नारद महा पुराण
विविध मन्त्रोंद्वारा श्रीहनुमान्जीकी उपासना, दीपदानविधि और कामनाशक भूतविद्रावण-मन्त्रोंका वर्णन
सनत्कुमारजी कहते हैं-विप्रवर! अब हनुमान्जीके मन्त्रोंका वर्णन किया जाता है, जो समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाले हैं और जिनकी आराधना करके मनुष्य हनुमान्जीके ही समान आचरणवाले हो जाते हैं। मनुस्वर (औ) तथा इन्दु (अनुस्वार)-से युक्त गगन (ह) अर्थात् 'हाँ' यह प्रथम बीज है। ह् स् फ्र और अनुस्वार (ए)-से युक्त हों अर्थात् 'ह्स्फ्रें' यह दूसरा बीज है। ख् फ् र ये भग (ए) और इन्दु (अनुस्वार)- से युक्त हों अर्थात् 'खें' यह तीसरा बीज कहा गया है। वियत् (ह्), भृगु (स्), अग्नि (र), मनु (औ) और इन्दु (अनुस्वार) इन सबका संयुक्त रूप सौं' यह चौथा बीज है। भग (ए) और चन्द्र (अनुस्वार)- से युक्त वियत् (ह्) भृगु (स्) ख् फ् तथा अग्नि (र) हों अर्थात् 'ह्स्छे' यह पाँचवाँ बीज है । मनु (औ) और इन्दु (अनुस्वार)- से युक्त ह् स् अर्थात् 'ह् सौं' यह छठा बीज है। तदनन्तर डे विभक्त्यन्त हनुमत् शब्द (हनुमते) और अन्तमें हृदय (नमः) यह (हौं हस्फे में हस्रौं हस्खों सौं हनुमते नमः) बारह अक्षरोंवाला महामन्त्रराज कहा गया है। इस मन्त्रके श्रीरामचन्द्रजी ऋषि हैं और जगती छन्द कहा गया है। इसके देवता हनुमान्जी हैं। 'हसौं' बीज है, 'हस्के' शक्ति है। छ: बीजोंसे षडङ्ग-न्यास करना चाहिये। मस्तक, ललाट, दोनों नेत्र, मुख, कण्ठ दोनों बाहु, हृदय, कुक्षि, नाभि, लिङ्ग, दोनों जानु, दोनों चरण इनमें क्रमशः मन्त्रके बारह अक्षरोंका न्यास करे। छ। बीज और दो पद इन आठोंका क्रमशः मस्तक, ललाट, मुख, हदय, नाभि, करू जङ्गर और चरणों में न्यास करे। तदनन्तर अञ्जनीनन्दन कपीश्वर हनुमानजीका इस प्रकार ध्यान करे-
उद्यत्कोट्यर्कसंकाशं जगत्प्रक्षोभकारकम्।
श्रीरामाङ्घ्रिध्याननिष्ठं सुग्रीवप्रमुखार्चितम्।।
वित्रासयंन्त नादेन राक्षसान् मारुतिं भजेत्।
(९-१०)
उदयकालीन करोड़ों सूर्योके समान तेजस्वी हनुमान्जी सम्पूर्ण जगत्को क्षोभमें डालनेको शक्ति रखते हैं, सुग्रीव आदि प्रमुख वानर वीर उनका समादर करते हैं। वे राघवेन्द्र श्रीरामके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें निरन्तर संलग्न हैं और अपने सिंहनादसे सम्पूर्ण राक्षसोंको भयभीत कर रहे हैं। ऐसे पवनकुमार हनुमान्जीका भजन करना चाहिये।
इस प्रकार ध्यान करके जितेन्द्रिय पुरुष बारह हजार मन्त्र-जप करे। फिर दही, दूध और घी मिलाये हुए धानको दशांश आहुति दे। पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर मूलमन्त्रसे मूर्तिकी कल्पना करके उसमें हनुमान्जीका आवाहन-स्थापनपूर्वक पाद्यादि उपचारोंसे पूजन करे। केसरोंमें हृदयादि अङ्गोंकी पूजा करके अष्टदल कमलके आठ दलोंमें हनुमान्जीके निम्नाङ्कित आठ नामोंकी पूजा करे-रामभक्त, महातेजा, कपिराज, महाबल, द्रोणाद्रिहारक, मेरुपीठार्चनकारक, दक्षिणाशाभास्कर सर्वविघ्रविनाशक। ( रामभक्ताय नमः, महातेजसे नमः, कपिराजाय नमः, महाबलाय नमः, द्रोणाद्रिहारकाय नमः, मेरुपीठाचनकारकाय नमः, दक्षिणाशाभास्कराय नमः, सर्वविघ्नविनाशकाय नमः) इस प्रकार नार्मोकी पूजा करके दलोंके अग्रभागमें क्रमशः सुग्रीव, अङ्गद, नील, जाम्बवान्, नल, सुषेण, द्विविद तथा मैन्दकी पूजा करे। तत्पश्चात् लोकपालों तथा उनके वज्र आदि आयुधोंकी पूजा करे। ऐसा करनेसे मन्त्र सिद्ध हो जाता है। जो मानव लगातार दस दिनोंतक रातमें नौ सौ मन्त्र- जप करता है, उसके राजभय और शत्रुभय नष्ट हो जाते हैं। एक सौ आठ बार मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया हुआ जल विषका नाश करनेवाला होता है। भूत, अपस्मार (मिरगी) और कृत्या (मारण आदिके प्रयोग)-से ज्वर उत्पन्न हो तो ठक्क मन्त्रसे अभिमन्त्रित भस्म अथवा जलसे क्रोधपूर्वक प्यास्त पुरुषपर प्रहार करे। ऐसा करनेपर वह मनुष्य तीन दिनमें चरसे छूट जाता और सुख पाता है। हनुमानजीके उक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित औषध या जल खा- पीकर मनुष्य सब रोगोंको मार भगाता और तत्क्षण सुखी हो जाता है। उक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित भस्मको अपने अङ्गोंमें लगाकर अथवा उससे अभिमन्त्रित जलको पीकर जो मन्त्रोपासक युद्धके लिये जाता है, वह शस्त्रोंके समुदायसे पीड़ित नहीं होता। किसी शस्त्रसे कटकर घाव हुआ हो या फोड़ा फूटकर बहता हो, लूता (मकरी) रोग फूटा हो, तीन बार मन्त्र जपकर अभिमन्त्रित किये हुए भस्मसे उनपर स्पर्श कराते ही वे सभी घाव सूख जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। ईशान कोणमें स्थित करंज नामक वृक्षकी जड़को ले आकर उसके द्वारा हनुमान्जीकी अँगूठे बराबर प्रतिमा बनावे; फिर उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करके सिन्दूर आदिसे उसकी पूजा करे। तत्पश्चात् उस प्रतिमाका मुख घरकी ओर करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसे दरवाजेपर गाड़ दे। उससे ग्रह, अभिचार रोग, अग्नि, विष, चोर तथा राजा आदिके उपद्रव कभी उस घरमें नहीं आते और वह घर दीर्घकालतक प्रतिदिन धन पुत्र आदिसे अभ्युदयको प्राप्त होता रहता है।
