), स्नान, (वस्त्र), चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमनीय, ताम्बूल, पूगीफल, आरती तथा दक्षिणा-ये उपचार समर्पित करने चाहिये। अब मैं पितृकल्पका वर्णन करूँगा, जो धन और संततिकी वृद्धि करनेवाला है। अमावस्या, अष्टका, वृद्धि (विवाहादिका अवसर), कृष्णपक्ष, दोनों अयनोंके आरम्भका दिन, श्राद्धीय द्रव्यको उपस्थिति, उत्तम ब्राह्मणकी प्राप्ति, विषुवत् योग, सूर्यकी संक्रान्ति, व्यतीपात योग, गजच्छाया, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा श्राद्धके लिये रुचिका होना ये सभी श्राद्धके समय अथवा अवसर कहे गये हैं। सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञानमें अग्रगण्य, श्रोत्रिय, ब्रह्मवेत्ता, युवक, मन्त्र और ब्राह्मणरूप वेदका तत्त्वज्ञ, ज्येष्ठ सामका गान करनेवाला, त्रिमधु', त्रिसुपर्णर, भानजा, ऋत्विक जामाता, यजमान, श्वशुर, मामा, त्रिणाचिकेत', दौहित्र,
१. 'मधु वाता०' इत्यादि तीन ऋचाओंका जप और तदनुकूल व्रतका आचरण करनेवाला। २. बिसौपर्णी ऋचाओंका अध्येता और तत्सम्बन्धी व्रतका पालन करनेवाला। ३. त्रिणाचिकेत-संज्ञक त्रिविध अग्निविधाको जाननेवाला और तदनुकूल व्रतका पालक।
शिष्य, सम्बन्धी, बान्धव, कर्मनिष्ठ, तपोनिष्ठ, पश्चाग्निसेषी*, ब्रह्मचारी तथा पिता-माताके पक्क ब्राह्मण श्राद्धकी सम्पत्ति है। रोगी, न्यूनान, अधिकार, काना, पुन की संतान, अवकीणी (ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहते हुए ब्रह्मचर्य भा करनेवाला), कुण्ड (पतिके जीते-जी पर-पुरुषसे ठत्पत्र की हुई संतान), गोलक (पतिकी मृत्युके बाद जारज संतान), खराब नखवाला, काले दाँतवाला, वेतन लेकर पढ़ानेवाला, नपुंसक, कन्याको कलङ्कित करनेवाला, स्वयं जिसपर दोषारोपण किया गया हो वह, मित्र-द्रोही, चुगलखोर, सोमरस बेचनेवाला, बड़े भाईके अविवाहित रहते विवाह करनेवाला, माता, पिता और गुरुका त्याग करनेवाला, कुण्ड और गोलकका अन्न खानेवाला, शूद्रसे उत्पत्र, एक पतिको छोड़कर आयी हुई स्त्रीका पति, चोर और कर्मभ्रष्ट-ये ब्राह्मण श्राद्धमें निन्दित हैं (अतः इनका त्याग करना चाहिये)।
श्राद्धकर्ता पुरुष मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर, पवित्र हो, श्राद्धसे एक दिन पहले म ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उन ब्राह्मणोंको भी उसी समयसे मन, वाणी, शरीर तथा क्रियाद्वारा पूर्ण संयमशील रहना चाहिये। श्राद्धके दिन अपराह्नकालमें आये हुए ब्राह्मणोंका स्वागतपूर्वक पूजन करे। स्वयं हाथमें कुशको पवित्री धारण किये रहे। जब ब्राहाणलोग आचमन कर लें, तब उन्हें आसनपर बिठाये। देवकार्यमें अपनी शक्ति के अनुसार युग्म (दो,चार, छ: आदि संख्यावाले) ब्राहाणोंको और श्राद्धमें अयुग्म (एक, तीन पाँच, आदि संख्यावाले) ब्राह्मणोंको निमन्वित करे। सब ओरसे घिरे हुए गोबर आदिसे लिपे पुते पवित्र स्थानमें, जहाँ दक्षिण दिशाको ओर भूमि कुछ नीची हो, श्राद्ध करना चाहिये। वैश्वदेव-श्राद्धमें दो ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख बिठाये और पितृकार्यमें तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख। अथवा दोनोंमें एक-एक ब्राह्मणको ही सम्मिलित करे। मातामहोंके श्राद्धमें भी ऐसा ही करना चाहिये। अर्थात् दो वैश्वदेव-श्राद्धमें और तीन मातामहादि श्राद्धमें अथवा उभयपक्षमें एक-ही- एक ब्राह्मण रखे
