नारद महा पुराण
गौतमाश्रम-माहात्म्यमें गोदावरीके पाकट्यका तथा पञ्चवटीके माहात्म्यका वर्णन
मोहिनी बोली- वसुजी! मैंने पुष्करका पापनाशक माहात्म्य सुन लिया। प्रभो! अब गौतम-आश्रमका माहात्म्य कहिये।
पुरोहित बसुने कहा- देवि! महर्षि गौतमका आश्रम परम पवित्र तथा देवर्षियों द्वारा सेवित है। वह सब पापोंका नाशक तथा सब प्रकारके उपद्रवोंकी शान्ति करनेवाला है। जो मनुष्य भक्तिभावसे युक्त हो बारह वर्षोंतक गौतम- आश्रमका सेवन करता है, वह भगवान् शिवके धाममें जाता है, जहाँ जाकर मनुष्य शोकका अनुभव नहीं करता। ब्रह्मपुत्री मोहिनी! महर्षि गौतमके तपस्या करते समय एक बार बारह वर्षोंतक घोर अनावृष्टि हुई, जो समस्त जीवोंका संहार करनेवाली थी। शुभे! उस भयानक दुर्भिक्षके आरम्भ होते ही सब मुनि अनेक देशोंसे गौतमके आश्रमपर आये। उन्होंने तपस्वी गौतमको इस बातकी जानकारी करायो कि 'आप हमें भोजन दें, जिससे हमारे प्राण शरीरमें रह सकें।' उन मुनियोंके इस प्रकार सूचना देनेपर महर्षि गौतमको बड़ी दया आयी। वे अपने ऊपर विश्वास करनेवाले उन ऋषियोंसे अपनी तपस्याके बलपर बोले।
गौतमने कहा-मुनियो! आप सब लोग मेरे आश्रमके समीप ठहरें। जबतक यह दुर्भिक्ष रहेगा, तबतक मैं आदरपूर्वक आपको भोजन दूंगा।
ऐसा कहकर गौतमने तपोबलसे गङ्गादेवीका ध्यान किया। उनके स्मरण करते ही गङ्गादेवी पृथ्वीतलसे प्रकट हुई। महर्षिने गङ्गाजीको प्रकट हुई देख प्रातःकाल पृथ्वीपर अगहनीके बीज रोपे और दोपहर होते-होते वे धानके पौधे बढ़कर उनमें फल लग गये। उसी समय वे पक भी गये; अतः मुनिने उन सबको काट लिया। फिर उसी अगहनीके चावलसे रसोई तैयार करके उन्होंने
उन ऋषियोंको भोजन कराया। भद्रे। इस प्रकार प्रतिदिन पके हुए अगहनी धानके चावलोंसे गौतमजीने भक्तिभावसे युक्त हो उन अतिथियोंका अतिथिसत्कार किया। तदनन्तर नित्यप्रति ब्राह्मण- भोजन कराते हुए मुनीश्वर गौतमके बारह वर्ष बीत जानेपर दुर्भिक्षकाल समाप्त हो गया। इसलिये वे सब मुनि मुनिश्रेष्ठ गौतमसे पूछकर अपने-अपने देशको चले गये। मोहिनी! गौतम मुनि बहुत वर्षोंतक वहाँ तपस्यामें लगे रहे।
तदनन्तर अम्बिकापति भगवान् शिवने उनकी तपस्यासे संतुष्ट हो उन्हें अपने पार्षदगणोंके साथ दर्शन दिया और कहा-'वर माँगो।' तब मुनिवर गौतमने भगवान् त्र्यम्बकको साष्टाङ्ग प्रणाम किया और बोले-'सबका कल्याण करनेवाले भगवन् !
आपके चरणोंमें मेरी सदा भक्ति बनी रहे और मेरे आश्रमके समीप इसी पर्वतके ऊपर आपको में सदा विराजमान देखें यही मेरे लिये अभीष्ट
वर है।' मुनिके ऐसा कहनेपर भोंको मनोमान्छिन वर देनेवाले पार्वतीवल्लभ भगवान् शिवने उन्हें अपना सामीप्य प्रदान किया। भगवान् त्र्यम्बक उसी रूपसे वहीं निवास करने लगे। तभीसे वह पर्वत त्र्यम्बक कहलाने लगा। सुभगे। जो मानव भक्तिभावसे गोदावरी-गङ्गामें जाकर स्नान करते हैं, वे भवसागरसे मुक्त हो जाते हैं। जो लोग गोदावरीके जलमें स्नान करके उस पर्वतपर विराजमान भगवान् त्र्यम्बकका विविध उपचारोंसे पूजन करते हैं, वे साक्षात् महेश्वर हैं। मोहिनी! भगवान् त्र्यम्बकका यह माहात्म्य मैंने संक्षेपसे बताया है। तदनन्तर जहाँतक गोदावरीका साक्षात् दर्शन होता है, वहाँतक बहुत-से पुण्यमय आश्रम हैं। उन सबमें स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करनेसे मनुष्य मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। भद्रे! गोदावरी कहीं प्रकट है और कहीं गुप्त फिर आगे जाकर पुण्यमयी गोदावरी नदीने इस पृथ्वीको आप्लावित किया है। मनुष्योंकी भकिसे जहाँ महेश्वरी देवी प्रकट हुई हैं, वहाँ महान् पुण्यतीर्थ है जो स्नानमात्रसे पापोंको हर लेनेवाला है। तदनन्तर गोदावरी देवी पञ्चवटीमें जाकर भलीभांति प्रकाशमें आयी हैं। वहाँ वे सम्पूर्ण लोकोंको उत्तम गति प्रदान करती हैं। विधिनन्दिनी! जो मनुष्य नियम एवं व्रतका पालन करते हुए पञ्चवटीकी गोदावरीमें स्नान करता है, वह अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जब त्रेतायुगमें भगवान् श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मणके साथ आकर रहने लगे, तबसे उन्होंने पशवटीको और भी पुण्यमयी बना दिया। शुभे! इस प्रकार यह सब गौतमाश्रमका माहात्म्य कहा गया है।