विशुद्ध अन्तःकरणवाला पुरुष अष्टमी या चतुर्दशीको मंगलवार या रविवारके दिन किसी तख्नेपर तैलयुक्त उड़दके बेसनसे हनुमान जी को सुन्दर तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित एक प्रतिमा बनावे। वाम भागमें तेलका और दाहिने भाग पीका दीपक जलाकर रखे। फिर मवज्ञ पुरुष मूलमन्यसे उक्त प्रतिमाये हनुमान्जीका आवाहन को। आवाहनके पक्षात् प्राणप्रतिष्ठा करके उन्हें पाय, अर्ज आदि अर्पण करे। लाल चन्दन लाल पल या सिन्दूर आदिसे उनकी पूजा करे। धूप और दीप देकर नैवेद्य निवेदन करे। मन्त्रवेत्ता उपासक मूलमन्त्रसे पूआ, भात, साग, मिठाई, बड़े, पकौड़ी आदि भोज्य पदार्थोंको घृतसहित समर्पित करके फिर सत्ताईस पानके पत्तोंको तीन-तीन आवृत्ति मोड़कर उनके भीतर सुपारी आदि रखकर मुख-शुद्धिके लिये मूलमन्त्रसे ही अर्पण करे। मन्त्रज्ञसाधक इस प्रकार भलीभांति पूजा करके एक हजार मन्त्रका जप करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष कपूरकी आरती करके नाना प्रकारसे हनुमानजीकी स्तुति करे और अपना अभीष्ट मनोरथ उनसे निवेदन करके विधिपूर्वक उनका विसर्जन करे। इसके बाद नैवेद्य लगाये हुए अन्नद्वारा सात ब्राह्मणोंको भोजन करावे और चढ़ाये हुए पानके पत्ते उन्हींको बाँटकर दे दे। विद्वान् पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार उन ब्राह्मणोंको दक्षिणा भी देकर विदा करे। तत्पश्चात् इष्ट बन्धुजनोंके साथ स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। उस दिन पृथ्वीपर शयन और ब्रह्मचर्यका पालन करे। जो मानव इस प्रकार आराधना करता है, वह कपीश्वर हनुमान् जी के प्रसादसे शीघ्र ही सम्पूर्ण कामनाओंको अवश्य प्राप्त कर लेता है।
भूमिपर हनुमान्जीका चित्र अङ्कित करे और उनके अग्रभागमें मन्त्रका उल्लेख करे। साथ ही साध्यवस्तु या व्यक्तिका द्वितीयान्त नाम लिखकर उसके आगे 'विमोचय विमोचय' लिखे, लिखकर उसे बायें हाथसे मिटा दे, उसके बाद फिर लिखे। इस प्रकार एक सौ आठ बार लिख-लिखकर उसे पुनः मिटावे। ऐसा करनेपर महान् कारागारसे वह शीघ्र मुक्त हो जाता है । ज्वरमें दूर्वा, गुरुचि, दही, दूध अथवा घृतसे होम करे। शूल रोग होनेपर करंज या वातारि (एरंड)-की समिधाओंको तैलमें डुबोकर उनके द्वारा होम करे अथवा शेफालिका (सिंदुवार)-की तैलसिक्त समिधाओंसे प्रयत्नपूर्वक होम करना चाहिये। सौभाग्यसिद्धिके लिये चन्दन, कपूर, रोचना, इलाइची और लवंगकी आहुति दे।
वस्त्रकी प्राप्तिके लिये सुगन्धित पुष्पोंसे हवन करे। विभिन्न धान्योंकी प्राप्तिके लिये उन्हीं धान्योंसे होम करना चाहिये। धान्यके होमसे धान्य प्राप्त होता है और अन्नके होमसे अन्नकी वृद्धि होती है। तिल, घी, दूध और मधुकी आहुति देनेसे गाय-भैंसकी वृद्धि होती है। अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता है ? विष और व्याधिके निवारणमें, शान्तिकर्ममें, भूतजनित भय और संकटमें, युद्ध में, दैवी क्षति प्राप्त होनेपर, बन्धनसे छूटने में और महान् वनमें पड़ जानेपर आदि सभीमें यह सिद्ध किया हुआ मन्त्र मनुष्योंको निश्चय ही कल्याण प्रदान करता है।
द्वादशाक्षर-मन्त्रमें जो अन्तिम छ: अक्षर (हनुमते नमः) हैं इनको और आदि बीज (हाँ)-को छोड़कर शेष बचे हुए पाँच बीजोंका जो पञ्चाक्षर-मन्त्र बनता है, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है। इसके श्रीरामचन्द्रजी ऋषि, गायत्री छन्द और हनुमान् देवता कहे गये हैं। सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिके लिये इसका विनियोग किया जाता है। इसके पाँच बीजों तथा सम्पूर्ण मन्त्रसे षडङ्ग-न्यास करे। रामदूत, लक्ष्मण-प्राणदाता; अञ्जनीसुत, सीताशोक-विनाशन तथा लङ्काप्रासादभञ्जन-ये पाँच नाम हैं, इनके पहले 'हनुमत्' यह नाम और है। हनुमत् आदि पाँच नामोंके आदिमें पाँच बीज और अन्त में डे विभक्ति लगायी जाती है। अन्तिम नामके साथ उक्त पाँचों बीज जुड़ते हैं, ये ही षडङ्ग-न्यासके छः मन्त्र हैं। इसके ध्यान-पूजन आदि कार्य पूर्वोक्त द्वादशाक्षर मन्त्रके समान ही हैं।