वैश्वदेव-श्राद्धके लिये ब्राह्मणका हाथ धुलानेके निमित्त उसके हाथमें जल दे और आसनके लिये कुश दे। फिर ब्राह्मणसे पूछे-'मैं विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहता हूँ।' तब ब्राह्मण आज्ञा दें-'आवाहन करो।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर 'विश्वेदेवास आगत०' इत्यादि ऋचा पढ़कर विश्वेदेवोंका आवाहन करे। तब ब्राह्मणके समीपकी भूमिपर जौ बिखेरे। फिर पवित्रीयुक्त अर्घ्यपात्र में 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे जल छोड़े, 'यवोऽसि०' इत्यादिसे जौ डाले, फिर बिना मन्त्रके ही गन्ध और पुष्प भी छोड़ दे। तत्पश्चात् 'या दिव्या आप:०' इस मन्त्रसे अर्घ्यको अभिमन्त्रित करके ब्राह्मणके हाथमें संकल्पपूर्वक अर्घ्य दे और कहे-'अमुकश्राद्धे विश्वेदेवाः इदं वो हस्तायै नमः।' यों कहकर वह अर्घ्यजल कुशयुक्त ब्राह्मणके हाथमें या कुंशापर गिरा दे। तत्पश्चात् पथ धोनेके लिये जल देकर क्रमश: गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा आच्छादन वस्त्र अर्पण करे; पुनः हस्तशुद्धिके लिये जल दे। (विश्वेदेवोंको जो कुछ भी दे, सव्यभावसे उत्तराभिमुख होकर दे और पितरोंको प्रत्येक वस्तु अपसव्यभावसे दक्षिणाभिमुख होकर देनी चाहिये।)
वैश्वदेवकाण्डके अनन्तर यज्ञोपवीत अपसव्य अग्नियोंका उपासका करके पिता आदि तीनकाल कुशोंको उनके आसनके लिये अप्रदक्षिण-क्रम दे। फिर पूर्ववत् ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर उशन्तस्त्वा० इत्यादि मन्त्रसे पितरोंका आवाहन करके 'आयन्तु न:०' इत्यादिका जप करे। 'अपहता असुर रक्षासि वेदिषद:०' यह मन्त्र पढ़ कर सब ओ तिल बिखेरे। वैश्वदेव-श्राद्ध में जो कार्य जोर किया जाता है, वही पितृश्राद्धमें तिलसे करन चाहिये। अर्घ्य आदि पूर्ववत् करे। संस्त्रव (ब्राह्मणके हाथसे चुए हुए जल) पितृपात्रमें ग्रहण करके भूमिपर दक्षिणाग्र कुश रखकर उसके ऊपर उस पात्रको अधोमुख करके दुलका दे और कहे 'पितृभ्य: स्थानमसि ।' फिर उसके ऊपर अर्घ्यपात्र और पवित्रक आदि रखकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि पितरोंको निवेदित करे। इसके बाद 'नौ करण' कर्म करे। घीसे तर किया हुआ अन लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे- अग्नौ करिष्ये' (मैं अग्निमें इसकी आहुति देना चाहता हूँ)। तब ब्राह्मण इसके लिये आज्ञा दें। इस प्रकार आज्ञा लेकर वह पिण्डपितृयज्ञकी भाँति उस अन्नकी दो आहुति दे (उस समय ये दो मन्त्र क्रमश: पढ़े-अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा नम,। सोमाय पिरामरो स्वाहा नमः)। फिर होमशेष अन्नको एकाग्रचित्त होकर यथाप्राप्त पात्रोंमें-
विशेषत: चाँदीके पात्रोंमें परोसे। इस प्रकार अन्न परोसकर 'पृथिवी ते पात्रं धौरपिधानम्' इत्यादि मन्त्र पढ़कर पात्रको अभिमन्त्रित करे। फिर 'इदं विष्णु०' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके अन्नमें ब्राहाणके अंगूठेका स्पर्श कराये। तदनन्तर तीनों च्यातियोसहित गायत्रीमन्त्र तथा मधु वाता० इत्यादि तीन ऋचाओंका जप करे और ब्राह्मणोंसे कहे 'आप सुखपूर्वक अन्न ग्रहण करें। फिर चे ब्राह्मण भी मौन होकर प्रसत्रतापूर्वक भोजन करें।