प्रणव (ॐ), वाग्भव (ऐं), पद्मा (श्री) तीन दीर्घ स्वरोंसे युक्त मायाबीज (हां ही है) तथा पाँच कूट (इस्फे, खो, हस्त्रौं, ह्स्खफें, ह्सौं) यह ग्यारह अक्षरोंका मन्त्र सम्पूर्ण सिद्धियों कोदेनेवाला है। इसके भी ध्यान-पूजन आदि सब कार्य पूर्ववत् होते हैं। इस मन्त्रकी आराधना की जाय तो यह समस्त अभीष्ट मनोरथोंको देनेवाला है।'नमो भगवते आञ्जनेयाय महाबलाय स्वाहा।' यह अठारह अक्षरोंका मन्त्र है। इसके ईश्वर ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, पवनकुमार हनुमान् देवता, हं बीज और स्वाहा शक्ति है, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है। 'आञ्जनेयाय नमः' का हृदयमें, 'रुद्रमूर्तये नमः' का सिरमें, 'वायुपुत्राय नमः' का शिखामें, 'अग्निगर्भाय नमः' का कवचमें, रामदूताय नमः' का नेत्रोंमें तथा 'ब्रह्मास्वाय नमः' के अस्त्रस्थानमें न्यास करे। इस प्रकार न्यास-विधि कही गयी है
ध्यान
तप्तचामीकरनिभं भीनं संविहिताञ्जलिम्।
चलत्कुण्डलदीप्तास्यं पद्याक्षं मारुतिं स्मरेत्।
जिनकी दिव्य कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है, जो भयका नाश करसेनाले हैं, जिन्होंने
*यथा-'हमें हनुमते नमः, इदयाय नमः ।
छे रामभक्ताय नम: शिरसे स्वाहा।
हाँ लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः शिखायै वषट्।
हस्छे अञ्जनीसुताय नमः कवचाय हुम्।
'हसौं सीताशोकविनाशाय नमः नेत्रत्रयाय वौषट्र।
ह्स्फें ख्फें ह्स्त्राँ ह्स्ख्फेंह्सौं लङ्काप्रासादभञ्जनाय नमः अस्त्राय फट्।
अपने प्रभु (श्रीराम)-का चिन्तन करके उनके लिये अञ्जलि बाँध रखी है, जिनका सुन्दर मुख हिलते हुए कुण्डलोंसे उद्भासित हो रहा है तथा जिनके नेत्र कमलके समान शोभायमान हैं, उन पवनकुमार हनुमान् जी का ध्यान करे।
इस प्रकार ध्यान करके दस हजार मन्त्र-जप करे। तत्पश्चात् घृतमिश्रित तिलसे दशांश होम करे। पूर्वोक्त रीतिसे वैष्णव-पीठपर पूजन करे। प्रतिदिन केवल रातमें भोजनका नियम लेकर जितेन्द्रियभावसे एक सौ आठ बार जप करे तो मनुष्य छोटे-मोटे रोगोंसे छूट जाता है, इसमें संशय नहीं है। बड़े भारी रोगोंसे मुक्त होनेके लिये तो प्रतिदिन एक हजार जप करना चाहिये। सुग्रीवके साथ श्रीरामकी मित्रता कराते हुए हनुमान् जी का ध्यान करके जो दस हजार मन्त्र-जप करता है, वह परस्पर द्वेष रखनेवाले दो विरोधियोंमें संधि करा सकता है। जो यात्राके समय हनुमान् जी का स्मरण करते हुए मन्त्र-जप करता है, उसके बाद यात्रा करता है, वह शीघ्र ही अपना अभीष्ट साधन करके घर लौट आता है। जो अपने घरमें मन्त्र-जप करते हुए सदा हनुमान् जी की आराधना करता है, वह आरोग्य, लक्ष्मी तथा कान्ति पाता है और किसी प्रकारके उपद्रवमें नहीं पड़ता। वनमें यदि इस मन्त्रका स्मरण किया जाय तो यह व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओं तथा चोर-डाकुओंसे रक्षा करता है। सोते समय शय्यापर एकाग्रचित्त होकर इस मन्त्रका स्मरण करना चाहिये। जो ऐसा करता है, उसे दुःस्वप्न और चोर आदिका भय कभी नहीं होता।
वियत् (ह) इन्दु (अनुस्वार) से युक्त हो उसके बाद 'हनुमते रुद्रात्मकाय' ये दो पद हो, फिर वर्ग) और अस्व (फट) हो तो (हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्) यह बारह अक्षरोका
महामन होता है, जो अणिमा आदि अष्ट अक्षरोंका मन्हामन्त्र होता है, जो अणिमा आदि अष्ट सिद्धियोंको देनेवाला हैं। इसके श्रीरामचन्द्रजी ऋषि, जगती छन्द, श्रीहनुमान्जी देवता, हं बीज और 'हुम्' शक्ति कही गयी है। छ: दीर्घस्वरोंसे युक्त बीज (हां ही हूँ हैं हाँ हः) के द्वारा षडङ्ग-न्यास करे।
ध्यान
महाशैलं समुत्पाट्य धावन्तं रावणं प्रति ।।
लाक्षारसारुणं रौद्रं कालान्तकयमोपमम्।
ज्वलदग्निसमं जैत्रं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥
अङ्गदाद्यैर्महावीरवेष्टितं रुद्ररूपिणम्।
तिष्ठ तिष्ठ रणे दुष्ट सृजन्तं घोरनिःस्वनम् ॥
शैवरूपिणमभ्यर्च्य ध्यात्वा लक्षं जपेन्मनुम् ।
(७४। १२२-१२५)
हनुमान् जी एक बहुत बड़ा पर्वत उखाड़कर रावणकी ओर दौड़ रहे हैं। वे लाक्षा (महावर)- के रंगके समान अरुणवर्ण हैं। काल, अन्तक तथा यमके समान भयंकर जान पड़ते हैं। उनका तेज
प्रज्वलित अग्रिके समान है। वे विजयशील तथा करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं। अंगद आदि महावीर उन्हें चारों ओरसे घेरकर चलते हैं। वे साक्षात् रुद्रस्वरूप हैं। भयंकर सिंहनाद करते हुए वे रावणसे कहते हैं-'अरे ओ दुष्ट! युद्धमें खड़ा रह, खड़ा तो रह!' इस प्रकार शिवावतार भगवान् हनुमान् जी का ध्यान और पूजन करके एक लाख मन्त्रका जप करे।
तदनन्तर दूध, दही, घी मिलाये चावलसे दशांश होम करे। विमलादि शक्तियोंसे युक्त पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर मूल मन्त्रसे मूर्ति-कल्पना करके हनुमान्जीकी पूजा करनी चाहिये। एकमात्र ध्यान करनेसे भी मनुष्योंको सिद्धि प्राप्त होती है। इसमें संशय नहीं है। अब मैं लोकहितकी इच्छासे इस मन्त्रका साधन बतलाता हूँ। हनुमान् जी का साधन 'पुण्यमय है, वह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है। यह लोकमें अत्यन्त गुह्यतम रहस्य है और शीघ्र उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला है। इसके प्रसादसे मन्त्र-साधक पुरुष तीनों लोकोंमें विजयी होता है। प्रात:काल स्रान करके नदीके तटपर कुशासनपर बैठे और मूल-मन्त्रसे प्राणायाम तथा षडङ्ग-न्यास सब कार्य करे। फिर सीतासहित भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करके उन्हें आठ बार पुष्पाञ्जलि अर्पित करे। तत्पश्चात् घिसे हुए लाल चन्दनसे उसीकी शलाकाद्वारा ताम्र-पात्रमें अष्टदल कमल लिखे। कमलको कर्णिकामें मन्त्र लिखे। उसमें कपीश्वर हनुमान् जी का आवाहन करे। मूल-मन्त्रसे मूर्ति-निर्माण करके ध्यान तथा आवाहनपूर्वक पाद्य आदि उपचार अर्पण करे। गन्ध, पुष्प आदि सब सामग्री मूल-मबसे हो निवेदन करके कमलके केसरों. ७ अङ्गो (इदय सिर, शिखा, कवच, नेत्र तथा अस्त्र) का पूजन करके आठ दलोंमें सुग्रीव आदिका पूजन करे। सुशीव, लक्ष्मण अगद, नल, भोल, जाम्बवान् कुमुद और के सरोका एक-एक पलमें पूजन करना
चाहिये। तदनन्तर इन्द्र आदि दिक्पालों तथा वन आदि आयुधोंका पूजन करे। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध होनेपर मन्त्रोपासक पुरुष अपनी अभीष्ट कामनाओंको सिद्ध कर सकता है।
नदीके तटपर, किसी वनमें, पर्वतपर अथवा कहीं भी एकान्त प्रदेशमें श्रेष्ठ साधक भूमि-ग्रहणपूर्वक साधन प्रारम्भ करे। आहार, श्वास, वाणी और इन्द्रियोंपर संयम रखे। दिग्बन्ध आदि करके न्यास और ध्यान आदिका सम्यक् सम्पादन करनेके पश्चात् पूर्ववत् पूजन करके उक्त मन्त्रराजका एक लाख जप करे। एक लाख जप पूर्ण हो जानेपर दूसरे दिन सबेरे साधक महान् पूजन करे। उस दिन एकाग्रचित्तसे पवननन्दन हनुमान् जी का सम्यक् ध्यान करके दिन-रात जपमें लगा रहे। तबतक जप करता रहे, जबतक दर्शन न हो जाय। साधकको सुदृढ़ जानकर आधी रातके समय पवननन्दन हनुमान् जी का अत्यन्त प्रसन्न हो उसके सामने जाते हैं। कपीश्वर हनुमान् जी का उस साधकको इच्छानुसार वर देते हैं; वर पाकर वह श्रेष्ठ साधक अपनी मौजसे इधर-उधर विचरता रहता है। यह पुण्यमय साधन देवताओंके लिये भी दुर्लभ है; क्योंकि गूढ रहस्यरूप है। मैंने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे इसे यहाँ प्रकाशित किया है। इसी प्रकार साधक अपने लिये हितकर अन्यान्य प्रयोगोंका भी अनुष्ठान करे। इन्दु (अनुस्वार)-युक्त वियत्. (ह) अर्थात् 'हं' के चश्चात् डे विभक्त्यन्त पवनन्दन शब्द हो और अन्तमें वह्रिप्रिया (स्वाहा) हो तो (हं पवननन्दनाय स्वाहा) यह दस अक्षरका मन्त्र होता है, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। इसके ऋषि आदि भी पहले बताये अनुसार हैं। पडङ्ग-न्यास भी पूर्ववत् करने चाहिये।
ध्यान
ध्यायेद्रणे हनूमन्तं सूर्यकोटिसमप्रभम् ।
धावन्तं रावणं जेतुं दादा सत्वरमुत्थितम्॥
लक्ष्मण च महावीर पतितं रणभूतले।
गुरु चक्रोधमुत्पाद्य ग्रहीतुं गुरुपर्वतम्॥
हाहाकारैः सदश्च कप्पयन्तं जगत्त्रयम्।
आब्राह्माण्ड समाव्याप्य कृत्वा भीमं कलेवरम्।
लङ्काकी रणभूमिमें महावीर लक्ष्मणको गिरा देख हनुमानजी तुरन्त उठ खड़े हुए हैं, वे हृदयमें महान् क्रोध भरकर एक विशाल एवं भारी पर्वतको उठाने तथा रावणको मार गिरानेके लिये वेगसे दौड़ पड़े हैं। उनका तेज करोड़ों सूर्योंकी प्रभाको लज्जित कर रहा है। वे ब्रह्माण्डव्यापी भयंकर एवं विराट् शरीर धारण करके दर्पपूर्ण हुंकारसे तीनों लोकोंको कम्पित किये देते हैं। इस प्रकार युद्ध-भूमिमें हनुमान्जीका चिन्तन करना चाहिये।