उस समय यजमान क्रोध और उतावलीको त्याग दे और जबतक ब्राह्मणलोग पूर्णतः तृप्त न हो जायें, तबतक पूछ-पूछकर प्रिय अन्न और हविष्य उन्हें परोसता रहे। उस समय पूर्वोक्त मन्त्रोंका तथा पावमानी आदि ऋचाओंका जप या पाठ करते रहना चाहिये। तत्पश्चात् अन्न लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे–'क्या आप पूर्ण तृप्त हो गये?' ब्राह्मण कहें-'हाँ, हम तृप्त हो गये।' यजमान फिर पूछे-'शेष अन्न क्या किया जाय?' ब्राह्मण कहें-'इष्टजनोंके साथ भोजन करो।' उनकी इस आज्ञाको 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकार करे। फिर हाथमें लिये हुए अन्नको ब्राह्मणों के आगे उनकी जूठनके पास ही दक्षिणाग्र कुश भूमिपर रखकर उन कुशोंपर तिल-जल छोड़कर वह अन्न रख दे। उस समय 'ये अग्निदग्धाः०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे। फिर ब्राह्मणोंके हाथमें कुल्ला करनेके लिये एक-एक बार जल दे। फिर पिण्डके लिये तैयार किया हुआ सारा अन्न लेकर दक्षिणाभिमुख हो पिण्डपितृयज्ञ-कल्पके अनुसार तिलसहित पिण्डदान करे। इसी प्रकार मातामह आदिके लिये पिण्ड दे। फिर ब्राह्मणोंके आचमनार्थ जल दे, तदनन्तर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और उनके हाथमें जल देकर उनसे प्रार्थनापूर्वक कहे-आपलोग 'अक्षय्यमस्तु' कहें। तब ब्राह्मण 'अक्षय्यम् अस्तु' बोलें। इसके बाद उन्हें यथाशक्ति क्षणा देकर कहे-'अब मैं स्वधावाचन कराऊँगा।' ब्राह्मण कहें-'स्वधावाचन कराओ।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर पितरों और मातामहादिके लिये 'आप यह स्वधावाचन करें, ऐसा कहे। तब ब्राह्मण बोले-'अस्तु स्वधा।' इसके अनन्तर पृथ्वीपर जल सींचे और 'विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम्' यों कहे। ब्राह्मण भी इस पाक्यको दुहरायें- 'प्रीयन्तां विश्वेदेवाः। तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे श्राद्धकर्ता निनादित मन्त्रका जप करे-
दातारो गोभिवर्धन्ता वेदाः सन्ततिरेव च।
श्रद्धा च नो मा बिगमद् बहु देवं च नोऽस्त्विति।
'मेरै दाता बढ़ें। वेद और संतति बढ़े। हमारी श्रद्धा कम न हो और हमारे पास दानके लिये बहुत धन हो।'
यह कहकर ब्राह्मणोंसे नम्रतापूर्वक प्रिय वचन बोले और उन्हें प्रणाम करके विसर्जन करे-'वाजे-बाजे०' इत्यादि ऋचाओंको पढ़कर प्रसन्नतापूर्वक विसर्जन करे। पहले पितरोंका, फिर विश्वेदेवोंका विसर्जन करना चाहिये। पहले जिस अर्घ्यपात्रमें संस्रवका जल डाला गया था, उस पितृपात्रको उत्तान करके ब्राह्मणोंको विदा करना चाहिये। ग्रामकी सीमातक ब्राह्मणों के पीछे-पीछे जाकर उनके कहनेपर उनकी परिक्रमा करके लौटे और पितृसेवित श्राद्धात्रको इष्टजनोंके साथ भोजन करे। उस रात्रिमें यजमान और ब्राह्मण-दोनोंको ब्रह्मचारी रहना चाहिये।
इसी प्रकार पुत्र-जन्म और विवाहादि वृद्धिके अवसरोंपर प्रदक्षिणावृत्तिसे नान्दीमुख पितरोंका यजन करे। दही और बेर मिले हुए अत्रका पिण्ड दे और तिलसे किये जानेवाले सब कार्य जौसे करे। एकोद्दिष्ट श्राद्ध बिना वैश्वदेवके होता है। उसमें एक ही अर्घ्यपात्र तथा एक हो पवित्रक दिया जाता है। इसमें आवाहन और आग्नौकरणकी क्रिया नहीं होती। सब जनेऊको अपसव्य रखकर किये जाते हैं। 'अक्षय्यमस्तु' के स्थानमें 'उपतिष्ठताम्' का प्रयोग करे। 'वाजे-वाजे०' इस मन्त्रसे ब्राह्मणको विसर्जन करते समय 'अभिरम्यताम्' यों कहे और ये प्राहाणलोग 'अभिरताः स्मः' ऐसा उत्तर दें। सपिण्डीकरण श्राद्धमें पूर्पोछ विधिसे अमीससिके लिये गन्म, जल और तिलसे युक्त चार अर्धपात्र