ध्यानके पश्चात् विद्वान् साधक एक लाख जप और पूर्ववत् दशांश हवन करे। इस मन्त्रका भी विधिवत् पूजन पहले-जैसा ही बताया गया है। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध होनेपर मन्त्रोपासक अपना हित-साधन कर सकता है। इस श्रेष्ठ मन्त्रका साधन भी गोपनीय रहस्य ही है। सब तन्त्रों में इसे अत्यन्त गोप्य बताया गया है। इसका उपदेश हर एकको नहीं देना चाहिये। ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर शौचादि नित्यकर्म करके पवित्र हो नदीके तटपर जाकर तीर्थके आवाहनपूर्वक स्नान करे। स्नानके समय आठ बार मूलमन्त्रको आत्ति करे। तत्पश्चात् बारह बार मन्त्र पढ़कर अपने ऊपर जल छिड़के। इस प्रकार स्नान, संध्या, तर्पण आदि करके गङ्गाजोके तटपर, पर्वतपर अथवा वनमें भूमिग्रहणपूर्वक अकारादि स्वरवणोंका उच्चारण करके पूरक 'क' से लेकर 'म' तकके पाँचवर्गके अक्षरोंसे कुस्मक तथा 'य' से लेकर अवशेष वर्गाका उच्चारण करके रोचक करना चाहिये। इस प्रकार प्राणायाम करके भूत डिसे लेकर पीतयातक के सब कार्य करे।फिर पूर्वोत्क रीतिसे कपीश्वर हनुमान् जी का ध्यान और पूजन करके उनके आगे बैठकर साधक प्रतिदिन आदरपूर्वक दस हजार मन्त्र-जप करे। सातवें दिन विशेषरूपसे पूजन करे। उस दिन मन्त्रसाधक एकाग्रचित्तसे दिन-रात जप करे। रातके तीन पहर बीत जानेपर चौथे पहरमें महान् भय दिखाकर कपीश्वर पवननन्दन हनुमान्जी अवश्य साधकके सम्मुख पधारते हैं और उसे अभीष्ट वर देते हैं। साधक अपनी रुचिके अनुसार विद्या, धन, राज्य अथवा विजय तत्काल प्राप्त कर लेता है। यह सर्वथा सत्य है, इसमें संशयका लेश भी नहीं है। वह इहलोकमें सम्पूर्ण कामनाओंका उपभोग करके अन्तमें मोक्ष प्रास कर लेता है।
सद्योजात (ओ)-सहित दो वायु (य् य् यो यो) 'हनूमन्त' का उच्चारण करे। फिर 'फल' के अन्तमें 'फ' तथा नेत्र (६) युक्त क्रिया (ल) एवं कामिका (त)-का उच्चारण करे। तत्पश्चात् 'धग्गधगित' बोलकर 'आयुराष' पदका उच्चारण करे, तदनन्तर लोहित (प) तथा 'रुडाह' का उच्चारण करना चाहिये। (पूरा मन्त्र इस प्रकार है-'ॐ यो यो हनूमन्त फलफलित धगधगित आयुराष परुडाह') यह पचीस अक्षरका मन्त्र है। इसके भी ऋषि आदि पूर्वोक्त ही हैं। 'प्लीहा' रोग दूर करनेवाले वानरराज हनुमान्जी इसके देवता कहे गये हैं। 'प्लीहा' रोगसे युक्त पेटपर पानका पत्ता रखे, उनके ऊपर आठ पर्व लपेटा हुआ वस्त्र रखकर उसे ढक दे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ साधक हनुमान्जीका स्मरण करके उस वस्त्रके ऊपर एक बाँसका टुकड़ा डाल दे। इसके बाद बेरके वृक्षकी लकड़ीसे बनी हुई छड़ी लेकर उसे जंगली पत्थरसे प्रकट हुई आग मन्त्रसे सात बार तपावे, फिर उस छड़ीसे पैटपर रखे हुए बाँसके टुकड़ेपर सात बार प्रहार करे। इससे मनुष्योंका प्लीहा रोग अवश्य ही नष्ट हो जाता है।
'ॐ नमो भगवते आमनेयाय असूकस्य
भकला प्रोटय प्रोटय अन्धमोही कुरु कुरु स्वाहा।'
यह एक मन्त्र है। इसके ईश्वर ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, शृखलामोचक पवनपुत्र श्रीमान् हनुमान् देवता, है बीज और स्वाहा शक्ति है। बन्धनसे छूटनेके लिये इसका विनियोग किया जाता है छः दीर्घ स्वर तथा रेफयुक्त बीजमन्त्रसे षडङ्ग- न्यास करे (यथा-हाँ ह्रदयाय नमः, ह्रीं शिरसे स्वाहा इत्यादि)।
ध्यान
वामे शैलं वैरिभिदं विशुद्ध टङ्कमन्यतः ।
दधानं स्वर्णवर्ण च ध्यायेत् कुण्डलिनं हरिम्॥
(७४। १६९-१७०)
'बायें हाथमें वैरियोंको विदीर्ण करनेवाला पर्वत तथा दायें हाथमें विशुद्ध टंक धारण करनेवाले, सुवर्णके समान कान्तिमान्, कुण्डल- मण्डित वानरराज हनुमान्जीका ध्यान करे।' इस प्रकार ध्यान करके एक लाख मन्त्रका जप तथा आम्र-पल्लवसे दशांश हवन करे। विद्वानोंने इसके पूजन आदिकी विधि पूर्ववत् बतायी है। महान् कारागारमें पड़ा हुआ मनुष्य दस हजार जप करे। इससे वह कारागारसे मुक हो अवश्य सुखका भागी होता है। अब मैं बन्धनसे छुड़ानेवाले शुभ हनुमत्- मन्त्रका वर्णन करता हूँ। अष्टदल कमलके भीतर षट्कोण बनावे। उसकी कर्णिकामें साध्य पुरुषका नाम लिखे। छ: कोणोंमें 'ॐ आञ्जनेयाय' का उल्लेख करे। आठों दलोंमें 'ॐ वातु-वातु' लिखे। गोरोचन और कुंकुमसे यह उत्तम मन्त्र लिखकर मस्तकपर धारण करके बन्धनसे छूटने के लिये उक्त मन्त्रका दस हजार जप करे। इस मन्त्रको प्रतिदिन मिट्टीपर लिखकर मन्त्र पुरुष दाहिने हाचसे मिटावे। बारह बार लिखने और मिटानेसे मन्त्राराधक महान् कारागारसे छुटकारा पा जाता है। गगन (ह) नेत्र ()-युत ज्वलन (२) अर्थात् 'हरि' पदके पक्षात् दो बार 'मर्कट' शब्द बोलकर शेष (आ) सहित तोच (व) अर्थात् 'वा' का उच्चारण करके 'मकरे' पद बोले। फिर 'परिमुञ्चति मुञ्चति शृङ्खलिकाम्' का उच्चारण करे। (पूरा मन्त्र इस प्रकार है-हरि मर्कट मर्कट वाम को परिमुञ्चति मुञ्चति शृङ्खलिकाम्) यह चौबीस अक्षरोंका मन्त्र है। विद्वान् पुरुष इस मन्त्रको दायें हाथमें बायें हाथसे लिखकर मिटा दे और एक सौ आठ बार इसका जप करे। ऐसा करनेपर कैदमें पड़ा हुआ मनुष्य तीन सप्ताहमें छूट जाता है। इसमें संशय नहीं है। इसके ऋषि आदि पूर्ववत् हैं। पूजन आदि कार्य भी पूर्ववत् करे। इसका एक लाख जप और शुभ द्रव्योंसे दशांश हवन करना चाहिये। मत्रसाधक पुरुष इस प्रकार कपीश्वर वायुपुत्र हनुमान्जीकी आराधना करता है, वह उन सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ हैं। अञ्जनीनन्दन हनुमान् जी की उपासना की जाय तो वे धन, धान्य, पुत्र, पौत्र, अतुल सौभाग्य, यश, मेधा, विद्या, प्रभा, राज्य तथा विवाद, विजय प्रदान करते हैं। सिद्धि तथा विजय देते हैं।
सनत्कुमारजी कहते हैं - अब मैं हनुमानजीके लिये रहस्यसहित दीपदान-विधिका वर्णन करता हूँ। जिसको जान लेनेमात्रसे साधक सिद्ध हो जाता है। दीपपात्रका प्रमाण, तैलका मान, द्रव्य-प्रमाण तथा तन्तु (बत्ती)-का मान-इन सबका क्रमश: वर्णन किया जायगा । स्थानभेद मन्त्र, पृथक्-पृथक् दीपदान-मन्त्र आदिका भी वर्णन होगा। पुष्पसे वासित तैलके द्वारा दिया हुआ दीपक सम्पूर्ण कामनाऑको देनेवाला माना गया है। किसी पथिकके आनेपर उसकी सेवाके लिये तिलका तैल अर्पण किया जाय तो वह लक्ष्मीप्राप्तिका कारण होता है। सरोका तेल रोग नाश करनेवाला है, ऐसा कर्मकुशल विद्वानों का कथन है। गेहूँ, तिल, उड़द, मूंग और चावल-ये पञ्चधान्य कहे गये हैं। हनुमानजीके लिये सदा इनका दीप देना चाहिये। पशधान्यका आटा बहुत सुन्दर होता है। यह दीपदानमें सदा सम्पूर्ण कामनाओं को देनेवाला कहा गया है।उचित है, लक्ष्मीप्राप्तिके लिये कस्तूरीका दीप लाभ विहित है, कन्याप्राप्तिके लिये इलायची, लौंग, बताय कपूर और कस्तूरीका दीपक बताया गया है। हो सख्य सम्पादन करनेके लिये भी इन्हीं वस्तुओंका कर्मो दीप देना चाहिये। इन सब वस्तुओंके न मिलनेपर अथवा पञ्चधान्य श्रेष्ठ माना गया है। आठ मुट्ठीका एक हन किञ्चित् होता है, आठ किञ्चित्का एक पुष्कल | है उसे होता है। चार पुष्कलका एक आढक बताया गया है, चार आढकका द्रोण और चार द्रोणकी खारी होती है। चार खारीको प्रस्थ कहते हैं अथवा यहाँ दूसरे प्रकारसे मान बताया जाता है दो पलका एक प्रसृत होता है, दो प्रसृतका कुडव हुआ दी माना गया है, चार कुडवका एक प्रस्थ और चार प्राप्तिका प्रस्थका आदक होता है। चार आढकका द्रोण संकटोंका और चार द्रोणकी खारी होती है। इस क्रमसे हनुमान् जी षट्कर्मोपयोगी पात्रमें ये मान समझने चाहिये। तथा व्याधि पाँच, सात तथा नौ-ये क्रमशः दीपकके प्रमाण समीप दीप हैं, सुगन्धित तेलसे जलनेवाले दीपकका कोई तथा दुष्ट । मान नहीं है। उसका मान अपनी रुचिके अनुसार ही माना गया है। तैलोंके नित्य पात्रमें केवल बत्तीका विशेष नियम होता है। सोमवारको धान्य सम्पूर्ण कार्यो लेकर उसे जलमें डुबोकर रखे। फिर प्रमाणके मूलभागमें दी अनुसार कुमारी कन्याके हाथसे उसको पिसाना विवाद-शान्ति चाहिये। पीसे हुएको शुद्ध पात्र में रखकर नदीके निवृत्तिके लिए जलसे उसकी पिण्डी बनानी चाहिये। उसीसे उतारनेके लिये शुद्ध एवं एकाग्रचित्त होकर दीपपात्र बनावे। जिस छुटकारा पाने समय दीपक जलाया जाता हो, हनुमत्कवचका पाठ करे। मङ्गलवारको शुद्ध भूमिपर रखकर जीवोंके आक्रम दीपदान करे। कूट बीज ग्यारह बताये गये हैं, बन्धनसे छूटनेके अतः उतने ही तन्तु ग्राहा है। पात्रके लिये कोई नियम नहीं है। मार्गमें जो दीपक जलाये जाते हैं, उनकी बत्तीमें इक्कीस तन्तु होने चाहिये। हनुमान् जी के दीपदानमें लाल सुत ग्राह्म बताया गया है। कूटकी जितनी संख्या हो उतना ही पल तेल दीपकमें डालना चाहिये। गुरुकार्यमें ग्यारह पलसे लाभ होता है। नित्यकर्ममें पाँच पल तेल आवश्यक बताया गया है। अथवा अपने मनकी जैसी रुचि हो उतना ही तेलका मान रखे। नित्य-नैमित्तिक कर्मोके अवसरपर हनुमान्जीकी प्रतिमाके समीप अथवा शिवमन्दिरमें दीपदान कराना चाहिये।
हनुमान् जी के दीपदानमें जो कोई विशेष बात है उसे मैं यहाँ बता रहा हूँ। देव-प्रतिमाके आगे, प्रमोदके अवसरपर, ग्रहोंके निमित्त, भूतोंके निमित्त, गृहोंमें और चौराहोंपर-इन छ: स्थलोंमें दीप दिलाना चाहिये। स्फटिकमय शिवलिङ्गके समीप, शालग्रामशिलाके निकट हनुमान्जीके लिये किया हुआ दीपदान नाना प्रकारके भोग और लक्ष्मीकी प्राप्तिका हेतु कहा गया है। विघ्न तथा महान् संकटोंका नाश करनेके लिये गणेशजीके निकट हनुमान्जीके उद्देश्यसे दीपदान करे। भयंकर विष तथा व्याधिका भय उपस्थित होनेपर हनुमद्विग्रहके समीप दीपदानका विधान है। व्याधिनाशके लिये तथा दुष्ट ग्रहोंकी दृष्टि से रक्षाके लिये चौराहे पर दीप देना चाहिये। बन्धनसे छूटनेके लिये राजद्वारपर अथवा कारागारके समीप दीप देना उचित है। सम्पूर्ण कार्योंकी सिद्धिके लिये पीपल और बड़के मूलभागमें दीप देना चाहिये। भयनिवारण और विवाद-शान्तिके लिये, गृहसंकट और युद्ध-संकटकी