तैयार करे। (इनमेंसे तीन तो पितरोंके पात्र है और एक प्रेतका पात्र होता है।) इनमें प्रेतके पात्रका जल पितरोंके पात्रोंमें डाले। उस समय 'ये समाना०' इत्यादि दो मन्त्रोंका उच्चारण करे। शेष क्रिया पूर्ववत् करे। यह सपिण्डीकरण और एकोद्दिष्ट श्राद्ध माताके लिये भी करना चाहिये। जिसका सपिण्डीकरणश्राद्ध वर्ष पूर्ण होनेसे पहले हो जाता है, उसके लिये एक वर्षतक ब्राह्मणको सानोदक कुम्भदान देते रहना चाहिये। एक वर्षतक प्रतिमास मृत्युतिथिको एकोद्दिष्ट करना चाहिये; फिर प्रत्येक वर्षमें एक बार क्षयाहतिथिको एकोद्दिष्ट करना उचित है। प्रथम एकोद्दिष्ट तों मरनेके बाद ग्यारहवें दिन किया जाता है। सभी श्राद्धोंमें पिण्डोंको गाय, बकरे अथवा लेनेकी इच्छावाले ब्राह्मणोंको दे देना चाहिये। अथवा उन्हें अग्निमें या अगाध जलमें डाल देना चाहिये। जबतक ब्राह्मणलोग भोजन करके वहाँसे उठन जायँ, तबतक उच्छिष्ट स्थानपर झाडू न लगाये श्राद्धमें हविष्यान्नके दानसे एक मासतक और खीर देनेसे एक वर्षतक पितरोंकी तृति बनी रहती है। भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशीको विशेषतः मघा नक्षत्रका योग होनेपर जो कुछ पितरों के निमित्त दिया जाता है वह अक्षय होता है। एक चतुर्दशीको छोड़कर प्रतिपदासे अमावास्यातकको चौदह तिथियोंमें श्राद्ध-दान करनेवाला पुरुष क्रमश: इन चौदह फलोंको पाता है-रूप- शीलयुक्त कन्या, बुद्धिमान् तथा रूपवान् दामाद, पशु, श्रेष्ठ पुत्र, द्यूत-विजय, खेतीमै लाभ, व्यापारमें लाभ, दो खुर और एक खुरवाले पशु ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र, सुवर्ण, रजत, कुप्यक (त्रपु-सीसा आदि), जाति-भाइयों में श्रेष्ठता और सम्पूर्ण मनोरथ । जो लोग शस्त्रद्वारा मारे गये हों, उन्हीं के लिये उस चतुर्दशी तिथिको श्राद्ध प्रदान किया जाता है।
स्वर्ग, संतान, ओज, शौर्य, क्षेत्र, बल, पुत्र, श्रेष्ठता, सौभाग्य, समृद्धि, प्रधानता, शुभ, प्रवृत्तचक्रता (अप्रतिहत शासन), वाणिज्य आदि, नीरोगता, यश, शोकहीनता, परम गति, धन, वेद, चिकित्सामें सफलता, कुप्य (त्रपु-सीसा आदि), गौ, बकरी, भेड़, अश्व तथा आयु-इन सत्ताईस प्रकारके काम्य पदार्थोंको क्रमशः वही पाता है जो कृत्तिकासे लेकर भरणीपर्यन्त प्रत्येक नक्षत्रमें विधिपूर्वक श्राद्ध करता है तथा आस्तिक, श्रद्धालु एवं मद-मात्सर्य आदि दोषोंसे रहित होता है। वसु, रुद्र और आदित्य-ये तीन प्रकारके पितर श्राद्धके देवता हैं। ये श्राद्धसे संतुष्ट किये जानेपर मनुष्योंके पितरोंको तृप्त करते हैं। जब पितर तृप्त होते हैं, तब वे मनुष्योंको आयु, प्रजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख तथा राज्य प्रदान करते हैं। इस प्रकार मैंने कल्पाध्यायका विषय थोड़े में बताया है। वेद तथा पुराणान्तरसे विशेष बातें जाननी चाहिये। मुनीश्वर! जो विद्वान् इस कल्पाध्यायका चिन्तन करता है, वह इस लोकमें कर्म-कुशल होता है और परलोकमें शुभ गति पाता है। जो मनुष्य देवकार्य तथा पितृकार्यमें इस कल्पाध्यायका भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह यज्ञ और श्राद्धका पूरा फल पाता है। इतना ही नहीं, वह इस लोकमें धन, विद्या, यश और पुत्र पाता है तथा परलोकमें उसे परम गति प्राप्त होती है। अब मैं वेदके मुखस्वरूप व्याकरणका संक्षेपसे वर्णन करूँगा। एकग्रचित्त होकर सुनो। (पूर्वभाग, द्वितीय पाद, अध्याय ५१)