निवृत्तिके लिये तथा विष, व्याधि और ज्वरको उतारनेके लिये, भूतग्रहका निवारण करने, कृत्यासे छुटकारा पाने तथा कटे हुएको जोड़नेके लिये, दुर्गम एवं भारी बनमें व्याघ्र, हाथी तथा सम्पूर्ण जीवोंके आक्रमणसे बचनेके लिये, सदाके लिये बन्धनसे छूटनेके लिये, पथिकके आगमनमें, आने- जानेके मार्ग तथा राजद्वारपर हनुमान् जी के लिये दीपदान आवश्यक बताया गया है। ग्यारह, इक्कीस और पिण्ड-तीन प्रकारका मण्डलमान होता है। पाँच, सात अथवा नी-इन्हें मधुमान कहा गया है। दीपदानके समय दूध, दही, माखन अथवा गोबरसे हनुमान्जीकी प्रतिमा बनानेका विधान किया गया है। सिंहके समान पराक्रमी वीरवर हनुमान् जी को दक्षिणाभिमुख करके उनके पैरको रीछपर रखा हुआ दिखावे। उनका मस्तक किरीटसे सुशोभित होना चाहिये। सुन्दर वस्त्र, पीठ अथवा दीवारपर हनुमान् जी की प्रतिमा अङ्कित करनी चाहिये। कूटादिमें तथा नित्य दीपमें द्वादशाक्षर-मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये। गोबरसे लिपी हुई भूमिपर एकाग्रचित्त हो षट्कोण अङ्कित करे। उसके बाह्यभागमें अष्टदल कमल बनावे तथा उसके भी बाह्यभागमें भूपुर-रेखा खींचे। उस कमलमें दीपक रखे। शैव अथवा वैष्णव पीठकर अञ्जनीनन्दन हनुमान् जी की पूजा करे। छ: कोणोंके अन्तरालमें 'हौं ह्स्फ्रें ख्फें इसौं हस्खों हसौं,' इन छ: कूटोंका उल्लेख करे। छहों कोणोंमें बीजसहित छ: अङ्गोंको लिखे। मध्यमें सौम्यका उल्लेख करे और उसीमें पवननन्दन हनुमान्जीकी पूजा करके छ: कोणोंमें छ: अङ्गों तथा छ: नामोंकी पहले बताये अनुसार पूजा करे। कमलके अष्टदलोंमें क्रमशः इन वानरोंकी पूजा करनी चाहिये-'सुग्रीवाय नमः, अङ्गदाय नमः, सुषेणाय नमः, नलाय नमः, नीलाय नमः, जाम्बवते नमः, प्रहस्ताय नमः, सुवेषाय नमः।' तत्पश्चात् एक षडङ्ग देवताओंका पूजन करे। 'अञ्जनापुत्राय नमः, रुद्रमूर्तये नमः, वायुसुताय नमः, गुरु जानकीजीवनाय रामदूताय ब्रह्मास्वनिवारणाय नमः।' पञ्चोपचार (गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य)-से इन सबका पूजन करे करके कुश और जल हाथमें लेकर देश-कालके भाट उच्चारणपूर्वक दीपदानका संकल्प करे। उसके बार बाद दीप-मन्त्र बोले। श्रेष्ठ साधक उत्तराभिमुख करे ही उस मन्त्रको कूट संख्या के बराबर (छ. भार) जप कर हाथमें लिये पुए जलको भूमिपर गिरा दे। तदनन्तर दोनों हाथ जोड़कर यथाशक्ति मन्त्र-जप करे। फिर इस प्रकार कहे-'हनुमान्जी! उत्तराभिमुख अर्पित किये हुए इस श्रेष्ठ दीपकसे प्रसन्न होकर आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे सारे मनोरथ पूर्ण हो जायें।' इस प्रकार ये तेरह द्रव्य उपयुक्त होते हैं- गोबर, मिट्टी, मषी, आलता, सिंदूर, लाल चन्दन, श्वेत चन्दन, मधु, कस्तूरी, दही, दूध, मक्खन और घी। गोबर दो प्रकारके बताये गये हैं- गायका और भैंसका। खोये हुए द्रव्यको पुनः प्राप्तिके लिये दीपदान करना हो तो उसमें भैसके गोबरका उपयोग आवश्यक माना गया है। मुने! दूर देशमें गये हुए पथिकके आगमन, महादुर्गकी रक्षा, बालक आदिकी रक्षा, चोर आदिके भयका नाश आदि कार्यों में गायका गोबर उत्तम कहा गया है। वह भी भूमिपर पड़ा हो तो नहीं लेना चाहिये। जब गाय गोबर कर रही हो तो किसी पात्रमें आकाश से ही उसे रोक लेना चाहिये। मिट्टी चार प्रकारको कही गयी है सफेद, पौली, लाल और काली। उनमें गोपीचन्दन, हरिताल, गेरू. आदि ग्राह्य हैं; अन्य सब द्रव्य प्रसिद्ध एवं सबके लिये सुपरिचित हैं। विद्वान् पुरुष गोपीचन्दनसे चौकोर मण्डल बनाकर उसके मध्यभागमें भैसके गोबरसे हनुमान् जी की मूर्ति बनावे। मन्त्रोपासक एकाग्रचित्त हो बीज और क्रोध (हं)-से उनकी पूँछ अङ्कित करे। तेलसे मूर्तिको नहलाये और गुडसे तिलक करे । कमलके समान रंगवाला धूप, जो शालवृक्षकी गोंदसे बना हो, निवेदन करे। पाँच वत्तियोंके साथ तेलका दीपक जलाकर अर्पण करे। इसके बाद (हाथ धोकर) श्रेष्ठ साधक दही- भातका नैवेद्य निवेदन करे। उस समय वह तीन बार शेष (आ) सहित विष (म)-का उच्चारण करे। ऐसा करनेपर खोयी हाईसों, गौओं तथा दास-दासियांकी भी प्राप्ति हो जाती है। चोर आदि दुए जीला तथा सर्प आदिका भय प्रास होनेपर ताल' से चार दरवाजेका सुन्दर गृह बनाने । पूर्वक
*मा मा मा इस प्रकार उच्चारण करना चाहिये
द्वारपर हाथीकी मूर्ति बिठावे और दक्षिण द्वारपर मैंसेकी, पश्चिम द्वारपर सर्प और उत्तर द्वारपर व्याघ्न स्थापित करे। इसी प्रकार क्रमसे पूर्वादि द्वारोंपर खड्ग, छुरी, दण्ड और मुद्गर अङ्कित करके मध्य भागमें भैंसके गोबरसे मूर्ति बनावे। उसके हाथमें डमरू धारण करावे और यत्नपूर्वक यह चेष्टा करे कि मूर्तिसे ऐसा भाव प्रकट हो मानो वह चकित नेत्रोंसे देख रही है। उसे दूधसे नहलाकर उसके ऊपर लाल चन्दन लगाये। चमेलीके फूलोंसे उसकी पूजा करके शुद्ध धूपकी गन्ध दे। घीका दीपक देकर खीरका नैवेद्य अर्पण करे। गगन (ह), दीपिका (ऊ) और इन्दु (अनुस्वार) अर्थात् 'हूं' और शस्त्र (फट्) यह आराध्यदेवताके से आगे जपे। इस प्रकार सात दिन करके मनुष्य प्रद भारी भयसे मुक्त हो जाता है। उक्त दोनों प्रयोगोंका प्रारम्भ मङ्गलवारके दिन आदरपूर्वक करना चाहिये। शत्रुसेनासे भय प्राप्त होनेपर गेरूसे मण्डल बनाकर आज उसके भीतर थोड़ा झुका हुआ ताड़का वृक्ष अङ्कित कप करे। उसपरसे लटकती हुई हनुमानजीकी प्रतिमा गोबरसे बनावे। उनके बायें हाथमें तालका अग्रभाग और दाहिनेमें जान-मुद्रा हो। ताड़की जडसे एक हाथ दूर अपनी दिशा में एक चौकोर मण्डल बनावे। उसके मध्यभागमें मूर्ति अङ्कित करे। उसका मुख दक्षिणकी ओर हो, वह हनुमन्मूर्ति बहुत सुन्दर बनी हो, हृदयमें अज्जलि बाँधे बैठी हो। जलसे उसको स्नान कराकर यथासम्भव गन्ध आदि उपचार अर्पण करे। फिर घृतमिश्रित खिचड़ीका नैवेद्य निवेदन करे और उसके आगे 'किलि-किलि' का जप बताया गया है। प्रतिदिन ऐसा ही करे। ऐसा करनेपर पथिकोंका शीघ्र समागम होता है। जो प्रतिदिन विधिपूर्वक हनुमान् जी को, दीप देता है, उसके लिये तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य नहीं है। जिसके तदयों दुष्टता भरी हो, जिसकी बुद्धि दुस्ताका ही चिन्तन करती हो, जो शिष्य होकर भी विलयशून्य और चुगला हो, ऐसे मनुष्यको कभी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। कृतघ्नको कदापि इस रहस्यका उपदेश न दे। जिसके शील-स्वभावकी भलीभाँति परीक्षा कर ली गयी हो, उस साधु पुरुषको ही इसका उपदेश देना चाहिये। अब मैं तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाले दूसरे मन्त्रका वर्णन करूँगा। 'तार (ॐ) नमो हनुमते' इतना कहकर तीन बार जाठर (म)-का उच्चारण करे। फिर 'दनक्षोभम्' कह-कहकर दो बार 'संहर' यह क्रियापद बोले। उसके बाद 'आत्म-तत्त्वम्' बोलकर दो बार 'प्रकाशय' का उच्चारण करे। उसके बाद वर्म (हुं), अस्त्र (फट) और वह्निजाया (स्वाहा)-का उच्चारण करे। (पूरा मन्त्र यों है- ॐ नमो हनुमते मम मदनक्षोभं संहर संहर आत्मतत्त्वं प्रकाशय प्रकाशय हुं फट् स्वाहा) यह साढ़े छत्तीस अक्षरोंका मन्त्र है। इसके वसिष्ठ मुनि, अनुष्टप् छन्द और हनुमान् देवता हैं । सात-सात, छ:, चार, आठ तथा चार मन्त्राक्षरोंद्वारा षडङ्ग-न्यास करके कपीश्वर हनुमान्जीका इस प्रकार ध्यान करे-
जानुस्थवामन्बाहुं च ज्ञानमुद्रापर हदि।
अध्यात्मचित्तमासीनं कदलीवनमध्यगम्।।
बालार्ककोटिप्रतिम ध्यायेज्ञानप्रदं हरिम्।
(७५ ९५-९६)
'हनुमान्जीका बायाँ हाथ घुटनेपर रखा हुआ है। दाहिना हाथ ज्ञानमुद्रामें स्थित हो हृदयसे लगा है। वे अध्यात्मतत्त्वका चिन्तन करते हुए कदलीवनमें बैठे हुए हैं। उनकी कान्ति उदयकालके कोटि- कोटि सूर्याक समान है। ऐसे ज्ञानदाता श्रीहनुमान् जी का ध्यान करना चाहिये।
इस प्रकार ध्यान करके एक लाख जप करे और घृतसहित तिलकी दशांश आहुति दे, फिर , पूर्वोक्त पीठपर पूर्ववत् प्रभु श्रीहनुमान्जीका पूजन करे। यह मन्त्र-जप किये जानेपर निश्चय ही कामविकारका नाश करता है और साधक कपीश्वर हनुमान् जी के प्रसादसे तत्त्वज्ञान प्राप्त कर लेता है। पूर्व
अब मैं भूत भगानेवाले दूसरे उत्कृष्ट मन्त्रका मन वर्णन करता हूँ। 'ॐ ॐ श्रीं महाञ्जनाय ॐ श्रीहनुमते फट्।' यह भाग पचीस अक्षरका मन्त्र है। इस मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि, | चाहि गायत्री छन्द, हनुमान् देवता, श्री बीज और फट् नहीं शक्ति कही गयी है। छः दीर्घस्वरोंसे युक्त बीजद्वारा षडङ्ग-न्यास करे।
ध्यान
आञ्जनेयं पाटलास्यं स्वर्णाद्रिसमविग्रहम्।
पारिजातनुममूलस्थं चिन्तयेत् साधकोत्तमः॥
'जिसका मुख लाल और शरीर सुवर्णगिरिके सदृश कान्तिमान् है, जो पारिजात (कल्पवृक्ष)- के नीचे उसके मूलभागमें बैठे हुए हैं उन अञ्जनीनन्दन हनुमान् जी का श्रेष्ठ साधक चिन्तन करे।'
इस प्रकार ध्यान करके एक लाख जप करे और मधु, घी एवं शक्कर मिलाये हुए तिलसे दशांश होम करे। विद्वान् पुरुष पूर्वोक्त पीठपर पूर्वोक्त रीतिसे पूजन करे। मन्त्रोपासक इस मन्त्रद्वारा यदि ग्रहग्रस्त पुरुषको झाड़ दे तो वह ग्रह चीखता-चिल्लाता हुआ उस पुरुषको छोड़कर भाग जाता है। इन मन्त्रोंको सदा गुप्त रखना चाहिये। जहाँ-तहाँ सबके सामने इन्हें प्रकाशमें नहीं लाना चाहिये। खूब जाँचे बूझे हुए शिष्यको अथवा अपने पुत्रको हो इनका उपदेश करना चाहिये। (ना० पूर्व० ७४-७५)